रविवार, 1 अगस्त 2021

Economic justice for all

तेजस्वी यादव के मुताबिक़ अब सामाजिक न्याय का कार्य पूरा हो चुका है ।
अब आर्थिक न्याय दिलाना ज़रूरी है ।कमजोर तबके को आर्थिक न्याय दिलाने के लिए कार्य होना। चाहिए ।
कांशी राम ने तो कई दशक पहले सत्ता में आने पर सवर्णो को reservations देने का ऐलान किया था 
वे अपनी जनसभाओं में कहा करते थे की सत्ता में क़ाबिज़ होने पर हम लोग अगाड़ी जातियों को न्याय दिलाएँगे ।
बाद में यही बात राम विलास पासवान , चिराग़ पासवान और मायावती कहती रही हैं ।
अब तेजस्वी यादव के बयान से लगता है की देश में सामाजिक न्याय का चक्र पूरा हो गया है ।
ऐसा लगता है की जाति की राजनीति करने वालों की नज़र upper caste पर है और वहीं दूसरी तरफ़ भाजपा और congress अभी भी दलित और obc वोट बैंक को अपने पाले में लाने की जुगत में जुटे हैं ।
राजनैतिक सोच के मामले में इन छेत्रिय नेताओं का नज़रिया नैशनल पार्टियों के नेताओं से ज़्यादा साफ़ और दूरगामी है ।
आज सही मायने में असली मुद्दा भूख बेरोज़गारी एजुकेशन स्वास्थ्य और महंगाई हैं।
जाति की राजनीति करने वाले कार्ल मार्क्स गांधी और दीन दयाल उपाध्याय का नाम लिए बग़ैर उन्ही के आर्थिक दर्शन को अपना कर आगे वड़ने की कोशिस में लगे है ।और दूसरी तरफ़ खुद को इन युग पुरुषों के स्वाभाविक उत्तराधिकरी समझने वाले उनके सिधांतों को तिलांजलि देकर आगे जाने की कोशिस में लगे हैं।

रविवार, 11 जुलाई 2021

Bjp vs opposition

भाजपा के मुक़ाबले विपछ की जुमलेबाज़ी ।
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देश के राजनैतिक दल और उसके नेता प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी से राजनैतिक तौर पर लड़ने में फिस्सडी साबित हो रहे हैं ।वे चाहते हैं की मीडिया और न्याय पालिका उनकी राजनैतिक लड़ाई भी लड़े।
अपनी राजनैतिक लड़ाई की विफलता के लिए वे मीडिया और न्यायपालिका को ज़िम्मेदार ठहराने में लगे हैं।
देश की ज़्यादातर ग़ैर भाजपा पार्टियाँ तथा उसके नेता समय समय पर सत्ता में आती रही हैं लेकिन उन्होंने अपने संगठन को मजबूत करने उसके लिए ज़मीनी स्तर तक कार्यालय बनाने के बजाय अपनी निजी सम्पत्ति जुटाते रहे हैं।
नतीजा सबके सामने हैं। पार्टियाँ कंगाल होती गयीं और उसके नेता मालामाल ।भाजपा ने अपने लगभग सात साल के शासन में पूरे देश में ज़िला स्तर तक अपना कार्यालय बना लिया है ।आख़िर दूसरे दलों को किसने रोका था ।
देश के ज़्यादातर भाजपा विरोधी नेता भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोपों से घिरे हैं । जाँच के डर से सरकार के ख़िलाफ़ बोलने से डर रहे हैं ।उनका आरोप है की मौजूदा सरकार  जाँच agencies का दुरुपयोग कर रही है ।
तो सवाल ये उठता है की क्या पिछली सरकारों ने ऐसा नहि किया था ?इस तरह के आरोप तो पहले भी लगते रहे है ।आज का विपछ सिर्फ़ जुमले बाज़ी कर रहा है । और चाहता है की उसकी राजनैतिक लड़ाई जनता न्यायपालिका और मीडिया लड़े ।

रविवार, 27 जून 2021

Loktantra ki loot

लोकतंत्र की लूट तो हमेशा होती रही है ।कभी धन बल तो कभी जन बल ।कभी जज़्बाती मुद्दों को उछाल कर तो कभी छेत्रियता को बडावा देकर।
इसीलिए तो कहा गया है कि अपरिपक्व लोकतंत के ख़तरे बहुत हैं।

इस समय उत्तर प्रदेश के ज़िला पंचायत  चुनावों की चर्चा कुछ ज़्यादा है ।
चुनावों में कई तरह के आरोप लग रहे हैं ।सरकार और सत्ता धारी पार्टी पर ग़लत तरीक़े से। चुनाव जीतने के आरोप भी हैं।
इस तरह के आरोप तो पहले भी लगते थे ।यह अलग बात है की तब आज का सत्ता धारी दल विपछ में हुआ करता था।
एक बार तो मायावती और मुलायम सिंह के बीच टकराव का कारण ही ज़िला पंचायत चुनाव था ।उत्तर प्रदेश में पहली बार मुलायम और मायावती -कांशीराम की पार्टी के बीच तालमेल से सरकार चल रही थी ।
लखनऊ के ज़िला पंचायत चुनाव में बसपा अपना प्रत्यासी नही उतार पायी । उसके प्रत्यासी को बताया जाता है की जबरन रोक दिया गया था परचा भरने से ।
दोनो दलों के नेताओं में इस मुद्दे को लेकर कई दिनो तक तनाव बना रहा । बयानबाज़ी होती रही ।एक दूसरे के ख़िलाफ़ ।
बग़ैर राजनैतिक जागरूकता और ईमानदारी के परिपक्व लोकतंत्र सम्भव नही है ।इसके लिए जनता को ईमानदार होना पड़ेगा ।जब तक ऐसा नहि होगा तब तक जनता और लोकतंत्र को धन जन और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के दम पर लूटा जाता रहेगा ।

रविवार, 20 जून 2021

Bjp

उत्तर प्रदेश भाजपा में क्या सही में गुट वाजी है? या आनेवाले विधान सभा चुनावों के मद्देनज़र पार्टी नेताओं को परस्पर विरोधी बयान बाज़ी करने की छूट दे दी गयी है। 
पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की रणनीति 2017 की तरह राजनैतिक सामाजिक छेत्रिय समीकरण को मज़बूत करके 2022 में फिर सत्ता में वापसी करनी है ।
शायद यही कारण है की निषाद मौर्य रजभर अनुसूचित जाति के नेताओं को बयानबाज़ी की इजाज़त मिल गयी है ।
इस  अभियान के तहत ये नेता राज्य के नेतृत्व पर भी सवाल खड़े करते दिखायी दे रहे हैं । इनमे केशव मौर्य स्वामी प्रसाद मौर्य सहित निषाद पार्टी के नेता ज़्यादा मुखर हैं।
इसके अलावा पार्टी और सरकार में ख़ाली पदों को भी भरने की मुहिम चल रही है ।पिछले एक हफ़्ते में सरकार और संघटन के दर्जनो पदों पर नियुक्तियाँ कर दी गयी हैं।
भाजपा की कोशिस विपछी दलों को चकमा देकर चुनाव जितने की है ।भाजपा नहि चाहती की 2022  के चुनाव में 2017 के चुनावी वायदों को याद दिलाया जायँ ।जनता की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़े मुद्दों पर चुनाव हो ।
पार्टी की तरफ़ से तीन तलाक़ लव जेहाद जैन संख्या क़ानून गो  वंस की हिफ़ाज़त राम मंदिर निर्माण काशी मथुरा जैसे मुद्दों के आधार पर आगामी चुनाव में जाने की कोशिस हो सकती है ।
अब देखना है की ग़ैर भाजपा पार्टियाँ खुद को कैसे भाजपा के ट्रैप से बचाकर जनता के मुद्दों को लेकर जनता के बीच में जा पाती हैं।विपछ में तमाम ऐसे दल हैंजो परोछ रूप से भाजपा की मदद में लगी हैं।
भाजपा एक अनुशासनिक पार्टी हैं।इसमें बाक़ी दलों की तरह बयान बाज़ी की इजाज़त नहि होती ।
इसलिए इस समय नेताओं के बयान स्वभाविक रूप से सवाल खड़ा करते हैं।

गुरुवार, 17 जून 2021

clash for power

West bengal से लेकर बेंगलूरू तक , बिहार  से लेकर उत्तर प्रदेश तक  ।पंजाब से लेकर राजस्थान तक ।या यूँ कहें तो लगभग देश के आधे से ज़्यादा हिस्सो  में राजनैतिक उथल पुथल  दिखायी दे रहा है ।
इस उथल पुथल का कारण कही सत्ता बचाने की क़वायद है तो कहीं पोलिटिकल dynasty बचाने की कोशिस ।ऐसा लगता है की इन राजनैतिक दलों और इनके नेताओं को आम जनता की चिंता से ज़्यादा अपने राजनैतिक भविष्य की है 
यह अलग बात है की ये सब कुछ जनता के हितों की आड़ में ही किया जा रहा है ।
इतिहास में सत्ता पर क़ाबिज़ होने को लेकर चाचा भतीजा , भाई भाई और दामाद —शाला के बीच में संघर्ष के सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं ।लेकिन जिस तरह का संघर्ष बिहार उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश में देखने को मिल रहा है उसका स्वरूप ही कुछ और है ।
कांग्रिस के बंशवादी राजनीति का विरोध करनेवाली पार्टियाँ खुद वंसवाद की शकर हैं ।
राम विलास पासवान जब राजनीति में आए थे उस समय सिधांतों की राजनीति होती थी । उनका पूरा जीवन संघर्षों से भरा था । उन्होंने कभी सोचा भी नहि होगा की उनके ना रहने पर उनके भाई और बेटा इस तरह से लड़ेंगे ।राम विलास पासवान की गलती यही रही की उन्होंने उम्र के आख़िरी पड़ाव में दूसरे भारतीय नेताओं की तरह परिवार वाद में उलझ कर रह गए ।
कमोवेश यही स्थिति कर्नाटक में एड्डुरप्पा तेलंगाना में चंद्र शेखर राव आंध्र में राम राव तमिल नाडु m करना निधि पंजाब में प्रकाश सिंह बादल मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह और कमल नाथ उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की रही ।
नतीजा विलकुल साफ़ है । जनता के मुद्दे और सिद्धांत पीछे छूट गए और परिवार हित सर्वोपरि हो गए ।कुछ लोगों ने परिवरवाद के बजाय व्यक्तिवादी राजनीति को बड़वा दिया जिसके चलते सरकार और संघटन में अधिनायकवादी सोच हाबी हो गए ।
लोकतंत्र  में इस तरह के सोच वाले नेता हमेशा अपने हितों की चिंता करते हैं ।

शुक्रवार, 11 जून 2021

Defection

वर्ष 2017 विधान सभा चुनाव वाला राजनैतिक समीकरण बनाने की कोशिश में जुटी है भाजपा ।
उत्तर प्रदेश में सरकार बनने के बाद से भाजपा के कुछ सहयोगी दलों के नेताओ में नाराज़गी रही है ।
अब पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उस नाराज़गी को कम करने की मुहिम में लगा है ।
हिंदी में एक बहुत ही मशहूर कहावत है 
कहीं का ईंट 
कहीं का रोड़ा 
भानुमति का 
कुनबा जोड़ा 
आज कल भारत की राजनीति पूरी तरह सिद्धांत विहीन रास्ते पर है 
सत्ता हर क़ीमत के सिद्धांत पर चल चुकी पार्टियाँ  कुछ दिन के लिए भले ही सत्ता में आ रही हैं लेकिन उनकी मौजूदगी का गुड़ातमक असर शासन प्रशासन पर दिखायी नहि देता ।
शायद यही कारण है की देश और समाज का भला करने में ज़्यादातर पार्टियों की सरकारें विफल रही हैं ।
एक चुनाव ख़त्म होते ही दूसरे चुनावों की तैयारी हमारे देश के नेताओं को दीर्घ क़ालीन दूरदर्शी नीतियों को बनाने में बाधक साबित होबरहे हैं ।
चुनावों को जीतने के मक़सद से जनता से लेकर अपने राजनैतिक सहयोगियों से किए गए झूठे वायदे सत्ता में आने के बाद गम्भीर चुनौती पैदा करते हैं।
आज की तारीख़ में देश के किसी भी नेता के पास वह नैतिक साहस नहि है जो अवाम के बीच में जाकर मूल भूत मुद्दों के आधार पर जनादेश हासिल करने की कोशिस करे ।
यही कारण है की चुनाव ख़त्म होते ही दलों के अंदर सिर फूटौल शुरू हो जाता है ।
यहाँ पर गोस्वामी तुलसी दास जी द्वारा रचित चौपायी का उलेख करना मुनासिब लगता है 
सुर नर मुनि जन की यही रीति 
स्वार्थ लागी करें सब प्रीति 
इसलिए दल बदल , आया राम गया राम , और अब कपिल सिब्बल के मुताबिक़ परसादम की संस्कृति को लेकर अब कोई आश्चर्य नहि हो रहा है ।
दल बदलूँ नेताओ ने साफ़ कर दिया है की राजनीति अब सेवा का नहि रोज़गार का माध्यम है ।

मंगलवार, 8 जून 2021

Sangh pariwar-bjp

Either you hate me or you love me 
But you can’t ignore me 
अंग्रेज़ी का यह फ़ेमस वाक्य भाजपा और इसके पैत्रिक संघटन आर एस एस पर पूरी तरह लागू होता है 
अपने गठन के दिन से लेकर आज तक जिस तरह की निरंतरता और consistency इन संघटनो के काम काज में देखने को मिलती है उस तरह की continuity and consistency शायद ही किसी दूसरे राजनैतिक सामाजिक या सांस्कृतिक संघटन के काम काज में देखने को मिले ।
इन संघटनो और इनके कार्यकर्ताओं के मनोबल पर कभी भी जय या पराजय का असर उतना नही होता जितना दूसरे संघटनो के कार्यकर्ताओं पर होता है ।लक्ष्य प्राप्ति तक इनका संघर्ष और प्रयास जारी रहता है ।
West bengal का चुनाव हारने के बाद जिस तेज़ी और सिद्दत से पूरा संघ परिवार और उसके frontal organisations के लोग आगामी विधान सभा चुनावों की तैयारी में जुटे हैं उस तरह की तैयारी और किसी राजनैतिक दल में तो देखने को नही मिल रही है ।
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी  बहुजन समाज पार्टी और कांग्रिस का शीर्ष नेतृत्व पूरे राजनैतिक पटल से नदारद  है ।जब की कोविड महामारी के चलते जनता में व्याप्त आक्रोश और नाराज़गी के बावजूद संघ परिवार और भाजपा के कार्यकर्ता घर घर जाकर लोगों से जन सम्पर्क स्थापित करने में लगे है ।
कमोवेश यही स्थिति उत्तराखंड गुजरात गोवा हिमाचल प्रदेश में भी देखने को मिल रही है 
पंजाब में चल रही कोंग्रेसी कलह के पीछे भी भाजपा का हाथ बताया जा रहा है ।
कृषि क़ानूनों के चलते भाजपा सरकार से सर्वाधिक नाराज़गी पंजाब के किसानो की है ।कृषि क़ानूनों के चलते भाजपा का साथ उसका सहयोगी अकाली दल भी छोड़ चुका है ।
चुनावी तैयारी के लिहाज़ से सबसे लचर और दयनीय हालत में कांग्रिस पार्टी ही दिखायी दे रही है ।पार्टी का सारा ज़ोर ट्वीटर और सोशल मीडिया के ज़रिए अपनी खोयी हुई राजनैतिक ज़मीन और सत्ता वापस पाने की है ।
वास्तव में कांग्रिस पार्टी के veteran नेताओं का एक बहुत बड़ा तबका भाजपा सहित दूसरे ग़ैर कोंग्रेसी दलों से लड़ने के बजाय राहुल प्रियंका सोनिया गांधी को कमजोर करने में जुटा है ।उनकी कोशिस गांधी परिवार को कांग्रिस पार्टी से वेदख़ल करने की है ।अपनी इस मुहिम को सफल बनाने के लिए ये नेता गांधी परिवार विरोधी तमाम नेताओं के सम्पर्क में हैं ।
गांधी परिवार विरोधी इन नेताओं के आर्थिक घोटालों में लिप्त होने के आरोपों के चलते कोंग्रेस  को कई बार सत्ता से वेदख़ल होना पड़ा ।
दिल चस्प बात ये है की इन नेताओं के पास अकूत निजी सम्पत्ति है लेकिन पार्टी पदाधिकारी रहते हुए ये नेता गड़ अपना यात्रा भत्ता भी पार्टी के खाते से लेतेरहे हैं।
ऐसे जनाधार विहीन नेताओं की हरकतों के चलते पार्टी कंगाल होती गयी और ये लोग माल माल होते गए ।आजकल ये लोग चुप हैं ।विधान सभा चुनावों के शुरू होते ही ये फिर सक्रिय होंगे पार्टी और गांधी परिवार को कमजोर करने के लिए ।
मेरी राय में सार्वजनिक जीवन में कार्य करने वालों को वैचारिक भिन्नतावों के बावजूद संघ परिवार और भाजपा की कार्य शैली और अनुशासन से सबक़ लेना चाहिए ।
सत्ता में आने के बाद जितने कम समय में संघ और भाजपा ने अपनी राजनैतिक और आर्थिक  संगठनिक ताक़त बड़ायी और उसका विस्तार किया वह क़ाबिले तारीफ़ है ।
इसलिए तमाम प्रशासनिक ख़ामियों , कोविड महामारी के दौरान कूप्रबंधन के बावजूद देश की राजनीति में संघ परिवार और भाजपा आज भी प्रासंगिक हैं ।

रविवार, 6 जून 2021

Lucknow Imambara

लखनऊ का विश्व प्रसिद्ध आसफ़ी इमामबाड़ा भी लगभग 11  साल तक चले दुर्भिछ (अकाल) के वक्त में ही 1874 में बना था ।लखनऊ के तत्कालीन नवाब आसफ़दौल्लाह ने अपनी अवाम को रोज़गार  उपलब्ध कराने के मक़सद से इस ऐतिहासिक इमामबाड़ा का निर्माण कराया था 
बताया जाता है की इस ऐरिहासिक इमारत के निर्माण में लगभग 20 हज़ार मज़दूरों ने दिन रात कार्य किया था । निर्माण कार्य दिन रत चलता था ।यह ऐतिहासिक इमारत 11  साल में बनकर तैयार हुई थी और अकाल भी 11 साल चला था ।
देश के अलग अलग हिस्सों में इस समय भी सरकारी और ग़ैर सरकारी   इमारतें बन रही हैं 
महामारी के इस दौर में हज़ारों करोड़ रुपए लगाकर बनायी जानेवाली इन इमारतों का मक़सद भी ज़रूरतमंद लोगों को रोज़गार उपलब्ध कराना हो सकता है ।
महामारी तो चलती रहेगी लेकिन मानव जीवन और उसकी ज़रूरतों पर भी ध्यान देना ज़रूरी है ।जनता के लिए ऑक्सिजन वेड और ventilators और दवाइयों के इंतज़ाम तो अब हो ही गए हैं ।
अब बाक़ी बातों और मसलों पर ध्यान देना ज़रूरी है ।मसलन चुनाव कराना नेता बदलना महामारी के कूप्रबंधन के लिए एक दूसरे पर दोषारोपण करना ।
मौसम महामारी और चुनावों का है इसलिए जाति धर्म देश भक्ति करप्शन जैसे सभी जुमले फिर उछले जाएँगे । चर्चा तो शायद बेरोज़गारी महंगाई बदतर अर्थ व्यवस्था और इंटर्नैशनल boarders की सुरकछा का भी हो ।
लेकिन पोलिंग के दिन तक आते आते मुद्दे शायद फिर वही बन जायँ जिन मुद्दों पर अभी तक चुनाव होते रहे हैं।और महामारी बेरोज़गारी बदहाल अर्थ व्यवस्था  विकास एक बार फिर अगले चुनावों के लिए राजनीति की तिजोरी में सम्भाल कर रख दिए जायँ ।
इसलिए मेरी राय में इमारतों के निर्माण का विरोध करने वालों को यह भी समझना चाहिए कि लोक कल्याणकारी सरकारों के लिए इस तरह के कार्य उनके दायित्वों में शामिल हैं।
शायद यही कारण है की उत्तर भारत की एक मात्र नेता मायावती हैं जिन्होंने सत्ता में रहते हुए सरकारी ख़ज़ाने का हज़ारों करोड़ रुपया मूर्तियों और स्मारकों के बनाने में खर्च कर दिया था ।अपने सपनो के प्राजेक्ट्स को पूरा करने में उन्होंने किसी की परवाह नहि की । और जो लोग उस समय मायावती का विरोध कर रहे थे वही लोग बाद में उनसे पोलिटिकल अलाइयन्स करके चुनाव में चले गए ।

शनिवार, 5 जून 2021

Mayawati

क्या मायावती जी आने वाले विधान सभा चुनावों में ख़ास तौर पर उत्तर प्रदेश में ओवैसी की भूमिका निभाएँगी ?
मायावती ने पिछले दिनो अपने दल के दो क़द्दावर नेताओं लाल जी वर्मा और राम अचल रजभर को पार्टी से निकाल कर उनके स्थान पर शाह आलम को नामित किया है 
शाह आलम पेशे से बिल्डर हैं और बसपा के विधायक हैं इसके अलावा कई और मुस्लिम नेताओं को अहम ज़िम्मेदारी दी गयी है 
मायावती पर इससे पहले भी गुजरात मध्य प्रदेश राजस्थान सहित कई राज्यों में कांग्रिस के वोट को काटने के मक़सद से अपने उमीदवार उतारने के आरोप लगते रहे हैं 
उत्तर प्रदेश इस तरह के आरोप समाजवादी पार्टी का वोट काटने का हो सकता है 
उत्तर प्रदेश और पंजाब में विधान सभा के चुनाव हैं उत्तर प्रदेश में भाजपा का सीधा मुक़ाबला समाजवादी पार्टी और पंजाब में कांग्रिस से होने वाला है 
मायावती पर पहले भी भाजपा से मिलकर राजनैतिक समीकरण बिगाड़ने के आरोप लगते रहे हैं 
यह भी सच है की मायावती भाजपा के समर्थन से ही दो बार मुख्य मंत्री बनी है पिछले लगभग दो साल से भाजपा के भाजपा सरकार के ख़िलाफ़ मायावती की चुप्पी आने वाले वक्त के राजनैतिक समीकरण का संकेत भी हो सकता है 
शायद इसीलिए उत्तर प्रदेश में मायावती की भूमिका को ओवैसी की भूमिका के रूप में देखा जा रहा है 
पिछले दिनो हुए चुनावों में ओवैसी की वजह से भाजपा को कई राज्यों में राजनैतिक लाभ मिला था ओवैसी को भाजपा विरोधी वोट को काटने वाला कहा जाने लगा 
इस बार के विधान सभा के चुनाव परिणाम 2024 के लोक सभा चुनाव के सेमी फ़ाइनल के रूप में माने जाएँगे 
इस लिए इन विधान सभाओं के चुनाव कांग्रिस और भाजपा के राजनैतिक दसा और दिशा तय करेंगे ।

मंगलवार, 1 जून 2021

Internal Crisis

उत्तर प्रदेश और पंजाब में देश की दोनो national parties आंतरिक गुट बाज़ी की शिकार दिखायी दे रही हैं
आने वाले दिनो में दोनो राज्यों के विधान सभा चुनाव हैं चुनाओ के पहले इस तरह के राजनैतिक उठा पटक कोई नयी बात नही है लेकिन महामारी के मद्देनज़र इस तरह का कलह नुक़सान दायक साबित हो सकता है 
पंजाब की गुटबाज़ी तो पहले से जगज़ाहिर है 
राहुल गांधी से लेकर नवजोत सिंह सिंधू सहित एक गुट कैप्टन अमरिंदेर से नाराज़ है लेकिन उनको हटा पाने में नाकाम रहा है 
सिंधू तो एक बार नाराज़ होकर आम आदमी पार्टी का भी दरवाज़ा खटखटा चुके हैं देखना है इस बार की नाराज़गी उनको किसके दरवाज़े पर जाने के लिए मजबूर करती है 
कृषि क़ानूनों के चलते पंजाब के किसान सबसे ज़्यादा नाराज़ हैं भाजपा का भरोसे मंद साथी अकाली दल भी उसको साथ छोड़ चुका है ऐसे हालात में भाजपा को भी एक भरोसेमंद चेहरे की तलास है सिंधू भाजपा छोड़कर ही congress में गए हैं
भाजपा कुछ वर्षों से दूसरे दलों के नेताओं को शामिल करके  चुनाव लड़ती रही है तो क्या सिंधू की घरवापसी हो गी  या अपनी माँग पूरी ना होने की स्थिति में आम आदमी पार्टी की तरफ़ जाएँगे 
अभी तक के राहुल गांधी के ट्रैक रेकर्ड को अगर डेलह जायँ तो वे अंदरूनी गुटबाज़ी की निपटाने में विफल रहे है पिछले कुछ वर्षों में हुए विधान सभा। चुनाओ में कांग्रिस पार्टी की हर के प्रमुख कारण कदावर नेताओं का दूसरे दलों में शामिल होना है 
राहुल गांधी की वजह से देश के तमाम राज्यों में कांग्रिस पार्टी सत्ता से बेदख़ल हो गयी अगर समय रहते पंजाब की गुटबाज़ी ख़त्म नहि हूयी तो दुबारा कांग्रिस पार्टी का सत्ता में वापसी मुसकिल होगा और किसानो की नाराज़गी का राजनैतिक लाभ आम आदमी पार्टी को ज़्यादा मिल सकता है 
उत्तर प्रदेश भाजपा का अंदरूनी कलह आने वाले चुनावों के मद्दे नज़र आत्मघाती हो सकता है चुनाव पूर्व सत्तारूढ़ दल में कलह स्वाभाविक प्रक्रिया है इस तरह की गतिविधियाँ लगभग सभी दलों में देखने को मिलती है अपने  राजनैतिक भविष्य को ध्यान में रखते हुए नेताओं का दल बदल भी होता रहा है 
लेकिन पार्टी नेतृत्व को ऐसे लोगों को चिन्हित करके उनको सम्भालने की कोशिस करनी चाहिए 
कांग्रिस के मुक़ाबले भाजपा का शीर्ष नेतृत्व ज़्यादा जागरूक दिखायी दे रहा है ऐसा लगता है की वे इस अंदरूनी कलह को रोक पाने में कामयाब रहेंगे दिल्ली और लखनऊ में चल रही क़वायद पार्टी नेतृत्व के इसी कोशिस का हिस्सा है

गुरुवार, 13 मई 2021

COVID 19

Congress के एक बड़े नेता हुआ करते थे श्री सीता राम केसरी ।उनकी पार्टी के नेता उन्हें “चाचा केसरी “ कह कर सम्बोधित किया करते थे ।चाचा केसरी लम्बे समय तक congress पार्टी के treasurer रहे ।बाद में पार्टी president भी बन गए थे ।
Treasurer रहते हुए चाचा के बारे में एक कहावत मशहूर थी 
खाता ना बही 
चाचा जो कहे 
वही सही ।
देश इस समय महामारी से जूझ रहा है ।COVID management task force कु तरफ़ से रोज़ नए नए guidelines जारी किए जा रहे है ।आज इसी क्रम में covishield के बारे में तीसरी बार guideline जारी की गयी है ।
आज की guideline covi shield ke pahle aur dusare dose ke bich gap ki hai ।आज की guideline के बाद कई तरह की आशंका पैदा हो गयी है ।सरकार की तरफ़ से इस आशंका को दूर करने की कोशिस की गयी है ।
लेकिन आम लोगों में trust deficit  साफ़ तौर पर दिखायी दे रहा है ।लोगों के सामने सरकारी फ़रमानो पर भरोसा करने के अलावा और कोई विकल्प नहि है .
इसलिए मौजूदा हालात में चाचा केसरी और उनकी कार्य शैली ज़्यादा याद आ रही है ।
उमीद है कि सरकार अवाम की मानसिक स्थिति को समझेगी और महामारी प्रबंधन को लेकर जारी होने वाले self contradictory guidelines से बचने की कोशिस करेगी ।
वास्तव में अगर देखा जायँ तो पिछले सात वर्षों में केंद्र सरकार ने नोट बंदी और gst जैसे दो ऐतिहासिक फ़ैसले किए ।लेकिन फ़ैसलों को लागू करवाने के लिए दर्जनो ऐसे notifications और guidelines जारी किए जाते रहे जिनका implementation और execution  respective agencies के लिए कई हफ़्तों तक   चुनौती बना रहा ।

शनिवार, 17 अप्रैल 2021

COVID 19

ऐसे अधिकारियों से सावधान रहना चाहिए जो कारोबारी बन चुके हों।ये कारोबारी अधिकारी 24x7 अपना कारोबार और अपनी कुर्सी बचाने की जुगत में रहते हैं।संकट के समय उनसे good and effective governance, की उमीद करना बेमानी है ।
ईमानदारी पारदर्शिता तो उनके शब्दकोश से कोसो दूर है ।उनकी एक मात्र कोशिस ग़लत तरीक़े से बनाए अपने हज़ारों करोड़ के आर्थिक साम्राज्य को बचाने की ही रहती है 
इसके लिए वे किसी से भी किसी भी हद तक नीचे गिरकर समझौता कर सकते हैं।
देश के अलग अलग राज्यों के हालात भयावह हैं ।सरकारी मशीनरी पूरी तरह विफल और लाचार दिखायी दे रही है।अवाम भगवान के भरोसे है ।
इस हालात से सत्ता के शीर्ष पर वैठे राज नेताओं को सबक़ लेनी चाहिए । प्रशासनिक टीम बनाते समय चाटुकार, corrupt , अयोग्य अधिकारियों के बजाय honest efficient transparent experienced अधिकारियों को वरीयता देनी चाहिए ।
तभी भविस्य में होने वाले ऐसे हालातों को रोका जा सकेगा ।
इस समय महामारी के इस दौर में हज़ारों साल  पहले European history के एक युग की याद ताज़ा हो गयी है ।एक दौर था जब चर्च की सत्ता सर्वोपरि थी ।योरोपीय समाज का जीवन चर्च के ही निर्देशों के तहत चलता था ।
चर्च की रोज़ मर्रा की ज़िंदगी में इतनी अधिक दखलंदजी थी की स्वर्ग और नर्क में जाने का फ़ैसला भी यही पर permit के ज़रिए हो जाता था ।
उस दौर के राजा को भी मरने से पहले अपने तथा अपने सहयोगियों के लिए पर्मिट के ज़रिए स्थान अरछित करवानी पड़ती थी ।राजा के मरने के साथ ही उनके सहयोगियों को भी उसके साथ जाना पड़ता था ।
बाद में चर्च की इस सत्ता के ख़िलाफ़ धार्मिक सुधार आंदोलन हुआ और जन आक्रोश के सामने चर्च को झुकना पड़ा ।आंदोलन से पहले उस समय के सलाहकार और कारिंदे आज ही की तरह राजा को ग़लत सलाह दिया करते थे ।
अब हम आज कल लोकतांत्रिक व्यवस्था के हिस्सा हैं । लेकिन कारिंदों और सलाहकारों की कार्य शैली कमोवेश उसी तरह है ।पहले उल्टा पलटा जनविरोधी सलाह देकर सत्ता के शीर्ष पर वैठे व्यक्ति को श्रीहीन बना देते हैं।
और बाद में इलेक्शन के परिणाम आने के पहले ही अपनी तैनाती मनचाही जगह पर करवाकर फ़ाइल अपने ही पास रखे रहते हैं ।
सत्ता बदलने के बाद नए सरकार में जोड़तोड़ में विफल रहने के बाद पहले से करवाई गयी तैनाती वाली जगह पर चले जाते हैं।
राज नेताओं को अपनी गलती का एहसास सत्ता से बेदख़ल होने के बाद होता है ।महामारी के वक्त भी यही नजारा देखने को मिल रहा है ।जनता बग़ैर बेड ऑक्सिजन ventilator मर रही है ।लेकिन इन कारोबारी अधिकारियों ने अपने लिए सबकूछ advance में reserve करवा लिया है ।वास्तव में यह कृत्य लोकशाही और मानवता के ख़िलाफ़ जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है ।

सोमवार, 12 अप्रैल 2021

judges re-employment

देश की अलग अलग अदालतों से retire होने के बाद विभिन्न सरकारों द्वारा judges साहबान को reemployment देने की परिपाटी रही है ।lower courts से लेकर supreme court तक के तमाम न्यायाधीशों को इस परिपाटी का लाभ मिलता रहा है ।
शर्त महज़ एक ही होती है की सरकार से उनके कितने मधुर रिश्ते रहे हैं ।इसी परम्परा के तहत उत्तर प्रदेश की सरकार ने 
अयोध्या बाबरी विध्वंस में एलके आडवाणी समेत 32 आरोपियों को बरी करने वाले पूर्व न्यायाधीश सुरेंद्र यादव को उप लोकायुक्त नियुक्त किया है ।

CBI court के पूर्व न्यायाधीश सुरेंद्र यादव अब करेप्शन की जांच करवाने की जिम्मेदारी निभाएंगे।
इसके पहले supreme court के तमाम  retired judges ——रंग नाथ मिश्रा , वाई सी सब्बरवाल, k balakrishanan sadashivam और ranjan gogai सरीखे judges reemployment पा चुके हैं।
Allhabad high court और lucknow high कोर्ट के भी जस्टिस विष्णु सहाय और जस्टिस हैदेरअब्बास रजा आदि सरकारी मदद से re-employment पर रह चुके हैं।
देश के अलग अलग राज्यों में भी इसे मामलों की बहुतायत है ।
सवाल re-employment का नहि है ।सवाल है क्या ये महानुभाव नौकरी में रहते हुए अपने दायित्वों को  free and fair. Unbiased तरीक़े से निभाते रहे है?

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

scams

मायावती सरकार द्वारा लखनऊ और नॉएडा में बनवाए गए पार्कों के निर्माण में हुए कथित घोटाले के आरोप में up vigilence deptt की लखनऊ यूनिट ने आज कुछ junior अधिकारियों को गिरफ़्तार किया है ।
लेकिन सैकड़ों करोड़ के इस घोटाले में उस दौर के ज़्यादा तर ias अधिकारियों के विरुध अभी तक कोई करवाई नही हुई है ।
इनमे से कुछ तो आज भी महत्वपूर्ण पदों पर जमे हुए है । ऐसे अधिकारी अखिलेश सरकार में भी अपनी तैनाती कराने और खुद को बचाने में कामयाब रहे ।
पार्क घोटाले की जाँच उत्तर प्रदेश के लोक आयुक्त के आदेश पर shuरु हुई थी ।लखनऊ के गोमती नगर में fir भी दर्ज हुआ था ।लेकिन दोषियों के ख़िलाफ़ कारवाई की शुरुआत अब हुई है ।उमीद है की आगे चलकर घोटाले के ज़िम्मेद्दर शायद बड़े ias aur pcs अधिकारियों के ख़िलाफ़  भी कारवाई होगी

covid 19

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में अब इलाज के पर्याप्त इंतज़ाम कर दिए गए हैं 
देश के defence minister और लखनऊ के सांसद राजनाथ सिंह ने अब लखनऊ निवासियों की जान बचाने का बीड़ा उठाया है
उनके प्रतिनिधि की तरफ़ से 9 april की रात्रि जारी एक हस्त लिखित बयान में दावा किया गया है की करोना मरीज़ों के इलाज की पूरी व्यवस्था कर ली गयी है ।आप लोगों की सुविधा के लिए हमने उनकी चिट्ठी भी नीचे paste कर दी है ।
राजनाथ सिंह जी का प्रयास सराहनीय है ।देश की सीमाओं के साथ ही लखनऊ की जनता की  चिंता उनके सांसद होने के दायित्व का एहसास कराता है ।
लेकिन अहम सवाल लखनऊ से निर्वाचित mlas और लखनऊ कोटे से राज्य मंत्रिमंडल में शामिल उन महानुभावों से भी है ।जितनी ज़िम्मेदारी राजनाथ जी की है उतनी ही ज़िम्मेदारी उनकी भी है ।
शायद वे लोग भी लखनऊ निवासियों की जान बचाने में जुटे होंगे ।

सोमवार, 22 मार्च 2021

Police

इलाहाबाद high कोर्ट के पूर्व जज a n mulla ने कई दशक पहले एक मामले की सुनवाई के वक्त police force को organised gang of criminals कहा था ।
Justice mulla के observation को बाद में भी पेश किया जाता रहा है । देश में जहां भी  police ज़्यादती की शिकायतें आती हैं तब अलग अलग अदालतें इस तरह की comments  करती रही हैं 
वावजूद इसके पुलिस की कार्य शैली में कोई ख़ास बदलाव नज़र नही आता ।पुलिस reform के नाम पर पूरे देश में हज़ारों करोड़ रुपया पानी की तरह भले ही बहाया जा चुका हो ।
वैसे तो फ़र्ज़ी मुठभेड़ दिखा कर हत्याएँ करने का शिलशिला पुराना है ।ats stf sit sog सरीखे पुलिस टीम के सदस्यों पर अपराधियों से पैसा लेकर एक दूसरे अपराधियों को मरने के आरोप पहले भी लगते रहे हैं 
रुपए के दम पर थाने से लेकर ज़िलों तक में तैनाती के आरोप पुलिस विभाग के अधिकारी ही समय समय पर लगाते रहे हैं । लेकिन हंगामा तब होता है जब इसके पीछे कोई पोलिटिकल अजेंडा होता है ।
मुंबई के पुलिस commisioner पद से हटाए गए परमवीर सिंह ने maharastra के गृह मंत्री अनिल देशमुख पर इसी तरह के गम्भीर आरोप लगाए हैं 
मामला supreme court से लेकर संसद तक में पहुँच चुका है । शरद पवार और उनकी पार्टी के नेता परमवीर सिंह के आरोपों को शीरे से ख़ारिज कर रहे हैं।आरोपों को राजनीति प्रेरित मानते हैं ।
परमवीर सिंह supreme court से मामले की जाँच cbi से करवाने की अपील किए हैं और भारतीय जनता पार्टी उधव सरकार से इस्तीफ़े की माँग कर रही है ।
इस घटना ने एकबार फिर पुलिसिया कार्यशैली पर सवाल खड़ा कर दिया है ।परम वीर सिंह के लेटर से पूरे maharastra की राजनीति एक बार फिर गरम हो गयी है और भाजपा को इस आपदा में अवसर दिखायी दे रहा है ।

बुधवार, 17 मार्च 2021

worship places act

Supreme court में पिछले दिनो दो याचिकाएँ दाखिल हुई है 
एक याचिका के ज़रिए worship places act पर फिर से विचार करने और दूसरी याचिका के ज़रिए Holy Quran की कुछ आयतों को हटाने की अपील की गयी है 
ऐसी याचिकाओं पर विचार करने से पहले supreme कोर्ट को देश की मौजूदा हालात को ध्यान में रखते हुए कोई फ़ैसला लेना चाहिए ।
देश इस समय internal aur external चुनौतियों से जूझ रहा है ।महंगाई बेरोज़गारी बदहाल आर्थिक हालात आम लोगों की ज़िंदगी बहाल किए हुए हैं ।
अदालतों में भी judges की कमी की वात supreme court के ही कई पूर्व judges कह चुके हैं । मुक़दमों की तादाद बड़ती जा रही है ।
ऐसे हालात में honourable supreme कोर्ट को अवाम से जुड़े मामलों पर विचार करना चाहिए ।ऐसी याचिकाएँ मज़हबी कम राजनैतिक ज़्यादा प्रतीत होती हैं।

सोमवार, 15 मार्च 2021

meghalya governor

किसान आंदोलन के समर्थन में मेघालय के राज्यपाल सत्य पाल मलिक का बयान क्या  unconstitutional conduct नहीं है ।
आख़िर उन्होंने ऐसा बयान क्यों दिया । क्या वे  आपदा में अवसर की तलास में हैं ।क्या वे राज्य पाल पद से त्याग पत्र देकर सक्रिय राजनीति में आने वाले हैं?
देश के किसान कृषि क़ानूनों को लेकर नाराज़ है ख़ास तौर पर west उ प हरियाणा और पंजाब में केंद्र सरकार और भाजपा के ख़िलाफ़ नाराज़गी है ।किसानो को मनाने में भाजपा पूरी तरह विफल रही है ।क्या अब सत्यपाल मलिक को आगे करके भाजपा किसानों को अपने पाले में लाना चाहती है ? 
रणनीति चाहे जो हो लेकिन एक बात तय है की राज्यपाल के पद पर रहते हुए सत्य पाल मलिक का आचरण मर्यादित नहीं है।

मंगलवार, 9 मार्च 2021

uttarakhand c m

उत्तराखंड के मुख्य मंत्री पद से त्रिवेंद्र सिंह रावत की विदाई हो गयी ।उनकी विदाई के पीछे वहाँ की जनता से ज़्यादा साधु संतों की नाराज़गी बतायी जा रही है 
त्रिवेंद्र जी का विरोध तो वहाँ के विधायकों और जनता उनके मुख्य मंत्री बनने के दिन से ही कर रही थी ।लेकिन पार्टी आला कमान के डर से कोई सामने आने को तैयार नहीं था ।
त्रिवेंद्र जी ने मुख्य मंत्री रहते हुए देव स्थानम  बोर्ड का गठन किया था और उत्तराखंड के जिन 52 मंदिरों का अधिग्रहण किया गया था उनके ज़्यादातर पुजारी ब्राह्मण समाज के थे ।रावत जी पर ब्राह्मण के ख़िलाफ़ काम करने के आरोप थे ।
उत्तराखंड की राजनीति ब्राह्मण और ठाकुर , गढ़वाल और कुमाऊँ मंडलों के बीच वर्चस्व की रही है इनके बीच में संतुलन बनाने में भी रावत जी विफल रहे ।
मुख्य मंत्री के रूप में रावत जी के पास 55 से अधिक विभागों की ज़िम्मेदारी थी । वावजूद इसके governance के मामले में भी रावत जी को सबसे फिस्सडी मुख्य मंत्री का तमग़ा मिला था ।
अब विधान सभा चुनाव में महज़ एक साल का वक्त बचा है पार्टी आला कमान के सामने सबसे वडी चुनौती ऐसे। व्यक्ति को मुख्य मंत्री   बनाने की है जो सबको साथ लेकर चलने की कूबत रखता हो ।

रविवार, 7 मार्च 2021

देश भक्ति

“नक्कालों से सावधान”
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दिल्ली एजुकेशन बोर्ड के गठन का ऐलान करके अरविंद केजरी वाल ने भी देश भक्ति की बात कही है ।केजरीवाल की देश भक्ति का पाठ क्या भारतीय जनता पार्टी और उसकी केंद्र सरकार द्वारा प्रचारित किए जाने वाले देश भक्ति से अलग होगा ?
देश भक्ति के सवाल और उसकी व्याख्या समय समय पर दलीय नज़रिए से होती रही है ।गांधी और नेहरू की देश भक्ति ।आर एस एस और भाजपा की देश भक्ति । वाम पंथियों  और समाजवादियों की देश भक्ति । अन्ना हज़ारे रामदेव जग्गी वासुदेव राम रहीम आशा राम श्री श्री रवि शंकर और अब केजरीवाल की देश भक्ति ।
अब सवाल यह उठता है की क्या केजरीवाल आर एस एस की तरह भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन की भी वकालत करेंगे । संघ और उसके आनुवंशिक संघटन पहले से ही इतिहास के पुनर्लेखन की बात करते रहे हैं । 
शायद यही कारण है की पूर्ण वहुमत की सरकार बनते ही मोदी जी के नेतृत्व में इतिहास की ग़लतियों को दुरुस्त करने की कोशिस हो रही है ।
केजरीवाल और अन्ना हज़ारे के आंदोलन को पूरी तरह संघ और भाजपा का समर्थन हासिल था ।लोगों का हमेशा से मानना रहा है की केजरीवाल किरण बेदी और तमाम अधिकारी 2014 के पहले तक एक साथ मिलकर कम करते रहे ।बताया जा रहा है की 
दिल्ली में नया एजुकेशन बोर्ड बनाने के पीछे भी केजरीवाल की मंशा भाजपा की तुलना में ज़्यादा नख़र होकर देश भक्ति के मुद्दे को उछालने की है केजरीवाल को पता है की भाजपा को राजनैतिक शिकस्त उसी के नारे को अपना कर ही दिया जा सकता है ।
केजरीवाल का यह चेहरा पिछले दिनो दिल्ली में हुए दंगो और निज़ामुद्दीन मरकज़ के मामले में दिल्ली की जनता को देखने को मिल चुका है ।
केजरीवाल disruption aur stunt ki politics के पुरोधा हैं वैसे तो राजनीति में झूठ  और फ़रेब जुमलेवजी और आडम्बर सफलता के लिए ज़रूरी हैं लेकिन  केजरीवाल ने झूठे आरोप लगाने के लिए स्वर्गीय अरुण जेटली से अदालत में माफ़ी माँगकर अपनी ईमानदारी इंटेग्रिटी को ज़ाहिर कर दिया था ।
केजरीवाल ने सत्ता पाने के लिए उन सभी हथकंडों को अपना लिया जिनका वे खुद सक्रिय राजनीति में आने से पहले तक विरोध करते थे ।
पहले रेल के डिब्बों और सवारी बसों में अपना माल वेचने वाले नारा लगाया करते थे —नक्कालों से सावधान 
असली माल हमारे पास है 
भारतीय राजनीति में भी यह प्रयोग होता रहा है ।एक वार अटल जी ने भी gandhian socialism का नारा दिया था लेकिन यह प्रयोग पूरी तरह विफल रहा और फिर वापस चुनावी कामयाबी के लिए अटल जी को मूल फ़िलासफ़ी पर ही जाना पड़ा।
अयोध्या में बंबे मस्जिद का ताला खुलने के वाद हुए चुनाव में राजीव गांधी ने भी राम राज्य  की स्थापना का नारा दिया था । लेकिन देश की जनता ने राजीव गांधी और उनकी पार्टी के स्लोगन पर भरोसा नहीं किया ।
सत्ता पाने के मक़सद से एक बार मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह और अखिलेश यादव ने मायावती से तालमेल किया  लेकिन जनता को रास नहीं आया ।अब इसी तरह के प्रयोग आज कल मध्या प्रदेश में देखने को मिल रहा है ।
वहाँ पर कमल नाथ और दिग्विजय सिंह जी की जोड़ी ऐसे नेताओं को पार्टी में शामिल करवा रही है जो कल तक गोडसे के पुजारी थे ।
भारतीय राजनीति के कुछ उदाहरण देने का मक़सद उन नेताओं को आइना दिखाना है जो देश की अवाम को कम अक़्ल समझते हैं । ऐसे नेताओं को जुमलेवाजी और स्टंट की पॉलिटिक्स से परहेज़ करते हुए अपने दल के मूल सिद्धांत के आधार पर जनता से वोट माँगना चाहिए ।

रविवार, 28 फ़रवरी 2021

Crisis

लोकतंत्र बनाम निजी स्वार्थ 
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राजनीति में सब कुछ जायज़ है ।लोकतंत्र और देश  ऐसे मुद्दे हैं जिनको ढाल बनाकर अपने हितों की रक्छा की हर सम्भव कोशिस होती रही है ।
राजनीति में नयी पिड़ी और पुरानी पिड़ी का संघर्ष कोई नया नहीं है ।लेकिन जब तक अपना भला होता रहता है तब तक सब ठीक है ।नेतृत्व और उसकी नीतियाँ ठीक है ।अपने हितों के ख़िलाफ़ काम होते ही लोकतंत्र ख़तरे में पड़ जाता है ।
राजनीति के इस syndrome से भारत का कोई भी राजनैतिक दल अछूता नहीं है ।आज हम congress की मौजूदा विद्रोह और इसी syndrome का विश्लेषण करने की कोशिस करेंगे ।
Congress में इस बार के विद्रोह का नेतृत्व ग़ुलाम नबी आज़ाद कर रहे हैं वही ग़ुलाम नबी जो लगभग चालीस साल तक सत्ता के शीर्ष पर रहे ।उनके बारे में कोंग्रेस्सियों के बीच में एक मज़ाक़ चलता था ।उनके विरोधी उन्हें सत्ता का ग़ुलाम कह कर उनका मज़ाक़ उड़ाते थे।
नेतृत्व के क़रीब रहते हुए ग़ुलाम नबी और अहेमद पटेल सरीखे इन नेताओं ने मुस्लिम समाज के किसी भी दूसरे नेता को आगे बड़ने से रोकने की भरसक कोशिस की ।आज वही ग़ुलाम नबी पार्टी के कमजोर होने पर घड़ीयली आशू बहा रहे हैं ।
यह सच है की राहुल गांधी में संघटन को लेकर आगे बढ़ने की कूबत नहीं है ।राहुल के बारे में मैं पहले भी लिख चुका हूँ की वे defocussed, inconsistent,whimsical styleसे राजनीति कर रहे हैं ।
लेकिन ग़ुलाम नबी एंड company को congress पार्टी को मज़बूत करने से किसने और कब रोका ।ये सभी तो congress की apex body congress working committee के भी मेम्बर रहे हैं ।
Congress पार्टी के भीतर के ज़्यादातर फ़ैसले इनकी रज़ामंदी से होरे रहे हैं । 
वास्तव में इन नेताओं को अपने political future and rehabilitation की चिंता है । ठीक उसी तरह जैसे ज्योतिरादित्य सिंधिया को थी ।
राजनैतिक दलों में एक दूसरे को कमजोर करने आंतरिक विद्रोह को हवा देने की परम्परा  पुरानी है ।इतिहास गवाह है कि इस तरह की वारदातें पहले भी होती रही हैं एक दिन पहले जम्मू में केसरिया पगड़ी बांधे ग़ुलाम नवी गैंग का जमावड़ा उसी की एक बानगी है ।
Congress इसके पहले भी विभाजित होती रही है । नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक कई बार पार्टी टूट चुकी है ।लेकिन यह भी सच है की भारत की जनता ने उसी congress को असली congress माना जिसका नेतृत्व नेहरू गांधी परिवार ने किया ।
आंतरिक विद्रोह की शिकार तो भाजपा भी रही है जनसंघ के समय से लेकर अब तक इस पार्टी में भी कई बार बिखराव देखने को मिलता है ।बलराज मधोक से लेकर कल्याण सिंह b s yedurappa ,यशवंत सिन्हा शत्रुघन सिन्हा अरुण सूरी और सुब्रमणियम स्वामी तो पार्टी नेतृत्व और नीतियों के ख़िलाफ़ अपनी अलग राय ज़ाहिर करते रहे हैं ।
दिलचस्प बात यह है की राहुल गांधी आज के बाग़ी भाजपा नेताओं की तारीफ़ ठीक उसी तरह से करते रहे हैं जैसे श्रीमान आदरणीय श्री नरेंद्र मोदी जी ग़ुलाम नबी की तारीफ़ कर रहे हैं ।
इस तरह के राजनैतिक उठा पटक से छेत्रिय पार्टियाँ भी ग्रसित रही हैं ।वाम पंथी पार्टियाँ समाजवादी पार्टी Tdp,dmk ,aiadmkसब के सब इस तरह के कलह से गुजराती रही हैं ।
मार्क्स वादी कॉम्युनिस्ट पार्टी में केरल और bengal गुट के बीच का विवाद तो जाग ज़ाहिर है ।Comrade jyoti somnath chaterji achyutanandan vijayan prakash karat aur yechuri sarikhe neta ek dusare ki nitiyon ke alochak rahe hain .!
और इस तरह के आंतरिक गुटबाज़ी और विघटन में शामिल नेता हमेशा लोकतंत्र और देश , सिद्धांत की दुहाई देते रहे हैं ।
ग़ुलाम नबी आज़ाद के बारे में जम्मू एंड कश्मीर हाई कोर्ट के एक ऐतिहासिक फ़ैसले से जुड़ी रिपोर्ट की लिंक है ।शायद ग़ुलाम नबी के तीखे तेवर के पीछे के कारणों में एक कारण यह भी है 
https://indianexpress.com/article/india/loot-to-own-jk-high-court-hands-rs-25000-crore-land-scam-probe-to-cbi-6724088/?fbclid=IwAR3APniFomr8AefKt2z23cyUSt-RL8WJtQ1CnpMh49rI3uCqUP1KjC80mVU

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

elections in 5 states

सत्ता हर क़ीमत पर 
सत्ता ही परमो धर्मों 
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देश की दोनो national parties- congress and bjp ,सिर्फ़ और सिर्फ़ सत्ता की राजनीति कर रही है ।
इनका एक मात्र सिद्धांत येन केन प्रकारेड सत्ता हासिल करना है । 
जिन राज्यों में विधान सभा चुनावों का एलान हुआ है उनमें कमोबेस यही स्थिति दिखायी दे रही है ।
केरल में congress और left parties एक दूसरे के ख़िलाफ़ मैदान में हैं राहुल गांधी और मुख्य मंत्री विजयन एक दूसरे की खुली आलोचना कर रहे हैं 
राहुल गांधी केरल से सांसद भी हैं और congress संघटन पर भी केरल लॉबी का दबदबा है 
वैसे भी केरल की सत्ता udf और ldf के वीच में हस्तांतरित होती रही है इसलिए congress को वहाँ पर ज़्यादा वेहतर सम्भावना दिखायी दे रही है ।
लेकिन वेस्ट bengal के चुनाव में congress  और left ममता और भाजपा के मुक़ाबले एक साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं 
West bengal में ममता की दस साल से सरकार है पिछले लोक सभा चुनाव में भाजपा को 40 फ़ीसदी वोट मिले थे 
भाजपा को वहाँ सत्ता मिलती दिखायी दे रही है शायद यही कारण है की भाजपा ने सत्ता और संघटन की पूरी ताक़त झोंक दी है 
सत्ता हथियाने की इस दौड़ में भाजपा ने उन ज़्यादातर दागी tmc नेताओं को भी अपने दल में मिला लिया है जो ममता बनर्जी सरकार के कथित घोटालों में भी शामिल थे और जाँच के दायरे में हैं
भाजपा एक तरफ़ उन्ही कथित घोटालों को मुद्दा बनाकर ममता को सत्ता से वेदख़ल  करना चाहती है practically कहा जा सकता है की north east की तरह वेस्ट bengal में भी भाजपा दूसरे दलों के आयातित नेताओं की मदद से चुनाव में है अटल जी के वक्त तो ममता बनर्जी भी nda का हिस्सा थी और केंद्र सरकार में मंत्री थीं ।
ठीक यही स्थिति तमिल नाडु की राजनीति में दिखायी दे रही है  ।भाजपा वहाँ पर aiadmk और congress  dmk के कंधे पर वैठ कर चुनाव में उतर रही है ।कई दशकों की कोशिस के वावजूद दोनो national parties कोई ख़ास जनाधार नहीं बना पायी हैं।
असम में भाजपा सत्ता में है और अपनी सत्ता बचाए रखने की जुगत में है असम भाजपा में भी आयातित नेताओं की बहुतायत है ।Congress ने इस बार नए नए local parties से तालमेल किया है ।
पांडिचेरी में तो कांग्रिस की ही सरकार थी चुनाव के एलान के ठीक पहले वहाँ की सरकार को defection करवाकर गिरवा दिया गया था । किरण वेदी के जरिये वहाँ की सरकार को लगातार परेशान कराया जाता रहा ।देखना है इस बार वहाँ की जनता किसको चुनती है ।
महाभारत में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान देते हुए कहा था कि राजनीति और लड़ाई में सब जायज़ होता है ।
ऐसा लगता है की दोनो National parties के नेताओं ने गीता ज्ञान को अपना लिया है और सत्ता ही परमो धर्मों के मार्ग पर चल रहे हैं ।

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

Govt of india

भारत सरकार ने ott platforms के ज़रिए समाज एवं देश विरोधी भ्रामक खबरों को रोकने के लिए तैयारी शुरू की है 
इस बात की जानकारी देश के दो मंत्रियों श्री रवि शंकर प्रसाद और प्रकाश जावडेकर ने दी है 
सरकार की कोशिस झूठी खबरों को रोकने की है 
सरकार चाहती है की t v channels पर चलने वाले कांटेंट्स की मॉनिटरिंग के लिए गठित nba  और प्रिंट मीडिया के लिए गठित press council of india की तरह self regulatory body  चाहती है 
सरकार के फ़ैसले क़ाबिले तारीफ़ हैं
लेकिन सवाल तो Nba और press council की fairness aur relevance पर उठते रहे है क्या प्रस्तावित व्यवस्था पूर्व के अनुभवों से सबक़ लेते हुए भारतीय सविधान में नागरिकों को मिले अधिकारों की हिफ़ाज़त करेगी

Rahul gandhi

राजनीति के  समुद्र में गोता लगाते राहुल गांधी —————————————-
गोता लगाते राहुल गांधी ।आख़िर कब तक सत्य की खोज में भटकते रहेंगे ?
राहुल सक्रिय राजनीति में आने से पहले से पूरे देश और दुनिया का भ्रमण कर चुके है ।देश और दुनिया की समस्याओं से रूबरू होते रहें हैं ।
राहुल का dialogue with people अभियान अब और कब तक जारी रहेगा अपनी defocused, inconsistent aur escapist tendency के लिए मशहूर राहुल गांधी को अगर भारतीय जनता पार्टी सहित उनके विरोधी अगर मज़ाक़ उड़ाते हैं तो इसके लिए काफ़ी हद तक वे खुद ज़िम्मेदार हैं 
अभी हाल में south india के दौरे पर गए राहुल गांधी का मछुआरों के साथ समुद्र में छलांग लगाना एक 136साल पुरानी कांग्रिस पार्टी के नेता के रूप में उनके गम्भीर छबी के मुनासिब नहीं है 
भारत और रुस के राजनैतिक और सामाजिक हालात अलग हैं रुस के president Putin इस तरह के करतब दिखते रहते है कभी जिम में वरजिस करते हुए अपनी विडीओ रिलीज़ करना तो कभी वर्फ़िलीग्राउंड पर हॉकी खेलना 
लेकिन भारतीय जनमानस को इस तरह की हरकतें पसंद नहीं आती हैं
भारत के जिस भी नेता ने अपनी विलासिता और दिल फेंक आचरण का प्रदर्शन किया जनता ने उसे पसंद नहीं किया यह अलग बात है की उसकी सत्ता और police के चलते जनता चुप्पी साधे रही और सही वक्त पर अपनी नाराज़गी जताती रही 1977  के चुनाव परिणाम हम सबके सामने हैं
यह सच है की राहुल विरोधियों ने सोशल मीडिया के ज़रिए उनकी छबि को ख़राब करने की भरपूर कोशिस की है लेकिन इसके लिए राहुल खुद भी ज़िम्मेदार हैं
देश के हालात और मीडिया तथा जूडिशीएरी की भूमिका पर भी लोगों की अलग अलग राय है 
राहुल सहित भाजपा विरोधियों का आरोप है कि मीडिया की निस्पछता सवालों के घेरे में है
लेकिन यह भी सच है की औरों के मुक़ाबले भाजपा की सक्रियता ज़्यादा है 
भाजपा पंचायत से लेकर संसद तक सभी चुनाओ को जिस आक्रामक और परिश्रम से लड़ती है उस तरह की मेहनत बाक़ी लोगों की तरफ़ से देखने को नहीं मिलती 
जिन धूड्डा तीन पाइयाँ 
गहरे पानी पैठ 
मैं बपुरा बुड़न डरा 
रहा किनारे बैठ 
ऐसा लगता है कि देश के मौजूदा हालात में सभी राज नेताओं को इस कालजयी दोहे से सबक़ लेकर अपनी रणनीति बनानी चाहिए

बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

congress

दिशाहीन congress और राहुल गांधी का तुनक मिज़ाजी रवैया 

Congress पार्टी एक और विभाजन के कगार पर खड़ी है इस बार के सम्भावित विभाजन  के लिए राहुल गांधी को ज़िम्मेदार माना जाएगा 
राहुल गांधी की तुनक मिज़ाजी और एकला चलो की नीतियाँ ज़्यादा ज़िम्मेदार होंगी ।राहुल इस बात को कई बार बोल चुके है की वे अकेले लडेंग़े।
वास्तव में विभाजन की नीव तो २०१९ के चुनाव परिणामों के समय ही पड़ गयी  थी जब चुनाव में पराजय के कारणो का पता लगाने  के लिए बनी अंटोनी committee की सिफ़ारिशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था 
पार्टी में इंदिरा गांधी के वक्त हुआ विभाजन operation kamraj plan aur emergency lagu karne ki wajahon se hua tha 
Rajiv गांधी के वक्त के विभाजन की वजह शाह बानो केस और बोफ़ोर्स घोटाला था ।लेकिन इस वार के सम्भावित  विभाजन की वजह राहुल होंगे ।

हमारे देश का मिज़ाज लोकतांत्रिक है हम universal brotherhood and coexistence के सिद्धांत पर चलते रहे हैं अछे लोकतांत्रिक व्यवस्था में participatory democracy ko behtar mana jata hai 
लेकिन राहुल गांधी का तरीक़ाguerilla tactics का है आरोप लगाओ और बग़ैर जवाब सुने भाग लो 
डिबेट की चुनौती दो और जबसामने  वाला तैयार हो जाय तो भाग लो 
 चाहें वह संसद केभीतर  हो या बाहर 
संघटन और सरकार को रिमोट कंट्रोल से चलाने की सोच  इस सबसे  पुरानी पार्टी की  दुर्दशा का करण है ।!
राहुल गांधी द्वाराparliament  के दोनो सदनो में ऐसे नेताओं को आगे किया जाता रहा है जो अपने अपने होम स्टेट्स में कांग्रिस पार्टी का बर्बाद कर चुके हैं 
ज़्यादातर आधार हीन अदूरदर्शी नेता ही राहुल की पहली पसंद हैं 
राहुल अक्सर  crucial मौक़े पर विलु।प्त हो जाते है चाहे वह parliament का डिबेट हो या पार्टी के कार्य कर्म।राहुल की राजनीति में consistency ,commitment aur conviction नहीं दिखायी देता ।
कांग्रिस पार्टी के फ़ाउंडेशन डे के मौक़े पर राहुल नदारत थे किसान आंदोलन जब परवान पर था तब नदारत ।
कांग्रिस के group 23 का letter bomb पार्टी की अंदरूनी हालात को ज़ाहिर कर चुका है 
हम इस मुद्दे पर अपने पहले के लेखों में तफ़्सील से लिख चुके हैं पार्टी के नेताओं में अपने future की चिंता है ।
किसी को फिर से राज्य सभा की सीट का दरकार है तो किसी को अपने हज़ारों करोड़ रुपए के साम्राज्य को बचाने की चिंता है ।
ग़ुलाम नबी आज़ाद भीऐसे नेताओं में  से एक है ।
कश्मीर से धारा ३७०  हटाने के ख़िलाफ़ छाती पीट कर रोने वाले ग़ुलाम अब उसी कश्मीर में विकास की गंगा बहते देख रहे है ।खुद को सबसे भाग्यशाली भारतीय मुसलमान बता रहे हैं ।उनका यह भी दावा है की उन्होंने अपने पूरे राजनैतिक जीवन में कभी पाकिस्तान की यात्रा नहीं की .
ग़ुलाम नबी के इन बयानो को उनकी भावी योजनाओं के संकेत के रूप में देखा जा सकता है ।
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और ग़ुलाम नबी आज़ाद का एक दूसरे के प्रति दोस्ती का इज़हार भी एक भावी राजनीति का हिस्सा है ।
वास्तव में पार्टी की मज़बूती नेतृत्व के मज़बूती से होती है ।workers aur cadres  नेता को follow करते हैं।लेकिन  राहुल के मामले में स्थिति बिल्कुल अलग है । ऐसा लगता 
है की राहुल गांधी अभी राज नीति का  tuition ही ले रहे है । 136 साल पुरानी पार्टी की इतनी दुर्गति किसी ने सोची भी नहीं थी 
देश के प्रधानमंत्री ने   सच ही कहा है कि कांग्रिस पार्टी लोक सभा और राज्य सभा में  divided है । एक ही मुद्दे पर संसद के दोनो सदनो में पार्टी के नज़रिया अलग अलग देखने को मिलता है ।
राहुल ज़्यादा तर राज्यों में अपने विरोधियों के मुक़ाबले हथियार डाले दिखायी दे रहे हैं
West bengal bihar aur north east  के राज्यों में पार्टी की हालत ठीक नहीं है ।
West bengal aur assam में चुनाव है और राहुल गांधी पूरे scene से ग़ायब है 
आख़िर इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है ।
आज की तारीख़ में congress party ka netritwa पूरी तरह confused and defocused dikhayee दे रहा है । राहुल को नेहरू और इंदिरा जी की नितियों को समझहना चाहिए ।
पार्टी का ट्रेडिशनल support base अलग रहा है ।शायद  यही कारण है की पार्टी के भीतर असंतोष बड़ रहा है ।अगर समय रहते इस पर क़ाबू नहीं किया गया तो पार्टी का एक गुट अलग होकर भाजपा का दमन थाम लेगा ।राज्यों में यह कार्य तो पहले से ही शुरू हो गया है।

सोमवार, 18 जनवरी 2021

Tug of war

उत्तर प्रदेश का अपना अलग इतिहास और पहचान रहा है 
आज़ादी से लेकर अब तक उत्तर प्रदेश का राजनैतिक नेतृत्व हमेसा केंद्रीय सत्ता के समानांतर अपनी सत्ता चलाता रहा है 
इसकी शुरुआत पंडित जवाहर लाल नेहरू  और पंडित गोविंद बल्लभ पंत के बीच चले खिच तान हुई ।चंद्रा भान गुप्ता कमला पति त्रिपाठी चौधरी चरण सिंह सुचिता कृपलानी विश्व नाथ प्रताप सिंह हेमवती नंदन बहुगुणा बीर बहादुर सिंह कल्याण सिंह मुलायम सिंह मायावती और अखिलेश यादव ने मुख्य मंत्री रहते हुए केंद्रीय सत्ता से अपनी अलग राय और अलग पहचान बनाए रखने की कोशिस की 
उत्तर प्रदेश कभी भी पिछलग्गू बन कर नहीं रहा देश के ज़्यादातर प्रधान मंत्री उत्तर प्रदेश से हुए है राजनैतिक तौर पर उत्तर प्रदेश हमेशा देश को दिशा देता रहा है 
शायद यही कारण है की उत्तर प्रदेश का मुख्य मंत्री खुद को first among equal के रूप में मानता है 
उत्तर प्रदेश ke mukhya mantriyon का यही attitude हमेसा केंद्रीय सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों की आँख में किरकिरी बना रहा है

गुरुवार, 7 जनवरी 2021

Trump. violence

अमेरिका में ट्रम्प समर्थकों द्वारा किया गया हंगामा और violence दुनिया के तमाम democratic countries के लिए एक सबक़ है ।ऐसे वारदातों और इस सोच के नेताओं से अन्य लोकतांत्रिक देशों की जनता को सावधान रहना चाहिए ।
अमेरिकी इतिहास पर अगर नज़र डालें तो इस तरह का हंगामा 1812 में अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ हुआ था 
अमेरिका पूरी दुनिया में araenal of democracy ke नाम से मशहूर रहा है पूरी दुनिया लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए अमेरिका का उदाहरण देती रही है 
लेकिन जो दुर्गति पिछले कुछ वर्षों में ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिका की हुई है वह शायद ही इसके पहले कभी देखने को मिली हो 
Industrialist turn politician donald trump ने अपने whimsical abd short sighted policies की वजह से पूरी दुनिया में अमेरिका की फ़ज़ीहत करवाई है 
और अब जाते जाते भी Washington d c में हंगामा और हिंसा करवाकर अमेरिकी इतिहास में अपना नाम एक निहायत ना समझ  
बददिमाग़ president के रूप में दर्ज करवा लिया 
ट्रम्प के इस कृत्य का विरोध पूरी अमेरिका की  पोलिटिकल जमात के अलावा दुनिया के दूसरे मुल्कों के उनके पुराने मित्र  नेताओं ने भी की है जो कल तक उनके साथ गल बहियाँ करते दिखायी दे रहे थे 
अभी भी दो हफ़्ते का वक्त है ट्रम्प को graceful  तरीक़े से अपनी हार मानकर president की ज़िम्मेदारी newly elected Biden और उनकी टीम को सौंप देनी चाहिए 
और Washington d c में कराए गए हंगामा और हिंसा के लिए अमेरिका सहित दुनिया के सभी democratic countries की जनता से माफ़ी माँगनी चाहिए

मंगलवार, 5 जनवरी 2021

brahmins

कर्नाटक की सरकार ने गरीब ब्राह्मण बालिकाओं को कर्मकांड से जुड़े ब्राह्मण बालकों के साथ विवाह करने पर आर्थिक मदद का ऐलान किया है 
वहाँ पर स्थापित brahmin development board की तरफ़ से दो योजनाएँ शुरू की गयी हैं 
दूसरी तरफ़ असम की सरकार ने फ़र्ज़ी मदरसों और संस्कृत विद्यालयों को बंद करने का फ़ैसला किया है
वेदिक education और भारतीय संस्कृति को बचाने के लिए कर्नाटक सरकार का फ़ैसला स्वागत योग्य है 
संस्कृत सभी भारतीय भाषाओं की जननी है 
बग़ैर संस्कृत के विकास के अन्य भारतीय भाषाओं का विकास नहीं हो सकता और ना ही भारतीय संस्कृति को बचाया जा सकता है 
संस्कृत को रोटी रोज़ी से जोड़कर उसका विकास और संस्कृति की हिफ़ाज़त की जा सकती है 
ब्राह्मण तो हमेसा से संस्कृत के माध्यम से समाज संस्कृति और देश की सेवा करते रहे हैं
इसलिए  ब्राह्मण के लिए शुरू की गयी योजनाएँ समाज संस्कृति और देश हित में है
तेलंगना की सरकार ने भी पहले से गरीब ब्राह्मण के लिए welfare schemes चला रखी है 
ख़ास बात यह है की brahmins के ख़िलाफ़ सामाजिक आंदोलन की शुरुआत south indian states से हुई थी उसका नक़ल north india में कांशी राम ने किया था 
लेकिन अब बदली परिस्थित्यों में southern states me welfare scheme चलाए जा रहे हैं 
North indian states में भी इस पर विचार किया जाना चाहिए 
उत्तर प्रदेश में मायावती जी को कई बार चीफ़ मिनिस्टर डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी और ब्रह्म दत्त द्विवेदी ने बनवाई थी 
उत्तर प्रदेश में भाजपा  समाज वादी पार्टी और bsp की सरकारों को पूर्ण बहुमत दिलाने में भी इस समाज की भूमिका रही है 
ब्राह्मण सबसे ज़्यादा समायोजन संयोजन और सम रसता भई चारा में विस्वास करता है 
ब्राह्मण बसुधैव कूतुम्बकम world is my family के सिद्धांत पर चलता रहा है

रविवार, 3 जनवरी 2021

union budget

देश की राजधानी दिल्ली की सीमा पर जहां एक तरफ़ ऐतिहासिक किसान आंदोलन चल रहा है वही दूसरी तरफ़ भारत सरकार का फ़ाइनैन्स मिनिस्ट्री फ़रवरी में पेश होने वाले बजट की तैयारी में जुटा है 
मंत्रालय के सामने सबसे बड़ी चुनौती वितीय घाटे की है 
अकड़ों के मुताबिक़ december 2020 तक का वितीय घाटा 11 लाख करोड़ था जो मार्च 2021 तक बड़ कर 14 लाख करोड़ हो सकता है 
पिछले साल डूबते बैंकिंग सेक्टर को बचाने के लिए सरकार ने 30 lakh करोड़ का पैकिज दिया था इस पैकिज का सर्वाधिक लाभ corporate सेक्टर को मिला 
Covid 19 महामारी के चलते केंद्र सरकार की आमदनी में गिरावट आयी है इसका सीधा असर राज्यों की आर्थिक स्थिति पर भी देखने को मिला है 
राज्यों को केंद्र सरकार से मिलने वाला टैक्स का हिस्सा उनको समय से नहीं मिल सका इस मुद्दे को लेकर राज्यों और केंद्र सरकार के बीच  खींच तान और आरोप प्रत्यारोप भी लगे 
देश की वितीय हालत आज भी बेहतर नहीं है ग़रीबी बेरोज़गारी आर्थिक मंदी शीर्ष स्थान पर है 
ऐसे हालात में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती समाज के कमजोर वंचित लोगों के लिए पहले से घोषित welfare schemes को जारी रखने की है 
इन योजनाओं को जारी रखने के लिए संसाधन जुटाने की  चुनौती है
समझा जाता है की सरकार public सेक्टर की companies में अपनी हिस्सेदारी  बेच कर संसाधन जुटाने की कोशिस में लगी है 
सरकार अपने इस मुहिम में कितना कामयाब होगी इस पर कोई भविस्यवाणि मुनासिब नहीं है 
लेकिन इतना तय है की मौजूदा हालात में pro people budget तैयार करके पेश करना finance ministry ke liye himalayan task hai