सोमवार, 6 सितंबर 2021

Role of Governors?

देश में इस समय अलग ही नजारा देखने को मिल रहा है ।सामविधानिक पदों पर कार्यरत लोग सक्रिय राजनीति में व्यस्त लोगों की तरह  कार्य कर रहे हैं।वयानबाज़ी कर रहे हैं।
सामान्यतया राज्यपालों से राज नेताओं की तरह बयानबाज़ी से बचने की अपेक्छा की जाती है ।लेकिन मेघालय , केरल और वेस्ट बेंगॉल के राज्यपालों ने तो संबिधानिक मान्यताओं और परम्पराओं की सारी हदें पर कर दी हैं।

राज्यपालों की भूमिका को लेकर पहले भी विवाद होता रहा है ।सरकारिया आयोग का गठन भी इस विवाद के चलते हुआ था ।लेकिन विवाद घटने के  बजाय वड़ता जा रहा है ।
केरल के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद खान विद्वान हैं ।देश की लगभग सभी प्रमुख राजनैतिक दलों में रह चुके हैं ।शाह बानो केश  मामले में सामविधान संसोधन के विरोध में राजीव गांधी मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया था ।वी पी सिंह , मायावती के साथ भी रह चुके हैं ।
उनके परिवार और रिस्तेदार भी सभी दलों के अलावा कारपोरेट घरानो की नौकरी करते रहे है ।आरिफ़ साहेब इस समय राज्यपाल रहते हुए भी देश के मुसलमानो को संघ परिवार से जोड़ने की कोशिस में जुटे हैं।
सबसे दिलचस्प मामला तो केरल के राज्यपाल सत्यपाल मलिक का है ।सत्यपाल मलिक जाट हैं । कुछ साल पहले उनको पहले बिहार फिर कश्मीर और अब मेघालय का राज्यपाल बनाया गया था ।
बताया जाता है की वे कृषि क़ानूनों को लेकर केंद्र सरकार से नाराज़ हैं ।इसीलिए हर मौक़े पर वे किसानो के आंदोलन का समर्थन करते दिखायी दे रहे हैं ।उनको इस बात का भरपूर एहसास है की राज्यपाल पद से हटने के बाद उनको उसी समाज के बीच में जाकर रहना है जो इन क़ानूनों का विरोध कर रहा है ।
सत्यपाल मलिक जी को अपनी बात कहने का बेशक अधिकार है ।लेकिन सामविधानिक पद पर रहते हुए अपनी ही सरकार द्वारा बनाए गए क़ानूनों का विरोध मुनासिब नहि है ।अगर वे सचमुच किसानो के हमदर्द हैं तो उनको राज्यपाल पद से त्याग पत्र देकर राजनीति करनी चाहिए ।
वेस्ट बेंगॉल के राज्यपाल की भूमिका और आचरण तो जगज़ाहिर है।अगर उनका बस चले तो वेस्ट बेंगॉल में किसी दूसरे ही दल की सरकार बन जायँ ।
लिखने का मक़सद साफ़ है ।कांग्रिस के सत्ता में रहते हुए जिन दलों ने राज्यपालों की भूमिका पर सवाल उठाया थाउनमें  से ज़्यादातर सत्ता में आने के बाद राज्यपालों के ज़रिए वैसे ही काम कर रहे हैं जैसा कोंग्रेस के वक्त में होता था ।यह ट्रेंड अछे लोकतंत्र के लिए अच्छा नहि है । सरकार में वैठे लोगों को सरकारिया आयोग की सिफ़ारिशों को फिर से पड़ना और उसपर गौर करना चाहिए ।

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