शनिवार, 25 सितंबर 2021

marpit in Pratapgarh

प्रताप गढ़ के संगी ब्लॉक में आयोजित आरोग्य मेले कार्य क्रम में भाजपा सांसद संगम लाल और कोंग्रेसी नेता प्रमोद तिवारी के समर्थकों में हुई मारपीट आने वाले विधान सभा चुनावों के पहले का curtain raiser हो सकता है ।
सांसद बनने के दिन से ही संगम लाल जी police के दम पर प्रताप गढ़ के दो दिग्गजों - प्रमोद तिवारी और राजा  भैया को चुनौती देते रहे हैं ।संगम लाल जी का यह रूप प्रताप गढ़ की जनता को रास नहि आ रहा है ।
संगम लाल के वर्ताव से आहत एक तबका पिछले कुछ दिनो से सही वक्त और स्थान की तलास में था ।आज संगम लाल जी उस तबके के हथे चड़ गए और जनता ने उनके साथ अभद्र व्यवहार कर दिया।
वताया जा रहा है की झगड़े की शुरुआत संगम लाल के पहले से आयोजित कोंग्रेसी आयोजन में घुसने से हूयी ।संगम लाल उसी स्थान पर भाजपा का आयोजन करना   चाह रहे थे ।
अब प्रशासन सक्रिय है । दोषियों के ख़िलाफ़ कारवाई की जा रही है । सख़्त कारवाई भी होगी ।लेकिन आज की घटना राजनीतिज्ञों के प्रति अवाम के मन में चल रही प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा सकता है ।

Bjp -congress

देश के दोनो राष्ट्रीय दल अपने परम्परागत वोट बैंक को छोड़ कर नए मतदाताओं को अपने पाले में लाने में जुटे हैं।
हा बात कर रहे हैं कोंग्रेस और भाजपा की ।कोंग्रेस अपने खोए दलित वोट बैंक को वापस लाना चाहती है और भाजपा obc vote bank को ।
ब्राह्मण मुस्लिम और दलित कोंग्रेस के परम्परागत वोट बैंक रहे हैं।बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद देश के मुसलमान कोंग्रेस से नाराज़ हो गए ।मायावती और कांशी राम ने उत्तर भारत के दलितों को कोंग्रेस से अलग कर दिया ।इसके साथ ही पंडित अटल बिहारी जी के वजह से देश के ज़्यादातर ब्राह्मण भी भाजपा में चले गए ।
वोट बैंक के विमुख होने की सबसे बड़ी वजह कोंग्रेस नेतृत्व की कार्य शैली भी रही है ।कोंग्रेस नेतृत्व अपनी जमा राजनैतिक पूजी बचाए रखने के बजाय नए वोट बैंक जुटाने में लगा रहा ।
नेतृत्व को शायद इतिहास की जानकारी नहि है ।देश का पिछड़ा वर्ग आज़ादी के बाद से ही कोंग्रेस विरोधी रहा है ।डॉक्टर लोहिया ने पिछड़ों को लामबंद करके कोंग्रेस को राजनैतिक चुनौती दी थी ।बाद में मंडल पॉलिटिक्स ने कोंग्रेस की जमा पूजी पर ही क़ब्ज़ा कर लिया ।
अब कोंग्रेस पार्टी एक बार फिर umbrella politics के उसी दौर को वापस लाना चाहती है ।लेकिन दिशा विहीन ,नेतृत्व इस राजनैतिक लक्च्च्य को हासिल करने में असहाय लग रहा है ।पंजाब गुजरात उत्तर प्रदेश और राजस्थान में प्रयोग ज़रूर किए जा रहे है ।
ठीक इसी तरह भाजपा भी प्रयोग में जुटी  है ।ब्राह्मण बनिया और शहरी इलाक़े की पार्टी अपना तेवर और कलेवर बदल कर make over में लगी है ।अपने committed vote bank के अलावा नए वोट बैंक की तलाश में पार्टी नित नए प्रयोग में व्यस्त है ।

शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

दुर्बल नाथ जी

दिल्ली के मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल ने आज अख़बारों में महान संत दुर्बल नाथ जी के सम्मान में एक इश्तहार छपवाया हैं ।
दुर्बलनाथ जी ने खटिक समाज की बुराइयों को दूर करने के लिए सामाजिक सुधार आंदोलन चलाया था ।
लेकिन उत्तर भारत के ज़्यादातर लोग दुर्बल नाथ जी के बारे में नहि जानते थे ।देश के कई राज्यों में चुनाव होने वाले हैं ।लगभग सभी पार्टियाँ जाति की राजनीति करने में जुट गयी हैं ।
पारदर्शिता गुड governance और करप्शन फ़्री प्रशासन देने का दावा करके सत्ता में आए केजरीवाल की पार्टी भी चुनाव मैदान में हैं।शायद इसीलिए उन्होंने खटिक समाज के महापुरुष दुर्बल नाथ जी को आज याद किया है ।
कमोबेश इसी तरह के कार्य मायावती ने भी सत्ता में आने के बाद किया था ।श्री पेरियार जी से लेकर छात्रा पति शाहू जी की मूर्तियाँ लगवाई थी ।अभी कुछ दिनो पहले जाट समाज के राजा के नाम से एक विश्व विद्यालय बनाने के लिए शिलान्यास भी हुआ है ।
राजनीति और  चुनाव के मौक़े पर सब जायज़ है ।

मंगलवार, 7 सितंबर 2021

farm laws

अल्लाह हु अकबर और हर हर महादेव के उद्घोष से सम्पन्न किसान आंदोलन आने वाले विधान सभा चुनावों में जाति और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से खुद को बचा पाएगा ?
देश के राजनैतिक दल चुनावों में इन हथकंडो का खुले आम इस्तेमाल करते हैं।
किसान नेता स्वर्गीय महेंद्र सिंह टिकैत और ग़ुलाम मोहम्मद इन नारों को लगवाया करते थे ।ग़ुलाम मोहम्मद आज भी इन नारों को लगाते हैं।85 वर्षीय ग़ुलाम मोहम्मद आज भी हिंदू मुस्लिम और किसान एकता के पछ्धर हैं।
मुज़फ़्फ़र नगर में हुए किसान पंचायत में सभी नेताओं ने किसानो को साम्प्रदायिक ताक़तों से सतर्क रहने की अपील की ।
हम सबको 2013 ke Mujaffarnagar में हुए साम्प्रदायिक दंगे की विभीषिका याद है ।
दंगे के बाद हज़ारों की तादाद में लोगों ने शरणार्थी शिविरों में शरण लिया था ।
इस बार फिर देश के कई राज्यों में चुनाव हैं ।
किसानो को पता है की राज नेता एक बार फिर दंगे करा कर राजनैतिक लाभ उठाने की कोशिस करेंगे ।
शायद इसीलिए बार बार सावधान रहते हुए किसान एका की अपील की गयी ।कृषि क़ानूनों को लेकर जारी आंदोलन के और लम्बे वक्त तक चलने की सम्भावना है ।दूसरी तरफ़ केंद्र सरकार भी अड़ी हूयी है ।सरकार तीनो क़ानूनों को रद्द करने के मूड में नहि है ।

सोमवार, 6 सितंबर 2021

Role of Governors?

देश में इस समय अलग ही नजारा देखने को मिल रहा है ।सामविधानिक पदों पर कार्यरत लोग सक्रिय राजनीति में व्यस्त लोगों की तरह  कार्य कर रहे हैं।वयानबाज़ी कर रहे हैं।
सामान्यतया राज्यपालों से राज नेताओं की तरह बयानबाज़ी से बचने की अपेक्छा की जाती है ।लेकिन मेघालय , केरल और वेस्ट बेंगॉल के राज्यपालों ने तो संबिधानिक मान्यताओं और परम्पराओं की सारी हदें पर कर दी हैं।

राज्यपालों की भूमिका को लेकर पहले भी विवाद होता रहा है ।सरकारिया आयोग का गठन भी इस विवाद के चलते हुआ था ।लेकिन विवाद घटने के  बजाय वड़ता जा रहा है ।
केरल के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद खान विद्वान हैं ।देश की लगभग सभी प्रमुख राजनैतिक दलों में रह चुके हैं ।शाह बानो केश  मामले में सामविधान संसोधन के विरोध में राजीव गांधी मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया था ।वी पी सिंह , मायावती के साथ भी रह चुके हैं ।
उनके परिवार और रिस्तेदार भी सभी दलों के अलावा कारपोरेट घरानो की नौकरी करते रहे है ।आरिफ़ साहेब इस समय राज्यपाल रहते हुए भी देश के मुसलमानो को संघ परिवार से जोड़ने की कोशिस में जुटे हैं।
सबसे दिलचस्प मामला तो केरल के राज्यपाल सत्यपाल मलिक का है ।सत्यपाल मलिक जाट हैं । कुछ साल पहले उनको पहले बिहार फिर कश्मीर और अब मेघालय का राज्यपाल बनाया गया था ।
बताया जाता है की वे कृषि क़ानूनों को लेकर केंद्र सरकार से नाराज़ हैं ।इसीलिए हर मौक़े पर वे किसानो के आंदोलन का समर्थन करते दिखायी दे रहे हैं ।उनको इस बात का भरपूर एहसास है की राज्यपाल पद से हटने के बाद उनको उसी समाज के बीच में जाकर रहना है जो इन क़ानूनों का विरोध कर रहा है ।
सत्यपाल मलिक जी को अपनी बात कहने का बेशक अधिकार है ।लेकिन सामविधानिक पद पर रहते हुए अपनी ही सरकार द्वारा बनाए गए क़ानूनों का विरोध मुनासिब नहि है ।अगर वे सचमुच किसानो के हमदर्द हैं तो उनको राज्यपाल पद से त्याग पत्र देकर राजनीति करनी चाहिए ।
वेस्ट बेंगॉल के राज्यपाल की भूमिका और आचरण तो जगज़ाहिर है।अगर उनका बस चले तो वेस्ट बेंगॉल में किसी दूसरे ही दल की सरकार बन जायँ ।
लिखने का मक़सद साफ़ है ।कांग्रिस के सत्ता में रहते हुए जिन दलों ने राज्यपालों की भूमिका पर सवाल उठाया थाउनमें  से ज़्यादातर सत्ता में आने के बाद राज्यपालों के ज़रिए वैसे ही काम कर रहे हैं जैसा कोंग्रेस के वक्त में होता था ।यह ट्रेंड अछे लोकतंत्र के लिए अच्छा नहि है । सरकार में वैठे लोगों को सरकारिया आयोग की सिफ़ारिशों को फिर से पड़ना और उसपर गौर करना चाहिए ।