मंगलवार, 8 जून 2021

Sangh pariwar-bjp

Either you hate me or you love me 
But you can’t ignore me 
अंग्रेज़ी का यह फ़ेमस वाक्य भाजपा और इसके पैत्रिक संघटन आर एस एस पर पूरी तरह लागू होता है 
अपने गठन के दिन से लेकर आज तक जिस तरह की निरंतरता और consistency इन संघटनो के काम काज में देखने को मिलती है उस तरह की continuity and consistency शायद ही किसी दूसरे राजनैतिक सामाजिक या सांस्कृतिक संघटन के काम काज में देखने को मिले ।
इन संघटनो और इनके कार्यकर्ताओं के मनोबल पर कभी भी जय या पराजय का असर उतना नही होता जितना दूसरे संघटनो के कार्यकर्ताओं पर होता है ।लक्ष्य प्राप्ति तक इनका संघर्ष और प्रयास जारी रहता है ।
West bengal का चुनाव हारने के बाद जिस तेज़ी और सिद्दत से पूरा संघ परिवार और उसके frontal organisations के लोग आगामी विधान सभा चुनावों की तैयारी में जुटे हैं उस तरह की तैयारी और किसी राजनैतिक दल में तो देखने को नही मिल रही है ।
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी  बहुजन समाज पार्टी और कांग्रिस का शीर्ष नेतृत्व पूरे राजनैतिक पटल से नदारद  है ।जब की कोविड महामारी के चलते जनता में व्याप्त आक्रोश और नाराज़गी के बावजूद संघ परिवार और भाजपा के कार्यकर्ता घर घर जाकर लोगों से जन सम्पर्क स्थापित करने में लगे है ।
कमोवेश यही स्थिति उत्तराखंड गुजरात गोवा हिमाचल प्रदेश में भी देखने को मिल रही है 
पंजाब में चल रही कोंग्रेसी कलह के पीछे भी भाजपा का हाथ बताया जा रहा है ।
कृषि क़ानूनों के चलते भाजपा सरकार से सर्वाधिक नाराज़गी पंजाब के किसानो की है ।कृषि क़ानूनों के चलते भाजपा का साथ उसका सहयोगी अकाली दल भी छोड़ चुका है ।
चुनावी तैयारी के लिहाज़ से सबसे लचर और दयनीय हालत में कांग्रिस पार्टी ही दिखायी दे रही है ।पार्टी का सारा ज़ोर ट्वीटर और सोशल मीडिया के ज़रिए अपनी खोयी हुई राजनैतिक ज़मीन और सत्ता वापस पाने की है ।
वास्तव में कांग्रिस पार्टी के veteran नेताओं का एक बहुत बड़ा तबका भाजपा सहित दूसरे ग़ैर कोंग्रेसी दलों से लड़ने के बजाय राहुल प्रियंका सोनिया गांधी को कमजोर करने में जुटा है ।उनकी कोशिस गांधी परिवार को कांग्रिस पार्टी से वेदख़ल करने की है ।अपनी इस मुहिम को सफल बनाने के लिए ये नेता गांधी परिवार विरोधी तमाम नेताओं के सम्पर्क में हैं ।
गांधी परिवार विरोधी इन नेताओं के आर्थिक घोटालों में लिप्त होने के आरोपों के चलते कोंग्रेस  को कई बार सत्ता से वेदख़ल होना पड़ा ।
दिल चस्प बात ये है की इन नेताओं के पास अकूत निजी सम्पत्ति है लेकिन पार्टी पदाधिकारी रहते हुए ये नेता गड़ अपना यात्रा भत्ता भी पार्टी के खाते से लेतेरहे हैं।
ऐसे जनाधार विहीन नेताओं की हरकतों के चलते पार्टी कंगाल होती गयी और ये लोग माल माल होते गए ।आजकल ये लोग चुप हैं ।विधान सभा चुनावों के शुरू होते ही ये फिर सक्रिय होंगे पार्टी और गांधी परिवार को कमजोर करने के लिए ।
मेरी राय में सार्वजनिक जीवन में कार्य करने वालों को वैचारिक भिन्नतावों के बावजूद संघ परिवार और भाजपा की कार्य शैली और अनुशासन से सबक़ लेना चाहिए ।
सत्ता में आने के बाद जितने कम समय में संघ और भाजपा ने अपनी राजनैतिक और आर्थिक  संगठनिक ताक़त बड़ायी और उसका विस्तार किया वह क़ाबिले तारीफ़ है ।
इसलिए तमाम प्रशासनिक ख़ामियों , कोविड महामारी के दौरान कूप्रबंधन के बावजूद देश की राजनीति में संघ परिवार और भाजपा आज भी प्रासंगिक हैं ।

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