रविवार, 6 जून 2021

Lucknow Imambara

लखनऊ का विश्व प्रसिद्ध आसफ़ी इमामबाड़ा भी लगभग 11  साल तक चले दुर्भिछ (अकाल) के वक्त में ही 1874 में बना था ।लखनऊ के तत्कालीन नवाब आसफ़दौल्लाह ने अपनी अवाम को रोज़गार  उपलब्ध कराने के मक़सद से इस ऐतिहासिक इमामबाड़ा का निर्माण कराया था 
बताया जाता है की इस ऐरिहासिक इमारत के निर्माण में लगभग 20 हज़ार मज़दूरों ने दिन रात कार्य किया था । निर्माण कार्य दिन रत चलता था ।यह ऐतिहासिक इमारत 11  साल में बनकर तैयार हुई थी और अकाल भी 11 साल चला था ।
देश के अलग अलग हिस्सों में इस समय भी सरकारी और ग़ैर सरकारी   इमारतें बन रही हैं 
महामारी के इस दौर में हज़ारों करोड़ रुपए लगाकर बनायी जानेवाली इन इमारतों का मक़सद भी ज़रूरतमंद लोगों को रोज़गार उपलब्ध कराना हो सकता है ।
महामारी तो चलती रहेगी लेकिन मानव जीवन और उसकी ज़रूरतों पर भी ध्यान देना ज़रूरी है ।जनता के लिए ऑक्सिजन वेड और ventilators और दवाइयों के इंतज़ाम तो अब हो ही गए हैं ।
अब बाक़ी बातों और मसलों पर ध्यान देना ज़रूरी है ।मसलन चुनाव कराना नेता बदलना महामारी के कूप्रबंधन के लिए एक दूसरे पर दोषारोपण करना ।
मौसम महामारी और चुनावों का है इसलिए जाति धर्म देश भक्ति करप्शन जैसे सभी जुमले फिर उछले जाएँगे । चर्चा तो शायद बेरोज़गारी महंगाई बदतर अर्थ व्यवस्था और इंटर्नैशनल boarders की सुरकछा का भी हो ।
लेकिन पोलिंग के दिन तक आते आते मुद्दे शायद फिर वही बन जायँ जिन मुद्दों पर अभी तक चुनाव होते रहे हैं।और महामारी बेरोज़गारी बदहाल अर्थ व्यवस्था  विकास एक बार फिर अगले चुनावों के लिए राजनीति की तिजोरी में सम्भाल कर रख दिए जायँ ।
इसलिए मेरी राय में इमारतों के निर्माण का विरोध करने वालों को यह भी समझना चाहिए कि लोक कल्याणकारी सरकारों के लिए इस तरह के कार्य उनके दायित्वों में शामिल हैं।
शायद यही कारण है की उत्तर भारत की एक मात्र नेता मायावती हैं जिन्होंने सत्ता में रहते हुए सरकारी ख़ज़ाने का हज़ारों करोड़ रुपया मूर्तियों और स्मारकों के बनाने में खर्च कर दिया था ।अपने सपनो के प्राजेक्ट्स को पूरा करने में उन्होंने किसी की परवाह नहि की । और जो लोग उस समय मायावती का विरोध कर रहे थे वही लोग बाद में उनसे पोलिटिकल अलाइयन्स करके चुनाव में चले गए ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें