गुरुवार, 17 जून 2021

clash for power

West bengal से लेकर बेंगलूरू तक , बिहार  से लेकर उत्तर प्रदेश तक  ।पंजाब से लेकर राजस्थान तक ।या यूँ कहें तो लगभग देश के आधे से ज़्यादा हिस्सो  में राजनैतिक उथल पुथल  दिखायी दे रहा है ।
इस उथल पुथल का कारण कही सत्ता बचाने की क़वायद है तो कहीं पोलिटिकल dynasty बचाने की कोशिस ।ऐसा लगता है की इन राजनैतिक दलों और इनके नेताओं को आम जनता की चिंता से ज़्यादा अपने राजनैतिक भविष्य की है 
यह अलग बात है की ये सब कुछ जनता के हितों की आड़ में ही किया जा रहा है ।
इतिहास में सत्ता पर क़ाबिज़ होने को लेकर चाचा भतीजा , भाई भाई और दामाद —शाला के बीच में संघर्ष के सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं ।लेकिन जिस तरह का संघर्ष बिहार उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश में देखने को मिल रहा है उसका स्वरूप ही कुछ और है ।
कांग्रिस के बंशवादी राजनीति का विरोध करनेवाली पार्टियाँ खुद वंसवाद की शकर हैं ।
राम विलास पासवान जब राजनीति में आए थे उस समय सिधांतों की राजनीति होती थी । उनका पूरा जीवन संघर्षों से भरा था । उन्होंने कभी सोचा भी नहि होगा की उनके ना रहने पर उनके भाई और बेटा इस तरह से लड़ेंगे ।राम विलास पासवान की गलती यही रही की उन्होंने उम्र के आख़िरी पड़ाव में दूसरे भारतीय नेताओं की तरह परिवार वाद में उलझ कर रह गए ।
कमोवेश यही स्थिति कर्नाटक में एड्डुरप्पा तेलंगाना में चंद्र शेखर राव आंध्र में राम राव तमिल नाडु m करना निधि पंजाब में प्रकाश सिंह बादल मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह और कमल नाथ उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की रही ।
नतीजा विलकुल साफ़ है । जनता के मुद्दे और सिद्धांत पीछे छूट गए और परिवार हित सर्वोपरि हो गए ।कुछ लोगों ने परिवरवाद के बजाय व्यक्तिवादी राजनीति को बड़वा दिया जिसके चलते सरकार और संघटन में अधिनायकवादी सोच हाबी हो गए ।
लोकतंत्र  में इस तरह के सोच वाले नेता हमेशा अपने हितों की चिंता करते हैं ।

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