रविवार, 7 मार्च 2021

देश भक्ति

“नक्कालों से सावधान”
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दिल्ली एजुकेशन बोर्ड के गठन का ऐलान करके अरविंद केजरी वाल ने भी देश भक्ति की बात कही है ।केजरीवाल की देश भक्ति का पाठ क्या भारतीय जनता पार्टी और उसकी केंद्र सरकार द्वारा प्रचारित किए जाने वाले देश भक्ति से अलग होगा ?
देश भक्ति के सवाल और उसकी व्याख्या समय समय पर दलीय नज़रिए से होती रही है ।गांधी और नेहरू की देश भक्ति ।आर एस एस और भाजपा की देश भक्ति । वाम पंथियों  और समाजवादियों की देश भक्ति । अन्ना हज़ारे रामदेव जग्गी वासुदेव राम रहीम आशा राम श्री श्री रवि शंकर और अब केजरीवाल की देश भक्ति ।
अब सवाल यह उठता है की क्या केजरीवाल आर एस एस की तरह भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन की भी वकालत करेंगे । संघ और उसके आनुवंशिक संघटन पहले से ही इतिहास के पुनर्लेखन की बात करते रहे हैं । 
शायद यही कारण है की पूर्ण वहुमत की सरकार बनते ही मोदी जी के नेतृत्व में इतिहास की ग़लतियों को दुरुस्त करने की कोशिस हो रही है ।
केजरीवाल और अन्ना हज़ारे के आंदोलन को पूरी तरह संघ और भाजपा का समर्थन हासिल था ।लोगों का हमेशा से मानना रहा है की केजरीवाल किरण बेदी और तमाम अधिकारी 2014 के पहले तक एक साथ मिलकर कम करते रहे ।बताया जा रहा है की 
दिल्ली में नया एजुकेशन बोर्ड बनाने के पीछे भी केजरीवाल की मंशा भाजपा की तुलना में ज़्यादा नख़र होकर देश भक्ति के मुद्दे को उछालने की है केजरीवाल को पता है की भाजपा को राजनैतिक शिकस्त उसी के नारे को अपना कर ही दिया जा सकता है ।
केजरीवाल का यह चेहरा पिछले दिनो दिल्ली में हुए दंगो और निज़ामुद्दीन मरकज़ के मामले में दिल्ली की जनता को देखने को मिल चुका है ।
केजरीवाल disruption aur stunt ki politics के पुरोधा हैं वैसे तो राजनीति में झूठ  और फ़रेब जुमलेवजी और आडम्बर सफलता के लिए ज़रूरी हैं लेकिन  केजरीवाल ने झूठे आरोप लगाने के लिए स्वर्गीय अरुण जेटली से अदालत में माफ़ी माँगकर अपनी ईमानदारी इंटेग्रिटी को ज़ाहिर कर दिया था ।
केजरीवाल ने सत्ता पाने के लिए उन सभी हथकंडों को अपना लिया जिनका वे खुद सक्रिय राजनीति में आने से पहले तक विरोध करते थे ।
पहले रेल के डिब्बों और सवारी बसों में अपना माल वेचने वाले नारा लगाया करते थे —नक्कालों से सावधान 
असली माल हमारे पास है 
भारतीय राजनीति में भी यह प्रयोग होता रहा है ।एक वार अटल जी ने भी gandhian socialism का नारा दिया था लेकिन यह प्रयोग पूरी तरह विफल रहा और फिर वापस चुनावी कामयाबी के लिए अटल जी को मूल फ़िलासफ़ी पर ही जाना पड़ा।
अयोध्या में बंबे मस्जिद का ताला खुलने के वाद हुए चुनाव में राजीव गांधी ने भी राम राज्य  की स्थापना का नारा दिया था । लेकिन देश की जनता ने राजीव गांधी और उनकी पार्टी के स्लोगन पर भरोसा नहीं किया ।
सत्ता पाने के मक़सद से एक बार मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह और अखिलेश यादव ने मायावती से तालमेल किया  लेकिन जनता को रास नहीं आया ।अब इसी तरह के प्रयोग आज कल मध्या प्रदेश में देखने को मिल रहा है ।
वहाँ पर कमल नाथ और दिग्विजय सिंह जी की जोड़ी ऐसे नेताओं को पार्टी में शामिल करवा रही है जो कल तक गोडसे के पुजारी थे ।
भारतीय राजनीति के कुछ उदाहरण देने का मक़सद उन नेताओं को आइना दिखाना है जो देश की अवाम को कम अक़्ल समझते हैं । ऐसे नेताओं को जुमलेवाजी और स्टंट की पॉलिटिक्स से परहेज़ करते हुए अपने दल के मूल सिद्धांत के आधार पर जनता से वोट माँगना चाहिए ।

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