बुधवार, 16 सितंबर 2020

uttar pradesh

पुलिस सुधार VS पुलिसिया राज 

उत्तर प्रदेश में एक तरफ पुलिस की कार्यशैली सवालों में घेरे में बनी हुई है दूसरी तरफ सूबे की सरकार उन्हें असीमित अधिकार देने की दिशा में काम कर रही है ... महोबा के  व्यापारी इंद्रकांत त्रिपाठी की हत्या मामले में आईपीएस अधिकारी मणिलाल पाटीदार की भूमिका को लेकर लोगों की हैरानी कम नहीं हुई थी कि सरकार ने स्पेशल सिक्युरिटी फोर्स बनाने का ऐलान कर दिया ... इस फोर्स का गठन अहम जगहों की सुरक्षा करने के मकसद से किया जा रहा है.... लेकिन इसे दिए गए असीमित अधिकारों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं .... इससे पहले पुलिस को ज्यादा से ज्यादा अधिकार दिए जाने को लेकर यूपी के नोएडा और लखनऊ में कमिश्नरी व्यवस्था लागू की जा चुकी है .. यानि कानून व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त करने के लिए तमाम उपाय किए जा रहे हैं लेकिन जिस राज्य में पुलिस की मौजूदा कार्यशैली पर लगातार गंभीर  सवाल खड़े हो रहे हों .. मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ाई जा रही हों वहां क्या ऐसे असीमित अधिकार दिया जाना सही है .. 
देश भर में 65 से ज्यादा जिलों में कमिश्नर प्रणाली लागू है .. इस व्यवस्था में  पुलिस को कार्रवाई से पहले जिलाधिकारी से इजाज़त लेने की जरूरत नहीं पड़ती .. आमतौर पर सुरक्षा के लिहाज से अहम माने जाने वाले जिलों में पुलिस को अधिक शक्तियां देने के लिए ये व्यवस्था की जाती है .. ठीक वैसे ही बिना वारंट गिरफ्तारी, बिना वारंट तलाशी जैसे अधिकार भी उन इलाकों के लिए पुलिस फोर्स को दिए जाते हैं जहां उग्रवाद, आतंकवाद हावी होता है ... अब जब उत्तर प्रदेश में सरकार ऐसे ही तमाम अधिकारों वाली स्पेशल सिक्युरिटी फोर्स बनाने जा रही है तो सवाल उठ रहे हैं कि सूबे में आखिर ऐसा क्या है कि पुलिस को इतने अधिकार दिए जा रहे हैं ... वो भी तब जब पिछले 4 साल से लगातार पुलिस की कार्यशैली सवालों के घेरे में है .. 
आबादी के हिसाब से देश के सबसे बड़े राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखना एक चुनौती से कम नहीं है लेकिन इससे ज्यादा बड़ी चुनौती है पुलिस और कानून व्यवस्था लोगों का भरोसा बनाए रखना .. जो महोबा के एसपी रहे मणिलाल पाटीदार जैसे अधिकारियों की वजह से हमेशा टूटता रहा है .. सवाल ये है कि जहाँ कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार आईपीएस अधिकारियों पर हीं संगीन आरोप लगते रहे हों वहां पुलिस रिफॉर्म के नाम पर इन्हें असीमित अधिकार देने से क्या ये समाज के लिए घातक साबित नहीं होगा.. उत्तर प्रदेश पुलिस को सवालों के घेरे में लाने वाले अकेले मणिलाल पाटीदार ही नहीं हैं .. कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं जिसमें पुलिस रिश्वतखोरी, जबरन उगाही, मारपीट जैसे आरोपों से घिरती है ... कई मामले ऐसे भी सामने आए हैं जिसमें एक आईपीएस अधिकारी ने दूसरे आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की है ... ऐसे में क्या रिफॉर्म के नाम पर मात्र अधिकार बढ़ाना काफी है ? 
पुलिस रिफॉर्म के नाम पर सूबे की सरकार ने नोएडा और लखनऊ में कमिश्नर सिस्टम लागू कर चुकी है .... कई और जिलों में भी ये व्यवस्था लागू करने पर विचार किया जा रहा है ... वो भी तब जब पहले इस तरह के प्रयोग सफल नहीं रहे हैं ..  कई साल पहले सत्तर के दशक में प्रदेश के कुछ जिलों में कमिश्नरी व्यवस्था लागू की गई थी जिसे बाद में आलोचना के बाद हटा दिया गया था ...  सवाल इस पर भी उठते रहते हैं कि मानकों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में पुलिस फोर्स है ही नहीं ...  2019  में आए आंकड़ों के मुताबिक यूपी में पुलिसबल में लगभग एक लाख तीस हज़ार पद खाली हैं ... क्या रिफ़ॉर्म से पहले कानून व्यवस्था सुधारने के लिए इन खाली पदों को भरने की ज़रूरत नहीं महसूस की जाती ... 
सरकार रिफॉर्म के नाम पर स्पेशल सिक्युरिटी फोर्स का गठन करने जा रही है जिसके पास बिना वारंट के तलाशी और गिरफ्तार करने जैसे अधिकार होंगे ... जहां भी पुलिस को असीमित अधिकार दिए जाते हैं वहां सिविल राइट्स, ह्यूमन राइट्स के उल्लंघन के मामलों में बढ़ोतरी देखी जाती है .. इसीलिए स्पेशल सिक्युरिटी फोर्स के गठन पर भी सवाल उठ रहे हैं ... सवाल उठने लाजिमी भी हैं वो भी तब-जब देश की ज्यादातर आबादी को आजतक अपने अधिकारों की समुचित जानकारी नहीं है ... 
नॉर्वे दुनिया के सबसे ज्यादा विकसित देशों में शुमार है .. शिक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था, साफ सफाई सबमें टॉप के देशों में आता है ... हैप्पीनेस इंडेक्स में भी फिनलैंड और डेनमार्क के बाद नॉर्वे का ही नंबर आता है ... नॉर्वे अपराध को कम करने के मामले में एक उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है ... हाल ही के दिनों में नॉर्वे में अपराधों की दर 24 साल के सबसे निचले स्तर पर है ... जबकि नॉर्वे की पुलिस अपने साथ हथियार लेकर नहीं चलती .... उनके हथियार गाड़ी में रखे होते हैं ... गौर करने लायक बात ये है कि उनकी पुलिस फोर्स और जनसंख्या का अनुपात अच्छा है । युनाइटेड नेशंस की एनालिसिस के मुताबिक नॉर्वे में 10 हज़ार की आबादी पर करीब 188 पुलिसकर्मी हैं जबकि भारत में 19 लाख 26 हज़ार लोगों पर 198 पुलिसकर्मी हैं  । 
ऐसे में पुलिस सुधार के नाम पर सिर्फ अधिकार दिए जाने की बात बेमानी ही लगती है खासकर भारत जैसे देश में जहां आम आदमी पुलिस पर भरोसा नहीं कर पाती, उन्हें जिलाधिकारी से बात करना ज्यादा आसान लगता है ।  अपने अधिकारों से अनजान लोग पुलिसिया ज्यादती के खिलाफ आवाज भी नहीं उठा पाते ... पुलिस और प्रशासनिक महकमे से ही पुलिस को ज्यादा अधिकार दिए जाने के खिलाफ आवाज़ें उठती रही हैं ... ऐसे में क्या पहले इंफ्रास्ट्रक्चर, पुलिस के रवैये को लेकर काम नहीं किया जाना चाहिए ?

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