शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

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कॉरपोरेट्स के सामने हमेशा उपेक्षित रहे हैं किसान 

देश में आए दिन किसानों को अपने हक के लिए लड़ाई लड़नी होती है ... सरकार तक अपनी आवाज़ पहुंचाने के लिए सड़क पर उतर कर विरोध प्रदर्शन करना पड़ता है..  देश की अर्थव्यवस्था में योगदान के पैमाने पर कृषि का नंबर तीसरा है ... और आज भी देश की लगभग 60 फीसदी से ज्यादा आबादी सीधे या परोक्ष रूप से खेती पर निर्भर करती है... बावजूद इसके आज तक कृषि सेक्टर को उद्योग का दर्जा नहीं मिला है ... और किसानों की हमेशा उपेक्षा होती रही है... अब तीन नए अध्यादेश लाए गए हैं जिसका किसान तो विरोध कर ही रहे हैं... सरकार की सहयोगी पार्टी भी इस मुद्दे पर अपना विरोध जता रही है .. 
ये सच्चाई है कि देश की करीब 60 फीसदी से ज्यादा आबादी आजीविका के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर करती है .. बावजूद इसके...  इस सेक्टर की हमेशा से उपेक्षा होती आई है .... देश में जो भी सरकार रही वो कॉरपोरेट्स और MSME की चिंता करती रही .... किसानों की उतनी फिकर किसी को नहीं हुई जितनी होनी चाहिए थी ... किसानों को हमेशा एक वोटबैंक के तौर पर ही देखा गया... कभी ऋणमाफी तो कभी सस्ती बिजली सस्ते खाद के सपने दिखाकर उनका वोट लिया गया ... ऐसा हमेशा से होता आया है ... 
विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री बनने से पहले किसानों को ऋण माफी का वायदा किया था ...और सत्ता में आने के बाद इसे पूरा भी किया ... लेकिन उस समय के अर्थशास्त्रियों ने वीपी सिंह की उस नीति पर विरोध जताया ... इस नीति की तीखी आलोचना की गई ... आरोप लगे कि इस तरह की योजनाएं बैंकिंग सेक्टर को कमजोर कर देती हैं ... 
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री रहे वीर बहादुर सिंह के शासनकाल में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत ने बिजली बिलों की माफी के लिए बहुत ही सफल आंदोलन चलाया था .. जिसके बाद सरकार झुकना पड़ा और किसानों की मांगें माननी पड़ी... उस समय भी आरोप लगे कि उत्तर प्रदेश बिजली बोर्ड की वित्तीय हालत खराब होने में किसानों के बिजली बिलों का भुगतान एक अहम वजह थी ... जबकि सच्चाई कुछ और है ,,.
किसानों बुनकरों और मजदूरों को जब भी कोई आर्थिक पैकेज या रियायत देने की बात आती है तो ज्यादातर अर्थशास्त्री और नौकरशाह विरोध में खड़े नज़र आते हैं ... और अगर वही रियायत कॉरपोरेट घरानों को या MSME सेक्टर को देने की बात आती है किसी खेमे से विरोध के सुर सुनाई नहीं देते ... 
देश के वित्त मंत्री चाहे वो प्रणब मुखर्जी रहे हों, पी चिदंबरम रहे हों या फिर एनडीए की सरकार में अरुण जेटली ने वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली, ये सब कहीं ना कहीं कॉरोपोरेट लॉबी के हितों की रक्षा में खड़े दिखाई दिए .. और किसानों के सवाल पर खाली खजाना और खराब वित्तीय स्थिति का हवाला देकर चुप्पी साध लेते हैं .. इसकी असली वजह खेती का Unorganised Sector होना है । राजनैतिक दलों को इन Unorganised Sector में काम करने वाले किसानों और मजदूरों का वोट तो चाहिए लेकिन उन्हें रियायत देने के लिए उनके पास पैसा नहीं है । 
रियायतों के नाम पर अब तक जितने भी कानून बने हैं उनमें से ज्यादातर कानून इन वर्गों की जिंदगी को और मुश्किल में ही डालते रहते हैं, शायद यही वजह है कि देश के अलग-अलग हिस्सों से किसानों, बुनकरों और मजदूरों की आत्महत्या करने की खबरें आती रहती हैं और नेता उन घटनाओं पर घड़ियाली आंसू बहाकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं ।

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