बुधवार, 30 सितंबर 2020

babri demolition case

Babri Demolition Case : विवादित ढांचा विध्वंस मामले में फैसला                                                                                                                                                                           https://youtu.be/1a_-v1wk4Ts?t=119

शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

farmers

कॉरपोरेट्स के सामने हमेशा उपेक्षित रहे हैं किसान 

देश में आए दिन किसानों को अपने हक के लिए लड़ाई लड़नी होती है ... सरकार तक अपनी आवाज़ पहुंचाने के लिए सड़क पर उतर कर विरोध प्रदर्शन करना पड़ता है..  देश की अर्थव्यवस्था में योगदान के पैमाने पर कृषि का नंबर तीसरा है ... और आज भी देश की लगभग 60 फीसदी से ज्यादा आबादी सीधे या परोक्ष रूप से खेती पर निर्भर करती है... बावजूद इसके आज तक कृषि सेक्टर को उद्योग का दर्जा नहीं मिला है ... और किसानों की हमेशा उपेक्षा होती रही है... अब तीन नए अध्यादेश लाए गए हैं जिसका किसान तो विरोध कर ही रहे हैं... सरकार की सहयोगी पार्टी भी इस मुद्दे पर अपना विरोध जता रही है .. 
ये सच्चाई है कि देश की करीब 60 फीसदी से ज्यादा आबादी आजीविका के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर करती है .. बावजूद इसके...  इस सेक्टर की हमेशा से उपेक्षा होती आई है .... देश में जो भी सरकार रही वो कॉरपोरेट्स और MSME की चिंता करती रही .... किसानों की उतनी फिकर किसी को नहीं हुई जितनी होनी चाहिए थी ... किसानों को हमेशा एक वोटबैंक के तौर पर ही देखा गया... कभी ऋणमाफी तो कभी सस्ती बिजली सस्ते खाद के सपने दिखाकर उनका वोट लिया गया ... ऐसा हमेशा से होता आया है ... 
विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री बनने से पहले किसानों को ऋण माफी का वायदा किया था ...और सत्ता में आने के बाद इसे पूरा भी किया ... लेकिन उस समय के अर्थशास्त्रियों ने वीपी सिंह की उस नीति पर विरोध जताया ... इस नीति की तीखी आलोचना की गई ... आरोप लगे कि इस तरह की योजनाएं बैंकिंग सेक्टर को कमजोर कर देती हैं ... 
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री रहे वीर बहादुर सिंह के शासनकाल में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत ने बिजली बिलों की माफी के लिए बहुत ही सफल आंदोलन चलाया था .. जिसके बाद सरकार झुकना पड़ा और किसानों की मांगें माननी पड़ी... उस समय भी आरोप लगे कि उत्तर प्रदेश बिजली बोर्ड की वित्तीय हालत खराब होने में किसानों के बिजली बिलों का भुगतान एक अहम वजह थी ... जबकि सच्चाई कुछ और है ,,.
किसानों बुनकरों और मजदूरों को जब भी कोई आर्थिक पैकेज या रियायत देने की बात आती है तो ज्यादातर अर्थशास्त्री और नौकरशाह विरोध में खड़े नज़र आते हैं ... और अगर वही रियायत कॉरपोरेट घरानों को या MSME सेक्टर को देने की बात आती है किसी खेमे से विरोध के सुर सुनाई नहीं देते ... 
देश के वित्त मंत्री चाहे वो प्रणब मुखर्जी रहे हों, पी चिदंबरम रहे हों या फिर एनडीए की सरकार में अरुण जेटली ने वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली, ये सब कहीं ना कहीं कॉरोपोरेट लॉबी के हितों की रक्षा में खड़े दिखाई दिए .. और किसानों के सवाल पर खाली खजाना और खराब वित्तीय स्थिति का हवाला देकर चुप्पी साध लेते हैं .. इसकी असली वजह खेती का Unorganised Sector होना है । राजनैतिक दलों को इन Unorganised Sector में काम करने वाले किसानों और मजदूरों का वोट तो चाहिए लेकिन उन्हें रियायत देने के लिए उनके पास पैसा नहीं है । 
रियायतों के नाम पर अब तक जितने भी कानून बने हैं उनमें से ज्यादातर कानून इन वर्गों की जिंदगी को और मुश्किल में ही डालते रहते हैं, शायद यही वजह है कि देश के अलग-अलग हिस्सों से किसानों, बुनकरों और मजदूरों की आत्महत्या करने की खबरें आती रहती हैं और नेता उन घटनाओं पर घड़ियाली आंसू बहाकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं ।

बुधवार, 16 सितंबर 2020

uttar pradesh

पुलिस सुधार VS पुलिसिया राज 

उत्तर प्रदेश में एक तरफ पुलिस की कार्यशैली सवालों में घेरे में बनी हुई है दूसरी तरफ सूबे की सरकार उन्हें असीमित अधिकार देने की दिशा में काम कर रही है ... महोबा के  व्यापारी इंद्रकांत त्रिपाठी की हत्या मामले में आईपीएस अधिकारी मणिलाल पाटीदार की भूमिका को लेकर लोगों की हैरानी कम नहीं हुई थी कि सरकार ने स्पेशल सिक्युरिटी फोर्स बनाने का ऐलान कर दिया ... इस फोर्स का गठन अहम जगहों की सुरक्षा करने के मकसद से किया जा रहा है.... लेकिन इसे दिए गए असीमित अधिकारों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं .... इससे पहले पुलिस को ज्यादा से ज्यादा अधिकार दिए जाने को लेकर यूपी के नोएडा और लखनऊ में कमिश्नरी व्यवस्था लागू की जा चुकी है .. यानि कानून व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त करने के लिए तमाम उपाय किए जा रहे हैं लेकिन जिस राज्य में पुलिस की मौजूदा कार्यशैली पर लगातार गंभीर  सवाल खड़े हो रहे हों .. मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ाई जा रही हों वहां क्या ऐसे असीमित अधिकार दिया जाना सही है .. 
देश भर में 65 से ज्यादा जिलों में कमिश्नर प्रणाली लागू है .. इस व्यवस्था में  पुलिस को कार्रवाई से पहले जिलाधिकारी से इजाज़त लेने की जरूरत नहीं पड़ती .. आमतौर पर सुरक्षा के लिहाज से अहम माने जाने वाले जिलों में पुलिस को अधिक शक्तियां देने के लिए ये व्यवस्था की जाती है .. ठीक वैसे ही बिना वारंट गिरफ्तारी, बिना वारंट तलाशी जैसे अधिकार भी उन इलाकों के लिए पुलिस फोर्स को दिए जाते हैं जहां उग्रवाद, आतंकवाद हावी होता है ... अब जब उत्तर प्रदेश में सरकार ऐसे ही तमाम अधिकारों वाली स्पेशल सिक्युरिटी फोर्स बनाने जा रही है तो सवाल उठ रहे हैं कि सूबे में आखिर ऐसा क्या है कि पुलिस को इतने अधिकार दिए जा रहे हैं ... वो भी तब जब पिछले 4 साल से लगातार पुलिस की कार्यशैली सवालों के घेरे में है .. 
आबादी के हिसाब से देश के सबसे बड़े राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखना एक चुनौती से कम नहीं है लेकिन इससे ज्यादा बड़ी चुनौती है पुलिस और कानून व्यवस्था लोगों का भरोसा बनाए रखना .. जो महोबा के एसपी रहे मणिलाल पाटीदार जैसे अधिकारियों की वजह से हमेशा टूटता रहा है .. सवाल ये है कि जहाँ कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार आईपीएस अधिकारियों पर हीं संगीन आरोप लगते रहे हों वहां पुलिस रिफॉर्म के नाम पर इन्हें असीमित अधिकार देने से क्या ये समाज के लिए घातक साबित नहीं होगा.. उत्तर प्रदेश पुलिस को सवालों के घेरे में लाने वाले अकेले मणिलाल पाटीदार ही नहीं हैं .. कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं जिसमें पुलिस रिश्वतखोरी, जबरन उगाही, मारपीट जैसे आरोपों से घिरती है ... कई मामले ऐसे भी सामने आए हैं जिसमें एक आईपीएस अधिकारी ने दूसरे आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की है ... ऐसे में क्या रिफॉर्म के नाम पर मात्र अधिकार बढ़ाना काफी है ? 
पुलिस रिफॉर्म के नाम पर सूबे की सरकार ने नोएडा और लखनऊ में कमिश्नर सिस्टम लागू कर चुकी है .... कई और जिलों में भी ये व्यवस्था लागू करने पर विचार किया जा रहा है ... वो भी तब जब पहले इस तरह के प्रयोग सफल नहीं रहे हैं ..  कई साल पहले सत्तर के दशक में प्रदेश के कुछ जिलों में कमिश्नरी व्यवस्था लागू की गई थी जिसे बाद में आलोचना के बाद हटा दिया गया था ...  सवाल इस पर भी उठते रहते हैं कि मानकों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में पुलिस फोर्स है ही नहीं ...  2019  में आए आंकड़ों के मुताबिक यूपी में पुलिसबल में लगभग एक लाख तीस हज़ार पद खाली हैं ... क्या रिफ़ॉर्म से पहले कानून व्यवस्था सुधारने के लिए इन खाली पदों को भरने की ज़रूरत नहीं महसूस की जाती ... 
सरकार रिफॉर्म के नाम पर स्पेशल सिक्युरिटी फोर्स का गठन करने जा रही है जिसके पास बिना वारंट के तलाशी और गिरफ्तार करने जैसे अधिकार होंगे ... जहां भी पुलिस को असीमित अधिकार दिए जाते हैं वहां सिविल राइट्स, ह्यूमन राइट्स के उल्लंघन के मामलों में बढ़ोतरी देखी जाती है .. इसीलिए स्पेशल सिक्युरिटी फोर्स के गठन पर भी सवाल उठ रहे हैं ... सवाल उठने लाजिमी भी हैं वो भी तब-जब देश की ज्यादातर आबादी को आजतक अपने अधिकारों की समुचित जानकारी नहीं है ... 
नॉर्वे दुनिया के सबसे ज्यादा विकसित देशों में शुमार है .. शिक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था, साफ सफाई सबमें टॉप के देशों में आता है ... हैप्पीनेस इंडेक्स में भी फिनलैंड और डेनमार्क के बाद नॉर्वे का ही नंबर आता है ... नॉर्वे अपराध को कम करने के मामले में एक उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है ... हाल ही के दिनों में नॉर्वे में अपराधों की दर 24 साल के सबसे निचले स्तर पर है ... जबकि नॉर्वे की पुलिस अपने साथ हथियार लेकर नहीं चलती .... उनके हथियार गाड़ी में रखे होते हैं ... गौर करने लायक बात ये है कि उनकी पुलिस फोर्स और जनसंख्या का अनुपात अच्छा है । युनाइटेड नेशंस की एनालिसिस के मुताबिक नॉर्वे में 10 हज़ार की आबादी पर करीब 188 पुलिसकर्मी हैं जबकि भारत में 19 लाख 26 हज़ार लोगों पर 198 पुलिसकर्मी हैं  । 
ऐसे में पुलिस सुधार के नाम पर सिर्फ अधिकार दिए जाने की बात बेमानी ही लगती है खासकर भारत जैसे देश में जहां आम आदमी पुलिस पर भरोसा नहीं कर पाती, उन्हें जिलाधिकारी से बात करना ज्यादा आसान लगता है ।  अपने अधिकारों से अनजान लोग पुलिसिया ज्यादती के खिलाफ आवाज भी नहीं उठा पाते ... पुलिस और प्रशासनिक महकमे से ही पुलिस को ज्यादा अधिकार दिए जाने के खिलाफ आवाज़ें उठती रही हैं ... ऐसे में क्या पहले इंफ्रास्ट्रक्चर, पुलिस के रवैये को लेकर काम नहीं किया जाना चाहिए ?

गुरुवार, 10 सितंबर 2020

west bengal

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का ‘अधीर’ अस्त्र
पश्चिम बंगाल में सोमेन मित्रा के निधन के बाद खाली हुई कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी के लिए कांग्रेस ने एक बार फिर अपनी पार्टी से सांसद अधीर रंजन चौधरी पर भरोसा जताया है... अधीर रंजन चौधरी पश्चिम बंगाल के बहरामपुर से ही लोकसभा सांसद हैं और पहले भी फरवरी, 2014 से लेकर सितंबर 2018 तक प्रदेश में कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं ... पश्चिम बंगाल में अगले साल यानि 2021 के अप्रैल-मई में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव को देखते हुए अधीर रंजन की नियुक्ति को काफी अहम माना जा रहा है ... ऐसे में ये तो तय है कि पश्चिम बंगाल में टिकट के बंटवारे से लेकर गठबंधन तक में अधीर रंजन चौधरी की भूमिका अहम होने जा रही है ... 
हालांकि अधीर रंजन चौधरी की अध्यक्ष पद पर तैनाती से ये बात साफ हो रही कि आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने तृणमूल से किनारा कर लिया है और कड़ी चुनौती देने की तैयारी कर रही है ... ऐसा इसीलिए माना जा सकता है कि अधीर रंजन के ममता बनर्जी से मतभेद जगजाहिर हैं .. अधीर रंजन चौधरी ने बीते कुछ महीनों में ममता बनर्जी को कठघरे में खड़ा करने का कोई मौका नहीं छोड़ा है ... प्रवासी मजदूरों के मसले पर अधीर रंजन ने ममता बनर्जी पर प्रवासियों और गैर-प्रवासियों के बीच दरार पैदा करने का आरोप लगाया था ... अधीर रंजन ने कहा था कि ममता बनर्जी कोरोना वायरस के संक्रमण के लिए भी गलत तरीके से प्रवासी मजदूरों को जिम्मेदार ठहरा रही हैं .. इससे पहले मार्च के महीने में नागरिकता संशोधन कानून के मसले पर भी अधीर रंजन चौधरी ने ममता बनर्जी पर बीजेपी से गोपनीय तालमेल करने के आरोप लगाए थे ... अधीर रंजन चौधरी 2013 में बंगाल पंचायत चुनावों के दौरान ममता बनर्जी को पागल हाथी तक कह चुके हैं .. 
ये अदावत दोनों तरफ से है ... कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी को जब 2012 में केंद्र में सत्ता संभाल रही यूपीए ने रेल राज्य मंत्री बनाया था तो यूपीए से अलग हो चुकीं ममता बनर्जी ने आरोप लगाए थे कि कांग्रेस ने जानबूझकर उनके विरोधी को मंत्रिमंडल में जगह दी है ... दरअसल 1996 में पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के दौरान भी उस वक्त कांग्रेस में रहीं ममता बनर्जी ने मुर्शिदाबाद सीट से अधीर रंजन चौधरी को टिकट दिए जाने का विरोध किया था ... हालांकि तब अधीर रंजन चौधरी रंजन का ना सिर्फ टिकट मिला बल्कि वो जीत भी गए .. तब से लेकर अब तक वो चुनाव जीतते आ रहे हैं ... पिछली बार पश्चिम बंगाल के बरहामपुर से लोकसभा का चुनाव लगातार पांचवी बार जीते .. 
ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़ दी .. बाद में अपनी पार्टी तृणमूल का समर्थन भी कांग्रेस से वापस ले लिया... 2019 के लोकसभा चुनावों में ममता बनर्जी से शरद पवार को साथ लेकर तीसरा मोर्चा बनाने की कवायद भी की... ममता बनर्जी राहुल गांधी को नकार ही चुकी हैं ... कई मौकों पर उनके खिलाफ बयान देकर ममता ने कांग्रेस का विरोध ही किया है .. ऐसे में अब अधीर रंजन चौधरी को आगे कर कांग्रेस ने भी ममता बनर्जी को साफ संदेश दे दिया है ... 
वैसे भी माना जा रहा है कि राहुल गांधी जोड़-तोड़ की राजनीति को आगे बढ़ाने के मूड में नहीं हैं ... राहुल ने उन सभी पार्टियों या नेताओं से किनारा करना शुरू कर दिया है जो ना तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी का साथ दे रहे हैं, ना हीं उनके खिलाफ जाकर अपना स्पष्ट मत दे रहे हैं ... ऐसे सभी मिडिल पाथ बनाकर चलने वाली पार्टियों और नेताओं से राहुल गांधी ने किनारा करना शुरू कर दिया है ..
ये बात राहुल गांधी और कांग्रेस के फैसलों से भी साफ हो रही है ... कांग्रेस में रहकर कई दशकों तक सत्ता की मलाई खाने वाले नेताओं की पिछले कुछ वक्त  में सामने आई बेचैनी को राहुल गांधी ने भांप लिया है ... ऐसा लगता है कि राहुल गांधी समझ चुके हैं कि कपिल सिब्बल, आनंद शर्मा और गुलाम नबी आज़ाद सरीखे नेता Compromised हैं .. इसीलिए आज के दौर में जब जनाधार खोती जा रही कांग्रेस को दोबारा जमीन पाने के लिए फाइटर नेताओं की ज़रूरत है तो पार्टी अधीर रंजन चौधरी जैसे नेताओं को आगे कर रही है और उन नेताओं से किनारा किया जा रहा है जो  liaisoner, Fixer या फिर फ्लोर मैनेजर की भूमिका में रहे हैं ... ऐसे नेताओं को पीछठे किया जा रहा है जो अपने व्यवसायिक हितों को साधने की वजह से सरकार से सीधे confront करने की हालत में नहीं हैं .. इसी रणनीति के तहत केंद्र और राज्यों में कांग्रेस की नई लीडरशिप को प्रोमोट किया जा रहा है ... यही रणनीति है जिसके तहत Compromised gang of Congress को पीछे कर अधीर रंजन चौधरी, रणदीप सुरजेवाला जैसे नेताओं को आगे किया जा  रहा है .. अब ये अलग बात है कि ऐसे ही कुछ यंग नेता सत्ता और पॉलिटिकल फ्यूचर बदलने के लालच में पार्टी छोड़कर भाग गए हैं ...

बुधवार, 9 सितंबर 2020

government

AAJ KA MUDDA : देश बेरोजगार, कहां हो सरकार ?                                                                                                                                                                 https://youtu.be/IooeeHqKUIc?t=256

मंगलवार, 8 सितंबर 2020

Friendly fight in u p

बीजेपी-आप की सियासी नूराकुश्ती
दो साल बाद उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी इन राज्यों में सक्रिय हो गई है .. आम आदमी पार्टी से राज्यसभा सांसद संजय सिंह कई महीनों से उत्तर प्रदेश में जमकर बैठे हैं और अलग-अलग मुद्दों पर योगी सरकार को घेरने की कोशिश करते नज़र आ रहे हैं .... मुद्दा चाहे विधायक रहे निवेंद्र मिश्रा की हत्या का हो ... या फिर चिकित्सा उपकरणों की खरीद में कथित घोटाले का ... ऐसे में पूरे प्रदेश में संजय सिंह के खिलाफ 10 से ज्यादा FIR भी दर्ज हो गई हैं ... हालांकि संजय सिंह के खिलाफ कार्रवाई में उत्तर प्रदेश सरकार की वो आक्रामकता नहीं दिखती जैसी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू को लेकर है ... सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने वाले अजय कुमार लल्लू आए दिन गिरफ्तार होते रहते हैं.. लगभग एक महीना जेल में बिता चुके हैं ... ऐसे में सवाल ये उठते हैं कि क्या प्रदेश सरकार को आम आदमी पार्टी से कोई खतरा नहीं दिखता या फिर ये एक अलग तरह की सियासी रणनीति है ? 
दरअसल देश की सियासत में लगभग दस साल पुरानी आम आदमी पार्टी और केंद्र की सत्ता पर 6 साल से काबिज बीजेपी एक जैसे मुद्दों और वादों के साथ कुर्सी पर काबिज हुई है .. अन्ना के आंदोलन के बाद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी बनाई और दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो गए... भ्रष्टाचार विरोधी इसी आंदोलन का एक चेहरा थीं तेज़तर्रार आईपीएस अधिकारी रहीं किरण बेदी .. जिन्होंने केंद्र में बीजेपी की सरकार बनते ही पार्टी ज्वाइन कर ली और 2016 आते -आते पुडुचेरी की राज्यपाल बना दीं गईं ... उस वक्त सीएजी की रिपोर्ट्स चर्चा में रही थीं.. क्योंकि सीएजी विनोद राय की 2जी स्पेक्ट्रम के आवंटन पर दी हुई रिपोर्ट को भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का आधार माना गया था ... केंद्र में एनडीए की सरकार बनने के बाद सीएजी रहे विनोद राय को बैंकिंग बोर्ड ऑफ इंडिया का चेयरमैन नियुक्त किया गया था .. ये बात अलग है कि इस कथित घोटाले की लंबी जांच के बाद भी किसी भी आरोपी के खिलाफ सबूत नहीं मिल पाए और सीबीआई की अदालत ने सारे आरोपियों को बरी कर दिया था .... इस आंदोलन में 2009 में बने विवेकानंद फाउंडेशन की भी बड़ी भूमिका रही थी .. ऐसा कहा गया कि अन्ना हज़ारे, अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और रामदेव को एक साथ लाने और टीम अन्ना बनाने में इस फाउंडेशन ने अहम रोल निभाया ... इस फाउंडेशन के डायरेक्टर हैं अजित डोभाल जो अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं …. 
बीते कुछ वक्त में कई ऐसे मुद्दे रहे हैं जिसपर अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी बीजेपी से सीधे दो-दो हाथ करने के मूड में नज़र नहीं आई है .. चाहे वो दिल्ली में हुए दंगों का मामला हो या फिर अनुच्छेद 370 हटाए जाने का .. कोविड 19 को लेकर केंद्र सरकार की स्ट्रैटेजी पर अरविंद केजरीवाल और केंद्र सरकार में कोई गतिरोध नहीं दिखा है ... ऐसे में उत्तर प्रदेश में आम आदमी की सक्रियता सवाल खड़े  करती ही है... यूपी- उत्तराखंड दोनों ही राज्यों में बीजेपी की सरकार है ... जिस पार्टी की सरकार होती है उसे एंटी इनकंबेंसी का खतरा होता है ... मौजूदा हालात में उत्तर प्रदेश में सरकार की छवि वर्ग विशेष के विरोधी के तौर पर बनी हुई है ...खासकर ब्राह्मण वर्ग में पैदा हुए सरकार विरोधी माहौल का फायदा कांग्रेस या बीएसपी और एसपी को ना मिले इसीलिए आम आदमी पार्टी को मैदान में उतारा गया है ... 2011 से ही बीजेपी की बी टीम रही आम आदमी पार्टी एक बार फिर बीजेपी को मजबूती देने के लिए मुस्तैद नज़र आ रही है ... इसीलिए उनके नेता संजय सिंह उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों का मुद्दा जोर शोर से उठाते दिख रहे हैं ... लगातार योगी आदित्यनाथ पर सीधे हमले करने के बावजूद इनके खिलाफ गिरफ्तारी की कार्रवाई नहीं हुई है ..