शनिवार, 18 जुलाई 2020

zimbabve

रॉबर्ट गैब्रिएल मुगाबे एक ऐसी शख्सियत था जिसे कुछ लोग नेता के तौर पर देखते हैं तो कुछ एक निरंकुश शासक के तौर पर ... 1980 में जिम्बाब्वे को आज़ादी दिलाने के नायक रहे रॉबर्ट मुगाबे ने 37 साल के शासनकाल में खुद को खलनायक साबित कर लिया ... नतीजा ये हुआ कि जब तख्तापलट कर इस निरंकुश शासक को सत्ता से बेदखल किया गया तो जिम्बाब्वे के लोग जश्न मनाते नज़र आए... 
मुगाबे का जन्म 21 फरवरी 1924 को उस वक़्त के रोडेशिया में हुआ था... 6 भाई बहनों के बीच जन्मे मुगाबे के पिता पेशे से कारपेंटर थे और माँ छोटे बच्चों को धार्मिक शिक्षा दिया करती थीं...  रोडेशिया पर ब्रिटिश का शासन था .. शोना जाति समूह के एक गरीब परिवार में जन्मे मुगाबे ने पढ़ाई पूरी करने के बाद बतौर शिक्षक नौकरी शुरू की थी ... जिम्बाब्वे पर शासन कर रहे अंग्रेजों  के लिए मुगाबे के मन में नफरत पैदा हो रही थी ...1949 में स्कॉलरशिप पर साउथ अफ्रीका की युनिवर्सिटी ऑफ फोर्ट हेर में पढ़ने गए मुगाबे ने अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस यूथ लीग ज्वाइन कर ली थी ... इसी दौरान मुगाबे कम्युनिस्ट विचारधारा वाले लोगों के संपर्क में आया ... ये वो वक्त था जब भारत ने अंग्रेजों से आज़ादी हासिल की थी और इस आज़ादी के लिए महात्मा गांधी के अपनाए गए तौर तरीकों से मुगाबे काफी प्रभावित हुआ था .. ये वो वक्त था जो रॉबर्ट मुगाबे की जिंदगी में टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ ... 1952 में रोडेशिया लौटा मुगाबे पूरी तरह से अंग्रेजों के शासन के खिलाफ हो चुका था ... हालांकि 1960 तक मुगाबे बतौर शिक्षक काम करता रहा ... 
50 के दशक के आखिरी में जिम्बाब्वे में अंग्रेज़ो के शासन के खिलाफ क्रांति की शुरुआत हो चुकी थी ... 1960 में मुगाबे का दोस्त क्रांतिकारी लियोपोल्ड तकाविरा को गिरफ्तार कर लिया गया ... इस गिरफ्तारी के खिलाफ मुगाबे ने 7000 लोगों को जुटाकर विरोध प्रदर्शन शुरू  कर दिया ... जिससे तेजी से लोग जुड़ने लगे ... एक ही दिन में प्रदर्शनकारियों की संख्या 40 हज़ार तक पहुंच गई ... यहीं पहली बार मुगाबे ने भीड़ को एक नेता के तौर पर संबोधित किया ... इस घटना ने मुगाबे की ज़िदगी पूरी तरह बदल दी .. मुगाबे ने तय कर लिया था कि वो अपनी ज़िंदगी अपने देश के नाम करने जा रहा है ... मुगाबे ने शिक्षक की नौकरी से इस्तीफा दे दिया ... और उग्र विचारधारा वाली नेशनल डेमोक्रैटिक पार्टी से जुड़ गया जहाँ बहुत जल्द मुगाबे को पार्टी का पब्लिसिटी सेक्रेटरी की जिम्मेदारी दे दी गई... ये वो वक्त जब देश में अंग्रेजों के खिलाफ माहौल बनता जा रहा था .. लगातार विद्रोह हो रहे थे .. मुगाबे ने पार्टी को देशभक्ति से जोड़ा .. 1961 आते आते अंग्रेज सरकार ने नेशनल डेमोक्रैटिक पार्टी पर बैन लगा दिया... जिसके बाद मुगाबे ने इस पार्टी के कई सदस्यों के साथ मिलकर जिम्बाब्वे अफ्रीकन पीपुल्स युनियन तैयार कर ली... और मुगाबे को इसका जेनरल सेक्रेटरी बना दिया गया... इस पार्टी ने देश में मुगाबे के नेतृत्व में व्हाइट कम्युनिटी को टारगेट करना शुरू किया ... मुगाबे को लगता था कि अंग्रेजों को देश से हटाने का ये सबसे अच्छा तरीका है लेकिन इसका नतीजा ये हुआ कि एक साल के अंदर जिम्बाब्वे अफ्रीकन पीपुल्स युनियन पर भी बैन लग गया और मुगाबे को गिरफ्तार कर गृहजिले तक सीमित कर दिया गया ... इस दौरान मुगाबे की पत्नी हेफ्रॉन को भी ब्रिटिश महारानी एलिजाबेथ के खिलाफ दिए गए बयान के लिए गिरफ्तार कर लिया गया था ... तभी इन्होंने ब्रिटिश के खिलाफ हिंसक लड़ाई के बारे में विचार करना शुरू कर दिया था... मार्च 1964 आते आते मुगाबे को 21 महीनों तक जेल में रहने की सजा सुना दी गई थी ... हालांकि 1966 में देश में जारी विद्रोह को देखते हुए मुगाबे की रिहाई नहीं हो पाई ... 
मुगाबे ने जेल में रहते हुए आंदोलन में गुरिल्ला युद्ध की नीति को अपना लिया ... 1974 में ब्रिटिश सरकार के लिए वफादार रहने के वादे के साथ प्रधानमंत्री बने इयान स्मिथ की सरकार ने मुगाबे की रिहाई के आदेश दे दिए.... हालांकि शर्त लगाई गई कि मुगाबे जाम्बिया चले जाएंगे ... मुगाबे ने गुरिल्ला युद्ध में माहिर लोगों की टुकड़ी बनाई और वापस जिम्बाब्वे लौट आए... 
जिम्बाब्वे को 1980 में ब्रिटिश शासन से आजादी मिल गई और मुगाबे स्वतंत्र जिम्बाब्वे के पहले प्रधानमंत्री चुने गए… हालांकि आने वाले 37 साल में देश मुगाबे का दूसरा ही रूप देखने वाला था .. वो रूप जिसने मुगाबे को नायक से खलनायक बना दिया .. 



अंग्रेजों के साथ लड़ाई में लगभग 12 साल जेल में रहे और देश को आजादी दिलाने में सबसे अहम भूमिका निभाने वाले रॉबर्ट मुगाबे को फरवरी 1980 में हुए पहले चुनाव में जनता ने हाथों हाथ लिया था ... 
मुगाबे की पार्टी जिम्बाब्वे अफ्रीकन नेशनल युनियन पैट्रियॉटिक फ्रंट को 80 में 57 सीटों पर जीत हासिल हुई थी... 18 अप्रैल 1980 को शपथ लेने के दौरान ही मुगाबे ने रोडेशिया का नाम बदलकर जिम्बाब्वे रख दिया था और देश में नस्लीय शांति बहाल करने का ऐलान किया ... 
सत्ता में आने के बाद मुगाबे एक तरफ समाजवाद की बात करता था दूसरी तरफ सरकार की सारी आर्थिक नीतियां इसके उलट थीं... विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया जा रहा था ...अगले एक दशक में देश का आर्थिक विकास 2.7 फीसदी के दर से हुआ लेकिन बढ़ती जनसंख्यां की वजह से लोगों की वास्तविक कमाई काफी कम हो गई थी... बेरोजगारी लगातार बढ़ती जा रही थी ... 1990 आते-आते जिम्बाब्वे में बेरोजगारी की दर 26 फीसदी तक पहुंच गई और देश की जीडीपी में लगातार गिरावट होती रही ... मुगाबे की नीतियों की वजह से देश में अमीर और गरीब वर्ग तैय़ार हो गय़ा ... कुछ लोग अमीर होते चले गए और इससे गरीब लोगों में अंसतोष बढ़ने लगा.. मुगाबे की पार्टी से जुड़े लोगों ने भी विदेशी निवेश के दम पर अपना बिजनेस अंपायर खड़ा कर लिया ... 
सत्ता में आते ही मुगाबे ने मास मीडिया ट्रस्ट बनाया .. इस ट्रस्ट ने देश में चल रहे सभी अखबारों को खरीद लिया... इन अखबारों में काम कर रहे अंग्रेज संपादक नौकरी से निकाल दिए गए और उनकी जगह पर सरकार के नुमाइंदे काम करने लगे .... नतीजा ये हुआ कि सारे अखबार सरकार का प्रोपगैंडा चलाने वाली मशीन बन चुके थे.. 
मुगाबे ने देश में नस्लीय खाई को भरने को वादा किया था शुरुआत में जिम्बाब्वे में रह रहे गोरों को इसका फायदा भी मिला ...उनका आर्थिक विकास भी हुआ .. नस्लीय भावनाओं को भड़का कर सरकार बनाने वाले मुगाबे की पार्टी जिम्बाब्वे में रह रहे गोरे लोगों के मन से डर नहीं निकाल पाई लिहाजा देश से उनका माइग्रेशन  शुरू हो गया ... 1981 में पार्टी हेडक्वार्टर पर हुए हमले के बाद मुगाबे का नज़रिया गोरों के खिलाफ बिल्कुल ही बदल गया ... इसके बाद से देश में दोनों  नस्लों के बीच की खाई चौड़ी होती चली गई और मुगाबे इस पर नियंत्रण नहीं कर पाया .. 
देश में राजनीतिक तौर पर भी अशांति बढती जा रही थी ... कभी विरोधियों को सरकार में जगह देने वाले मुगाबे देश में सारे अधिकारी अपनी पार्टी को देने के बारे में विचार करने लगे थे ... देश में मुगाबे समर्थक और विरोधी पार्टी के सदस्यों के बीच हिंसक झड़पें होने लगी थीं ... सैकड़ों लोग मारे जाने लगे ... अपने विरोधियों को सबक सिखाने के लिए मुगाबे ने फिफ्थ ब्रिगेड के नाम से एलीट आर्म्ड फोर्स बना ली .. इसके बाद कत्लेआम होने लगे ... पूछताछ के नाम पर लोगों को टॉर्चर किया जाने लगा ... कई आम नागरिक भी इसका शिकार हुए ... मुगाबे को पता था कि ऐसा हो रहा है .. मुगाबे ने कहा ‘We cant tell who is a dissident and who is not’.. यानि हम ये कैसे कह सकते हैं कि कौन विरोधी है कौन नहीं ... 
1987 में देश के संविधान में संशोधन करके मुगाबे देश के राष्ट्रपति बन गए ... लेकिन आने वाला वक्त  इकोनॉमिक फ्रंट पर चुनौतियों वाला था ... 90 के दशक में जिम्बाब्वे की अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता हो चुकी थी ... साल 2000 आते –आते देश में बेरोजगारी की दर 90 फीसदी पहुंच गई और महंगाई दर 23 करोड़ फीसदी ... कहा जाता है कि देश में गरीबी कम करने के लिए सरकार ने अंधाधुंध नोट छापने शुरू कर दिए थे ... लोगों के पास अफरात पैसे आ गए लेकिन ज़रूरी चीजों की कमी   हो गई लिहाजा सामान की कीमतें आसमान छूने लगीं और राशन खरीदने के लिए लोगों को ट्रॉली और सूटकेस में भरकर पैसे ले जाने पड़े... जो गरीब था वो भी करोड़पति था लेकिन उस पैसों की कोई अहमियत नहीं रह गई थी ... 
कहते हैं कि उस वक्त एक हजार लाख करोड़ जिम्बाब्वे डॉलर की कीमत महज 5 अमेरिकी डॉलर रह गई थी... हालात ये हो गए थे कि मुगाबे सरकार को अपने ही देश में अपनी करेंसी तक बंद करनी पड़ गई.... 
मुगाबे की आर्थिक नीतियों का खामियाजा देश की जनता भुगत रही थी ... 1997 में मुगाबे ने देश की जंग-ए-आज़ादी में शामिल हुए वरिष्ठ नागरिकों को लाखों डॉलर भुगतान करने का फैसला किया था ... ये पैसे जुटाने के लिए मनमाने तरीके से टैक्स वसूले गए .... इसके विरोध में देश में हड़ताल होने लगे और पार्टी में भी मुगाबे का विरोध होने लगा ... हालांकि इस फैसले ने देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह पटरी से उतार दिया था ... एक अनुमान के मुताबिक 2009 आते आते देश से 40 लाख लोगों ने पलायन कर दिया था .. ये वो लोग जो हुनरमंद थे और मुगाबे की लचर नीतियों को झेल नहीं पाए... 
मुगाबे की लैंड रिफॉर्म्स की नीतियां भी विवादास्पद रहीं.. मुगाबे ने ज़मीनों पर सरकारी कब्जे के लिए आर्मी का इस्तेमाल किया.... ये ज़मीनें गोरे लोगों की थीं ... कब्जे का विरोध करने पर उन्हें मार डाला गया... ये मामला अदालत में भी गया ... फैसला मुगाबे के विरोध में आया ... हालांकि इसके विरोध में अपना फैसला देने वाले सभी जजों को सरकार ने इस्तीफा देने को मजबूर कर दिया ... इस पूरे विवाद की वजह से देश में एग्रीकल्चर का विकास रुक गया.. देश का अन्न भंडार खाली होने लगा और ह्युमन राइट्स वॉच के मुताबिक देश की 50 फीसदी जनता के पास खाने पीने की कमी हो गई... 2005 आते आते देश के 80फीसदी लोग बेरोजगार हो गए .. 
हालांकि जिम्बाब्वे की माली हालत के लिए मुगाबे ने हमेशा पश्चिमी ताकतों को जिम्मेदार मानते रहे ...इन सबके बीच एक लंबे समय तक रॉबर्ट मुगाबे और ज़िम्बाब्वे एक-दूसरे का पर्याय रहे. कुछ लोगों के लिए तो मुगाबे तमाम विवादों के बावजूद एक हीरो रहे जिन्होंने देश को आज़ादी दिलाई.. खुद मुगाबे को ऐसा लगने लगा था कि उन्हें कोई सत्ता से बेदखल नहीं कर सकता.. देश में चुनाव होते थे लेकिन उस पर हमेशा सवालिया निशान खड़े होते ... 2008 की एक चुनावी रैली में मुगाबे ने कहा मुझे ईश्वर ने नियुक्त किया है, ईश्वर के अलावा कोई और मुझे हटा नहीं सकता.''
1996 में मुगाबे ने उम्र में 40 साल छोटी अपनी सेक्रेटरी ग्रेस से शादी कर ली थी ... भुखमरी से जूझ रहे जिम्बाब्वे ने एक बेहद खर्चीली  शादी देखी थी जिसें हजारों लोग शामिल थे .. ग्रेस के शौक इतने महंगे थे कि लोगों ने उसे अमेजिंग ग्रेस के नाम से बुलाना शुरू कर दिया था ...कहते हैं मुगाबे के पतन में उनकी इस दूसरी पत्नी की अहम भूमिका थी .. 
सत्ता में किसी भी कीमत पर बने रहने के लिए तिकड़म करने वाले मुगाबे को लोग अफ्रीकी तानशाह मानने लगे थे ... जिसने अपनी कुर्सी बचाने के लिए पूरे देश को तबाह कर दिया था... साल 1980 में जिन सपनों को दिखाकर मुगाबे पहली बार सत्ता में आए थे, वो सपने सामाजिक और आर्थिक पैमानों पर लगभग तीन दशक बाद भी पूरे नहीं हो पाए थे ... 
नतीजा ये हुआ कि साल 2017 में सेना ने मुगाबे को सत्ता से बेदखल कर दिया और इमरसन मननगागवा को राष्ट्रपति बनाया गया, जो कभी मुगाबे के ही ख़ास आदमी हुआ करते थे... 
मुगाबे के सत्ता से हटते ही लोगों ने जश्न मनाना शुरू कर दिया ... सड़क पर लोग नाचते गाते नज़र आए ... उनके लिए ये एक बुरे दौर का अंत था .. 
मुगाबे की सेहत हालांकि इस वक्त तक काफी खराब हो चुकी थी .. इलाज के लिए वो अक्सर सिंगापुर जाया करते थे ... उनकी मौत भी 95 साल की उम्र में इलाज के दौरान सिंगापुर में हुई .. अब मुगाबे को लोग अगर जिम्बाब्वे की आज़ादी के नायक के तौर पर याद करते हैं तो लोग उसके कार्यकाल को एक बुरे सपने की तरह भी देखते हैं .. जिसने अपने देश के लोगों की भलाई के लिए लिए कुछ नहीं किया ... 
मुगाबे की बुरी सेहत की वजह से अक्सर उसकी मौत की खबरें उड़ाई जातीं ...मुगाबे ने अपने 88वें जन्मदिन के मौके पर इन अफवाहों का मज़ाक उड़ाया था और कहा “I have died many times—that’s where I have beaten Christ. Christ died once and resurrected once,” यानि मैं इतनी बार मर चुका हूं कि मैंने जीसस क्राइस्ट को भी मात दे दी है ... क्राइस्ट अपने मरने के बाद भी जी उठे थे .. हालांकि तमाम विफलताओं के बाद भी अफ्रीका  में नेल्सन मंडेला के बाद अगर किसी नेता को याद किया जाएगा तो वो जिम्बाब्वे का ये तानाशाह रॉबर्ट मुगाबे ही होगा

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें