मंगलवार, 14 जुलाई 2020

Russia

डेथ इज़ द सॉल्यूशन टू द ऑल प्रॉब्लम... नो मैन, नो प्रॉब्लम' यानी जब आदमी नहीं होगा... तो समस्याएं अपने आप खत्म हो जाएंगी... रूस के सबसे क्रूर तानाशाह जोसेफ़ स्टालिन का ये कथन काफी चर्चित हुआ था ... गरीबों, मजदूरों और मजबूरों के लिए जार शासन के खिलाफ बागावत करने वाला स्टालिन सत्ता में आने के बाद 'क्रूर तानाशाह' बन गया...
बीसवीं सदी की शुरुआत में स्टालिन ने रूसी जार साम्राज्य के ख़िलाफ़ बाग़ी तेवर अपनाया... स्टालिन अक्सर हड़ताल और विरोध प्रदर्शन आयोजित किया करता था... ज़ार की ख़ुफ़िया पुलिस को स्टालिन की हरकतों का अंदाज़ा हो चुका था... इस दौरान उसकी बोलशेविक (Bolshevik)  क्रांति के अगुवा व्लादिमीर लेनिन से मुलाक़ात हुई... और लेनिन उसकी प्रतिभा के क़ायल हो गए... बस फिर क्या था... स्टालिन, लेनिन के सहारे पहले आगे बढ़ा और फिर बन बैठा दुनिया सबसे बड़ा तानाशाह....  
1924 में लेनिन की मौत के बाद स्टालिन ने ख़ुद को उनके वारिस के तौर पर पेश किया... हालांकि पार्टी के बहुत से नेता ये समझते थे कि लेनिन के बाद लियोन ट्राटस्की ही उनके वारिस होंगे... लेकिन ट्रॉटस्की को कई लोग बहुत आदर्शवादी मानते थे... उधर, इस दौरान स्टालिन ने अपनी राष्ट्रवादी मार्क्सवादी विचारधारा का ज़ोर-शोर से प्रचार शुरू कर दिया... हालांकि स्टालिन का मकसद हर कीमत पर रूस की सत्ता हासिल करना था... लेकिन जब ट्रॉटस्की ने स्टालिन की योजनाओं का विरोध किया, तो स्टालिन ने उन्हें देश निकाला दे दिया... और 1920 के दशक के आख़िर के आते-आते स्टालिन सोवियत संघ का तानाशाह बन चुका था। 
गरीबों और अंतिम पायदन पर खड़े आदमी को मदद पहुंचाने का नारा लगाने वाला जोसेफ़ स्टालिन सत्ता में आते ही ऐसे बदला कि वो 'नो मैन, नो प्रॉब्लम' जैसे नारे लगाने लगा। हालांकि धूर्तता ऐसी कि वो ख़ुद को एक नरमदिल और देशभक्त नेता के तौर पर प्रचारित करता था। लेकिन, सच ये था कि स्टालिन अक्सर उन लोगों को मरवा देता था, जो भी उनका विरोध करता था। फिर चाहे वो सेना के लोग हों या फिर कम्युनिस्ट पार्टी के.... आरोप तो ये भी है कि स्टालिन ने पार्टी की सेंट्रल कमेटी के 139 में से 93 लोगों को मरवा दिया था. .. इसके अलावा सेना के 103 जनरल और एडमिरल में से 81 को मरवाने के आरोप भी स्टालिन पर लगे.. 
सत्ता में आने के बाद स्टालिन ने सोवियत संघ को औद्योगिक सुपरपावर बनाने के लिए काम करना शुरू किया... इसके लिए कई पंचवर्षीय योजनाएं शुरू की गईं और किसानों से जबरन जमीन लेना शुरू किया गया.. लेकिन जब लाखों किसानों ने स्टालिन का फरमान नहीं माना तो उनको सजा के तौर पर या तो गोली मार दी गई या साइबेरिया में अज्ञातवास पर भेज दिया गया.... लोगों की जमीन जबरन छीनने की वजह से पूरे सोवियत संघ में अकाल जैसे हालात पैदा हो गए... जिससे लाखों लोगों की मौत हो गई लेकिन स्टालिन को इसकी कोई चिंता नहीं थी। और वो चापलूसों के बीच घिरता चला गया। 
ऐसा नहीं है कि जोसफ स्टालिन को महज विलेन के ही तौर पर जाना जाता है... बहुत से लोग उसे रूस के हीरो के तौर पर भी जानते हैं... क्योंकि इसने रूस को ताकतवर बनाया और दूसरे विश्वयुद्ध में हिटलर को हराकर इतिहास रच दिया। करीब ढाई दशक तक सोवियत संघ की राजनीति में उसका दबदबा रहा
स्टालिन का जन्म 18 दिसंबर, 1878 को जॉर्जिया के एक छोटे से शहर गोरी में हुआ था.. जॉर्जिया उस समय रूस के जार साम्राज्य का हिस्सा था.. उनके बचपन का नाम जोसफ विसारियोनोविच जुगाशविली था.. स्टालिन के पिता पेशे से एक मोची थे और मां कपड़े धोने का काम करती थीं..  जोसफ के पिता को शराब की लत थी... जिसके नशे में वो जोसफ और उनकी मां के साथ खूब मारपीट करते थे.. सात बरस की उम्र में स्टालिन को चेचक की बीमारी हो गई थी। जिससे उसके चेहरे पर दाग पड़ गए.. बचपन के दिनों में स्टालिन बहुत कमजोर यानी पतला-दुबला दिखता था..  स्टालिन की मां धार्मिक विचारों वाली महिला थीं इसीलिए उन्होंने तिबलिसी शहर में एक सेमिनरी यानी एक धार्मिक स्कूल में उसका दाखिला करा दिया... जहां उनको जॉर्जिया के ऑर्थोडॉक्स चर्च में पादरी की पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप मिल रहा था.. लेकिन धार्मिक शिक्षा में नहीं होने की वजह से स्टालिन ने चोरी छिपे कार्ल मार्क्स को पढ़ना शुरू कर दिया था.. 
कार्ल मार्क्स की लेखनी ने स्टालिन पर गहरा असर डाला और वो रूसी बादशाहत के खिलाफ चल रहे क्रांतिकारी आंदोलन में दिलचस्पी लेने लगा.. लिहाजा उसने सेमिनरी में परीक्षाएं भी नहीं दीं... इस वजह से 1899 में स्टालिन को सेमिनरी से निकाल दिया गया, स्कूल छोड़ने के बाद स्टालिन सरकार विरोधी आंदोलनों में सक्रिय हो गया। उन्होंने मजदूरों के प्रदर्शन और हड़तालों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया... स्वभाव से बागी बन चुके स्टालिन लेनिन के नेतृत्व में शुरू हुए बोल्शेविक आंदोलन में साथ आ गया... इसके बाद 22 जनवरी, 1905 को रूस के इतिहास में 'खूनी रविवार' जैसी घटना हुई.. इसमें रूस की जार सेना ने मजदूरों और उनके बीबी-बच्चों के एक जुलूस पर गोलियां बरसाई, जिसके कारण हजारों लोगों की जान गईं... इससे लोग भड़क उठे और जार निकोलस टू का विरोध अपने चरम पर पहुंच गया ...  जार के विरोध में उतरे ने स्टालिन बैंक डकैती समेत कई आपराधिक गतिविधियों में हिस्सा लिया .. इन गतिविधियों से इकट्ठा हुए पैसे से वो बोल्शेविक पार्टी फंड में मदद करते थे... लिहाजा उनको 1902 से 1913 के बीच में कई बार गिरफ्तार किया गया और जेल भेजा गया... यहां तक की उनको साइबेरिया में निर्वासित कर दिया गया था .. जहां कैदियों से बहुत क्रूर व्यवहार किया जाता था, इसे अंग्रेजों की काले पानी की सजा से भी बदतर कहा जाता है। हालांकि लेनिन के साथ आंदोलनों का स्टालिन को फायदा हुआ और लेनिन ने स्टालिन को अहम काम दिया और अपनी बोल्शेविक पार्टी के ज्वेडा स्टार, प्रावडा ट्रुथ नाम के दो अखबारों को चलाने की जिम्मेदारी भी दी। 1912 में जोसफ स्टालिन को लेनिल की बोल्शेविक पार्टी की पहली सेंट्रल कमिटी में नियुक्त किया... इसके बाद नवंबर 1917 में लेनिन की बोल्शेविक पार्टी रूस की सत्ता पर काबिज हो गई और 1922 में सोवियत संघ की स्थापना हुई और लेनिन उसके पहले राष्ट्र प्रमुख बने। 
इस दौरान स्टालिन का कद बढ़ता रहा और 1922 में वो कम्यूनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमिटी के सेक्रटरी जनरल बन गए। जिससे उनको काफी ताकत मिल गई। हालांकि इस दौरान लेनिन से भी उनके खासे मतभेद हो गए... और लेनिन ने यहां तक कह दिया कि उहोंने अपने सहयोग के लिए स्टालिन के रूप में गलत आदमी चूज किया। हालांकि 1924 में लेनिन की मौत हो गई इसके बाद स्टालिन ने अपने दांव-पेंच से सभी प्रतिद्वंद्वियों को चित कर कम्युनिस्ट पार्टी पर अपना कब्जा बना लिया और बाद में वो सोवियत संघ का तानाशाह बन गया.. 
तानाशाह स्टालिन की सनक ऐसी थी कि उससे रूस ही नहीं उसका परिवार भी परेशान था। बताया जाता है कि उसकी दूसरी पत्नी ने उसकी हरकतों से तंग आकर खुद को गोली मार ली... तो बेटे ने भी डिप्रेशन में जान दे दी.. तानाशाह स्टालिन ने 1906 में स्टालिन ने एकाटेरिना 'काटो' से शादी की.. जिससे उसको एक बेटा हुआ जिसका नाम याकोव रखा गया..... एकाटेरिना की मौत के बाद स्टालिन ने 1919 में दूसरी शादी की.. दूसरी पत्नी नाडेददा 'नादया' अलिलुयेवा एक रूसी क्रांतिकारी की बेटी थी.. बताया गया कि नाडेददा 'नादया' अलिलुयेवा जब 16 साल की थी तभी स्टालिन को उससे प्यार हो गया था .. कहा जाता है कि स्टालिन की दूसरी महिलाओं से नजदीकियां देखकर दूसरी पत्नी नाडेददा 'नादया' अलिलुयेवा ने 1932 में खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर ली...  उस वक्त उनकी उम्र 31 साल थी...  दूसरी पत्नी से स्टालिन को एक बेटी स्वेतलाना और बेटा वैसिली हुआ।... जानकार बताते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान स्टालिन की पहली शादी से हुए बेटे याकोव को जर्मन सेना ने गिरफ़्तार कर लिया... लेकिन स्टालिन की सनक ऐसी थी कि जब जर्मनी ने बंदियों की अदला-बदली में याकोव को रूस को सौंपने का प्रस्ताव किया, तो स्टालिन ने ये प्रस्ताव ठुकरा दिया...  इसके बाद जर्मनी के युद्धबंदी कैंप में ही स्टालिन के बेटे याकोव की 1943 में मौत हो गई.. 
तानाशाह स्टालिन की बड़ी उपलब्धि दूसरे विश्वयुद्ध में हिटलर को हराना थी...  1939 में दूसरा विश्वयुद्ध शुरू होने से पहले स्टालिन और हिटलर ने एक समझौता किया था। समझौते के मुताबिक जर्मनी और सोवियत संघ एक-दूसरे पर हमला नहीं करेंगे। लेकिन हुआ कुछ ऐसा कि तानाशाह स्टालिन सोवियत संघ का हीरो बन बैठा... 
जब दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ, तो स्टालिन ने जर्मनी के तानाशाह हिटलर के साथ समझौता करके पूर्वी यूरोप के देशों का आपस में बंटवारा कर लिया... जर्मनी की सेना ने बड़ी आसानी से फ्रांस पर क़ब्ज़ा कर लिया... लिहाजा ब्रिटेन को भी पीछे हटना पड़ा... इस दौरान रूसी सेना के जनरलों ने स्टालिन को आगाह किया कि जर्मनी, सोवियत संघ पर भी हमला कर सकता है... लेकिन स्टालिन ने अपने फौजी कमांडरों की चेतावनी अनसुनी कर दी... लेकिन हुआ वही और हिटलर ने स्टालिन को धोखा दे दिया... क्योंकि 1941 में जर्मनी ने पहले पोलैंड पर क़ब्ज़ा कर लिया और फिर सोवियत संघ पर भी ज़बरदस्त हमला किया.... जिसकी वजह से सोवियत सेनाओं को भारी नुक़सान उठाना पड़ा.... 
हिटलर के धोखे से स्टालिन इस क़दर ग़ुस्सा हो गया वो कोई फ़ैसला नहीं ले पा रहा था... इस दौरान स्टालिन ने ख़ुद को एक कमरे में क़ैद कर लिया... कई दिनों तक सोवियत संघ की सरकार दिशाहीन रही... इस दौरान हिटलर की सेनाएं राजधानी मॉस्को तक आ पहुंचीं... और जर्मनी के लगातार हमलों से सोवियत संघ का बुरा हाल था... देश तबाही के कगार पर खड़ा था... सलाहकारों ने स्टालिन को मॉस्को छोड़ने की सलाह दी... मगर स्टालिन ने इससे साफ़ इनकार कर दिया... और अपने कमांडरों को फ़रमान जारी किया कि नाज़ी सेनाओं को किसी भी क़ीमत पर हराना होगा... 
इसके बाद जर्मनी और रूस के बीच जंग में स्टालिनग्राड की लड़ाई से निर्णायक मोड़ आया... हिटलर ने इस शहर पर इसलिए हमला किया क्योंकि इसका नाम स्टालिन के नाम पर था... वो स्टालिनग्राड को जीतकर स्टालिन को शर्मिंदा करना चाहता था. लेकिन खराब मौसम से उसकी सेना को काफी दिक्कत हुई... और अगस्त 1942 से फरवरी 1943 तक चले स्टालिनग्राद के युद्ध में सोवियत संघ का पलड़ा भारी हो गया क्योंकि रेड आर्मी ने जर्मनी को हरा दिया... साथ ही सोवियत संघ की सेना जर्मन सैनिकों को खदेड़ते हुए बर्लिन तक जा पहुंचीं.... और पूर्वी यूरोप के एक बड़े हिस्से पर सोवियत सेनाओं ने क़ब्ज़ा कर लिया.... 
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमरीका और ब्रिटेन, स्टालिन के साथ थे... मगर युद्ध के बाद स्टालिन की नीतियों के चलते वो उसके दुश्मन बन गए... ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने कहा कि स्टालिन यूरोप के एक बड़े हिस्से को लोहे के पर्दे से बंद कर रहे हैं.... 
बर्लिन को लेकर ब्रिटेन-अमरीका और सोवियत संघ के बीच तनातनी इस क़दर बढ़ गई कि स्टालिन ने पूर्वी बर्लिन में अमरीकी और ब्रिटिश सेनाओं के घुसने पर रोक लगा दी... और धीरे धीरे शीत युद्ध का आग़ाज़ हो गया... जो तक और बढ़ गया जब सोवियत संघ ने 29 अगस्त 1949 को अपने पहले एटम बम का परीक्षण किया..... 
सोवियत संघ के तानाशाह स्टालिन के मन में न्याय, दया या संवेदना के लिए तिल भर भी जगह नहीं थी... उसके अपने बीवी-बच्चे भी– उसके आगे थर-थर कांपते थे... खैर, ऐसे बेरहमदिल शख्स का अंत भी बेहद बुरी तरह हुआ...
दिसंबर, 1952 में अपने जन्मदिन पर स्टालिन ने एक बर्थडे पार्टी दी थी... जिसमें उनके तमाम क़रीबी लोग बुलाए गए... डांस चल रहा था... लेकिन ये सब स्टालिन की बेटी स्वेतलाना अलिलुएवा को बिलकुल पसंद नहीं आ रहा था... उस समय वो 26 साल की थीं... इस दौरान जब स्टालिन ने उसके साथ डांस करने की इच्छा जताई तो उन्होंने ऐसा करने से साफ़ इंकार कर दिया... इससे गुस्सा स्टालिन ने अपनी बेटी के बाल पकड़े और उसे लगभग खींचते हुए आगे ले आए... स्वेतलाना का चेहरा इस अपमान से लाल हो गया और उनकी आँखों से आँसू निकल आए... 
सोवियत संघ के पूर्व प्रधानमंत्री निकिता ख्रुश्चेव ने अपनी आत्मकथा 'ख्रुश्चेव रिबेंबर्स' में लिखते हैं... स्टालिन ने इतना खराब व्यवहार इसलिए नहीं किया था कि वो स्वेतलाना को कोई तकलीफ़ पहुंचाना चाहते थे... असल में ये उनका स्वेतलाना के लिए स्नेह दिखाने का तरीका था. लेकिन दूसरों को लग रहा था कि वो उनके साथ ज़्यादती कर रहे थे....  लेकिन स्टालिन अक्सर इस तरह की हरकतें करते रहते थे...
इस घटना के करीब 3 महीने बाद 1 मार्च 1953 को अपने खास सहयोगियों के साथ स्टालिन ने पार्टी की... जो सुबह 4 बजे तक चली ... किसी को ज़रा भी आभास नहीं मिला कि स्टालिन की तबियत नासाज़ है.... सोवियत संघ के पूर्व प्रधानमंत्री निकिता ख्रुश्चेव ने अपनी आत्मकथा 'ख्रुश्चेव रिबेंबर्स' में लिखा कि 'हम सभी स्टालिन को भला-चंगा छोड़ कर आए थे। वो हमसे मज़ाक कर रहे थे और बार-बार मेरे पेट में अपनी उंगलियां घुसा रहे थे। वो जानबूझ कर यूक्रेनियन लहजे में मुझे 'मिकिता' कह कर पुकार रहे थे।
जानकार बताते हैं कि '1 मार्च को पूरे दिन स्टालिन के कमरे से कोई आवाज़ नहीं आई..... हालांकि स्टालिन की आदत थी कि जब वो सुबह सो कर उठते थे तो वो नींबू की फांक के साथ चाय का एक कप मांगते थे। लेकिन जब दिन भर हलचल नहीं हुई तो बॉडीगार्ज कमरे में घुसे तो वहां का हाल देख कर भौंचक्के रह गए।  'स्टालिन ज़मीन पर गिरे हुए थे। वो पूरी तरह से बेहोश नहीं हुए थे, लेकिन वो कुछ बोल नहीं पा रहे थे' 
निकिता ख्रुश्चेव अपनी आत्मकथा में लिखते हैं 'सभी नेता 2 मार्च की सुबह स्टालिन को देखने पहुंचना शुरू हो गए थे लेकिन तब तक भी किसी डॉक्टर को स्टालिन को देखने नहीं बुलाया गया था.... जानकार बताते हैं  स्टालिन की हालत जानबूझ कर बिगड़ने दी गई....  लेकिन ये भी हो सकता है कि उनके राजनीतिक मातहत जानबूझ कर फ़ैसला लेने से हिचक रहे हों, क्योंकि उन्हें डर था कि अगर स्टालिन ठीक हो गए तो उन्हें इस बात की बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी...... खैर तानाशाह का ऐसा ही अंत होना लिखा था... स्टालिन को अपने ही मूत्र में सना हुआ पाया गया... उनसे शरीर के पूरे दाहिने हिस्से पर लकवा मार गया था.... स्टालिन लगातार तीन दिनों तक इसी तरह बेहोश हालत में था...
स्टालिन की बेटी स्वेतलाना ने अपनी आत्मकथा 'ट्वेंटी लेटर्स टू अ फ़्रेंड में' लिखा 'उनका चेहरा पूरी तरह से बदल गया था. उनके होंठ काले पड़ गए थे और उनका चेहरा पहचाना नहीं जा रहा था..... आखिरी क्षणों में उन्होंने अचानक अपनी आँख खोली और कमरे में मौजूद हर शख़्स पर अपनी नज़र दौड़ाई.... उन्होंने अपना हाथ उठाया जैसे वो किसी की तरफ़ इशारा कर उसे शाप देने की कोशिश कर रहे हों.... अगले ही क्षण उनकी मौत हो गई.... उस समय सुबह के 9 बजकर 50 मिनट हुए थे । 
सोवियत संघ के नेतृत्व ने तय किया कि उनके शरीर को साथ भी वही किया जाएगा जो स्टालिन ने 1924 में लेनिन के पार्थिव शरीर के साथ किया था... तय हुआ कि स्टालिन के शरीर को सुरक्षित रखने के लिए लेप लगाया जाएगा... ताकि लोग उनके अंतिम दर्शन कर सके..... 9 मार्च 1953 को स्टालिन का अंतिम संस्कार किया गया.... स्टालिन की मौत के कई दशक बीत जाने के बाद आज भी इस बात पर विवाद है कि स्टालिन को कितनी मौतों का जिम्मेदार माना जाए ... कुछ इतिहासकार मानते हैं कि स्टालिन की नीतियों की वजह से लगभग 8 लाख लोग मारे गए .... तो कुछ मानते हैं कि ये आंकड़ा 90 लाख लोगों का है ... स्टालिन की मौत के बाद सोवियत संघ में De- Stalinization की प्रक्रिया चलाई गई .. हालांकि ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो इतना सब कुछ होने के बाद भी स्टालिन को सिर्फ इसीलिए पसंद करते हैं क्योंकि सेकेंड वर्ल्ड वॉर में स्टालिन के नेतृत्व में सोवियत संघ ने जर्मनी को मात दे दी थी और दूसरे सबसे क्रूर तानाशाह हिटलर का अंत कर दिया था..

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