शनिवार, 18 जुलाई 2020

Iraq

लगभग 24 साल तक इराक के राष्ट्रपति रहे सद्दाम हुसैन को दुनिया तानाशाह के रूप में जानती है ...सियासत में सद्दाम की एंट्री एक क्रांतिकारी के तौर पर हुई थी .. जिसने शुरुआती दिनों में अपने काम के लिए युनेस्को से सम्मान भी हासिल किया लेकिन यही सद्दाम हुसैन बाद में लाखों लोगों की मौत की वजह बना .... 
सद्दाम हुसैन के जन्म से कुछ महीने पहले कैंसर से उसके पिता और भाई की मौत हो गई थी .. सद्दाम की माँ उसे इस घटना के लिए जिम्मेदार मानती थी ... पति और बेटे की मौत के टूट चुकी माँ ने ये तय किया था कि वो सद्दाम को जन्म नहीं देंगी लेकिन परिवार के बाकी लोगों ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया .. 28 अप्रैल 1937 को सद्दाम ने इस दुनिया में कदम रखा ...हालांकि माँ ने सद्दाम को छोड़ दिया जिसके बाद उसकी परवरिश उसके अंकल ने की ..... इस पूरी घटना ने सद्दाम के मन पर गहरा असर डाला था .. सद्दाम के अंकल नाजीवाद से प्रभावित थे .... पर्शियन, यहूदियों और मक्खियों से सद्दाम के अंकल को नफरत थी .. सद्दाम का बचपन काफी चुनौतियों से भरा था दूसरे उसकी परवरिश नफरत से भरे वातावरण में हुई थी ... सद्दाम के बचपन से जवानी की दहलीज पर कदम रखने के दौरान इराक की राजनीति भी उथल पुथल से भरी थी  ... 1958 में जनरल अब्दुल करीम कासिम ने ब्रिटेन की कठपुतली रहे मोनार्की के खिलाफ विद्रोह कर दिया था ... राज परिवार के कई लोग मौत के घाट उतार दिए गए थे इसके साथ ही ब्रिटिश को इराक से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था .. 
हालांकि बहुत जल्द अब्दुल करीम कासिम को अपने ही देश में चुनौती मिलने वाली थी और ये चुनौती दी थी बाथ पार्टी ने .. बाथ पार्टी इराक में 50 के दशक की सबसे बड़ी एक्टिविस्ट पॉलिटिकल पार्टी थी ... जिसने पूरे देश में रेडिकल सेक्युलर नेशनलिस्ट मूवमेंट चलाया था ... सद्दाम हुसैन की विचारधारा काफी हद तक ऐसी थी लिहाजा उसने बाथ पार्टी ज्वाइन कर ली ... 
बाथ पार्टी की वैचारिक तौर पर अब्दुल करीमा कासिम का विरोध करती थी लिहाजा इराक में एक और तख्तापलट की तैयारी की जा रही थी ... बाथ पार्टी ने अब्दुल करीम कासिम की हत्या तक की तैयारी कर ली थी ... इसकी जिम्मेदारी उस वक्त 22 साल के सद्दाम हुसैन ने उठाई .. उन्होंने पहली बार 7 अक्टूबर 1959 को कासिम को घेर कर मारने की कोशिश की .. लेकिन कासिम दो गोलियां लगने के बाद भी बच गए ... सद्दाम हुसैन और उसके साथी कासिम को मरा समझकर वहां से भाग निकले थे .... इसके बाद चार साल तक सद्दाम हुसैन सीरिया और फिर इजिप्ट में रहा  ... 1963 में बाथ पार्टी ने रमादान रिवॉल्यूशन के ज़रिए अब्दुल करीम कासिम को सत्ता से बेदखल कर मौत के घाट उतार दिया ..और अब्दुल सलाम आरिफ इराक के राष्ट्रपति बन गए ... . ये वो वक्त था जब सद्दाम की इराक में वापसी होने वाली थी ... 
सद्दाम हुसैन इराक तो लौट आया लेकिन जनरल कासिम को मारने की नाकाम कोशिश की वजह  से सद्दाम पार्टी में अपनी मजबूत जगह नहीं बना पाया ... कहत हैं अपने वफादारों के साथ मिलकर सद्दाम ने अपनी ही पार्टी के राष्ट्रपति आरिफ को मारने की साजिश भी रची थी .. जिसके बाद 1964 में उसे गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया .. जेल में उसने दो साल बिताए... . हालांकि बहुत जल्द उसकी किस्मत बदलने वाली थी.... 
जुलाई 1968 में उसकी सद्दाम के करीबी अहमद हसन अल बाकर ने तख्तापलट के ज़रिए सत्ता हासिल कर ली ....  अल बाकर ने सद्दाम को सरकार में काफी पावरफुल बना दिय.... हालांकि उस वक्त अल बाकर को भी पता नहीं था कि सद्दाम इस पावर का कितना गलत इस्तेमाल करने वाला है .... सद्दाम बाथिस्ट सिक्युरिटी  सर्विस के नाम से अपनी सेना बना चुका था .. जिसमें उसने अपने ट्राइब के उन लोगों की भर्ती की जो ज्यादा पढे लिखे नहीं थे लेकिन मजबूत कद काठी के  थे ... सत्ता में नंबर 2 की पोजीशन पर रहने वाला सद्दाम ही दरअसल सरकार चला रहा था .. उस वक्त इराक में बहुत ज्यादा अनिश्चितता थी .. लोग कई ग्रुप में बंटे हुए थे ... शिया और सुन्नी एक दूसरे के खिलाफ थे ....अरब और कुर्द के बीच लड़ाइयां होती रहती थीं ... आर्थिक आधार पर भी लोग बंटे हुए थे ... सद्दाम ने शुरुआत के दिनों में इन सबको साथ लाने का काम किया साथ ही इराक की आर्थिक नीतियां भी बदल दीं ...  सत्तर के दशक में  सद्दाम ने ऑयल रिच इराक की समृद्धि का फायदा उठाकर "National Campaign for the Eradication of Illiteracy", Compulsory Free Education in Iraq के साथ साथ इराकी सैनिकों के परिवारों के लिए  free hospitalization और किसानों के लिए भारी सब्सिडी दिए जाने जैसे अभियान चलाए ... इसकी वजह से इराक में सद्दाम को एक प्रोग्रेसिव और प्रभावी राजनेता के तौर पर देखा जाने लगा ... इस दौरान इराक ने अपनी हेल्थ सर्विसेज इतनी बेहतर कर लीं कि सद्दाम को युनेस्को ने सम्मानित भी किया ... उस वक्त तक किसी को अंदाजा नहीं था कि आने वाले वक्त में सद्दाम हुसैन एक तानाशाह की तरफ व्यवहार करने लगेगा .... 
सद्दाम का असली नाम अब्द-अल-मजीद अल-टिकरीति था ... 1972 में अल बाकर के राष्ट्रपति रहते हुए इराक ने सोवियत संघ के साथ 15 साल तक सहयोग करने का एक समझौता किया था ...इस समझौते की वजह से इराक ने अमेरिका को अपना दुश्मन बना लिया...कहते हैं अमेरिका ने खुफिया तरीके से इराक में कुर्दिश विद्रोहियों की मदद करनी शुरू कर दी थी ... इराक में इसने तनाव को जन्म दिया... इधर अल बाकर बूढ़े हो चुके थे ..सरकार पूरी तरह से सत्ता में नंबर 2 सद्दाम हुसैन के मुताबिक चल रही थी ...  सद्दाम हुसैन ने सरकारी बैंकों पर परोक्ष रूप से अपना अधिकार कर लिया था... 
फिर आखिरकार वो साल आया जो सद्दाम हुसैन को ना सिर्फ राष्ट्रपति बनाने वाला था बल्कि दुनिया को एक तानाशाह से भी मिलवाने वाला था ... 1979 में अल बाकर ने सीरिया के साथ एक ट्रीटी साइन की थी ... इस ट्रीटी की वजह से सद्दाम हुसैन का एकछत्र राज खत्म हो सकता था.. इससे नाराज सद्दाम ने उनसे जबरन इस्तीफा दिलवा दिया ...  और खुद राष्ट्रपति बन गया ... 
राष्ट्रपति बनने के महज 6 दिन बाद 22 जुलाई 1979 को सद्दाम हुसैन ने बाथ पार्टी की मीटिंग बुलाई.. इस मीटिंग में उसने अदबेक हुसैन समेत पार्टी के कई सीनियर लीडर्स को अपने खिलाफ साजिश करने का दोषी बताया ... सद्दाम हुसैन ने एक के बाद एक 60 से ज्यादा लोगों के नाम लिए ... इन्हें धोखेबाज करार दिया गया और मौत की सज़ा सुना दी गई .. सद्दाम के फायरिंग स्कवॉड ने इन्हें मौत के घाट उतार दिया ... ये दरसअल सद्दाम का पार्टी के बाकी बचे लोगों को एक मैसेज था कि वफादार रहो नहीं तो अंजाम भुगतो.... ये अब भी इराक के इतिहास की सबसे खूनी घटना मानी जाती है ... इस घटना ने सद्दाम हुसैन को एक तानाशाह की भी पहचान दे दी .. यहीं से इराक में सद्दाम के 24 साल चले तानाशाही शासन की शुरुआत भी हुई ... 
सद्दाम हुसैन ने अपनी सेना में ज्यादातर ग्रामीण इलाकों से आए लड़कों की भर्ती की थी ... उन्हें पैसा, घर जैसी हर सुविधाएं दी जाती थीं .... वो सद्दाम हुसैन को ही अपना सबकुछ मानने लगे थे ... इसी सेना की बदौलत सद्दाम ने इराक के लोगों में खौफ पैदा करने लगा ... उसके शासनकाल नें विरोध  करने वालों को किडनैप कर लिया जाता.. उसे भयंकर यातनाएं दी जातीं और फिर हत्या कर दी जाती ... सद्दाम के सैनिक टॉर्चर करने के लिए तरह तरह के रौंगटे खड़े  कर देने वाले तरीके आजमाते ... 
सद्दाम कभी भी आर्मी में नहीं रहा था लेकिन हमेशा वो युनिफॉर्म में नज़र आता .. जिसमें खुद को दिए गए मेडल सजाकर रखता ... सद्दाम ने 1980 में ईरान के पानी और नए नेता खुमैनी से नाराज होकर युद्ध छेड़ दिया .. ये लड़ाई आठ साल तक चलती रही ... इराक की कुल आबादी के 60 फीसदी शिया समुदाय के थे जबकि सद्दाम खुद सुन्नी था ... उसे हमेशा अपनी सत्ता जाने का खतरा रहता था ... इसीलिए शिया बहुल ईरान भी उसे अपना दुश्मन नज़र आता ... 8 साल बाद बिना किसी नतीजे के ये लड़ाई खत्म हो गई लेकिन इसमें एक अनुमान के मुताबिक 10 लाख लोग मारे गए .. और दोनों देशों की आर्थिक हालत खस्ता हो गई ... 
सद्दाम ने अपने देश में अल अनफाल कैम्पेन चलाया... इसके तहत कुर्दिश लोगों का नरसंहार किया गया ... इस कैम्पेन के शबक, यज़ीदी, पेशमर्गा, तुर्कोमान लोगों को निशाना बनाया गया .. इनके गांव तबाह कर दिए गए .. कहते हैं इसमें लगभग 2 लाख लोग मौत के घाट उतार दिए गए ... इसमें सबसे घातक हमला इराक-ईरान की सीमा पर बसे हेलबजा शहर पर किया गया हमला था ... सद्दाम एकमात्र ऐसा तानाशाह है जिसने अपने ही लोगों पर अपनी आर्मी के जरिए केमिकल अटैक करवाया ... मिनटों में कुर्दों का हेलबजा शहर घातक मस्टर्ड गैस की वजह से कब्रिस्तान बन चुका था ... 
ईरान के साथ युद्ध के दौरान इराक कर्ज में डूब गया था ... सद्दाम हुसैन ने कुवैत से 30 बिलियन डॉलर का ये कर्ज माफ कर देने को कहा लेकिन कुवैत ने साफ मना कर दिया ... इसने सद्दाम को नाराज कर दिया था... कुवैत के साथ इराक के रिश्ते बिगड़ने लगे ... लिहाजा सद्दाम ने 1990 में कुवैत पर हमला कर दिया ... सद्दाम की इस हरकत के बाद युनाइटेड नेशंस को दखल देनी पड़ी... अपने तानाशाही रवैये की बदौलत सद्दाम अब पश्चिमी देशों को खटकने लगा था .. आखिरकार इस गल्फ वॉर में इराक की हार हुई और सद्दाम हुसैन को पीछे हटना पड़ा ... लेकिन लड़ाई यहीं नहीं रुकी ..  सद्दाम के अंत के साथ ही इसका अंत होना था ... 
खाड़ी युद्ध ने सद्दाम के खात्मे की स्क्रिप्ट तैयार कर दी थी ... खाड़ी युद्ध के बाद सद्दाम सरकार पर परमाणु हथियार बनाने पर रोक लगा दी गयी ... अमेरिका ने इराक को चेतावनी दी कि वो विश्व शांति के लिए परमाणु हथियारों के निर्माण को बिना शर्त बंद कर दे लेकिन सद्दाम ने अमेरिका की चेतावनी पर ध्यान नही दिया ....  इसके बाद अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय की ओर से इराक पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगे जिससे इराक की अर्थ व्यवस्था चरमराने लगी... 
इस हालात में इराक में जगह जगह  पर विद्रोह होने लगे.. सद्दाम को अपनी सत्ता जाने का भी खतरा सताने लगा था ... सद्दाम ने इस दौरान खुद को  सच्चा मुसलमान बताना शुरू किया ... वो इराक में मस्जिदें बनवाने लगा ... शरिया कानून के कुछ हिस्से को देश में लागू कर दिया गया .. यहाँ तक कि नेशनल फ्लैग में सद्दाम के हाथों लिखा गया अल्ला हू अकबर जोड़ दिया गया ... कहते हैं सद्दाम में एक कुरान लिखने के लिए अपना 26 लीटर खून दिया ... 605 पन्नों में सद्दाम के खून से लिखी गई ये कुरान आज भी सद्दाम की ही बनवाई एक मस्जिद में मौजूद है .. जिसे एक शीशे के केस में रखा गया है ... 
सद्दाम अपने निजी जीवन में भी सनकी था ... सद्दाम हुसैन की 3 बीवियाँ और 6 बच्चे थे ... कहते हैं कि उसके साथ कई मिस्ट्रेस भी रहा करती थीं ... सद्दाम हुसैन की एक ऐसी ही प्रेमिका का नाम शकरा था.. शकरा ने इराक के एक बिजनेसमैन से शादी की थी लेकिन सद्दाम ने उसे पाने के लिए बिजनेसमैन की हत्या करा दी थी .. बाद में शकरा ने खुद इसका खुलासा किया था ... शकरा के मुताबिक सद्दाम मारा पीटा करता था.. यहाँ तक कि सद्दाम के बेटे ने शकरा की बेटी के साथ रेप भी किया था ... आखिरकार सद्दाम के विरोधियों की मदद से शकरा भाग निकलने में कामयाब हुई थी ...
देश की खराब अर्थव्यवस्था और जाति विशेष को लेकर नफरत भरी कार्रवाई का नतीजा था कि अपने ही देश सद्दाम हुसैन की लोकप्रियता नफरत की शक्ल ले चुकी थी ...दूसरा अमेरिका और ब्रिटेन की नज़रों में तो वो खटक ही रहा था ... साल 2000 में अमेरिका में जॉर्ज बुश की ताजपोशी ने सद्दाम सरकार पर दबाव और ज्यादा बढ़ा दिया 
इराक पर वेपन्स ऑफ मास डिस्ट्रक्शन यानि नरसंहार के अस्त्र जुटाने के आरोप लग रहे थे ... साल 2002 में सयुंक्त राष्ट्र के दल ने इराक का दौरा किया और इस दौरान इराक की कई मिसाइलों को खत्म किया गया...  मार्च 2003 में अपने कुछ सहयोगी देशों के साथ मिलकर अमेरिका ने इराक पर हमला कर दिया ..  09 अप्रैल 2003 को सद्दाम हुसैन सरकार को गिरा दिया गया और 20 मार्च को इराकी सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया था ..  इसके बाद सद्दाम हुसैन अंडरग्राउंड हो गया था... बाद में सद्दाम की तलाश के ऑपरेशन रेड डॉन शुरू हुआ ...  सद्दाम हुसैन के लिए इराक के लोगों की नफरत उस वक्त सामने आई जब उसकी एक मूर्ति को अमेरिकी सैनिकों ने तोडना शुरू किया ... वहाँ मौजूद इराकी लोग भी इसमें शामिल हो गए और मूर्ति पर अपना गुस्सा उतारा 
13 दिसंबर 2003 को आखिरकार तिकरित के पास एक गड्ढे में छिपे हुए सद्दाम हुसैन को ढूंढ निकाला गया ... उसके खिलाफ अदालती कार्रवाई की गई और 5 नवंबर 2006 को सद्दाम हुसैन को फांसी की सज़ा सुना दी गई ....इसके 25 दिन बाद 30 दिसंबर को सद्दाम को फांसी पर लटका दिया गया ... फांसी दिए जाने की पूरी कार्रवाई को इराक के नेशनल टेलीविजन पर दिखाया गया ...  इराक के इस तानाशाह का कुछ इस तरह हुआ ... हालांकि इसके बाद भी सद्दाम हुसैन सुर्खियों में आता रहा है ... दफनाए जाने के 12 साल बाद अचानक सद्दाम हुसैन का शव कब्र से गायब हो गया था ... उसके गाँव में टूटी हुई खाली कब्र देखी गई .. फिर उसके शव का कोई पता नहीं चला .. हालांकि इराक में आज भी कुछ लोग सद्दाम को शहीद का दर्जा देते हैं और हर साल उसके दफनाए गए जगह पर लोगों का जमावड़ा लगता है

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