गुरुवार, 9 जुलाई 2020

Dictators of the world

जिस माओवाद के बारे में हम बचपन से सुनते आ रहे हैं उसके जनक माओ त्से तुंग हैं...   मार्क्सवाद और लेनिनवाद से प्रभावित माओ त्से तुंग ने चीन में Peoples Republic of China की स्थापना की थी .. साम्यवाद की वकालत करने वाले माओ को बाद में तानाशाह की पहचान क्यों और कैसे मिली .... कैसे उन्होंने चीन को दुनिया में आए सबसे बड़े संकट का गवाह बना दिया ... 
माओ से तुंग या माओ ज़ेदोंग ये एक ऐसा नाम है जिसके बिना चीन तो क्या दुनिया का इतिहास भी नहीं लिखा जा सकता ... चीनी क्रांतिकारी, राजनैतिक विचारक और साम्यवादी दल के सबसे बड़े नेता के तौर पर जनवादी गणतंत्र चीन की स्थापना करने वाले माओ से तुंग ने ही माओवाद को जन्म दिया था ...
20वीं सदी के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों में शुमार माओ ने 1949 में सेकेंड वर्ल्ड वॉर के बाद के बाद चीन में सिविल वॉर की शुरुआत की और इसके दौरान लोगों को एकजुट कर जनवादी गणतंत्र चीन की स्थापना की और तब से लेकर 1976 में अपनी मृत्यु तक माओ चीन की सत्ता पर काबिज रहे ... 
एक साधारण किसान परिवार में माओ का जन्म उस वक्त हुआ था जब चीन में 2 हज़ार साल से भी ज्यादा पुराने सामंती राजतंत्र का शासन था ... खेती का काम देखते हुए बड़े होने वाले माओ को स्कूल जाने के लिए भी रोजाना 20 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था ... 
दूसरे वर्ल्ड वॉर के बाद पैदा हुए हालात में माओ त्से तुंग ने चीन को साम्यवाद का सपना दिखाया.. चीन की कम्युनिस्ट पार्टी जनता से ये वायदा करके सत्ता में आई थी कि जब उनका राज होगा तो वे देश में मौजूद वर्ग संरचना को खत्म कर देंगे.... इसके लिए कई क्रांतिकारी कदम भी उठाए गए.. कहते हैं साम्यवाद की इस फिलॉसॉफी पर काम करने से पहले माओ गाँवों में रहे.. किसानों, मजदूरों, व्यापारियों, विद्वानों यहाँ तक कि असंतुष्ट रहे युवाओं से मिल-जुल कर स्थिति को समझने की कोशिश की ... इसीलिए जब सत्ता परिवर्तन हुआ तो पहले के विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के अधिकार छीन लिए गए, कई लोगों की हत्या तक कर दी गई.. 
चीन में क्रांति लाने के उद्देश्य से ग्रेट लीप फॉरवर्ड की शुरुआत की गई ... ग्रेट लीप फॉरवर्ड कॉम्यूनिस्ट चीन का 1958 से 1962 तक चलने वाला एक आर्थिक और सामाजिक अभियान था ... माओ से तुंग के नेतृत्व में चलाए गए इस अभियान का मकसद औद्योगीकरण और सामूहिक खेती के जरिए देश की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को उत्पादन की समाजवादी विधा में तब्दील करना था .. आसान शब्दों में कहें तो किसानों से निजी खेती करने के अधिकार छीन लिए गए ... जिसने ऐसा किया उसे क्रांतिकारी घोषित कर दिया गया... ग्रामीण औद्योगीकरण इस अभियान की प्राथमिकता थी ... कहते हैं कि सोवियत संघ के दौरे के बाद ही माओ ने अपने देश में कृषि अर्थव्यवस्था को बदलने के विचार पर काम शुरू किया था ... माओ को भरोसा था कि चीन अगर इस नीति पर काम करेगा तो 15 सालों के भीतर ग्रेट ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था से आगे निकल जाएगा .. 

लिहाजा किसानों के साथ सैनिकों की तरह सलूक किया जाने लगा ... उनके लिए बैरक बनाए गए .. इस नीति के मुताबित ज़मीनों पर निजी कब्जे खत्म कर दिए गए ....लोगों को अपने घर के पीछे क्रूड स्टील के उत्पादन करने के निर्देश दिए गए... साम्यवाद से शुरू हुआ आंदोलन धीरे धीरे दमनकारी होता चला गया ...
इसकी वजह से चीन के इतिहास की सबसे बड़ी विपदा आई... फसल का उत्पादन घटने और निर्यात जारी रहने की वजह से चीन में अकाल पड़ गया .. माओ ने चीन से अनाज का निर्यात सिर्फ इसीलिए नहीं रोका क्योंक वो दुनिया को अपनी योजनाओं की सफलता दिखाना चाहते थे... .. माओ को चीन में जरूरत से ज्यादा शक्ति और सत्ता हासिल थी, जिसका उसने फायदा उठाया.... और किसी भी कीमत पर ग्रेट लीप फॉरवर्ड की नीति को सफल बनाने की ज़िद में माओ ने देश को सबसे बड़ी आपदा में धकेल दिया... एक अनुमान के मुताबिक 1959 से 1961 तक चीन में पड़े अकाल के दौरान करोड़ों लोगों के घरों में अन्न का एक दाना भी नहीं बचा और लोगों ने भूख से तड़प कर अपनी जान गंवा दी .... ये दुनिया का सबसे घातक अकाल साबित हुआ.... देश की अर्थव्यस्था सिकुड़ने लगी .. लिहाजा पार्टी सम्मेलनों में माओ की नीतियों की आलोचना होने लगी ... 1962 के बाद राष्ट्रपति लीउ शओची और देंग जियाओपिंग जैसे नरमपंथी लोग सत्ता में आ गए ...  हाशिए पर डाल दिए माओ त्से तुंग ने खुद को वापस मजबूत बनाने के लिए एक और दुर्भावनापूर्ण सामाजिक क्रांति शुरू की .. 
साल 1966 में माओ ने देश के युवाओं को साथ लेकर सांस्कृतिक क्रांति की शुरुआत की जिसका मिशन पुरानी संस्कृति, पुरानी विचारधारा, पुराने रीति रिवाज और पुरानी परंपराओं को खत्म करने का था ... लाखों की संख्या में चीन के युवा इस क्रांति से जुड़ते चले गए ... माओ के विचारों वाली लिटिल रेड बुक हर युवा के लिए पढ़ना ज़रूरी हो गया ... देश भर में रेड गार्ड्स नाम से एक युवा संगठन उभरा .. रेड गार्ड्स ने देश भर में घूमकर सांस्कृतिक विरासत को नष्ट किया.. ये सांस्कृतिक क्रांति के समय में यूनिवर्सिटी और स्कूल सेमी सैन्य संस्थान के तौर पर चल रहे थे.... पूरे पाठ्यक्रम में बदलाव कर दिया गया.. फ्रेंच क्लास में फ्रेंच रिवॉल्यूशन पढाया जाने लगा.. राजनैतिक नीतियां और प्रैक्टिकल एक्सपीरिएंस पढाया जाने लगा .. . क्रांति 10 साल तक चली और इसने चीन के सामाजिक ढांचे में कई बड़े बदलाव कर दिए ..... माओ का इस क्रांति को शुरू करने का असल मकसद पार्टी में अपने विरोधियों से छुटकारा पाना था .. जिसमें माओ कामयाब भी रहे...नेताओं के साथ साथ  हज़ारों अधिकारियों, शिक्षकों पर देशद्रोही होने का आरोप लगा... किसी ने चेयरमैन माओ के नाम से लोकप्रिय माओ त्से तुंग की नीतियों पर सवाल खड़े किए तो उसे इसकी कीमत जान देकर चुकानी पड़ी ...तत्कालीन राष्ट्रपति लिउ शाओची को पार्टी से निकाल दिया गया... एक व्यक्ति के तौर पर माओ को इसका फायदा मिला लेकिन एक देश के तौर पर चीन को इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी ... कुछ समय के बाद रेड गार्डस के बीच आपस में ही संघर्ष शुरू हो गया... चीन में एक बार फिर गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा हो गए.. चीन को बर्बाद कर देने वाले माओ की इस सांस्कृतिक क्रांति का अंत उनकी मौत के साथ ही हो पाया .. कुल मिलाकर जिस माओ त्से तुंग के विचारों को दुनिया भर के देशों में अपनाने वाले लोग हैं उसी माओ की नीतियों की वजह से उनके अपने ही देश में लाखों लोगों ने भारी कीमत चुकाई ..

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