बुधवार, 15 जुलाई 2020

combodia

कंबोडिया का तानाशाह पोल पॉट देश की सत्ता पर महज चार साल तक काबिज रहा था लेकिन उसने अपने देश में जो कुछ अंजाम दिया उसे दुनिया कंबोडियन जीनोसाइड के नाम से जानती है... साम्यवाद से प्रभावित पोल पॉट ने इसकी अपनी खुद की परिभाषा तैयार कर ली थी .. पोल पॉट एक समृद्ध परिवार से ताल्लुक रखता था.. उसे अच्छी शिक्षा हासिल हुई थी ... उसने पेरिस से रेडियो टेक्नोलॉजी की पढ़ाई भी की थी .. पोल पॉट के भाई के मुताबिक वो बचपन में बहुत ही सौम्य और रहम दिल बच्चा था .... हालांकि ये रहम दिल बच्चा कब सरकार के विरोध में काम कर रही सेना का लीडर बन गया... इसकी भनक उसके परिवार को भी नहीं थी ... एक विद्रोही सेना से देश के प्रधानमंत्री बनने तक पोल पॉट काफी आक्रामक बन चुका था ... और फिर जो हुआ उसे दुनिया के इतिहास में कभी नहीं भुलाया जा सकेगा ...
कंबोडिया में आज भी पोल पॉट के जुल्मों के निशान मौजूद हैं .. किलिंग फील्ड और म्यूजियम में रखे गए सैकड़ों खोपड़ियों को देखकर लोग आज भी उस खौफ को महसूस कर पाते हैं जो कभी पोल पॉट की वजह से पूरे कंबोडिया के लोगों के दिलों में पैदा हुआ था .... 
पोल पॉट का जन्म सैलथ सार के तौर पर एक समृद्ध किसान के परिवार में हुआ ...  अपने माता-पिता के  नौ बच्चो में से सैलथ सार 8वां बच्चा था .. कंबोडिया के कम्पॉन्ग थॉम प्रोविंस में जन्मा सैलथ सार 9 साल की उम्र में राजधानी नाम पेन्ह चला गया ... पहले बुद्धिस्ट  और फिर फ्रेंच मॉनेस्ट्री में पढ़ते हुए सैलथ सार बड़ा हुआ ... 24 साल की उम्र में उसने स्कॉलरशिप हासिल कर ली और फिर आगे की पढ़ाई के लिए फ्रांस चला गया ... जहाँ उसने रेडियो टेक्नोलॉजी की पढ़ाई की ... इसी दौरान सैलथ सार कम्युनिस्ट लोगो के संपर्क में आया.. और उनकी विचारधारा से जुड़ गया ... यहीं उसने अपना नाम सैलथ सार से बदलकर पोल पॉट रख लिया ... 
जनवरी 1953 में पोल पॉट कंबोडिया लौट आया ..उस दौरान फ्रेंच कोलोनियल रूल के खिलाफ पूरे कंबोडिया में विरोध प्रदर्शन चल रहा था ... इस साल के खत्म होते होते यहां कंबोडिया को आज़ादी मिल गई ... इस दौरान सैलथ सार ने कंबोडिया की कम्युनिस्ट खमेर पीपुल्स रिवॉल्य़ुशनरी पार्टी ज्वाइन कर ली ..इस पार्टी का गठन 1951 में कम्युनिस्ट नॉर्थ वियतनाम की मदद से हुआ था ...
1956 से 1963 तक पोल पॉट एक प्राइवेट स्कूल में बतौर शिक्षक नौकरी करता रहा जहाँ वो बच्चों को इतिहास, भूगोल और फ्रेंच लिटरेचर पढ़ाया करता था ... स्कूल में पढ़ाते पढाते पोल पॉट क्रांति की भी तैयारी कर रहा था ... देश की सरकार को इसकी भनक लग गई थी लिहाजा सरकार ने सभी कन्युनिस्ट गतिविधियों पर रोक लगा दी ... नतीजा ये हुआ कि पोल पॉट समेत कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े सभी नेताओं में भागकर जंगल में शरण लेनी पड़ी ... नॉर्थ कंबोडिया के जंगलों और गांवों में रहते हुए पोल पॉट ने वहां के लोगों के रहन-सहन को करीब से समझा... ये आगे चलकर कंबोडिया के लिए डिजास्टर साबित होने वाला था .... पोल पॉट के साथ इस जगह पर विएट कॉन्ग के सैनिकों का एक ग्रुप भी था ... ये नॉर्थ वियतनाम के सैनिक थे .. 
1968 में पोल पॉट अपनी पार्टी का चीफ बन गया और खमेर रूज नाम से अपनी सेना बना ली .. इस सेना के गठन से ही पोल पॉट की क्रांति की धीमी शुरुआत हो चुकी थी .. खमेर रूज दरअसल पार्टी की विचारधारा को समर्थन देने वाली गुरिल्ला आर्मी थी .. खमेर कंबोडिया में बोली जाने वाली एक भाषा भी है और यहाँ की मुख्य जाति भी खमेर लोगों की ही है .... और रूज का मतलब लाल रंग से है ... इस आर्मी की बदौलत पोल पॉट की पार्टी ने बहुत जल्द नॉर्थ ईस्ट कंबोडिया में पकड़ हासिल कर ली ... 
मार्च 1970 में कंबोडिया के लीडर प्रिंस नोरडॉम सिहानुक के सत्ता पलट की साजिश रची गई जिसके केंद्र में था कंबोडियन जनरल लॉन नॉल .. कहा जाता है कि इस जनरल लॉन नॉल को अमेरिका की मदद हासिल थी ... इस सत्तापलट से बचने के लिए प्रिंस नोरडॉम सिहानुक ने खमेर ग्रुप से मदद मांगी .. लेकिन ये इतना आसान नहीं था ... इसकी वजह से पूरे कंबोडिया में सिविल वॉर शुरू हो गई ... इसी दौरान वियतनाम में भी युद्ध चल रहा था .. अमेरिका वियतनाम वॉर में साउथ वियतनाम के साथ था जबकि कंबोडिया की पोल पॉट की खमेर रूज सेना नॉर्थ वियतनाम को समर्थन देती थी  ... नॉर्थ वियतनाम के कई सैनिक यानि विएट कॉन्ग के सैनिकों में कंबोडिया में संरक्षण दिया गया था .. लिहाजा अमेरिका ने इस युद्ध के लिए वियतनाम कंबोडिया बॉर्डर पर अपने 70 हज़ार सैनिकों की तैनाती कर दी ... 
चार साल चलने वाले इस युद्ध के खात्मे के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने कंबोडिया पर सीक्रेट बॉम्बिंग्स (secret bombings) के आदेश दे दिए .. कहा जाता है इस दौरान कंबोडिया पर इतने बम गिराए गए जितने दूसरे विश्वयुद्ध में जापान पर भी नहीं गिराए गए थे ... इस युद्ध के दौरान जो कुछ हो रहा था उससे ही कंबोडिया में पोल पॉट के भविष्य की नींव तैयार हो रही थी ... 
इस दौरान कितने लोग मारे गए इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा सामने नहीं आया.. युद्ध खत्म होते होते अमेरिका ने कंबोडिया के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया था... कंबोडिया में सरकार विरोध लहर ज़ोरों पर थी और लोग पोल पॉट की आर्मी खमेर रूज से जुड़ते जा रहे थे ... 1973 में खमेर रूज के सैनिकों की संख्या तीन गुनी हो चुकी थी .. और इन्होंने तीन चौथाई कंबोडिया पर अपना कब्जा कर लिया ... कंबोडिया में जारी सिविल वॉर का खात्मा 1975 में उस वक्त हुआ जब खमेर रूज के सैनिकों ने एयरपोर्ट पर बमबारी कर अमेरिकी सप्लाई बाधित कर दी और आखिरकार राजधानी नाम पेन्ह पर भी कब्जा कर लिया ... एक अनुमान के मुताबिक इस युद्ध में कंबोडिया में 5 लाख से ज्यादा नागरिक मारे गए ... हालांकि इससे बुरा दौर आना अभी बाकी था ... 
कंबोडिया की सत्ता अपने हाथ में लेते ही पोल पॉट अपनी वैचारिक नीतियां लागू करने लगा ... लंबे वक्त तक पूर्वोत्तर कंबोडिया के  जंगलों में पहाड़ी आदिवासियों के बीच रहे पोल पॉट को उनकी आत्मनिर्भर जिंदगी पसंद आ गई थी .. लिहाजा पोल पॉट कंबोडिया की जनता को वैसा ही आत्मनिर्भर बना देना चाहता था ... इसके तहत कंबोडिया की राजधानी नाम पेन्ह में रह रहे लगभग 25 लाख लोगों को शहर खाली कर देने के लिए कहा गया .... तानाशाह पोल पॉट चाहता था कि उसकी जनता शहरों में ना रहकर गाँवों में रहे ... इसकी पीछे दलील थी कि शहर और आधुनिकता हर बुराई की जड़ है ... अपनी नीतियों के तहत पोल पॉट ने अपने फील्ड के एक्सपर्ट्स जैसे डॉक्टर और शिक्षकों से ना सिर्फ उनकी नौकरी बल्की उनकी डिग्री भी वापस ले ली और उन्हें रीएजुकेशन कैंप में भेज दिया गया ... जिस किसी ने पोल पॉट की इन तानाशाही नीतियों के खिलाफ आवाज उठाई उसे पहले टॉर्चर किया गया फिर मौत के घाट उतार दिया गया .. यहाँ तक कि जिन लोगों ने अपने पास राशन रखने की कोशिश की उन्हें भी पहले यातना दी गई और फिर मार दिया गया .. जिन लोगों ने पोल पॉट के बनाए नियमों को तोड़ा उन्हें भी सजा ए मौत दी गई ... पोल पॉट की आर्मी ने इस कत्लेआम के लिए जगह-जगह पर डिटेंशन सेंटर बना रखे थे ... ज्यादातर स्कूलों में बनाए गए इन डिटेंशन सेंटर्स को अलग अलग नाम दिए गए थे .... इनमें सबसे कुख्यात साबित हुआ सिक्युरिटी प्रिज़न 21 (Security Prison 21) जिसे लोग  एस 21 के नाम से जानते हैं ... कहा जाता है यहाँ 20 हज़ार लोगों की हत्या की गई ... कहा ये भी जाता है कि इस प्रिजन में ज्यादा 15 साल से 19 साल के बीच के बच्चों की हत्या की गई थी .... इन्हें यहां बंधक रखा जाता था .. इन्हें अपने माता-पिता को मां या पापा कहने की इजाज़त नहीं दी जाती थी ... इन्हें कंबोडिया को ही अपना पेरेंट कहना और समझना  होता था ... 
पोल पॉट ने सत्ता संभालते ही देश में नई शुरुआत के लिए ‘ज़ीरो ईयर’ का ऐलान कर दिया था . कंबोडिया का नाम बदलकर डेमोक्रैटिक कम्पूचिया रख दिया गया ... .. कंबोडिया के लोगों की सभी निजी संपत्ति, गहने, पैसे यहां तक कि किताबें  जब्त कर ली गईं ... लोगों से किसी धर्म को मानने की स्वतंत्रता भी छीन ली गई ... सरकार ने भाषा, कपड़े, शादी यहां तक कि शारीरिक संबंधों के लिए भी नियम कायदे बनाए…. लोगों से काले कपड़े पहनने को कहा गया और अरेंज्ड मैरिज की शर्त लगा दी गई ...  शहर से गाँव ले जाए लोगों को खेतों में काम करने को कहा गया ... उन्हें खाने को बहुत थोड़ा दिया जाता .. उनसे कई घंटे काम करवाया जाता.. लिहाजा कई लोग ओवरवर्क और  भूख की वजह से मारे गए ... बच्चों को मां-बाप से अलग कर दिया गया और जबरदस्ती सेना में भर्ती करा दिया गया .... 
कहते हैं कि पोल पॉट ने उन सबकी हत्या करा दी थी जो खुद को बुद्धिजीवी मानते थे ... चश्मा पहनने वाले और विदेशी भाषाओं के जानकार को खासकर टॉर्चर किया जाता था ... मिडिल क्लास के लोगों को पोल पॉट के डिटेंशन सेंटर पर पहले टॉर्चर किया जाता फिर मार दिया जाता...  पोल पॉट के शासनकाल में मारे गए लाखो लोगों के शवों को खेतों में फेंका गया ... ये वो खेत थे जो बाद में किलिंग फील्ड के नाम से जाने गए ...
एक अनुमान के मुताबिक पोल पॉट के शासनकाल में करीब 20 लाख लोग मारे गए जो उस वक्त कंबोडिया की कुल आबादी का एक चौथाई हिस्सा था ... इसे कंबोडियन जीनोसाइड का नाम दिया गया 
पोल पॉट के शासन काल में ना सिर्फ लाखों लोगों को छोटी सी बात पर मौत की सजा दी गई बल्कि इन्हें मारने के लिए क्रूरतम तरीकों का इस्तेमाल किया गया ... बताते हैं कि डिटेंशन सेंटर में लोगों को भीषण यातना दी जाती थी .. उन्हें लात घूंसों से और बिजली के तारों से पीटा जाता था ..... लोगों को सिगरेट से जलाया जाता और बिजली के झटके दिए जाते...लोगों को उल्टा टांग कर चेहरे को पानी में डुबा दिया जाता.... लोगों के चेहरे ढक दिए जाते और सांस नहीं लेने दिया जाता .. कई बार पोल पॉट के सैनिकों ने लोगों को टॉर्चर करने के लिए बिच्छुओं तक का सहारा लिया .... 
पोल पॉट की क्रूरता और विध्वंसकारी नीतियों की वजह से देश में कई छोटे –छोटे विद्रोह होने लगे ... उसकी भरोसेमंद सेना में भी कुछ अधिकारी पोट पॉल की खूनी नीतियों के खिलाफ हो गई ..खमेर रूज के वेस्टर्न जोन के रीजनल चीफ रहे कोह कॉन्ग ने सरकार विरोधी हमले शुरू कर दिए... 1976 के आखिरी महीनों से लेकर 1977 तक सरकार के विरोध में पूरे डेमोक्रैटिक कम्पूचिया में हिंसक प्रदर्शन होने लग गए .. इसमें पोल पॉट की पार्टी के ही कई लोग शामिल थे .... तेज हो रहे विरोध के सुर को खत्म करने के लिए पोल पॉट ने अपनी ही पार्टी के 5000 लोगों को एनिमी एजेंट्स का नाम दे दिया था ... 1978 में सरकार ने देश की जनता के खिलाफ भी ऐसी कार्रवाई शुरू की ... जिसे सेकेंड पर्ज के नाम से जाना जाता है .. इसके तहत पोल पॉट और उसकी सरकार ने देश के हज़ारों नागरिकों को वियतनाम का साथ देने वाला देशद्रोही माना ... ऐसे हज़ारों लोगों को मौत के घाट उतारा गया..   पोल पॉट ने नारा दिया प्यूरीफाई दी पार्टी, प्यूरीफाई दी आर्मी, प्यूरीफाई दी कैडर्स ... 
पोल पॉट के कंबोडिया को डेमोक्रैटिक कम्पूचिया बनाने के बाद वियतनाम ने बधाई दी थी लेकिन दोनों देशों के बीच रिश्ते खराब हो रहे थे .... कंबोडिया के तानाशाह पोल पॉट को वियतनाम देश की स्वतंत्रता के लिए खतरा लगने लगा था तो वहीं दोनों देशों के बीच सीमा विवाद भी गहराने लगा था ... टकराव तब और बढ़ गया जब पोल पॉट की आर्मी ने 1977 में वियतनाम में घुसकर आम नागरिकों की हत्या कर दी .. इस बीच पोल पॉट चीन और नॉर्थ कोरिया की यात्रा कर चुका था और उसे लगता था कि वियतनाम से लड़ाई की हालत में इन दोनों देशों के समर्थन से उसे जीत हासिल होगी ... दिसंबर 1977 में वियतनाम ने कंबोडिया की सीमा पर 50 हज़ार सैनिक तैनात कर दिए... यहीं से एक लंबे संघर्ष की बुनियाद पड़ गई .,.. 
पोल पॉट की सनक की वजह से सीमा पर लगभग दो साल तक युद्ध छिड़ा रहा ... आखिरकार जनवरी 1979 में वियतनाम ने पोल पॉट की सेना को हराकर नाम पेन्ह पर कब्जा कर लिया.... इससे महज कुछ घंटे पहले पोल पॉट अपने सबसे करीबी सहयोगियों के साथ वहां से भाग खड़ा हुआ.. बताया जाता है कि पोल पॉट दक्षिण पश्चिम कंबोडिया के जंगलों में छिप गया था ... ये कंबोडिया में पोल पॉट के चार साल तक चले तानाशाही सरकार का अंत था ... 
इसके बाद भी कई साल तक पोल पॉट कंबोडिया में  चल रही सरकार के खिलाफ काम करता रहा ... 1979 की जुलाई में उसने माउंट थॉम में अपना हेडक्वॉर्टर बना लिया और अपना नाम पोल पॉट से बदलकर फेम रख लिया .. पोल पॉट के नेतृत्व में उसकी सेना खमेर रूज ने जंगलों से भी अपनी लड़ाई जारी रखी और ये लोग लगभग 20 साल तक लड़ते रहे  .. खमेर रूज का नेता पोल पॉट आखिरकार 1980 में रिटायर हो गया ... कंबोडिया के जंगलों सालों तक चले खूनी झड़पों के बाद उसकी सेना के ही लोगों ने जुलाई 1997 में पोल पॉट को गिरफ्तार कर लिया... और लगभग एक साल के बाद 72 साल की उम्र में पोल पॉट की मौत हो गई .. कहते हैं कि उसे हार्ट अटैक आया था ... हालांकि कुछ लोग ये भी कहते हैं कि उसकी मौत जहर दिए जाने की वजह से हुई थी .. हालांकि पोल पॉट के खिलाफ कभी भी नरसंहार के लिए कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुई..  कंबोडियन जीनोसाइड के लिए खेमर रूज के कुछ चंद नेताओं को जिम्मेदार ठहराया गया ... 


पोल पॉट की सनक की कहानियां दुनिया के सामने तब आ पाईं थीं जब वियतनाम  के सैनिकों ने कंबोडिया पर कब्जा किया था ... 1984 में हॉलीवुड ने The Killing Field के नाम से पोल पॉट की कारगुजारियों पर एक फिल्म भी बनाई ... इस फिल्म को देखने वालों के रौंगटे खड़े हो गए .. तब पहली बार दुनिया ने पोल पॉट के शासन काल में हुए जीनोसाइड के बारे में जाना... लेकिन कहते हैं कि वियतनाम के लिए पोल पॉट की नफरत की वजह से दुनिया के कई शक्तिशाली देश उसे समर्थन देते रहे .... इसीलिए कभी उसपर जीनोसाइड का मुकदमा नहीं चला ... अपने आखिरी दिनों में एक इंटरव्यू के दौरान पोल पॉट ने कहा .. My Conscience is Clear यानि लाखों लोगों को मारने का उसे कोई भी पछतावा नहीं था ...

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें