सोमवार, 27 जुलाई 2020

china

पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ने माओ जेंदोग के विनाशकारी राज के बाद नीतियों में बदलाव किए थे ताकि कोई भी इतने लंबे समय तक सत्ता पर निरंकुश शासन ना कर सके ... लेकिन जब शी जिनपिंग चीन के संविधान में बदलाव कर खुद को आजीवन राष्ट्रपति बना लिया तो ये सवाल उठने लगे कि चीन तानाशाही की तरफ बढ गया है ... और शी जिनपिंग आधुनिक दुनिया के तानाशाहों में शुमार हो गए हैं ... चीन की खोखली आंतरिक व्यवस्था भी इसी की गवाही देती है ... 
चीन के मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग दुनिया के सबसे ताकतवर लोगों में से एक हैं ...माओ जेदोंग के बाद चीन में अब तक के सभी नेताओं में शी जिनपिंग दूसरे सबसे ताकतवर नेता माने जाते हैं... ऐसा कम लोगों को पता होगा कि शी जिनपिंग के पिता शी जॉन्गशुन एक क्रांतिकारी थे और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना के बाद उन्होंने माओ जेदोंग की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना में कई अहम पदों पर काम किया था ... 
1953 में जन्मे शी जिनपिंग के लिए बचपन आरामदेह था....10 साल की उम्र तक शी जिनपिंग ने बीजिंग में अच्छे स्कूलों में पढ़ाई की थी और यहीं पर ल्यू हे से शी जिनपिंग की दोस्ती हुई थी जो अब तक बरकरार है .. ल्यू हे चीन के अर्थशास्त्री हैं और वर्तमान में पोलित ब्यूरो के सदस्य हैं.. 1960 में चीन में हुए राजनीतिक उथल- पुथल का शी जिनपिंग के परिवार पर खासा असर पड़ा था ... माओ जेदोंग की विफल रही नीतियों की वजह से चीन की हालत बुरी हो चुकी थी .. पार्टी पर जेदोंग की पकड़ कमजोर हो गई थी .. लिहाजा अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने और देश को एक बार फिर कब्जे में करने के लिए माओ जेदोंग ने कल्चरल रिवॉल्यूशन की शुरुआत कर दी .. शी जिनपिंग के पिता शी जॉन्गशुन भी माओ जेंदोंग के पॉलिटिकल पर्ज (Political Purge) का शिकार हो गए ... लिहाजा 1963 आते आते शी जिनपिंग के पूरे परिवार को बीजिंग छोड़कर सुदूर गाँवों में जाकर छिपना पड़ा .. जहां पूरा परिवार गुफा में रहा करता था .. 
चीन में सांस्कृतिक क्रांति 1966  से लेकर 1976 तक चली थी ...क्रांति के नाम पर बुद्धिजीवियों पर कहर ढाया जा रहा था ... विरोध करने वाले मौत के घाट उतारे जा रहे थे ... पुरानी संस्कृति, पुरानी विचारधारा, पुराने रीति रिवाज और पुरानी परंपराओं को खत्म करने  के चेयरमैन माओ की सनक को पूरा करने में उसके रेड गार्ड्स लगे हुए थे ... इनकी कारस्तानियों से गुफा में छुपकर रह रहा शी जिनपिंग का परिवार भी बच नहीं पाया ... मां पर जिनपिंग के पिता को क्रांति विरोधी होने का दबाब डाला गया.. बाद में इसी आरोप में पिता को जेल में डाल दिया गया ... बड़ी बहन ने खुदकुशी कर ली और शी जिनपिंग को 15 साल की उम्र में दूर के किसी गाँव में काम करने को भेज दिया गया ... 
शी जिनपिंग इस दौरान लगातार कम्युनिस्ट यूथ लीग ऑफ चाइना से जुड़ना चाहता था ...कहते हैं 7 बार इसमें फेल रहने के बाद आखिरकार 1971 में किसी तरह शी जिनपिंग इसमें कामयाब हो गया और 1974 आते आते शी जिनपिंग देश की सत्तारूढ पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना का सदस्य बनने में भी कामयाबी हासिल की... कहते हैं शीन जिनपिंग ने 1973 से लेकर 1974 के बीच कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना से जुड़ने के लिए 10 बार एप्लीकेशन दी थी .. ये वही वक्त था जब चीन में माओ जेदोंग की सास्कृतिक क्रांति खत्म होने के कगार पर थी और माओ जेदोंग का भी अंत नजदीक आ चुका था... 
शी जिनपिंग ने 1975  से लेकर 1979 तक शिन्हुआ युनिवर्सिटी में केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी लेकिन कहते हैं इसी दौरान शी जिनपिंग मार्क्सवाद, लेनिनवाद और माओवाद की पढ़ाई भी करता रहा .. शी जिनपिंग के ये साल आगे चलकर चीन की राजनैतिक दिशा तय करने वाले थे  
शी जिनपिंग ने पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत चीन के सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के जेनरल सेक्रेटरी रहे गेंग ब्याओ के सेक्रेटरी के तौर पर की ... यहीं से शी जिनपिंग को मिलिट्री के बारे में पता चला ... शी जिनपिंग ने एक डेलीगेट के तौर अमेरिका में भी कुछ दिन बिताए ..जहां शी जिनपिंग एलेनोर ड्वोरचाक के घर में कुछ दिन रहे थे.... इन दोनों ही बातों ने शी जिनपिंग के व्यक्तित्व पर असर डाला ... 
1998 से लेकर 2002 तक शी जिनपिंग ने मार्क्सिस्ट (Marxist Theory) की भी पढ़ाई की ... इस दौरान शी जिनपिंग फुजियान के गवर्नर बना दिए गए ..  2002 में शी जिनपिंग फुजियान से निकलकर झेझियांग (Zhejiang) पहुंच गए जहां आने वाले 5 साल तक उन्होंने पार्टी चीफ के तौर पर काम किया .. इस दौरान शी जिनपिंग की इमेज एक इमानदार नेता की बनी .... 2008 में शी जिनपिंग को वाइस प्रेसीडेंट बना दिया गया था ... अगले चार साल में शी जिनपिंग ने दुनिया भर का दौरा कर राष्ट्रपति बनने की रिहर्सल कर ली... 2009 में शी जिनपिंग ने मेक्सिको में एक कार्यक्रम में अपनी सोच की एक झलक दी थी जिसमें उन्होंने कहा था  ‘दुनिया की कुछ बेहतर अर्थव्यवस्था वाले देशों के लोगों के पास हमारी नीतियों पर सवाल उठाने के अलावा कोई काम नहीं है ... चीन कभी क्रांति, गरीबी और भुखमरी का निर्यात नहीं करता .. कभी आपके लिए मुश्किलें खड़ी नहीं करता आप क्यों चीन की आलोचना करते रहते हो ...’
2012 में शी जिनपिंग चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेता बने..... हू जिंताओ के उत्तराधिकारी के रूप में नवंबर 2012 में उन्हें चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव बनाया गया... वो कम्युनिस्ट पार्टी के तमाम खेमों के आम सहमति से चुने गए नेता थे.... लेकिन किसी को भी ये अंदाज़ा नहीं था कि अगले पांच सालों में वो कैसे नेता बनकर उभरने वाले हैं.... मार्च 2013 में शी जिनपिंग ने चीन का राष्ट्रपति पद संभाला.....  इसके पहले पार्टी प्रमुख का पद स्वीकार करने के बाद अपने भाषण में शी ने कहा था, ‘‘पार्टी के पास कई बड़ी चुनौतियां हैं और ऐसी कई परेशानियां हैं पार्टी के भीतर जिन्हें सुलझाना होगा, खास तौर से भ्रष्टाचार, लोगों से अलग होना और नौकरशाही, जिसे कुछ पार्टी अधिकारियों की वजह से बढ़ावा मिला है.’’
इसके बाद से शी जिनपिंग ने अपने इन्हीं कथनों पर काम किया.... सत्ता संभालते ही शी जिनपिंग ने भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करना शुरू किया.. कई ऊंचे पदों पर काम करने वाले अधिकारियों और स्थानीय कर्मचारियों पर शिकंजा कसा गया .... कहते हैं इसका मकसद अपने सारे राजनीतिक विरोधियों का सफाया था ...इसमें चाऊ योंगकांग भी शामिल थे जो कभी चीन के अर्धसैनिक बलों, जेलों और खुफिया ऑपरेशन के अगुआ हुआ करते थे..... हालांकि चाऊ के हिमायती कहते हैं कि पार्टी में शी जिनपिंग के विरोधी रहे चाऊ को बड़ी ही सफाई से निपटा दिया गया ... 
कहते हैं भ्रष्टाचार पर रोक के नाम पर पार्टी के हर नेता के दफ्तर के साइज़ से लेकर नेताओं के लंच या डिनर में इस्तेमाल होने वाले बर्तनों की संख्या को लेकर भी शी जिनपिंग ने नियम बना दिए.... लेकिन इस दौरान शी जिनपिंग के कई रिश्तेदार अमीर होते चले गए ... हालांकि ये किसी तरह साबित नहीं किया जा सका कि इसमें शी जिनपिंग की कोई भूमिका रही.. 
शी जिनपिंग जब बड़े हो रहे थे तो चीन विनाशकारी आंदोलन के दौर से गुजर रहा था ... माओ के उस सांस्कृतिक क्रांति की मार शी जिनपिंग के पूरे परिवार पर पड़ी थी ... शायद इसीलिए जिनपिंग किसी आंदोलन को पसंद नहीं करते ... लेकिन इसी बात ने शी जिनपिंग को माओ जेदोंग से ज्यादा खतरनाक बना दिया है ... 
कहते हैं कि चीन में आज भी माओ और उसकी क्रांति के खिलाफ आवाज़ उठाना गुनाह है .. माओ की नीतियों की वजह से करोड़ो लोग मारे गए लेकिन शी जिनपिंग की सत्ता इसके खिलाफ बोलने वालों को सबक सिखाती है .. शी जिनपिंग खुद को माओ का वारिस समझते हैं .. शी के तानाशाही रवैयों का निशाना उनके अपने करीबी भी होते हैं ... कहते हैं रिसर्च स्कॉलर शू झियोंग को सिर्फ इसीलिए देशद्रोह के आरोप में जेल में डाल दिया गया क्योंकि उसने बेघर और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए लोगों के हितों की वकालत शुरू कर दी थी... जेल से कुछ साल शू रिहा हो गया था लेकिन तब से अभी तक उसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली .. 
कई बार तो ऐसे लोगों को सज़ा सुनाने से पहले मुकदमों का टीवी पर सीधा प्रसारण किया गया ... लोगों ने अपनी ग़लतियां पूरे देश के सामने मानीं....  शी जिनपिंग के राज में कई नेता और कारोबारियों के लापता होने की खबरें आती रही हैं । मुसलमान, ईसाई, मज़दूर कार्यकर्ता, ब्लॉगर, पत्रकार वक़ीलों की गिरफ्तारी होती रही है । 
शी जिनपिंग अक्सर अपने देश के लोगों को ..नेशन फर्स्ट की थ्योरी समझाते नज़र आते हैं .,... उन्हें सलाह देते हैं कि वो देश से प्यार करें.... चीन की संस्कृति और जीवन मूल्यों को जानें-समझें....
चीन में इंटरनेट के इस्तेमाल पर भी काफी पाबंदी है... कहते हैं कि शी जिनपिंग ने अरब देशों में चल रही क्रांति के वक्त ही चीन की सत्ता संभाली थी ऐसे में इंटरनेट के जरिए ऐसी किसी भी क्रांति के पैदा हो जाने से जिनपिंग डरते हैं ... 
बराक ओबामा और शी जिनपिंग की तस्वीर के सामने आने और उस पर हुए कमेंट्स के बाद से चीन में इंटरनेट के इस्तेमाल पर पाबंदियां और कड़ी कर दी गई हैं ... इस तस्वीर में जिनपिंग और ओबामा की चहलक़दमी की तुलना, कार्टून कैरेक्टर विनी द पू से की गई थी... चीन में 75 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं....  ये तादाद यूरोप और अमरीका में मिलकर इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों से ज़्यादा है.... लेकिन जिनपिंग इस पर काबू रखना चाहते हैं वो भी तब शी जिनपिंग का सपना चीन को साइबर सुपरपावर बनाने का है ... 
इंटरनेट की सुविधा देने वाले और सोशल मीडिया साइट पर सख्ती से सेंसर लागू किया जाता है..... कोई भी फर्जी खाता बनाकर चीन में सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं कर सकता.... साइबर सुरक्षा को शी जिनपिंग देश की सुरक्षा का मुद्दा बना चुके हैं ... इसीलिए इस पर बड़े पैमाने पर सरकारी निवेश भी किया जा रहा है ... 
चीन में नागरिकों को वफादार बनाने की मुहिम चलाई जा रही है ... इसीलिए यूनिवर्सिटी में कम्यूनिस्ट पार्टी की पहुंच बढ़ाई जा रही है....  क़िताबों में से पश्चिमी सभ्यता के निशान मिटाए जा रहे हैं... निजी कंपनियों में भी कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता की शाखाएं खोली जा रही हैं... 
मीडिया पर चीन की पाबंदी जगजाहिर है ... चीन के बारे में जानकारी सिर्फ सरकारी न्यूज एजेंसी सिन्हुआ देती है ... यहां प्रेस की आज़ादी...आम लोगों के अधिकारों .. और स्वतंत्र अदालतों की बात करने की मनाही है ... आंतरिक विरोधों की खबरें दबा दी जाती हैं... राष्ट्रपति के फैसले लेने की प्रक्रिया को अपने हाथ तक सीमित कर चुके हैं....  देश का हर फैसला वही होता है जो शी जिनपिंग चाहते हैं... .शायद इसीलिए ब्रिटेन की इकोनॉमिस्ट पत्रिका ने एक बार शी जिनपिंग को "चैयरमैन ऑफ एवरीथिंग" कहा था .. 
चीन में ह्यूमन राइट्स को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं ... ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक चीन ने ऐसी नीतियां बनाई हैं जिसमें लोगों की आलोचना को दबाने के लिए आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है ...जिनमें चीन के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र शिनचियांग में उइगुर मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों ने चीन में मानवाधिकारों पर और गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं .. ह्यूमन राइट्स वॉच ने 2020 में जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के तहत चीनी सरकार घरेलू मानवाधिकार सक्रियता को "अस्तित्ववादी खतरे" के रूप में देखती है.. 
शी जिनपिंग को विरासत  में एक ताकतवर चीन मिला है ..शी जिनपिंग ने इसका मुजाहिरा करने में कोई कसर भी नहीं छोड़ी है लेकिन चमक दमक के पीछे कई आर्थिक दिक्कतें भी हैं .. चीन की विकास की रफ्तार धीमी हो रही है ... अब तक अपने जोर जुल्म पर शी जिनपिंग आर्थिक तरक्की का मुलम्मा चढ़ाते आए हैं लेकिन आने वाली राह बहुत कठिन साबित होने वाली है .. वो भी तब, जब दुनिया के तमाम देश चीन की नीतियों पर शक की निगाह से देख रहे हैं ...

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