सोमवार, 13 जुलाई 2020

abdullah family

सत्ता पलट और सत्ता हथियाने का फ़ॉर्म्युला पुराना है.. यही काम पहले इंदिरा जी के ज़माने में भी होता था .. युद्ध और राजनीति में सब जायज़ है
महाकवि तुलसी दास ने राम चरित मानस में लिखा है, ‘समरथ को नहीं दोष गोसाईं’ मतलब जो समर्थ है उसे किसी तरह का दोष नहीं लगता... शिव पुराण में लिखा गया है वीर भोग्या वसुंधरा..यानि जो वीर है वही सत्ता सुख भोगने के लायक है... 
वैसे भी बीजेपी की तैयारी और रणनीति आने वाले पचास साल तक सत्ता में बने रहने की है.. देश के अलग अलग हिस्सों में चल रहे ऑपरेशन लोटस को इसी नज़रिए से देखा जाना चाहिए ....
सचिन पायलट आज बीजेपी का हाथ थामने के लिए बेकरार दिख रहे हैं इसमें कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए ... ऐसा इसीलिए क्योंकि ऐसा काफी पहले लिखी जा चुकी एक तय स्क्रिप्ट के तहत हो रहा है जिसका खुलासा रॉ के प्रमुख रह चुके ए एस  दुलत ने एक वरिष्ठ पत्रकार से साथ अपनी बातचीत में किया था ... अपसाउंड दुलत की बाइट का... इसी बातचीत के बाद जम्मू कश्मीर की अब्दुल्ला फैमिली वापस लाइमलाइट में आ गई है... इससे पहले वो अनुच्छेद 370 हटाए जाने के वक्त अपनी नज़रबंदी को लेकर सुर्खियों में रहे थे ... 
खैर अब्दुल्ला परिवार सियासी उठापटक के बीच अपनी विचारधारा और नजदीकियां तय करने के लिए जाने जाते हैं .. आपको याद होगा कि यही अब्दुल्ला परिवार आज़ादी के वक्त कांग्रेस का बेहद करीबी था लिहाजा फ़ारुख अब्दुल्ला के पिता शेख अब्दुल्ला को कश्मीर की कमान सौंपी गई थी... स्वतंत्र रहने के अपने फैसले को उन्होंने कांग्रेस के साथ हुए समझौते के तहत बदल लिया था... फिर अपने पिता की मौत के बाद फारुख अब्दुल्ला जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री बन गए ... इसके बाद से नेशनल कॉन्फ्रेंस की नजदीकियां कांग्रेस के साथ घटती बढ़ती रहीं .... कांग्रेस के साथ इनका लव एंड हेट का रिश्ता चलता रहा ... 
1984 में फारुख अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री पद से हटाने में कांग्रेस ने अहम भूमिका निभाई ... दरअसल नेशनल कॉन्फ्रेंस का एक धड़ा फारुख अब्दुल्ला के बहनोई गुलाम मोहम्मद शाह के नेतृत्व में पार्टी से अलग हो गया और कांग्रेस ने ही उनकी मदद कर सरकार बनवा दी ... 
लेकिन नेशनल कॉन्फ्रेंस का कांग्रेस से ये विवाद ज्यादा दिन नहीं चला ..1987 में एक बार फिर कांग्रेस के साथ मिलकर फारुख अब्दुल्ला ने सरकार बना ली ..इस समझौते को नाम दिया गया राजीव-फारुख अकॉर्ड (Rajiv – Farooq Accord)… 
कांग्रेस के साथ अपने रिश्तों में तमाम ट्विस्ट्स और टर्न के बाद 1996  में नेशनल कॉन्फ्रेंस अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में शामिल हो गई .... उतार चढाव के बाद साल 2009 में फारुख अब्दुल्ला यूपीए के साथ वापस आ गए और मंत्री भी बन गए ... हाल फिलहाल में जब केंद्र में एडीए पार्ट 2 की शुरुआत में जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 के तहत मिला विशेष दर्जा खत्म हुआ तो फारुख अब्दुल्ला परिवार समेत नज़र बंद कर दिए गए ... इसके साथ ही एक नए सियासी स्क्रिप्ट पर काम भी शुरू हो गया ... दुलत की बाइट का हिस्सा (जिसमे कह रहे हैं कि फारुख मुख्यमंत्री बनने वाले हैं)
सचिन पायलट इसी अब्दुल्ला परिवार के दामाद हैं .... सचिन पायलट के पिता राजेश पायलट सोनिया गांधी के खिलाफ अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ चुके हैं ...  राजेश पायलट के निधन के बाद कांग्रेस के टिकट पर सचिन पायलट भारत के सबसे कम उम्र के सांसद भी बन चुके हैं और कांग्रेस की सरकार में मंत्री भी बनाए गए... लेकिन इनकी राजनैतिक महात्वाकांक्षा हमेशा से सबके सामने रही है .. ऐसे में बीजेपी के ऑपरेशन लोटस के तहत सिंधिया के बाद सचिन पायलट सबसे मुफीद साबित हो रहे हैं ... विरोधी दलों की कार्यशैली उनके लिए ईंधन का काम कर रही है ... ऐसे में देश के ग़ैर बीजेपी दलों को अपनी राजनैतिक गतिविधियों को स्थगित करके कुछ दिन तक भोजन चिंतन और विश्राम करना चाहिए .. वैसे भी उनकी तरफ़ से सिर्फ़ ट्वीट करने के अलावा और कोई ठोस काम दिखायी नहीं दे रहा है .. ट्विटर  राजनैतिक मनोविनोद का बेहतर माध्यम है .. ट्वीट करके अपने राजनैतिक दायित्वों का एहसास भी हो जाता है और शरीर को कंट्रोल्ड वातानुकूलित कमरे से बाहर भी नहीं ले जाना पड़ता ... कोई ताज्जुब नहीं जब आने वाले चुनावों  में जनता भी ऐसे दलों को ट्वीट के ज़रिए अपना वोट देने लगे ... 
ग़ैर बीजेपी दलों के लिए यह राजनैतिक विश्राम का काल है... इस वक़्त का उपयोग इन दलों के नेताओं को अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियों को पूरा करने में करना चाहिए मसलन शादी विवाह और बही खाता ठीक करना ... पार्टी से लेकर एनजीओ तक के अकाउंट्स को दुरुस्त करना, राजनैतिक कारोबार फेल होने के बाद निजी कारोबार को बचाने की कोशिश करनी चाहिए... वे लोग समझदार हैं जो समय रहते बीजेपी की गोद में बैठते जा रहे हैं.. उनकी अक़्लमंदी के वजह से घर और ससुराल पक्ष भी सुरक्षित हो रहा है और राजनैतिक भविष्य भी .. यह कोई जन्म जन्मान्तर का फ़ैसला तो है नहीं .. जब ग़ैर बीजेपी दलों के अच्छे दिन आएंगे तो वे फिर घर वापसी कर लेंगे यह काम तो उनके पुरखे पहले कर ही चुके हैं..

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