गुरुवार, 30 जुलाई 2020

iran

अयातुल्लाह सय्यद अली होसैनी ख़ामेनेई  .. इस नाम से ज्यादातर लोग परिचित हैं... ईरान के सर्वोच्च नेता के तौर पर खामेनेई ने पूरी दुनिया में अपनी एक पहचान बना रखी है खासकर अमेरिका से अपनी दुश्मनी निभाने को लेकर ... खामेनेई बचपन से ही अपने पिता की तरह मौलवी बनना चाहते थे और तब किसी ने नहीं सोचा था कि खामेनेई एक दिन ईरान के सर्वोच्च नेता होंगे और एक तानाशाह की तरह सरकार चलाएंगे ... 
अयातुल्लाह अली खामेनेई का जन्म 1939 में इरान के पवित्र माने जाने वाले शहर मशहद में हुआ था ...अपनी उम्र के बाकी बच्चों से अलग खामेनेई ने जब मौलवी बनने का फैसला किया था तो वैसे कपड़े भी पहनने लग गए थे ... अक्सर बाकी बच्चे खामेनेई का मज़ाक उड़ाया करते .. लेकिन इससे खामेनेई के इरादों में कोई फर्क नहीं आया .. 
खामेनेई 8 भाई बहनों में से एक हैं ... इनके दो भाई मौलवी हैं जबकि एक भाई मौलवी होने के साथ साथ एक अखबार का संपादक भी है ... खामेनेई की पढ़ाई चार साल की उम्र में शुरू हो गई थी जब इन्होंने एक मकतब में कुरान पढ़ना शुरू किया था ... मौलवी बनने के लिए आगे की पढ़ाई खामेनेई ने मशहद शहर के सेमीनरी और हवजा से की .. हालांकि धार्मिक शिक्षा के साथ साथ खामेनेई राजनीति में भी काफी सक्रिय थे ..
अयातुल्लाह अली खामेनेई को जानने वाले कहते हैं कि खामेनेई एक आम इंसान की तरह ही पले बढ़े ... उन्हें कविताओं का बहुत शौक है...  लेकिन एक चीज जो खामेनेई को उनके साथ के लोगों से अलग करती थी वो थी स्मोकिंग की आदत... अक्सर खामेनेई को सार्वजनिक जगहों पर स्मोक करते हुए देखा जा सकता था ....जबकि इस्लामिक शिक्षा से जुड़े लोगों के लिए ये आम बात नहीं है... 
खामेनेई की राजनीतिक महात्वाकांक्षा सत्तर के दशक में ही सामने आ गई थी जब ये  इस्लामिक लीडर और अपने गुरु अयातुल्‍लाह रुहोल्लाह खोमैनी की देश वापस के लिए चल रहे आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था ... उस वक्त देश में मोहम्मद रजा शाह पहलवी का शासन हुआ करता था... देश में कहने को लोकतंत्र था लेकिन जनता के चुने प्रधानमंत्री की कोई अहमियत नहीं थी ... पहलवी राजवंश के मोहम्मद रजा शाह पहलवी का ही परोक्ष रूप सत्ता पर नियंत्रण हुआ करता था ...जो एक तरह से अमेरिका की कठपुतली था... जनता में इसके खिलाफ बगावत जन्म ले रही थी... इस बगावत की अगुआई करने वाले अयातुल्लाह रुहोल्लाह खोमैनी को देश निकाला दे दिया गया था लेकिन ईरान में शाह के खिलाफ हमेशा प्रदर्शन होते रहते थे रुहोल्लाह खोमैनी की देश में वापसी की मांग की जाती थी ... ईरान के मौजूदा सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई भी 70 के दशक में होने वाले इस विरोध प्रदर्शनों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया करते थे ... कहते हैं इस दौरान अली खामेनेई को 6 बार गिरफ्तार भी किया गया ...
शाह के खिलाफ हुई ईरानी क्रांति का नतीजा था कि 1979 में एक जनमत संग्रह के बाद ईरान को इस्लामी गणतंत्र घोषित किया गया.. और वर्तमान सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई के गुरू रहे अयातुल्लाह रुहोल्लाह खोमैनी को देश का सर्वोच्च नेता चुना गया... तभी ईरान में प्रधानमंत्री का पद खत्म कर राष्ट्रपति का पद कायम किया गया ... और एक तरह ईरान में अमेरिका की कठपुतली सरकार भी तभी से खत्म हो गई ... जो अली खामेनेई के शासन काल में भी जारी है ... 
रुहोल्लाह खोमैनी के ईरान के सर्वोच्च नेता बनने के बाद से अक्सर खामेनेई उनके साथ नज़र आया करते थे ... खोमैनी के कार्यकाल में खामेनेई को डिप्टी डिफेंस मिनिस्टर भी बनाया गया ... कहते हैं इसमें उस वक्त सांसद रहे हसन रुहानी की अहम भूमिका थी ... जो अब ईरान के राष्ट्रपति हैं ... खामेनेई के विरोधी कहते हैं कि उनके बारे में उस वक्त लोग सिर्फ इतना जानते थे कि इन्हें कई बार जेल हुई है .... 
खोमैनी ने अली खामेनेई को 1980 में तेहरान में होने वाली शुक्रवार की नमाज के लिए इमाम भी नियुक्त किया था... कहते हैं इस्लामिक देश बन चुके ईरान में सत्ता में तेजी से बढ़ते कदम की वजह से अली खामेनेई अपने विरोधियों की नज़रों में आ गए थे जिसकी वजह से अली खामेनेई के खात्मे की साजिश रची जाने लगी थी..
अली खामेनेई पर 1981 में पीपुल्स मुजाहिदीन ऑर्गनाइजेशन ऑफ इरान ने एक घातक हमला किया था ... इस हमले में खामेनेई की जान बच गई लेकिन दाहिना हाथ खराब हो गया .. कहा जाता है कि जान बच जाने पर खामेनेई ने कहा था कि खुदा ने उन्हें किसी वजह से बचाया है .. इस हादसे के कुछ ही दिनों बाद ईरान में हुए राष्ट्रपति चुनाव में खामेनेई को 97 फीसदी वोट के साथ जीत हासिल हुई... राष्ट्रपति बनने के बाद अपने पहले भाषण में खामेनेई ने deviation, liberalism और American-influenced leftists के खात्मे की बात कही थी .. और आने वाले सालों में ऐसा ही हुआ ... 
उस वक्त ईरान में एक वर्ग इस्लामिक शासन के खिलाफ था और इसका पुरजोर विरोध किया जा रहा था ... ईरान चैंबर के मुताबिक खामेनेई के राष्ट्रपति बनने के बाद ऐसे सभी विरोधों पर सरकार ने कड़ी कार्रवाई शुरू कर दी .. हज़ारों विद्रोहियों को मौत की सजा दी गई ... हालांकि इसमें सबसे चर्चित रहा था जर्मनी के माइकोनोस रेस्टोरेंट में हुआ हत्याकांड .. 
जर्मनी की राजधानी बर्लिन के इस रेस्टोरेंट में 1992 में तीन ईरानी मूल के नेताओं और उनके ट्रांसलेटर की हत्या हुई थी ... जिसका मुकदमा जर्मनी की अदालत में चला.. अदालत ने 1997 में इसका फैसला देते हुए इसमें खामेनेई के शामिल होने की बात कही थी .. 
1989 के जून में ईरान के पहले सुप्रीम लीडर रहे रुहोल्लाह खोमैनी की मौत हो गई ... इसके बाद ईरान के असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स ने खामेनेई को ईरान का सुप्रीम लीडर बना दिया ... कहते हैं तब ईरान के संविधान के मुताबिक सर्वोच्च नेता बनने के लिए मरजा की उपाधि होना ज़रूरी था लेकिन खामेनेई के पास ये उपाधि नहीं थी लिहाजा संविधान में संशोधन कर दिया गया ... तब से लेकर अब तक अली खामेनेई ईरान के सर्वोच्च नेता के पद पर बने हुए हैं .. 
खामेनेई को ईरान का सर्वोच्च नेता बने हुए 30 साल हो चुके हैं ... खामेनेई को ईरान की इस्लामिक क्रांति के संरक्षण के लिए ही सुप्रीम लीडर चुना गया था ... जो पहले सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खोमैनी के विचारों को आगे बढ़ाता ... कहते हैं खामेनेई ने खोमैनी के एक ग्रुप के समानांतर दूसरे ग्रुप को ताकतवर बनाने की पॉलिसी को काफी अच्छे तरीके से आगे बढ़ाया है .... ईरान में खामेनेई की तरह ही मौलवी रहे और अब खामेनेई की बायोग्राफी लिख रहे मेहदी खालाजी ने एक बार कहा था कि  देश के आर्मी और इंटेलीजेंस एजेंसी समेत सभी बड़े संस्थानों में खामेनेई ने एक पैरेलल स्ट्रक्चर खड़ा कर रखा है जो खामेनेई के लिए काम करता है साथ ही आर्मी और इंटेलीजेंस एजेंसी को कभी भी बहुत ताकतवर नहीं होने देता ... 
आमतौर पर विनम्र और एक आम आदमी की तरह व्यवहार करने वाले खामेनेई के लिए ये भी कहा जाता है कि इन्होंने राष्ट्रपति की शक्तियां भी अपने पास रखी हुई हैं.. राजनैतिक विरोधी तो हैं ही नहीं .... इस तरह खामेनेई अब ईरान के तानाशाह बन चुके है ...
1997 से 2005  तक ईरान के राष्ट्रपति रहे मोहम्मद खातमी ने ईरान में कई तरह के रिफ़ॉर्म्स की शुरुआत की थी .. इससे ईरान की राजनैतिक और सामाजिक व्यवस्था में बदलाव आता लेकिन खामेनेई ने इस तरह के सारे प्रस्तावों पर रोक लगा दी थी ... मोहम्मद खातमी को उदारवादी माना जाता था जिसकी पश्चिमी देशों में भी अच्छी छवि थी ...कहते हैं कि खामेनेई की कट्टरपंथी ताकतों ने मोहम्मद खातमी की नीतियों को विफल करने में अहम भूमिका निभाई थी ... 
कहते हैं सिर्फ मोहम्मद खातमी ही नहीं बल्कि खामेनेई के कार्यकाल के दौरान ईरान में राष्ट्रपति रहे अकबर हाशमी रफसंजानी और महमूद अहमदीनेजाद को भी नीतियों के सवाल पर खामेनेई से विरोध का सामना करना पड़ा ... जबकि अहमदीनेजाद को आलोचक खामेनेई का शागिर्द कहते आए हैं .... और 2009 में अहमदीनेजाद के राष्ट्रपति पद पर दोबारा चुने जाने के पीछे खामेनेई के तंत्र का हाथ बताया गया था .. चुनाव में धांधली के आरोप लगे थे जिसकी वजह से  देश ने इस्लामिक क्रांति के बाद का सबसे हिंसक आंदोलन देखा था..सौ से ज्यादा लोग गिरफ्तार किए गए थे ... ईरान ने देश के साथ साथ विदेशी मीडिया के कवरेज पर भी आंशिक रोक लगा दी थी ... 
खामेनेई ने 2007 में सारे सरकारी बिजनेस कंपनियों का निजीकरण कर दिया था ...जिसमें बैंक, टेलीफोन कंपनियां यहां तक कि छोटी छोटी ऑयल कंपनियां भी शामिल थीं .... खामेनेई के तेजी से निजीकरण के ये फैसले भी ईरान की आर्थिक व्यवस्था को नहीं सुधार पाए ...इसका नतीजा था कि 2008 में ईरान की आर्थिक हालत खस्ता हो गई ... हालात खाने पीने की चीजों की कमी तक पहुंच गए थे .. यूएन ने स्टेट ऑफ इमरजेंसी डिक्लेयर कर दी थी लेकिन खामेनेई को कोई फर्क नहीं पड़ा था ...खामेनेई ने सरकारी अधिकारियों को आर्थिक दिक्कतों पर ध्यान नहीं देने की हिदायत देते हुए कहा था कि I advise you to keep in your mind that this great nation is never afraid of economic sanctions" ... हालांकि ईरान की जनता त्रस्त हो चुकी थी और आने वाले वक्त में खामेनेई जनता के विरोध का सामना करने वाले थे 
एक सुप्रीम नेता के तौर पर खामेनेई ही ईरान की विदेश नीति तय करते हैं …  कई बार खामेनेई की विदेश नीतियों पर सवाल खड़े होते रहे हैं .. ह्यूमन राइट्स की बात  करने वाली संस्थाओं ने भी खामेनेई की आलोचना की है ... 
खामेनेई एक तरफ बांग्लादेश में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ होने वाली कार्रवाई की आलोचना करते हैं और आंग सान सू की को ब्रूटल वुमन कहते हैं लेकिन दूसरी तरफ चीन में उईगर मुसलमानों की दुर्दशा पर चुप्पी साधे रहते हैं ... 
खामेनेई पर अपने विरोधियों को दबाने के आरोप भी लगते रहे हैं ... एक रिपोर्ट के मुताबिक humble नज़र आने वाले खामेनेई ने दुनिया भर में 160 से ज्यादा विरोधियों की हत्या कराई है ... देश में इस्लामिक गणतंत्र का विरोध करने वाले हज़ारों लोगों को मौत की सज़ा दी है ... 
एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक ईरान में फ्रीडम ऑफ स्पीच और फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन नहीं है ... विरोध करने वाले प्रदर्शनकारियों से सख्ती से निपटा जाता है .. विरोध में आवाज उठाने वालों की हत्या तक कर दी जाती है ... महिलाओं को समान अधिकार नहीं मिले हुए हैं और अल्पसंख्यकों के साथ अक्सर बुरा व्यवहार किया जाता है ... 
पत्रकारों के साथ भी बुरा व्यवहार किया जाता है ... सरकार के भ्रष्टाचार को उजागर करने  या विरोध प्रदर्शन के कवरेज करने को गुनाह माना जाता है ... व्यवस्था पर सवाल उठाने वालों को सुप्रीम लीडर का अपमान करने वाले के तौर पर देखा जाता है .... 
देश में स्वतंत्र चुनाव पर हमेशा सवाल खड़े होते हैं ... उम्मीदवारों का चुनाव ईरान की गार्डियन काउंसिल करती है ... जो उम्मीदवार इस्लामिक गणतंत्र की नीतियों का समर्थन नहीं करते हैं उन्हें रिजेक्ट कर दिया जाता है ... उदारवादियों और कट्टरपंथियों के बीच हमेशा जीत कट्टरपंथियों की ही होती है ... ऐसे में चुनाव बेमानी साबित होते हैं .. 
ईरान पर लंबे वक्त से आर्थिक प्रतिबंध लगे हुए हैं .. और खामेनेई की तरफ से इसे खत्म करने की कोई सार्थक पहल भी नहीं होती लिहाजा देश की अर्थव्यवस्था गर्त में जा चुकी है .. महंगाई और बेरोजगारी की वजह से गरीबी चरम पर पहुंच चुकी है ... 2018 में ईरान में एक डॉलर के मुकाबले ईरानी करेंसी रियाल की कीमत 1 लाख डॉलर तक पहुंच गई थी ... 
लिहाजा रह रह कर ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शन होते रहते हैं ... 2017 के दिसंबर में तेहरान यूनिवर्सिटी में हुए प्रदर्शन में अली खामेनेई को सत्ता छोड़ने को कहा गया था .. सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों की संख्या हर दिन बढ़ती जा रही है ...2018 में देश में महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन हुए ... 2019 में ईरान में तेल की कीमतें 300 फीसदी बढ़ गईं... प्रदर्शन में 200 से ज्यादा लोग मारे गए और 7 हज़ार से ज्यादा लोग गिरफ्तार कर लिए गए ...ईरान की तरफ से यूक्रेन का प्लेन गिराए जाने की खबरें कंफर्म होने के बाद फिर देश में हिंसक विरोध प्रदर्शन होने लगे ... पिछले एक साल में 1500 से ज्यादा लोग इसकी वजह से मारे जा चुके हैं ... विरोध प्रदर्शन को दबाने के लिए सरकार हर मुमकिन कोशिश करती है ... वहीं मरने वालों की संख्या को लेकर अलग अलग रिपोर्ट्स आती रही हैं ... 
ये विरोध प्रदर्शन चाहे किसी भी घटना से ट्रिगर होते हों इनमें खामेनेई को हटाने और इस्लामिक गणतंत्र के खात्मे का शोर भी सुनाई देता है ... लगातार प्रदर्शन के बीच खामेनेई इसे पश्चिमी देशों की साजिश करार देते हैं ...और देश की गंभीर आर्थिक समस्या को एक बीमारी कहते हैं जो वक्त आने पर खुद ठीक हो जाएगी ...

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

ethopia

सत्तर, अस्सी और नब्बे के दशक में दुनिया ने कई तानाशाह देखे हैं ... खासकर लैटिन अमेरिकी, अफ्रीकी और मिडिल ईस्ट के देशों में  ऐसी शख्सियतों ने सत्ता संभाली जिन्होंने लगभग एक जैसी नीतियां बनाईं ... लगभग एक जैसे नारे दिए और इन सभी देशों का हाल लगभग एक जैसा ही हुआ ... ज्यादातर देशों की अर्थव्यवस्था खोखली हो गई और आम लोगों का जीवन तहस नहस हो गया….. 
ऐसा ही एक नाम था मेनगिस्तु हाइले मरियम का ... इथियोपिया फर्स्ट जैसे नारों के साथ सत्ता संभालने वाले मेनगिस्तो ना सिर्फ इथियोपिया बल्कि पूरे अफ्रीका के इतिहास में सबसे क्रूर शासकों में एक साबित हुआ ... इथियोपिया के लिए ये एक ऐसा शासक साबित हुआ जिस पर नरसंहार के आरोप में मुकदमा चला ... और सज़ा-ए-मौत का फरमान सुनाया गया .... मेनगिस्तु हाइले मरियम का नाम भले ही आज आम लोग नहीं जानते हों लेकिन इथियोपिया में लोग इसे कभी नहीं भुला पाएंगे ..
1937 में जन्मा मेनगिस्तु हाइले मरियम ने बहुत कम उम्र में अपनी मां को खो दिया था .. जिसके बाद अपने दो भाई बहनों के मेनगिस्तु का बचपन अपनी नानी के साथ बीता .. मेनगिस्तु के पिता आर्मी में थे और बहुत कम उम्र में मेनगिस्तु ने भी आर्मी ज्वाइन कर ली थी... जहां जनरल अमन एन्डम की नजर में आने के बाद मेनगिस्तु सार्जेन्ट बना दिया गया ... मेनगिस्तु ने इथियोपिया के दो सबसे अच्छे मिलिट्री स्कूलों में शुमार होलेता मिलिट्री से ग्रेजुएशन किया था ... सेना में अपने करियर की शुरुआत में जनरल अमन एन्डम के तौर पर मेनगिस्तु को गॉडफादर मिल गया था ... 1964 में मेनगिस्तु को अमेरिका के इलियोनाइस स्टेट भेज दिया गया जहाँ से उसने मिलिट्री की एडवांस ट्रेनिंग ली थी ..इसके बाद 1970 तक मेनगिस्तु कई बार ट्रेनिंग के लिए अमेरिका आता जाता रहा ... कहते हैं इस दौरान मेनगिस्तु हाइल मरियम को नस्लीय भेदभाव का शिकार होना पड़ा था .. इसी भेदभाव की वजह से उसकी मानसिकता अमेरिका के खिलाफ होती जा रही थी ... मेनगिस्तु पर इसका असर हुआ था कि उसने इसे इथियोपिया में अमीर गरीब के भेदभाव से भी जोड़ा .. कहते हैं सत्ता संभालते ही उसने ये बात साफ कर दी थी कि इथियोपिया के कुलीन वर्ग के लोग काली रंगत और मोटे होंठ वाले लोगों को अपना दास समझते हैं... ऐसे लोगों को बहुत जल्द सबक सिखाया जाएगा ... 
मेनगिस्तु एक तरफ आर्मी में पावरफुल होता जा रहा था दूसरी तरफ देश में राजशाही के खिलाफ माहौल बनता जा रहा था .. इथियोपिया में सूखा पड़ा था .... अनाज की कमी हो गई थी .. भुखमरी बढ़ती जा रही थी... बादशाह हेली सेलसई की सरकार से जनता का भरोसा टूट चुका था ... इथियोपिया में एक क्रांति का माहौल तैयार हो चुका था ...  उस वक्त कोई नहीं जानता था कि आने वाले वक्त मे क्या होने वाला है .,.. 
1974 में इथियोपिया में हुए तख्तापलट में में बादशाह हेली सेलसई को सत्ता से उखाड़ फेंका गया ... और देश में अतनाफु अबाते नाम के एक सैनिक की अगुआई में सेना की सरकार बन गई ... इथियोपिया की सेना को डर्ग कहा जाता था ... 1975 में मेनगिस्तु अतनाफु अबाते की तरह सेना यानि डर्ग का डिप्टी चेयरमैन बन गया था हालांकि सेना में जनरल रैंक के कई लोग मेनगिस्तु को परेशानी खड़ा करने वाले सैनिक के तौर पर जानते थे... जो अनुशासन में रहना पसंद नहीं करता था ... 1975 में इथियोपिया के सम्राट रहे हेली सेलसई की हत्या कर दी गई ... कहा जाता है कि मेनगिस्तु ने ही तकिए से उनका दम घोंटकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया था ... 
मेनगिस्तु पर सम्राट रहे हेली सेलसई की हत्या के आरोप लगत रहे लेकिन मेनगिस्तु ने कभी भी इस अपराध को confess नहीं किया... उस वक्त इथियोपिया में कई तरह के समूह बने हुए थे ... सब अपने अपने स्तर पर सम्राट हेली सेलसई के खिलाफ काम करते रहे थे लेकिन सत्ता डर्ग यानि मिलिट्री के हाथ में आ गई थी ... डर्ग को सोवियत संघ का समर्थन मिला हुआ था लिहाजा इथियोपिया की सत्ता पर अब कम्युनिस्ट काबिज हो चुके थे .. डर्ग के सत्ता में आते ही मेनगिस्तु ने विरोधियों के खिलाफ काम करना शुरू किया ... कहते हैं 1974 में मेनगिस्तु ने सम्राट के शासनकाल में अधिकारी रहे 61 लोगों की हत्या करा दी थी ...इतना ही नहीं आने वाले सालों में मेनगिस्तु ने डर्ग के सहारे कई अधिकारियों और विरोधियों के मौत के घाट उतरवाया .... डर्ग के सैनिकों ने बाद में इस नरसंहार का खुलासा करते वक्त कहा था कि मेनगिस्तु हाइले मरियम ने पूरी प्लानिंग के साथ ये हत्याएं कराईं थीं . हालांकि मेनगिस्तु ने कभी भी ये कबूल नहीं किया.. 
मेनगिस्तु अभी तक डर्ग में नंबर 2 की तरह काम कर रहा था लेकिन इथियोपिया में सिविल वॉर जैसे हालात थे ... एक तरफ थी इथियोपिया की नई बनी मिलिट्री जनता कम्युनिस्ट गवर्नमेंट तो दूसरी तरफ थे सरकार विरोधी विद्रोही ... 1977 में ब्रिगेडियर रहे तफारी बंती की हत्या हो गई थी .. इस हत्या के बाद में डर्ग में आपस में संघर्ष हुआ ... एक तरफ था मेनगिस्तु तो दूसरी तरफ था अब तक उसका करीबी अनताफु अबाते ... ये दोनों ही डिप्टी चेयरमैन रहे थे ... इस लड़ाई में मेनगिस्तु जीत गया जिसका नतीजा ये हुआ कि अनताफु अबाते और उसके वफादार रहे 40 लोगों की हत्या करा दी गई ... अब इथियोपिया की मिलिट्री डर्ग का सबसे पावरफुल शख्स बन गया मेनगिस्तु हाइले मरियम ... इसके बाद इथियोपिया में रेड टेरर का जन्म हुआ ... 
सिविल वॉर से जूझ रहे इथियोपिया में एरित्रिया विद्रोहियों से मेनगिस्तु को सबसे ज्यादा खतरा था... मेनगिस्तु ने डर्ग की मदद से के शिबिर (Qey Shibir)  यानि रेड टेरर अभियान की शुरुआत की ... इसका एक ही मकसद था विद्रोह करने वालों को हर मुमकिन तरीके से खत्म कर देना ...ये भीषण लड़ाई मेनगिस्तु के देश छोड़कर भागने से पहले खत्म नहीं होने वाली थी 
इथियोपिया से मोनार्की खत्म करने और लोकतंत्र की स्थापना करने जैसे इरादों के साथ 1972 में इथियोपियन पीपल्स रिवॉल्यूशनरी पार्टी का गठन किया गया था ..... सम्राट हेली सेलसई को सत्ता से हटाने में इस पार्टी की अहम भूमिका रही थी लेकिन सत्ता पर काबिज होने का इपीआरपी (EPRP) का सपना पूरा नहीं हो पाया था ....  देश की सरकार मेनगिस्तु की अगुआई में डर्ग चला रही थी ... EPRP ने देश के ग्रामीण इलाकों में गुरिल्ला वॉर के जरिए सरकार का विरोध जारी रखा ... इस पर काबू पाने के लिए मेनगिस्तु ने रेड टेरर अभियान की शुरुआत की.... मेनगिस्तु को समाजवादी विचारधारा से जुड़े ऑल इथियोपिया सोशलिस्ट मूवमेंट का सपोर्ट हासिल हो गया था ... 1976 आते आते देश में सिविल वॉर चरम पर था.. मेनगिस्तु और उसके समर्थकों को खत्म करने के लिए EPRP ने अहम लोगों, इमारतों को निशाना बनाना शुरू कर दिया ... इसे व्हाइट टेरर का नाम दिया गया .. खिसियाए मेनगिस्तु ने एक पब्लिक स्पीच दी जिसमें उसने सबके सामने चिल्ला कर कहा .... Death to counterrevolutionaries! Death to the EPRP! य़ानि क्रांति के विरोध में अभियान चलाने वाले लोगों को मौत दो ... EPRP को मौत दो ... कहते हैं इसके साथ ही मेनगिस्तु ने एक के बाद एक तीन बोतलें ज़मीन पर पटक कर तोड़ दी थीं जिसमें लाल रंग भरा हुआ था .. इसके बाद अगले दो साल में इथियोपिया की सड़कों पर लाशें मिलती रहीं जो उसके विरोधियों की थीं ... 
कहते हैं इन हत्याओं के पीछे वार्ड लेवल पर प्रशासन चलाने वाले मेनगिस्तु के लोग थे ... इन्होंने ना सिर्फ हज़ारों लोगों को मौत के घाट उतारा बल्कि इनका शव देने के लिए परिजनों से टैक्स भी वसूला जिसे नाम दिया गया था दी वेस्टेड बुलेट (the wasted bullet) .. 1977 में स्वीडन की सेव दी चिल्ड्रेन संस्था के मुताबिक इथियोपिया में उस दौरान 1000 से ज्यादा बच्चे भी मारे गए थे जिनके शवों को राजधानी अदीस अबाबा की सड़कों पर फेंक दिया गया था .. एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक इथियोपिया में मेनगिस्तु के चलाए रेड टेरर अभियान में 2 साल के अंदर 50 हज़ार से ज्यादा लोगों की हत्या कर दी गई थी .. 
70 के दशक में मार्क्सवाद और लेनिनवाद काफी लोकप्रिय हो चुका था ... ज्यादातर देशों में राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी पार्टियां इनकी नीतियों के मुताबिक काम कर रही थी .. इथियोपिया में इसकी शुरुआत मेनगिस्तु हाइले मरियम ने की थी ... सत्ता में आते ही उसने लैंड रिफॉर्म शुरू कर दिया ... ग्रामीण इलाकों की जमीनों पर भी सरकारी कब्जा हो गया ... देश विदेश की सारी कंपनियों पर भी सरकारी नियंत्रण हो गया .... यहां तक कि सरकार ने निजी व्यवसाय, बैंक, इंश्योरेंस कंपनियों, रीटेल बिजनेस पर भी सरकार ने कब्जा कर लिया ... सरकार ने ये सारी संपत्ति ब्यूरोक्रेसी के नियंत्रण में दे दी.. एग्रीकल्चर प्रॉडक्ट भी अब फ्री मार्केट का हिस्सा नहीं रह गए थे ...इनकी खरीद बिक्री का जिम्मा ने सरकार ने अपने नियंत्रण में कर लिया था .. 
सिविल वॉर, अनियंत्रित आर्थिक नीतियों ने 1983 में इथियोपिया में अकाल को जन्म दिया ... ये अकाल इस सदी का सबसे भीषण अकाल साबित हुआ ... लोग भूखों मरने लगे ... दो वक्त के खाने के लिए जंग छिड़ गई ... नतीजा ये हुआ 1985 तक इस अकाल ने लगभग 12 लाख लोगों की जान ले ली... चार लाख लोगों ने देश छोड़ दिया .. करीब 25 लाख लोग अपने ही देश में बेघर हो गए और करीब 2 लाख बच्चे अनाथ हो गए ... 
1984 में मेनगिस्तु की अगुआई में डर्ग ने वर्कर्स पार्टी ऑफ इथियोपिया बनाई थी ... जिसके जरिए अब वो देश में सरकार चलाने वाला था ... मेनगिस्तु इसका जनरल सेक्रेट्री बन गया... 1985 में इसने देश में सोवियत से प्रभावित नया संविधान लागू कर दिया और पार्टी का नाम बदलकर पीपुल्स डेमोक्रैटिक रिपब्लिक ऑफ इथियोपिया रखा .. मेनगिस्तु पार्टी प्रेसीडेंट बन चुका था और कहने को देश में लोकतांत्रिक सरकार थी ... लेकिन मेनगिस्तु की तानाशाही का बहुत जल्द अंत होने वाला था 
मेनगिस्तु को सोवियत का समर्थन मिला हुआ था .. उसने 1977 से 1984 के बीच 7 बार सोवियत संघ की यात्रा की थी ... वो क्यूबा के तानाशाह फिदेल कास्त्रो और जिम्बाब्वे के तानाशाह रॉबर्ट मुगाबे से बहुत प्रभावित था ... डेमोक्रैटिक सरकार के गठन के बावजूद उसने कार्यपालिका और विधायिका की तमाम शक्तियां अपने पास रखी थीं लेकिन ये ज्यादा दिन तक नहीं चलने वाला था 
1989 में एरित्रियन वॉर ऑफ इनडिपेंडेंस शुरू हो गया... इस युद्ध में मेनगिस्तु की सेना हार गई .. 15 हज़ार लोग मारे गए ... एक साल बाद एक और युद्ध हुआ इसमें मेनगिस्तु को हार मिली .. आंतरिक तौर पर मेनगिस्तु काफी कमजोर हो चुका था 1989 में इथियोपिया में तख्तापलट की असफल कोशिश हुई ..... आखिरकार दो साल बाद Ethiopian People’s revolutionary Front ने  मेनगिस्तु को देश छोड़कर भागने पर मजबूर कर दिया ... इथियोपिया फर्स्ट का नारा देकर देश में तख्तापलट के जरिए सत्ता में आए मेनगिस्तु हाइले मरियम को तख्तापलट के जरिए देशनिकाला मिल गया .. जिम्बाब्वे ने मेनगिस्तु को शरण दे दी ... जहां उसे मारने की असफल कोशिश भी हुई ... इथियोपिया की नई सरकार ने मेनगिस्तु को नरसंहार का दोषी माना.. उसपर मुकदमा भी चलाया गया .. 2006 में उसे दोषी मानते हुए इथियोपिया की अदालत ने मौत की सज़ा सुनाई लेकिन जिम्बाब्वे से प्रत्यर्पण नहीं होने की वजह से बूढा हो चुका मेनगिस्तो हाइले मरियम अभी भी ज़िंदा है ..

सोमवार, 27 जुलाई 2020

china

पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ने माओ जेंदोग के विनाशकारी राज के बाद नीतियों में बदलाव किए थे ताकि कोई भी इतने लंबे समय तक सत्ता पर निरंकुश शासन ना कर सके ... लेकिन जब शी जिनपिंग चीन के संविधान में बदलाव कर खुद को आजीवन राष्ट्रपति बना लिया तो ये सवाल उठने लगे कि चीन तानाशाही की तरफ बढ गया है ... और शी जिनपिंग आधुनिक दुनिया के तानाशाहों में शुमार हो गए हैं ... चीन की खोखली आंतरिक व्यवस्था भी इसी की गवाही देती है ... 
चीन के मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग दुनिया के सबसे ताकतवर लोगों में से एक हैं ...माओ जेदोंग के बाद चीन में अब तक के सभी नेताओं में शी जिनपिंग दूसरे सबसे ताकतवर नेता माने जाते हैं... ऐसा कम लोगों को पता होगा कि शी जिनपिंग के पिता शी जॉन्गशुन एक क्रांतिकारी थे और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना के बाद उन्होंने माओ जेदोंग की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना में कई अहम पदों पर काम किया था ... 
1953 में जन्मे शी जिनपिंग के लिए बचपन आरामदेह था....10 साल की उम्र तक शी जिनपिंग ने बीजिंग में अच्छे स्कूलों में पढ़ाई की थी और यहीं पर ल्यू हे से शी जिनपिंग की दोस्ती हुई थी जो अब तक बरकरार है .. ल्यू हे चीन के अर्थशास्त्री हैं और वर्तमान में पोलित ब्यूरो के सदस्य हैं.. 1960 में चीन में हुए राजनीतिक उथल- पुथल का शी जिनपिंग के परिवार पर खासा असर पड़ा था ... माओ जेदोंग की विफल रही नीतियों की वजह से चीन की हालत बुरी हो चुकी थी .. पार्टी पर जेदोंग की पकड़ कमजोर हो गई थी .. लिहाजा अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने और देश को एक बार फिर कब्जे में करने के लिए माओ जेदोंग ने कल्चरल रिवॉल्यूशन की शुरुआत कर दी .. शी जिनपिंग के पिता शी जॉन्गशुन भी माओ जेंदोंग के पॉलिटिकल पर्ज (Political Purge) का शिकार हो गए ... लिहाजा 1963 आते आते शी जिनपिंग के पूरे परिवार को बीजिंग छोड़कर सुदूर गाँवों में जाकर छिपना पड़ा .. जहां पूरा परिवार गुफा में रहा करता था .. 
चीन में सांस्कृतिक क्रांति 1966  से लेकर 1976 तक चली थी ...क्रांति के नाम पर बुद्धिजीवियों पर कहर ढाया जा रहा था ... विरोध करने वाले मौत के घाट उतारे जा रहे थे ... पुरानी संस्कृति, पुरानी विचारधारा, पुराने रीति रिवाज और पुरानी परंपराओं को खत्म करने  के चेयरमैन माओ की सनक को पूरा करने में उसके रेड गार्ड्स लगे हुए थे ... इनकी कारस्तानियों से गुफा में छुपकर रह रहा शी जिनपिंग का परिवार भी बच नहीं पाया ... मां पर जिनपिंग के पिता को क्रांति विरोधी होने का दबाब डाला गया.. बाद में इसी आरोप में पिता को जेल में डाल दिया गया ... बड़ी बहन ने खुदकुशी कर ली और शी जिनपिंग को 15 साल की उम्र में दूर के किसी गाँव में काम करने को भेज दिया गया ... 
शी जिनपिंग इस दौरान लगातार कम्युनिस्ट यूथ लीग ऑफ चाइना से जुड़ना चाहता था ...कहते हैं 7 बार इसमें फेल रहने के बाद आखिरकार 1971 में किसी तरह शी जिनपिंग इसमें कामयाब हो गया और 1974 आते आते शी जिनपिंग देश की सत्तारूढ पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना का सदस्य बनने में भी कामयाबी हासिल की... कहते हैं शीन जिनपिंग ने 1973 से लेकर 1974 के बीच कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना से जुड़ने के लिए 10 बार एप्लीकेशन दी थी .. ये वही वक्त था जब चीन में माओ जेदोंग की सास्कृतिक क्रांति खत्म होने के कगार पर थी और माओ जेदोंग का भी अंत नजदीक आ चुका था... 
शी जिनपिंग ने 1975  से लेकर 1979 तक शिन्हुआ युनिवर्सिटी में केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी लेकिन कहते हैं इसी दौरान शी जिनपिंग मार्क्सवाद, लेनिनवाद और माओवाद की पढ़ाई भी करता रहा .. शी जिनपिंग के ये साल आगे चलकर चीन की राजनैतिक दिशा तय करने वाले थे  
शी जिनपिंग ने पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत चीन के सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के जेनरल सेक्रेटरी रहे गेंग ब्याओ के सेक्रेटरी के तौर पर की ... यहीं से शी जिनपिंग को मिलिट्री के बारे में पता चला ... शी जिनपिंग ने एक डेलीगेट के तौर अमेरिका में भी कुछ दिन बिताए ..जहां शी जिनपिंग एलेनोर ड्वोरचाक के घर में कुछ दिन रहे थे.... इन दोनों ही बातों ने शी जिनपिंग के व्यक्तित्व पर असर डाला ... 
1998 से लेकर 2002 तक शी जिनपिंग ने मार्क्सिस्ट (Marxist Theory) की भी पढ़ाई की ... इस दौरान शी जिनपिंग फुजियान के गवर्नर बना दिए गए ..  2002 में शी जिनपिंग फुजियान से निकलकर झेझियांग (Zhejiang) पहुंच गए जहां आने वाले 5 साल तक उन्होंने पार्टी चीफ के तौर पर काम किया .. इस दौरान शी जिनपिंग की इमेज एक इमानदार नेता की बनी .... 2008 में शी जिनपिंग को वाइस प्रेसीडेंट बना दिया गया था ... अगले चार साल में शी जिनपिंग ने दुनिया भर का दौरा कर राष्ट्रपति बनने की रिहर्सल कर ली... 2009 में शी जिनपिंग ने मेक्सिको में एक कार्यक्रम में अपनी सोच की एक झलक दी थी जिसमें उन्होंने कहा था  ‘दुनिया की कुछ बेहतर अर्थव्यवस्था वाले देशों के लोगों के पास हमारी नीतियों पर सवाल उठाने के अलावा कोई काम नहीं है ... चीन कभी क्रांति, गरीबी और भुखमरी का निर्यात नहीं करता .. कभी आपके लिए मुश्किलें खड़ी नहीं करता आप क्यों चीन की आलोचना करते रहते हो ...’
2012 में शी जिनपिंग चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेता बने..... हू जिंताओ के उत्तराधिकारी के रूप में नवंबर 2012 में उन्हें चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव बनाया गया... वो कम्युनिस्ट पार्टी के तमाम खेमों के आम सहमति से चुने गए नेता थे.... लेकिन किसी को भी ये अंदाज़ा नहीं था कि अगले पांच सालों में वो कैसे नेता बनकर उभरने वाले हैं.... मार्च 2013 में शी जिनपिंग ने चीन का राष्ट्रपति पद संभाला.....  इसके पहले पार्टी प्रमुख का पद स्वीकार करने के बाद अपने भाषण में शी ने कहा था, ‘‘पार्टी के पास कई बड़ी चुनौतियां हैं और ऐसी कई परेशानियां हैं पार्टी के भीतर जिन्हें सुलझाना होगा, खास तौर से भ्रष्टाचार, लोगों से अलग होना और नौकरशाही, जिसे कुछ पार्टी अधिकारियों की वजह से बढ़ावा मिला है.’’
इसके बाद से शी जिनपिंग ने अपने इन्हीं कथनों पर काम किया.... सत्ता संभालते ही शी जिनपिंग ने भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करना शुरू किया.. कई ऊंचे पदों पर काम करने वाले अधिकारियों और स्थानीय कर्मचारियों पर शिकंजा कसा गया .... कहते हैं इसका मकसद अपने सारे राजनीतिक विरोधियों का सफाया था ...इसमें चाऊ योंगकांग भी शामिल थे जो कभी चीन के अर्धसैनिक बलों, जेलों और खुफिया ऑपरेशन के अगुआ हुआ करते थे..... हालांकि चाऊ के हिमायती कहते हैं कि पार्टी में शी जिनपिंग के विरोधी रहे चाऊ को बड़ी ही सफाई से निपटा दिया गया ... 
कहते हैं भ्रष्टाचार पर रोक के नाम पर पार्टी के हर नेता के दफ्तर के साइज़ से लेकर नेताओं के लंच या डिनर में इस्तेमाल होने वाले बर्तनों की संख्या को लेकर भी शी जिनपिंग ने नियम बना दिए.... लेकिन इस दौरान शी जिनपिंग के कई रिश्तेदार अमीर होते चले गए ... हालांकि ये किसी तरह साबित नहीं किया जा सका कि इसमें शी जिनपिंग की कोई भूमिका रही.. 
शी जिनपिंग जब बड़े हो रहे थे तो चीन विनाशकारी आंदोलन के दौर से गुजर रहा था ... माओ के उस सांस्कृतिक क्रांति की मार शी जिनपिंग के पूरे परिवार पर पड़ी थी ... शायद इसीलिए जिनपिंग किसी आंदोलन को पसंद नहीं करते ... लेकिन इसी बात ने शी जिनपिंग को माओ जेदोंग से ज्यादा खतरनाक बना दिया है ... 
कहते हैं कि चीन में आज भी माओ और उसकी क्रांति के खिलाफ आवाज़ उठाना गुनाह है .. माओ की नीतियों की वजह से करोड़ो लोग मारे गए लेकिन शी जिनपिंग की सत्ता इसके खिलाफ बोलने वालों को सबक सिखाती है .. शी जिनपिंग खुद को माओ का वारिस समझते हैं .. शी के तानाशाही रवैयों का निशाना उनके अपने करीबी भी होते हैं ... कहते हैं रिसर्च स्कॉलर शू झियोंग को सिर्फ इसीलिए देशद्रोह के आरोप में जेल में डाल दिया गया क्योंकि उसने बेघर और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए लोगों के हितों की वकालत शुरू कर दी थी... जेल से कुछ साल शू रिहा हो गया था लेकिन तब से अभी तक उसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली .. 
कई बार तो ऐसे लोगों को सज़ा सुनाने से पहले मुकदमों का टीवी पर सीधा प्रसारण किया गया ... लोगों ने अपनी ग़लतियां पूरे देश के सामने मानीं....  शी जिनपिंग के राज में कई नेता और कारोबारियों के लापता होने की खबरें आती रही हैं । मुसलमान, ईसाई, मज़दूर कार्यकर्ता, ब्लॉगर, पत्रकार वक़ीलों की गिरफ्तारी होती रही है । 
शी जिनपिंग अक्सर अपने देश के लोगों को ..नेशन फर्स्ट की थ्योरी समझाते नज़र आते हैं .,... उन्हें सलाह देते हैं कि वो देश से प्यार करें.... चीन की संस्कृति और जीवन मूल्यों को जानें-समझें....
चीन में इंटरनेट के इस्तेमाल पर भी काफी पाबंदी है... कहते हैं कि शी जिनपिंग ने अरब देशों में चल रही क्रांति के वक्त ही चीन की सत्ता संभाली थी ऐसे में इंटरनेट के जरिए ऐसी किसी भी क्रांति के पैदा हो जाने से जिनपिंग डरते हैं ... 
बराक ओबामा और शी जिनपिंग की तस्वीर के सामने आने और उस पर हुए कमेंट्स के बाद से चीन में इंटरनेट के इस्तेमाल पर पाबंदियां और कड़ी कर दी गई हैं ... इस तस्वीर में जिनपिंग और ओबामा की चहलक़दमी की तुलना, कार्टून कैरेक्टर विनी द पू से की गई थी... चीन में 75 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं....  ये तादाद यूरोप और अमरीका में मिलकर इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों से ज़्यादा है.... लेकिन जिनपिंग इस पर काबू रखना चाहते हैं वो भी तब शी जिनपिंग का सपना चीन को साइबर सुपरपावर बनाने का है ... 
इंटरनेट की सुविधा देने वाले और सोशल मीडिया साइट पर सख्ती से सेंसर लागू किया जाता है..... कोई भी फर्जी खाता बनाकर चीन में सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं कर सकता.... साइबर सुरक्षा को शी जिनपिंग देश की सुरक्षा का मुद्दा बना चुके हैं ... इसीलिए इस पर बड़े पैमाने पर सरकारी निवेश भी किया जा रहा है ... 
चीन में नागरिकों को वफादार बनाने की मुहिम चलाई जा रही है ... इसीलिए यूनिवर्सिटी में कम्यूनिस्ट पार्टी की पहुंच बढ़ाई जा रही है....  क़िताबों में से पश्चिमी सभ्यता के निशान मिटाए जा रहे हैं... निजी कंपनियों में भी कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता की शाखाएं खोली जा रही हैं... 
मीडिया पर चीन की पाबंदी जगजाहिर है ... चीन के बारे में जानकारी सिर्फ सरकारी न्यूज एजेंसी सिन्हुआ देती है ... यहां प्रेस की आज़ादी...आम लोगों के अधिकारों .. और स्वतंत्र अदालतों की बात करने की मनाही है ... आंतरिक विरोधों की खबरें दबा दी जाती हैं... राष्ट्रपति के फैसले लेने की प्रक्रिया को अपने हाथ तक सीमित कर चुके हैं....  देश का हर फैसला वही होता है जो शी जिनपिंग चाहते हैं... .शायद इसीलिए ब्रिटेन की इकोनॉमिस्ट पत्रिका ने एक बार शी जिनपिंग को "चैयरमैन ऑफ एवरीथिंग" कहा था .. 
चीन में ह्यूमन राइट्स को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं ... ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक चीन ने ऐसी नीतियां बनाई हैं जिसमें लोगों की आलोचना को दबाने के लिए आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है ...जिनमें चीन के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र शिनचियांग में उइगुर मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों ने चीन में मानवाधिकारों पर और गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं .. ह्यूमन राइट्स वॉच ने 2020 में जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के तहत चीनी सरकार घरेलू मानवाधिकार सक्रियता को "अस्तित्ववादी खतरे" के रूप में देखती है.. 
शी जिनपिंग को विरासत  में एक ताकतवर चीन मिला है ..शी जिनपिंग ने इसका मुजाहिरा करने में कोई कसर भी नहीं छोड़ी है लेकिन चमक दमक के पीछे कई आर्थिक दिक्कतें भी हैं .. चीन की विकास की रफ्तार धीमी हो रही है ... अब तक अपने जोर जुल्म पर शी जिनपिंग आर्थिक तरक्की का मुलम्मा चढ़ाते आए हैं लेकिन आने वाली राह बहुत कठिन साबित होने वाली है .. वो भी तब, जब दुनिया के तमाम देश चीन की नीतियों पर शक की निगाह से देख रहे हैं ...

शनिवार, 25 जुलाई 2020

north korea

उत्तर कोरिया के सनकी तानाशाह किम जोंग उन पर दुनिया के तमाम शक्तिशाली देशों की नज़रें टिकी रहती हैं ... कई तरह के आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद किम ने अपने विध्वंसक हथियारों की टेस्टिंग नहीं रोकी है ... दूसरी तरफ देश में मानवाधिकारों के हनन की बातें सार्वजनिक होती जा रही हैं ... हद ये है कि मानवाधिकार उल्लंघन की आलोचना पर किम जोंग उन संयुक्त राष्ट्र परिषद को भी धमकी देने से नहीं चूकता ... डेमोक्रैटिक पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया के आधिकारिक नाम वाले नॉर्थ कोरिया में कभी से कोई डेमोक्रैसी नहीं रही फिर चाहे सत्ता किम जोंग उन के दादा के हाथ में रही हो या फिर किम के पिता के हाथ में....  किम जोंग उन ने भी जनता के लिए अपने खानदानी रवैये को बरकरार रखा है ... 
नॉर्थ कोरिया एक देश के तौर पर 9 सितंबर 1948 को अस्तित्व में आया था ... 1910 में कोरिया साम्राज्य पर जापाना ने कब्जा कर लिया था... सेकेंड वर्ल्ड वॉर में जापान की हार के बाद कोरिया आज़ाद हो गया ... इस के दो हिस्से हुए नॉर्थ कोरिया और साउथ कोरिया ... नॉर्थ कोरिया आधिकारिक तौर पर खुद को समाजवादी राज्य बताता है लेकिन 1948 में स्थापना के बाद से ही इस देश पर एक परिवार का ही शासन रहा है ... नॉर्थ कोरिया के पहले प्रीमियर बने किम इल सुंग .. सुंग ने लगभग 50 साल तक कोरिया पर राज किया .. जिसके बाद सत्ता 1994 में किम जोंग इल के हाथों में आ गई थी .. किम जोंग इल  के कार्यकाल में नॉर्थ कोरिया ने सदी का सबसे भयंकर अकाल देखा था जिसमें एक अनुमान के मुताबिक लाखों लोग मारे गए थे ... मौजूदा किम जोंग ने 2011 में सत्ता संभाली ... नॉर्थ कोरिया पर राज करने वाले इन तीनों नेताओं को बेरहम तानाशाह माना जाता है .. जिनके कार्यकाल में नॉर्थ कोरिया पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा खतरनाक देशों में गिना जाता रहा है ... 
किम जोंग उन उत्तरी कोरिया पर राज करने वाले अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी है .. उत्तरी कोरिया की सरकारी मीडिया के मुताबिक किम जोंग का जन्म 8 जनवरी 1982 को हुआ था ... जबकि कोरिया के इंटेलीजेंस ऑफीसर के मुताबिक किम जोंग उन का जन्म 1983 में हुआ था .,.. हालांकि अमेरिका के एक सरकारी विभाग के मुताबिक किम जोंग 1984 में पैदा हुआ था ... ये इतना विवाद इसीलिए क्योंकि उत्तरी कोरिया में हर सूचना छांट कर, जांच परखकर दी जाती है .. इसीलिए किम जोंग उन के जन्म साल को लेकर भी कई तरह की बातें कही जाती हैं ... किम जोंग उन के तीन भाई बहनों में ये दूसरी संतान था ... हालांकि किम जोंग का एक सौतेला भाई भी हुआ करता था जो इन सबसे बड़ा था और उत्तरी कोरिया के नियम कायदों के मुताबिक किम जोंग इल की मौत के बाद सत्ता उसी के हाथ में आनी चाहिए थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ ... शायद इसीलिए कि तानाशाही के लिए जिन गुणों की ज़रूरत थी वो सब किम जोंग उन में थीं ... 
किम की स्कूली शिक्षा स्विट्ज़रलैंड में हुई थी ... और उसके स्कूल में साथ पढ़ने वाले लोगों के मुताबिक किम जोंग उन काफी शर्मीला और पढ़ने में ठीक ठाक था ... उसे बास्केटबॉल खेलने का शौक था और राजनीति में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी ... किम के बचपन के इन दिनों के बारे में कई तरह की रिपोर्ट्स आती रही हैं ..कभी भी किसी की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई ..स्विटज़रलैंड से साल 2000 में किम जोंग उन वापस बुला लिया गया था .. जिसके बाद उसने उत्तरी कोरिया की राजधानी प्योंगयांग में अपने दादा के नाम पर बने मिलिट्री स्कूल में दाखिला ले लिया था ... कहते हैं तभी से इसके कोरिया के अगले तानाशाह के तौर पर ताजपोशी होनी तय हो गई थी ... 2011 में पिता की मौत के बाद किम जोंग उन ने महज 27 साल की उम्र में सत्ता संभाल ली थी .. 
कहते हैं कि 2001 तक उत्तरी कोरिया में ऐसा लगता रहा था कि किम जोंग उन का सौतेला भाई किम जोंग नाम ही देश का अगला शासक होगा लेकिन ऐसा नहीं हो पाया था .. 2001 में फेक पासपोर्ट पर जापान जाने की कोशिश करते हुए पकड़े जाने के बाद किम जोंग नाम को देशनिकाला दे दिया गया था ... बाद में किम जोंग नाम ने कहा था कि उसे तानाशाही नीतियों के खिलाफ बोलने की सज़ा दी गई .. 2017 में किम जोंग नाम क्वालालंपुर एयरपोर्ट पर हुए रसायनिक हमले में मारा गया था ...इसकी साजिश किम जोंग उन के कहने पर ही रची गई थी ... जिस दिन किम जोंग नाम की मौत हुई उस दिन उसके पास से 1,20,000 डॉलर कैश मिला था ... कहते है कि किम जोंग नाम अमेरिका की सीक्रेट एजेंसी सीआईए के लिए काम करता था ... इसका खुलासा किम जोंग उन पर लिखी गई एक किताब the great successor  में पत्रकार और लेखिका एना फाइफील्ड ने किया .. एना के मुताबिक किम जोंग उन का आलोचक रहा किम जोंग नाम सीआईए को उससे जुड़ी जानकारियां दिया करता था.. इसीलिए उसकी हत्या करा दी गई थी ... लेकिन अपने विरोधियों या रिश्तेदारों की हत्या करवाने में किम जोंग उन के शामिल होने का ना तो पहला मामला था ना ही आखिरी होने वाला था ... 
2011 में किम जोंग उन 27 साल की उम्र में नॉर्थ कोरिया का लीडर बन गया था ... सत्ता संभालने के बाद  कई साल तक किम जोंग उन ने अपने खानदान के दिखाए रास्ते पर चलकर ही देश पर शासन करना शुरू कर दिया था .... इनमें विरोधियों को मरवाने, मीडिया को पूरी तरह कंट्रोल करने और मनमाने हुक्म देने जैसी चीजें शामिल हैं 
कहते हैं कि किम जोंग उन ने सत्ता संभालने के बाद ऐसे सारे लोगों को मौत के घाट उतार दिया था जिससे उसकी सत्ता को खतरा हो सकता था ...एक रिपोर्ट के मुताबिक 2017 आते आते 340 लोगों की हत्या कराई .. इसमें किम के अपने फूफा गैंग सोंग थाएक भी शामिल था ... गैंग सोंग थाएक की हत्या काफी दिनों तक सुर्खियां बनता रही थीं ...गैंग उत्तरी कोरिया के नेशनल डिफेंस कमीशन का वाइस चेयरमैन रह चुके थे जो किम के पिता की तबीयत खराब होने पर देश के सुप्रीम लीडर के तौर पर काम कर रहे थे .. किम जोंग उन के सत्ता संभालने के बाद दो साल तक गैंग सोंग थाएक ने किम के मुख्य सलाहकार के तौर पर काम किया था .. अचानक एक दिन गैंग सोंग थाएक पर सत्ता विरोधी होने के आरोप लगाए गए और इसके कुछ ही दिन बाद 2013 के दिसंबर में थाएक को मौत की सज़ा  दिए जाने की खबरें दुनिया भर में सुर्खियां बन गई थीं .. खबरें आईं कि थाएक को भूखे कुत्तों के सामने छोड़ दिया गया था.. कहा जाता है कि थाएक के साथ साथ उनके परिवार के कई सदस्यों की भी हत्या कर दी गई थी ... 
किम जोंग उन पर छोटी से छोटी बातों पर हत्या की सज़ा दिए जाने के आरोप लगते रहे हैं .. दक्षिण कोरिया की खुफिया एजेंसी ने एक बार खुलासा किया था कि किम की पार्टी के 10 कार्यकर्ताओं को सिर्फ इसलिए गोलियों से भून दिया गया था क्योंकि वो दक्षिणी कोरिया का टीवी कार्यक्रम देखते थे और घूस लिया करते थे... इस एजेंसी ये भी दावा किया था किम ने एक साल में 50 से ज्यादा अधिकारियों की हत्या करा दी थी .. 
किम जोंग उन को विरासत में एक ऐसा देश मिला था जिस पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तमाम तरह की पाबंदियां लगी हुई थीं ... उत्तर कोरिया पर 2006 से ही संयुक्त राष्ट्र ने प्रतिबंध लगा रखा था ... बैलिस्टिक मिसाइल, पांच परमाणु परीक्षण और लंबी दूरी की मिसाइल के परीक्षणों के बाद संयुक्त राष्ट्र ने कदम उठाया था ...इसके बावजूद किम जोंग उन इस तरह के परीक्षण नहीं रोके ..सत्ता संभालने के बाद महज 9 साल में किम ने 80 से ज्यादा मिसाइलों का परीक्षण किया ... 
इसके बाद भी किम जोंग उन रुका नहीं है... भले ही संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका के दवाब में किम जोंग ने परमाणु कार्यक्रम रोकने पर सहमति जताई है लेकिन ये सब बहुत बड़ा झूठ साबित हुआ है ... उत्तर कोरिया में किम जोंग उन की मौजूदगी में बैलिस्टिक मिसाइल टेस्ट होते रहे हैं .. कहते हैं कि उत्तर कोरिया के पास ऐसे हथियार हैं जो पूरे अमेरिका को एक बार में तबाह कर सकते हैं ... इतना ही नहीं उत्तर कोरिया हिरोशिमा में गिराए गए परमाणु बम से 16 गुना ज्यादा शक्तिशाली बम का भी परीक्षण कर चुका है ... 
दुनिया के बाकी देश जहां परमाणु हथियारों को खत्म करने पर सहमति बना चुके हैं ... नॉर्थ कोरिया एक मात्र ऐसा देश है जिसने इस सदी में परमाणु हथियारों का परीक्षण करता आया है .... एक्सपर्ट्स के मुताबिक ये एक ऐसा मसला है उत्तर कोरिया की जनता को शक्तिशाली और सुरक्षित होने का अहसास दिलाती है ... वहीं लोग ये भी कहते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय दवाब में परमाणु हथियार हटाने वाले लीबिया के तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी की सरेआम हत्या की घटना को देखने के बाद किम जोंग उन कभी भी अपने परमाणु हथिय़ारों को खत्म नहीं करने जा रहा .. 
किम जोंग ने 2011 में सत्ता संभालने के बाद कुछ बदलाव के संकेत दिए थे ... किम ने खुद की एक उदार छवि दिखाने के लिए 2012 में मोरानबोंग बैंड के एक म्यूजिकल कंसर्ट में हिस्सा लिया ... इसी साल नॉर्थ कोरिया के एक मिसाइल परीक्षण फेल हो जाने पर किम ने पहली बार सार्वजनिक मंच पर इसे कबूल किया .. इतना ही नहीं देश में भी बदलाव दिखने लगे थे तभी किम के पिता के शेफ रह चुके जापानी मूल के केंजी फूजीमोतो ने उत्तरी कोरिया की अपनी विजिट के दौरान कहा था किम जोंग उन के सत्ता में आने के बाद से उत्तरी कोरिया काफी बदल गया है .. लेकिन क्या सच में ऐसा हो पाया था ... 
आर्थिक तौर पर उत्तरी कोरिया में बहुत बड़े बदलाव आ गए हों ऐसा नहीं लगता ... उत्तरी कोरिया की राजधानी प्योंगयांग में आसमान छूने वाली ऊंची ऊंची इमारतें हैं और पहली नज़र में चारों तरफ समृद्धि नज़र आती है लेकिन ऐसे कोई दस्तावेज नहीं हैं  जो ये साबित करें कि उत्तरी कोरिया में रह रहा आम आदमी समृद्ध हो और एक अच्छी जिंदगी जी रहा हो .. 
2013 में किम जोंग उन ने कहा था कि North Koreans will never have to tighten his belt again .. किम दरअसल अपने लोगों को ये संदेश देना चाहता था कि उनकी जिंदगी बेहतर होने वाली है .. इसके बाद किम अक्सर फैक्ट्रियों और दुकानों में नज़र भी आने लगा ... लेकिन इससे क्या बदलाव हुए ये कहा नहीं जा सकता ... उत्तर कोरिया किसी भी तरह का आर्थिक डेटा नहीं देता ... एक दावे के मुताबिक 1960 के दशक से लेकर अभी तक उत्तर कोरिया ने कोई आर्थिक डेटा पब्लिश नहीं किया है.... दक्षिण कोरिया का सेंट्रल बैंक सरकारी और इंटेलिजेंस से जुटाई जानकारी के आधार पर उत्तर कोरिया की जीडीपी के आंकड़े जारी करता है... जिसके मुताबित साल 2017 में उत्तर कोरिया का ग्रोथ रेट बीते 20 सालों में सबसे खराब रहा था ... शायद इसीलिए किम जोंग उन में देश पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को खत्म कराने की बेचैनी दिखने लगी थी ... 
इसीलिए कभी अमेरिका के राष्ट्रपति रहे बराक ओबामा को बंदर कहने वाले किम जोंग उन मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से नजदीकियां बढाने की कोशिश करने लगा था.. लेकिन परमाणु हथियारों के मसले पर ऐसा नहीं हो सका ...और किम जोंग उन ने डोनाल्ड ट्रंप को Depraved और stupid करार दिया.... किम जोंग उन ने साउथ कोरिया से भी रिश्ते सुधारने की कोशिश की और पहली बार नॉर्थ कोरिया के नेता के तौर पर धुर विरोधी माने जाने वाले साउथ कोरिया की जमीन पर भी गया ..
नॉर्थ कोरिया पर तमाम तरह के आर्थिक प्रतिबंधों के बीच चीन ने हमेशा उत्तरी कोरिया के लिए अपने बाज़ार खोले रखे .. इस मामले में सिर्फ चीन के साथ ही किम जोंग उन के रिश्ते सही रहे ... किम ने 2018 में अपने निजी ट्रेन से चीन की यात्रा की .. 
इन सबके बीच आम आदमी के अधिकारों के हनन को लेकर भी किम जोंग उन सुर्खियों में बना रहा 
डेमोक्रेसी इंडेक्स में आज भी नॉर्थ कोरिया सबसे निचले पायदान पर यानि 167 देशों में सबसे नीचे आता है .. कनाडा की ह्यूमन राइट्स के लिए काम करने वाली एक संस्था हान व्यॉएस के मुताबिक नॉर्थ कोरिया में 99 फीसदी लोगों के पास ना तो पर्याप्त भोजन है ना ही पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं ... इनके पास आय के भी साधन मौजूद नहीं हैं .. कहते हैं कि नॉर्थ कोरिया के कानून के मुताबिक सरकार और सेना के अधिकारियों के अलावा यहाँ किसी को भी कार रखने की इजाज़त नहीं है
उत्तरी कोरिया के लोग अंतर्राष्ट्रीय क्या अपने देश में भी यात्राएं करने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं उन्हें इसके लिए सरकार से इजाज़त लेनी होती है .... 
नॉर्थ कोरिया में रेडियो, टीवी लेकर सोशल मीडिया तक सरकार के नियंत्रण में है जिसका इस्तेमाल नॉर्थ कोरिया के नागरिकों को चुनी हुई सूचनाएं देने के लिए किया जाता है .. इतना ही नहीं विदेशी मीडिया को भी सीमित सूचनाएं ही दी जाती हैं ... पत्रकारों को कहीं भी कवरेज के लिए 10 पन्नों के सरकारी गाइडलाइंस का पालन करना पड़ता है ... इंटरनेट के इस्तेमाल पर भी सरकारी पाबंदी लगी हुई है ... कहते हैं कि उत्तरी कोरिया के लोगों को बाहर के देशों में लोगों की जानकारी नहीं होती क्योंकि वहां की मीडिया में सिर्फ उत्तरी कोरिया के बारे में ही दिखाया जाता है .. कहते हैं स्कूल में जो इतिहास पढाया जाता है उसमें किम के दादा को भगवान की तरह बताया गया है .. 
उत्तरी कोरिया के जेलों के बारे में लिखने वाले एक शख्स ने वहां के हालात हिटलर के नाजी कैंप से भी बदतर होने का दावा किया था ... 
किम जोंग उन की तानाशाही शख्सियत का अंदाजा इस बात से लगाइए कि एक बार अमेरिकी कंपनी सोनी पिक्चर्स ने दी इंटरव्यू के नाम से फिल्म बनाई थी जिसकी कहानी किम की शख्सियत से मिलते जुलते तानाशाह की हत्या की साजिश पर आधारित थी ... ये बात किम जोंग उन को पसंद नहीं आई... लिहाजा किम जोंग उन की साइबर सेना सीक्रेट युनिट 121 ने ना सिर्फ सोनी पिक्चर्स के कंप्यूटर हैक किए बल्कि कंपनी की गोपनीय और व्यक्तिगत जानकारियां निकालकर सार्वजनिक कर दीं .. इसी साइबर सेना ने सिनेमा घरों को फिल्म रिलीज करने की सूरत में आतंकी हमले की धमकी भी दी ... आखिरकार फिल्म नेट पर रिलीज की गई ..इसी फिल्म का समर्थन करने पर खिसियाए उत्तर कोरिया ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को बंदर कहा था ... 
इस तानाशाह की नीतियों की वजह से उत्तर कोरिया के आंतरिक हालात के बारे में ज्यादा पता नहीं चल पाता लेकिन दक्षिण कोरिया की मीडिया के हवाले से आंतरिक विद्रोह की खबरें सामने आती रहती हैं ... मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अक्सर दक्षिण कोरिया की सीमा से उत्तर कोरियाई विद्रोहियों गुब्बारे उड़ाते हैं जिन पर तानाशाह किम जोंग उन को भला बुरा कहा जाता है... कई बार गुब्बारों पर अपशब्द भी लिखे होते हैं ... इस बात के लिए किम जोंग उन और उसकी बहन किम यो जॉन्ग ने साउथ कोरिया को जिम्मेदार ठहराते हैं ... 
किम जोंग उन की निजी जिंदगी से जुड़ी सूचनाएं कभी सार्वजनिक नहीं होतीं ... मसलन अभी भी ये विवाद है कि किम जोंग उन और उनकी पत्नी री सोल जू के कितने बच्चे हैं ... कोई एक बच्चा होने की बात करता है तो कोई तीन ... ये कहां हैं और क्या करते हैं इसे रहस्य रखा गया है .. उत्तरी कोरिया में 15 अप्रैल को सालाना होने वाले कार्यक्रम डे ऑफ द सन में किम जोंग उन की गैरमौजूदगी ने उसके बीमार होने की खबरों को हवा दी थी .. लगभद 20 दिन तक किम जोंग नज़र नहीं आया लेकिन कभी भी आधिकारिक तौर पर ये नहीं बताया कि किम जोंग उन कहाँ है ...  दरअसल इस दुनिया में उत्तरी कोरिया एक मात्र ऐसा देश है जहां के राष्ट्राध्यक्ष के बारे में इतने सारे रहस्य सामने आते रहते हैं ..... इन्ही रहस्यों के बूते ये तानाशाह आज भी एक डेमोक्रैटिक कहे जाने वाले देश में सत्ता पर काबिज है ..

मंगलवार, 21 जुलाई 2020

benezuela

लैटिन अमेरिकी देश वेनेज़ुएला 70के दशक में दुनिया के सबसे अमीर देशों में से एक था .. लैटिन अमेरिका के बाकी देशों से अलग यहाँ लोकतांत्रिक सरकार थी ... संवैधानिक नियमों का पालन करते हुए सत्ता चल रही थी .. वेनेजुएला के राजनैतिक इतिहास के इस वक्त को Venezuelan Exceptionalism का नाम दिया गया था ... लेकिन ऐसा तभी तक चल पाया जब तक यहाँ तानाशाह का उदय नहीं हुआ था ... 
कुछ ही दशक के बाद वेनेजुएला ने एक तानाशाह का उदय देखा ...जिसने सभी लोकतांत्रिक संस्थानों को खत्म कर दिया और अपनी तानाशाही नीतियों से देश के इतिहास का सबसे बड़ा आर्थिक और मानवीय संकट खड़ा कर दिया .... 
वेनेजुएला का ये तानाशाह था ह्यूगो शावेज़ ... शावेज़ की आर्थिक नीतियों, सभी उद्योगों को nationalise करने... खासकर कट्टरपंथी संवैधानिक सिद्धांतों को लागू करने की वजह से वेनेज़ुएला ने ऐसा वक्त देखा जिसकी किसी ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी ... 
ह्यूगो शावेज़ का पूरा नाम ह्यूगो रफाएल शावेज़ फ्रीयस है .. 1954 में एक मिडिल क्लास परिवार में जन्मे शावेज़ सात भाई बहनों में दूसरी संतान था ... शावेज़ अपने बचपन को गरीबी में बीता हुआ खुशियों से भरा वक्त कहा करता था ... बारिनास राज्य के सबानेटा शहर में जन्में ह्यूगो के पिता एक स्कूल शिक्षक थे .. ह्यूगो की मां के परिवार में कई लोग सैनिक रहे थे ... इसका असर ह्यूगो शावेज़ पर भी हुआ ... 
17 साल की उम्र में शावेज़ ने काराकस में वेनेजुएलन एकेडमी ऑफ मिलिट्री साइंसेज ज्वाइन कर ली थी .... कहते हैं मिलिट्री स्कूल में रहते हुए ह्यूगो शावेज़ ने वेनेजुएला के गरीब तबके के लोगों की ज़िंदगी को करीब से देखा था .. और तभी से शावेज़ सामाजिक न्याय की बातें करने लगा था .. हालांकि सामाजिक न्याय की इस धुन  में शावेज़ अपने देश को और गरीबी में धकेलने वाला था ... 
मिलिट्री स्कूल में रहते हुए ही शावेज़ ने अमेरिकी क्रांतिकारी साइमन बोलीवर को पढ़ना शुरू कर दिया था ... शावेज़ फिदेल कास्त्रो के सहयोगी और मार्क्सवादी क्रांतिकारी चेक गुएरा से भी काफी प्रभावित था ... कहते हैं 1970 के दशक में शावेज़ की दोस्ती पनामा के तानाशाह उमर तोरीजोस के बेटे से हो गई थी .. जिसके साथ शावेज़ पनामा गया और वहाँ तोरीजोस के लागू किए गए लैंड रिफॉर्म्स को करीबी से देखा ... मिलिट्री स्कूल के दौरान शावेज़ पर पेरु के राष्ट्रपति रहे जनरल युआन वेलास्को अलवैरैडो से इतना प्रभावित हुआ कि उनके भाषण याद कर लिए...यहीं से ह्यूगो शावेज़ के तानाशाह बनने की भी शुरुआत हो गई थी जो आगे चलकर वेनेजुएला के लोगों को मुश्किलों में धकेलने वाली थी ... 
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मिलिट्री स्कूल में जन्म ले चुकी शावेज़ की तानाशाही महात्वाकांक्षा 1980 के दशक में परवान चढ़ने लगी थी ..... ह्यूगो शावेज़ ने एक बार कहा था ... मुझे ऐसा लगता है कि जब मैंने एकेडमी छोड़ी थी तभी से मेरा झुकाव क्रांतिकारी आंदोलन की तरफ हो चुका था .... 
इसका नतीजा हुआ ये था कि 1975 में जूनियर लेफ्टिनेंट के तौर पर पास आउट हुए ह्यूगो शावेज़ ने 1977 आते आते मिलिट्री के अंदर ही कुछ सैनिकों को मिलाकर एक गुट बना लिया था ... जिसका नाम रखा वेनेज़ुएलन पीपुल्स लिबरेशन आर्मी .... इनका मकसद देश की दक्षिणपंथी सरकार को हटाकर वामपंथ की स्थापना करना था ... पांच साल बाद ह्यूगो शावेज़ ने मिलिट्री मे रहते हुए ही रिवॉल्यूशनरी बोलिवियन मूवमेंट 200 की शुरूआत की जिसे MBR 200 भी कहा जाता है .. ये वो वक्त था जिसमें वेनेजुएला में अब तक काफी प्रभावी रहे लोकतांत्रिक और आर्थिक व्यवस्था खोखली होने लगी थी .. 80 के दशक में दुनिया भर में तेल की कीमतें कम होने लगी थीं ... तेल पर आधारित वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था पर इसका खासा असर पड़ा था .. इसका नतीजा ये हुआ था कि कभी दुनिया के चौथे सबसे अमीर देश में लोग गरीब होते जा रहे थे ... इसी दौरान जब 1989 में राष्ट्रपति रहे कार्लोस एंड्रेस पेज़ेज़ की आर्थिक नीतियों ने वेनेजुएला के पहले से परेशान चल रहे लोगों में और गुस्सा भर दिया था ... देश में जहां तहां दंगे शुरू हो गए थे इस पर काबू पाने के लिए सरकार ने सेना की मदद ली .. लोगों के खिलाफ कार्रवाई हुई .. कई लोग मारे गए .. उस वक्त चिकन पॉक्स की वजह से अस्पताल में भर्ती ह्यूगो शावेज़ ने इसे नरसंहार करार दिया .. उसने ऑपरेशन ज़मोरा के नाम से तख्तापलट की साजिश रची ... ह्यूगो शावेज़ की ये साजिश तो नाकाम रही लेकिन इसकी बदौलत वो सुर्खियों में आ आ गया ... ह्यूगो शावेज़ ने टेलीविजन पर आकर ऐलान किया कि वो फेल हुआ है लेकिन सिर्फ अभी के लिए ... ह्यूगो अब देश के उन तमामा लोगों का हीरो बन चुका था जो देश की सरकार के खिलाफ विरोध कर रहे थे .. ह्यूगो शावेज़ गिरफ्तार हो गया .. लेकिन इस गिरफ्तारी के खिलाफ विरोध होने लगे ... आने वाले सालों में कार्लोस एंड्रेस पेज़ेज़ को राष्ट्रपति  पद से हटा दिया गया और ह्यूगो शावेज़ जेल से रिहा हो गया ... शावेज़ ने फैसला कर लिया था कि वो चुनाव जीतकर देश का राष्ट्रपति बनेगा ... बहुत जल्द वेनेज़ुएला की राजनीति में मची उथल-पुथल के बीच सामाजिक और आर्थिक बदलाव के वादे के साथ ह्यूगो शावेज़ 1999 में राष्ट्रपति की कुर्सी तक भी पहुंच गया .. 
राष्ट्रपति बनते ही शावेज़ ने मौजूदा व्यवस्था में बदलाव करने शुरू कर दिए .... उसने सरकारी पदों पर वामपंथी विचारधारा और सेना में उसके सहयोगी रहे लोगों की नियुक्ति शुरू कर दी ...कहते हैं इसी दौरान शावेज़ ने अपने कई रिश्तेदारों को भी सियासत में जगह दे दी जिसकी वजह से शावेज़ पर भाई भतीजावाद करने के भी आरोप लगने लगे ... 
ह्यूगो शावेज की सरकार शुरू में पूंजीवाद के आधार पर ही फैसले लिए ... इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड की गाइडलाइंस मानी और वेनेजुएला में विदेशी निवेश को बढ़ावा देते रहे ... साल 2000 में ह्यूगो शावेज़ ने प्लान बोलीवर पर काम करना शुरू किया था ... इसमें लगभग 113 मिलियन डॉलर इन्वेस्ट किए गए .. जिसके तहत देश में बड़े पैमाने पर वेलफेयर का काम शुरू किया गया और इसकी जिम्मेदारी सेना को सौंपी गई .. हालांकि इस योजना मे जमकर भ्रष्टाचार हुआ और आरोप सेना के जनरल्स पर लगते रहे ... इसी साल संविधान में बदलाव कर  राष्ट्रपति का कार्यकाल 5 से बढ़ाकर 6 साल का कर दिया.. नए संविधान के तहत इसी साल एक मेगा इलेक्शन हुआ जिसमें प्रेसीडेंट, गवर्नर यहाँ तक कि क्षेत्रीय नेता के चुनाव के लिए भी एक ही दिन वोट डाले गए ...  शावेज़ दोबारा प्रेसीडेंट चुन लिए गए ... लेकिन इस बार राह आसान नहीं थी देश में कई जगहों पर सरकार के खिलाफ विरोध शुरू हो चुके थे 
साल 2002 एक विद्रोह के जरिए शावेज को कुछ घंटों के लिए सत्ता से बेदखल कर दिया गया ...... इस तख्तापलट की कोशिश को ऑयल कंपनियों में शावेज़ की तरफ से की गई नियुक्तियों ने हवा दी थी ... तख्तापलट वाले दिन खूनी झड़प भी हुई जिसमें 19 लोग मारे गए ... हालांकि 47 घंटे बाद ही शावेज़ दोबारा राष्ट्रपति पद पर बहाल होने में कामयाब रहा .. शावेज़ ने इसके लिए अमेरिका को जिम्मेदार ठहराया.. हालांकि उस वक्त अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रही कोंडोलीज़ा राइस ने कहा ह्यूगो शावेज़ को ध्यान देना चाहिए कि उनकी नीतियाँ "काम नहीं कर रहीं, कोंडोलीजा ने ये भी  कहा कि "हम आशा करते हैं ह्यूगो शावेज़ इस मौके का फ़ायदा उठाएगें और अपनी नाव को सही दिशा में ले जाएगें, जो काफ़ी समय से उल्टी दिशा में चल रही है."
ये विद्रोह दरअसल शावेज़ की आर्थिक नीतियों की वजह से हुआ था .. जिसकी वजह से वेनेजुएला के समाP में और विषमताएं पैदा हो रही थीं..  ट्रेड यूनियन और व्यापार जगत से जुड़े लोग हड़ताल और विरोध प्रदर्शन कर रहे थे .. मीडिया अपनी फ्रीडम खत्म किए जाने को लेकर पहले ही ह्यूगो शावेज़ के खिलाफ हो चुका था ... सरकार सेंशरशिप के जरिए मीडिया पर हावी होने की कोशिश कर रही थी ... 
ह्यूगो शावेज़ ने जो नीतियां बनाई थीं उससे देश के एक तबके को फायदा मिल रहा था ... शावेज ने समाज में मौजूद आर्थिक असमानता को खत्म करने के लिए लैंड रिफार्म्स और सोशल प्रोग्राम शुरू किए .. इसकी वजह से वहां की गरीबी की दर में काफी कमी देखी गई ... युनाइटेड नेशंस की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1999 से 2012 तक शावेज़ के कार्यकाल में वेनेजुएला की गरीबी दर उनचास फीसदी से 23 फीसदी आ गई थी ... हालांकि सरकार की तरफ से सामाजिक कार्यक्रमों पर होने वाले खर्चे की वजह से भविष्य में होने  वाली आर्थिक दिक्कतों के लिए सरकार पैसे नहीं बचा पाई ... इसका नतीजा ये हुआ कि दुनिया भर में तेल की कीमतों में हो रही उटापटक के बीच देश में महंगाई बढ़ गई ... लोगों की आय घट गई वेनेजुएला की करंसी की वैल्यू घटने लगी ... 
शावेज़ ने खाने पीने  की चीजों की कीमतें निर्धारित कर दी थीं ... यानि लोगों को सस्ते दरों पर खाने की चीजें उपलब्ध कराई जा रही थीं ....  हालांकि इसने खाने पीने की कालाबाज़ारी को जन्म दिया जिसे शावेज़ ने सेना की मदद से दबाने की कोशिश की ... राइस प्रोसेसिंग प्लांट्स पर सेना का कब्जा हो गया .... सिर्फ उन किसानों के पास जमीने छोड़ीं गईं जो सरकार की शर्तों पर काम करने के लिए तैयार हो गए  ... देश में कुकिंग ऑयल, मिल्क पाउडर, शुगर, कॉफी, चीज़, सॉस जैसी चीजें बनाने वाली कंपनियों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया... शावेज़ ने सारे बड़े फार्म्स पर सरकारी कब्जा करा लिया... शावेज़ ने कहा "The land is not private. It is the property of the state." .. इसके बाद प्रोडक्शन गिरता चला गया और नतीजा ये हुआ कि खाने पीने की चीजें 9 गुना तक महंगी हो गईं ... सरकार की तरफ से किए जा रहे इस तरह के कंट्रोल की वजह से वेनेजुएला को बाद मे आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा ... 
शावेज़ ने बेरोजगारी कम करने के लिए देश की सरकारी तेल कंपनियों पर लोगों को देने का दबाव बनाया था .. तेल कंपनियों को इतने कर्मचारियों की ज़रूरत नहीं थी लेकिन लाखों लोगों इसके जरिए अनावश्यक रोजगार दिया गया ... 
अपनी नीतियों के तहत सरकार ने सारे उद्योंगो को सरकारी कब्जे में लेना शुरू कर दिया था .. नतीजा ये हुआ कि देश में कारोबार कर रहे कई लोगों ने पलायन करना शुरू कर दिया ... उद्योगपति कोलंबिया या कोस्टा रिका जाकर बसने लगे.. प्राइवेट सेक्टर में भयंकर मंदी आ गई और देश में बेरोजगारों की संख्या बढ़ने लगी ... 
सरकार ने मनमाने ढंग से टैक्स व्यवस्था लागू की जिसका सारा भार संपन्न लोगों पर आ गया .. शावेज़ ने आम लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा और घर को लेकर कई महात्वाकांक्षी मिशन शुरू किए थे लेकिन कभी फंड की कमी तो कभी खराब व्यवस्था की वजह ये पूरी ही नहीं हो पाए ... एक रिपोर्ट के मुताबिक शावेज़ के 2006 से पहले शुरू किए गए 4 हज़ार से ज्य़ादा प्रोजेक्ट्स 2013 आते आते पूरे नहीं हो पाए ... 
देश की आंतरिक आर्थिक हालत खराब हो ही रही थी .... अंतर्राष्ट्रीय कर्ज भी लगातार बढ़ता जा रहा था ... 
शावेज़ की छवि एक मुंहफट वक्ता की थी .... इसके लिए वो हर हफ्ते टीवी पर हैलो प्रेसीडेंट के नाम से एक कार्यक्रम किया करता था .... इसके जरिए ह्यूगो शावेज़ अपनी राजनैतिक विचारधारा जाहिर किया करता था... 
शावेज़ देश को संबोधित करने का कोई मौका नहीं छोड़ता था ... चर्च के नेताओं के साथ भी शावेज़ का लगातार टकराव होता रहा शावेज़ ने उन पर गरीबों की अनेदखी करने और अमीरों का पक्ष लेने का आरोप लगाया... 
11 सितम्बर 2001 के बाद बुश प्रशासन ने अफगानिस्तान युद्ध के दौरान कड़ा रवैया अपनाया तो शावेज़ ने इसकी कड़ी आलोचना की और कहा कि अमेरिका आंतक से निपटने के लिए आंतक का ही इस्तेमाल कर रहा है.... शावेज़ ने 2006 में यूएन में दिए गए अपने भाषण में उस वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति रहे जॉर्ज बुश को The Devil कहा था ... शावेज़ ने कहा "the devil came here yesterday... it smells of sulphur still today."
शावेज़ पर संविधान में संशोधन के जरिए लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश करने के भी आरोप लगते रहे थे ... इस तरह के संशोधन के जरिए शावेज़ ने अधिकारों को अपने पास सुरक्षित कर लिया था ... इसी तरह के संशोधन का नतीजा था जब शावेज़ ने कहा कि कोई कितनी बार भी राष्ट्रपति बन सकता है ... 
ह्यूगो शावेज़ देश में बढ़ रहे अपराध पर भी काबू करने में असफल रहा .. हत्या और किडनैपिंग जैसे अपराध बढ़ते चले गए .... कहते हैं क्राइम का ग्राफ इतना ऊपर चला गया था कि सरकार ने 2007 में इससे जुड़े आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए .. 
शावेज़ के जानने वाले लोगों के मुताबिक वो बाइपोलर डिस्ऑर्डर का शिकार था ... कभी डिप्रेशन में चला जाता तो कभी बेहद खुश हो जाता ... हालांकि शावेज की मौत 2013 में कैंसर के इलाज के दौरान हार्ट अटैक की वजह से हुई थी ... कहते हैं अपनी मौत के वक्त उसके आखिरी शब्द थे मैं मरना नही चाहता प्लीज मुझे मरने मत दो .. ये शब्द शावेज़ ने अपने गार्ड से कहे थे ...  कैंसर से अपनी लड़ाई के दौरान एक बार शावेज़ ने अमेरिका पर बीमारी देने का आरोप लगाया था .. शावेज़ ने कहा, अमेरिका ने लैटिन अमरीकी देशों के नेताओं को कैंसर की बीमारी देने की गुप्त तकनीक तो इज़ाद नहीं कर ली है....

शावेज़ की मौत के बाद भी उसकी तानाशाही नीतियों का खामियाजा वेनेजुएला के लोग भुगत रहे हैं ... गरीबी और महंगाई से जूझ रहे इस देश में अक्सर हिंसा भड़क उठती है ..  ऐसी ही एक हिंसा में प्रदर्शनकारियों ने शावेज़ के बचपन के घर को आग के हवाले कर दिया था और देश में अलग-अलग जगहों पर लगी 5 प्रतिमाएं तोड़ दीं... वेनेजुएला के इतिहास में ह्यूगो शावेज़ एक ऐसी शख्सियत है जिसे एक वर्ग ने मसीहा माना तो दूसरे वर्ग ने तानाशाह .... आज भी दुनिया में एक बहुत बड़ा वर्ग ह्यूगो शावेज़ को उसकी नीतियों को तानाशाही ही करार देता है

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दुनिया ने अब तक कई तानाशाह देखे हैं ... कुछ ऐसे तानाशाह हैं जिन्हें उनकी क्रूरता की वजह से पूरी दुनिया जानती है .. कुछ ऐसे तानाशाह हैं जिनकी वजह से लाखों लोगों की जानें गईं और इस तरह उन्होंने इतिहास में अपनी जगह बना ली.... वहीं कुछ ऐसे तानाशाह हुए हैं जिनके फैसले की वजह से उनके देश की कई पीढियों ने सज़ा पाई है ...एक ऐसा ही तानाशाह हुआ है सपरमूरत नियाजोव
सोवियत युनियन से अलग होने के बाद तुर्कमेनिस्तान का पहला राष्ट्रपति बना था सपरमूरत नियाजोव....लेकिन बहुत जल्द उसने खुद को प्रेसीडेंट ऑफ लाइफ अनाउंस कर दिया.... देश के राष्ट्रपति रहते हुए नियाजोव ने ना सिर्फ खुद के लिए अपना असीमित प्यार लोगों को दिखाया बल्कि उनके रहन-सहन के लिए भी नियम कायदे बना दिए ... ये एक तानाशाह था जिसने ये भी तय किया कि लोग पढेंगे क्या .. 
सपरमूरत नियाजोव का जन्म 1940 में तुर्कमेनिस्तान की राजधानी एशगैबैट के महज 10 किलोमीटर दूर किपचक नाम की जगह पर हुआ था ... उस वक्त तुर्कमेनिस्तान सोवियत संघ का हिस्सा था .. सपरमूरत नियाजोव के पिता स्कूल शिक्षक थे लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने सोवियत संघ की रेड आर्मी ज्वाइन कर ली थी... कहते हैं कि युद्ध के दौरान उन्होंने भागने की कोशिश की जिसके बाद मिलिट्री कोर्ट ने उन्हें मौत की सज़ा दी थी .. हालांकि सपरमूरत नियाजोव की आधिकारिक बायोग्राफी में उनके युद्ध के दौरान शहीद होने की बात कही गई है ... कहते हैं कि नियाजोव की पूरी फैमिली 1948 में एशगैबैट में आए एक भयानक भूकंप में मारी गई थी ...महज 8 साल की उम्र में अनाथ हुआ नियाजोव कुछ दिन तक अनाथालय में रहा बाद मे सरकार ने उसकी कस्टडी दूर के रिश्तेदार को सौंप दी ..
बड़े होने पर नियाजोव ने लेनिनग्राड पॉलीटेक्नीक स्कूल से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल कर आगे की बढ़ाई के लिए रूस चला गया .. हालांकि बहुत नियाजोव पढ़ाई में काफी कमजोर होने की वजह से बाहर कर दिया गया ... शायद यहीं से नियाजोव के तानाशाह बनने कहानी शुरू हुई ... 
नियाजोव ने 1961 में कम्युनिस्ट पार्टी ज्वाइन कर ली थी .. बहुत जल्द उसे एशगैबैट सिटी कमिटी का सेक्रेटरी बना दिया गया ... 1985 आते आते राजनीति में नियाजोव ने कितनी शक्ति हासिल कर ली थी इसका अंदाजा इस घटना से लगाया जा सकता है कि सोवियत संघ के जेनरल सेक्रेटरी रहे मिखाइल गोर्बाचोव ने तुर्कमेनिस्तान के कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव गापुरोव को भ्रष्टाचार के पद से हटाया तो इस पद पर नियाजोव की नियुक्ति की.. 1990 आते आते नियाजोव इस पार्टी का चेयरमैन बन चुका था ... 1991 में नियाजोव ने इस पार्टी का नाम बदलकर डेमोक्रैटिक पार्टी ऑफ तुर्कमेनिस्तान कर दिया था ... ये वही साल था जिसमें सोवियत संघ का विघटन हुआ ... इस विघटन में नियाजोव भी गोर्बाचोव के खिलाफ रहे सोवियत संघ के नेताओं में शुमार था.. इसके बाद आजाद हुए तुर्कमेनिस्तान पर खुद को कम्युनिस्ट विचारधारा से जोड़ने वाली नियाजोव की डेमोक्रैटिक पार्टी ऑफ तुर्कमेनिस्तान ने सत्ता हासल कर ली और नियाजोव देश का राष्ट्रपति बन गया ..अगले साल देश में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हुए ... इस चुनाव में नियाजोव अकेला उम्मीदवार था लिहाजा वो लोकतांत्रिक तरीके से चुना गया राष्ट्रपति बन गया जिसे 99 फीसदी से ज्यादा वोट मिले... बहुत जल्द नियाजोव ने खुद को तुर्कमेनबाशी यानि लीडर ऑफ ऑल तुर्कमेनिया घोषित कर दिया था .. 1994 में कथित तौर पर एक जनमत संग्रह के जरिए नियाजोव ने अपना कार्यकाल 2002 तक बढ़ा लिया था ... सपरमूरत नियाजोव उर्फ तुर्कमेनबाशी ने सत्ता हासिल करने के बाद कभी भी तुर्कमेनिस्तान में स्वतंत्र चुनाव नहीं होने दिया ... 1999 में चुनाव के वक्त नियाजोव ने सारे उम्मीदवार खुद तय किए थे लेकिन इसके कुछ दिनों बाद ही नियाजोव ने संसद से खुद को प्रेसीडेंट ऑफ लाइफ घोषित करवा लिया ... इसके साथ ही उसने भविष्य़ में मिलने वाली किसी भी चुनौती को खत्म कर लिया था ... यहां से देश में उसकी मनमानी चलने वाली थी ... बहुत जल्द नियाजोव ने खुद को तानाशाह की तरह स्थापित कर लिया था .... धीरे-धीरे लोगों से मानवाधिकार छिनने लगे ..
देश में प्रेस और धर्म की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े होने लगे थे...  देश में मौजूद सभी मीडिया हाउस पर तुर्कमेनिस्तान की सरकार का कब्जा हो चुका था ... 1994 आते आते नियाजोव ने रूहनामा से एक किताब लिखी थी ..  ये किताब दरअसल नियाजोव की अपनी नैतिक और आध्यात्मिक विचारधारा थी जिसे देश के हर धर्म के लोगों के ऊपर थोप दिया गया ...यहां तक कि स्कूल में बच्चों को रूहनामा पढ़ाना ज़रूरी कर दिया गया था ... कहते हैं कि इस किताब के जरिए नियाजोव अपने देश की अलग संस्कृति बनाना चाहता था .... कहते हैं कि अपनी विचारधारा वाली इस किताब के लिए नियाजोव इतना सनकी था कि 2006 में उसने ये दावा किया कि इस किताब को 3 बार पढ़ने वाले छात्र को जन्नत नसीब होगी ... नियाजोव के कार्यकाल में तुर्कमेनिस्तान की राजधानी में ये किताब एक स्मारक के रूप में भी बनाई गई .... 2002 में तुर्कमेनिस्तान में सितंबर के महीने का नाम रूहनामा रखा गया और 2005 में इस नाम से एक युनिवर्सिटी का निर्माण शुरू कर दिया गया था हालांकि इसके अगले साल ही नियाजोव की मौत हो गई थी ... 
नियाजोव ने राष्ट्रपति रहते हुए कई तरह के बदलाव करने शुरू कर दिए थे .. वो खुद से बहुत प्रभावित था .. उसने जगह जगह अपनी प्रतिमाएं बनवानी शुरू कर दीं .. देश के हर कोने में या तो नियाजोव की प्रतिमा या फिर उसकी विशालकाय तस्वीरें दिखने लगीं ... तुर्केमेनिस्तान की राजधानी एशगैबैट में नियाजोव में अपनी 15 मीटर ऊंची सोने की परत चढ़ी प्रतिमा बनवाई जिसमें उसका चेहरा सूरज की दिशा के मुताबिक घूमता रहता था .. इस प्रतिमा को आर्क ऑफ न्यूट्रैलिटी का नाम दिया गया .. 
तुर्कमेनिस्तान की अधिकांश जनता गरीबी में जीवन जी रही थी, लेकिन नियाजोव ने राजधानी में एक बर्फ का महल बनवाया और कारा कुम रेगिस्तान के बीचों बीच झील बनाने का भी आदेश दिया ....इतना ही नहीं उसने रेगिस्तान की जलवायु बदलने के लिए एक विशाल जंगल बनाने के भी आदेश दिए .. उसने अपने नाम पर शहर और पार्क बनवाए.... यहां तक कि उसने जनवरी महीने का नाम बदलकर अपने नाम पर कर दिया..और अप्रैल महीने का नाम नियाजोव ने अपनी मां के नाम पर रखा था... अपने कार्यकाल में नियाजोव ने नाटक, ओपेरा को तो प्रतिबंधित किया ही पुरुषों के लंबे बाल रखने पर भी प्रतिबंध लगाया ... 1997 में नियाजोव ने एक सर्जरी के बाद स्मोकिंग छोड़ दी थी इसके बाद उसने अपने सारे मंत्रियों को भी स्मोकिंग छोड़ने पर मजबूर कर दिया.. इसके अलावा सेना में नहीं रहते हुए भी नियाज़ोव के पास मार्शल की रैंक थी और पांच बार उसे तुर्कमेनिस्तान के हीरो की उपाधि से सम्मानित किया गया ... खुद को तुर्कमेनबाशी कहने वाले नियाजोव के साथ बैठक के दौरान, अधिकारियों को उनके दाहिने हाथ को चूमना होता था जिसमें वो पन्ना और हीरे जड़ी अंगूठियां पहना करता था.. 
इसके अलावा भी नियाजोव ने कई अजीबोगरीब फैसले लिए... 2004 में नियाजोव ने एक आदेश दिया जिसके तहत उसके देश में किसी को भी सोने के दांत रखने की इजाज़त नहीं थी .. उसने पुरूषों को गाड़ियों में रेडियो सुनने पर प्रतिबंध लगा दिया था... . उसने शादियों समेत किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में रिकॉर्ड किया गया म्यूजिक बजाने पर पाबंदी लगा दी ... नियाजोव ने मध्य एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद बनवाई जिसे स्पिरिट ऑफ तुर्कमेनबाशी कहा जाता है ... कहते हैं इसमें 60 मिलियन पाउंड का खर्च आया था .. 
नियाजोव अपने खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों को उनके घरों से बाहर नहीं निकलने देता था.... इतना ही नहीं विरोध करने वाले लोगों को हिरासत में ले लिया जाता और उन्हें मेंटल हॉस्पिटल में भर्ती करा दिया जाता ... नियाजोव के कार्यकाल में देश से लोगों के आने जाने पर भी कड़ी नज़र रखी जाती .. नियाजोव लाख कोशिशों के बाद भी तुर्कमेनिस्तान में रहे लोगों की हालत दुनिया से छुपा नहीं पाया था ... सारे न्यूजपेपर, रेडियो और टेलीविजन पर कब्जे, साइबर कैफे और इंटरनेट पर नियाजोव की रोक के बावजूद उसकी कारस्तानियां सामने आ रही थीं ... नियाजोव ने राजधानी के बाहर सभी लाइब्रेरी पर भी रोक लगा दी उसका मानना था कि तुर्कमेनिस्तान के लोगों को सिर्फ कुरान और रूहनामा पढ़नी चाहिए .. रूहनामा खुद नियाजोव की लिखी हुई किताब थी... 
2004 में नियाजोव ने अपने तानाशाही फैसले में 15 हजार हेल्थ वर्कर्स को नौकरी से निकाल दिया था ... 2005 आते आते उसने राजधानी के बाहर के सारे अस्पताल बंद करा दिए ... और दलील दी कि सभी बीमारों को राजधानी में ही आकर इलाज कराना चाहिए .. एक अखबार की खबर के मुताबिक तुर्कमेनिया में डॉक्टर्स को हिप्पोक्रैटिक ओथ की जगह नियाजोव के नाम की शपथ दिलाई जाती थी .. 
नियाजोव के कार्यकाल में देश में मानवाधिकार की हालत एशिया के सभी देशों के मुकाबले सबसे खराब थी ... पत्रकारों के लिए ये देश सबसे खतरनाक देशों की सूची में लगातार बना रहा .. 
2002 में कथित तौर पर नियाजोव की हत्या की कोशिश की गई थी ... नियाजोव के  घर से ऑफिस जाते वक्त उसके काफिले पर हमला किया गया .. नियाजोव ने इस हमले को तख्तापलट की साजिश करार दिया ... नियाजोव ने अपने दो विरोधियों पर इसके आरोप लगाए जो देश से निकाले जाने की वजह से उस वक्त रूस में रह रहे थे .. हालांकि बाद में इसके बारे में ये तथ्य भी दिए गए कि इस हमले के पीछे खुद नियाजोव था ... ताकि इस हमले के आरोप में वो अपने सैकड़ों विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई कर सके और दुनिया भर में खुद के लिए सहानुभूति भी जुटा सके ... इस बहाने राजधानी एशगैबैट की हर सड़क, हर गली में सीसीटीवी कैमरे लगा दिए गए ताकि भविष्य़ में ऐसी कोई घटना ना हो सके ... 
आखिरकार 2006 में दिल का दौरा पड़ने से नियाजोव की मौत के बाद ही देश को उससे आजादी मिल पाई .. लोग कहते हैं कि उसके निधन के कई दिनों पर बाद इसकी आधिकारिक सूचना दी गई ... इसके बाद देश ने उसका पतन भी देखा .. उसके निधन के बाद देशभर में फैली लगभग 14000 प्रतिमाएं और चित्र हटाने का काम शुरू हुआ .. 2011 आते आते राजधानी एशगैबैट में लगी प्रतिमा आर्क ऑफ न्यूट्रैलिटी को भी हटा दिया .. इसे अब शहर के बाहरी इलाके में लगा दिया गया है लेकिन अब नियाजोव की प्रतिमा घूमती नहीं है ... हालांकि अब भी नियाजोव की कुछ प्रतिमाएं एशगैबैट में मौजूद हैं .. और देश में हालात में कुछ ज्यादा बदलाव नहीं आ पाए हैं .. आरोप है कि नियाजोव ने जिस तरह का आदर्श स्थापित किया अब भी वहां की सियासत पर काबिज लोग वही अपना रहे हैं ..

सोमवार, 20 जुलाई 2020

sharad pawar

शरद पवार का जीवन राजनैतिक उतार चढ़ाव का जीवन रहा है... शरद पवार के अगर राजनीतिक सफर पर नज़र डालें तो वो अपने मन के  मालिक की तरह राजनीति करते रहे हैं उनको न तो वैचारिक तौर पर और ना निजी तौर पर किसी भी दल के नेता से कभी कोई परहेज़ नहीं रहा वो अपने पॉलिटिकल मिनट के लिए अपने राजनीतिक एजेंडे को पूरा करने के लिए जहां जैसे ज़रुरत पड़ी वैसा जवाब दिया... उन्होंने कांग्रेस पार्टी के खिलाफ भी किया... और ये शरद पवार की पर्सनालिटी का ही नतीजा था कि वो एक तरफ कांग्रेस पार्टी से राजनीतिक गठबंधन रखते थे और दूसरी तरफ शिवसेना के संस्थापक बालासाहब ठाकरे के सबसे करीबी और शुभचिंतक माने जाते थे बहरहाल जब-जब उनको ज़रुरत पड़ी उन्होंने बालासाहब ठाकरे का नाम कांग्रेस नेतृत्व को दबाव में लेने के लिए हमेशा उत्तम कार्ड के रूप में इस्तेमाल किया... आज भी शरद पवार की राजनीति का तरीका वही पुराना है वही टेस्ट फॉर्मुला है जो पिछले विधानसभा के चुनाव में जब महाराष्ट्र की जनता ने किसी भी राजनैतिक दल को बहुमत नहीं दिया और मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर बीजेपी और शिवसेना के बीच में तकरार बढ़ी तो शरद पवार दोनों दलों से अलग-अलग डील करते दिखाई दिए थे... एक बार प्रधानमंत्री से किसानों के मुद्दे के बहाने मिलकर शरद पवार ने बीजेपी के साथ हाथ मिलाने का संकेत दिया... लेकिन जब वो फॉर्मुला फेल हो गया तो शिवसेना और कांग्रेस को एक मंच पर लाकर वैकल्पिक सरकार बनाने का काम किया... प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने भी शरद पवार की तारीफ करते रहे हैं... यहीं नहीं ये दोनों नेता समय समय पर एक-दूसरे की तारीफ करके अपने राजनैतिक विरोधियों को शिकस्त देते रहे हैं... भारतीय सीमा के अंदर चीन की घुसपैठ को लेकर जब प्रधानमंत्री ने ऑल पार्टी मीटिंग बुलाई तो उस मीटिंग के दौरान शरद पवार ने राहुल गांधी का नाम लिए बगैर चीन के सवाल पर उनकी आलोचना कर डाली... और फिर वहीं शरद पवार ने कुछ दिन बाद मशहूर अखबार दा हिंदू में दिए गए एक इंटरव्यू में चीन के मामले में नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना की... शरद पवार राजनीति सिर्फ अपने लिए अपने परिवार के लिए और अपनी पार्टी के लिए करते हैं... शायद यही वजह है कि शरद पवार को उनके विरोधी उन्हें जवाब देने भी डरते हैं... वहीं कोरोना माहामारी को लेकर दिया गया बयान पवार की इसी राजनैतिक पैंतरेबाज़ी का हिस्सा है... पूरे देश को पता है राम मंदिर निर्माण के लिए होने वाली पूजा में प्रधानमंत्री को हिस्सा लेना है... वहीं दूसरी तरफ देश में कोरोना महामारी विकराल रूप लेती जा रही है... ऐसी स्थिति में शरद पवार का ये कहना कि मोदी सरकार राम मंदिर के एजेंडे को आगे करके कोरोना महामारी से लड़ने की कमज़ोरी छिपा रही है... ये एक गंभीर आरोप है... ऐसा लगता है कि शरद पवार का कोई काम प्रधानमंत्री के लेवल पर लटका पड़ा है... और उसको क्लीयरेंस दिलाने के लिए वो एक बार फिर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं... दूसरी तरफ ये भी हो सकता है कि महाराष्ट्र में अपने जनाधार को मज़बूत करने के लिए पवार राम मंदिर के निर्माण के सहारे कोरोना महामारी को बड़ा मुद्दा बनाने में लगे हों... मकसद चाहे जो भी हो लेकिन शरद पवार के जानने वालों का मानना है कि उनके बयान कहीं ना कही उनके राजनैतिक एजेंडे से जुड़े रहते हैं।

शनिवार, 18 जुलाई 2020

zimbabve

रॉबर्ट गैब्रिएल मुगाबे एक ऐसी शख्सियत था जिसे कुछ लोग नेता के तौर पर देखते हैं तो कुछ एक निरंकुश शासक के तौर पर ... 1980 में जिम्बाब्वे को आज़ादी दिलाने के नायक रहे रॉबर्ट मुगाबे ने 37 साल के शासनकाल में खुद को खलनायक साबित कर लिया ... नतीजा ये हुआ कि जब तख्तापलट कर इस निरंकुश शासक को सत्ता से बेदखल किया गया तो जिम्बाब्वे के लोग जश्न मनाते नज़र आए... 
मुगाबे का जन्म 21 फरवरी 1924 को उस वक़्त के रोडेशिया में हुआ था... 6 भाई बहनों के बीच जन्मे मुगाबे के पिता पेशे से कारपेंटर थे और माँ छोटे बच्चों को धार्मिक शिक्षा दिया करती थीं...  रोडेशिया पर ब्रिटिश का शासन था .. शोना जाति समूह के एक गरीब परिवार में जन्मे मुगाबे ने पढ़ाई पूरी करने के बाद बतौर शिक्षक नौकरी शुरू की थी ... जिम्बाब्वे पर शासन कर रहे अंग्रेजों  के लिए मुगाबे के मन में नफरत पैदा हो रही थी ...1949 में स्कॉलरशिप पर साउथ अफ्रीका की युनिवर्सिटी ऑफ फोर्ट हेर में पढ़ने गए मुगाबे ने अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस यूथ लीग ज्वाइन कर ली थी ... इसी दौरान मुगाबे कम्युनिस्ट विचारधारा वाले लोगों के संपर्क में आया ... ये वो वक्त था जब भारत ने अंग्रेजों से आज़ादी हासिल की थी और इस आज़ादी के लिए महात्मा गांधी के अपनाए गए तौर तरीकों से मुगाबे काफी प्रभावित हुआ था .. ये वो वक्त था जो रॉबर्ट मुगाबे की जिंदगी में टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ ... 1952 में रोडेशिया लौटा मुगाबे पूरी तरह से अंग्रेजों के शासन के खिलाफ हो चुका था ... हालांकि 1960 तक मुगाबे बतौर शिक्षक काम करता रहा ... 
50 के दशक के आखिरी में जिम्बाब्वे में अंग्रेज़ो के शासन के खिलाफ क्रांति की शुरुआत हो चुकी थी ... 1960 में मुगाबे का दोस्त क्रांतिकारी लियोपोल्ड तकाविरा को गिरफ्तार कर लिया गया ... इस गिरफ्तारी के खिलाफ मुगाबे ने 7000 लोगों को जुटाकर विरोध प्रदर्शन शुरू  कर दिया ... जिससे तेजी से लोग जुड़ने लगे ... एक ही दिन में प्रदर्शनकारियों की संख्या 40 हज़ार तक पहुंच गई ... यहीं पहली बार मुगाबे ने भीड़ को एक नेता के तौर पर संबोधित किया ... इस घटना ने मुगाबे की ज़िदगी पूरी तरह बदल दी .. मुगाबे ने तय कर लिया था कि वो अपनी ज़िंदगी अपने देश के नाम करने जा रहा है ... मुगाबे ने शिक्षक की नौकरी से इस्तीफा दे दिया ... और उग्र विचारधारा वाली नेशनल डेमोक्रैटिक पार्टी से जुड़ गया जहाँ बहुत जल्द मुगाबे को पार्टी का पब्लिसिटी सेक्रेटरी की जिम्मेदारी दे दी गई... ये वो वक्त जब देश में अंग्रेजों के खिलाफ माहौल बनता जा रहा था .. लगातार विद्रोह हो रहे थे .. मुगाबे ने पार्टी को देशभक्ति से जोड़ा .. 1961 आते आते अंग्रेज सरकार ने नेशनल डेमोक्रैटिक पार्टी पर बैन लगा दिया... जिसके बाद मुगाबे ने इस पार्टी के कई सदस्यों के साथ मिलकर जिम्बाब्वे अफ्रीकन पीपुल्स युनियन तैयार कर ली... और मुगाबे को इसका जेनरल सेक्रेटरी बना दिया गया... इस पार्टी ने देश में मुगाबे के नेतृत्व में व्हाइट कम्युनिटी को टारगेट करना शुरू किया ... मुगाबे को लगता था कि अंग्रेजों को देश से हटाने का ये सबसे अच्छा तरीका है लेकिन इसका नतीजा ये हुआ कि एक साल के अंदर जिम्बाब्वे अफ्रीकन पीपुल्स युनियन पर भी बैन लग गया और मुगाबे को गिरफ्तार कर गृहजिले तक सीमित कर दिया गया ... इस दौरान मुगाबे की पत्नी हेफ्रॉन को भी ब्रिटिश महारानी एलिजाबेथ के खिलाफ दिए गए बयान के लिए गिरफ्तार कर लिया गया था ... तभी इन्होंने ब्रिटिश के खिलाफ हिंसक लड़ाई के बारे में विचार करना शुरू कर दिया था... मार्च 1964 आते आते मुगाबे को 21 महीनों तक जेल में रहने की सजा सुना दी गई थी ... हालांकि 1966 में देश में जारी विद्रोह को देखते हुए मुगाबे की रिहाई नहीं हो पाई ... 
मुगाबे ने जेल में रहते हुए आंदोलन में गुरिल्ला युद्ध की नीति को अपना लिया ... 1974 में ब्रिटिश सरकार के लिए वफादार रहने के वादे के साथ प्रधानमंत्री बने इयान स्मिथ की सरकार ने मुगाबे की रिहाई के आदेश दे दिए.... हालांकि शर्त लगाई गई कि मुगाबे जाम्बिया चले जाएंगे ... मुगाबे ने गुरिल्ला युद्ध में माहिर लोगों की टुकड़ी बनाई और वापस जिम्बाब्वे लौट आए... 
जिम्बाब्वे को 1980 में ब्रिटिश शासन से आजादी मिल गई और मुगाबे स्वतंत्र जिम्बाब्वे के पहले प्रधानमंत्री चुने गए… हालांकि आने वाले 37 साल में देश मुगाबे का दूसरा ही रूप देखने वाला था .. वो रूप जिसने मुगाबे को नायक से खलनायक बना दिया .. 



अंग्रेजों के साथ लड़ाई में लगभग 12 साल जेल में रहे और देश को आजादी दिलाने में सबसे अहम भूमिका निभाने वाले रॉबर्ट मुगाबे को फरवरी 1980 में हुए पहले चुनाव में जनता ने हाथों हाथ लिया था ... 
मुगाबे की पार्टी जिम्बाब्वे अफ्रीकन नेशनल युनियन पैट्रियॉटिक फ्रंट को 80 में 57 सीटों पर जीत हासिल हुई थी... 18 अप्रैल 1980 को शपथ लेने के दौरान ही मुगाबे ने रोडेशिया का नाम बदलकर जिम्बाब्वे रख दिया था और देश में नस्लीय शांति बहाल करने का ऐलान किया ... 
सत्ता में आने के बाद मुगाबे एक तरफ समाजवाद की बात करता था दूसरी तरफ सरकार की सारी आर्थिक नीतियां इसके उलट थीं... विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया जा रहा था ...अगले एक दशक में देश का आर्थिक विकास 2.7 फीसदी के दर से हुआ लेकिन बढ़ती जनसंख्यां की वजह से लोगों की वास्तविक कमाई काफी कम हो गई थी... बेरोजगारी लगातार बढ़ती जा रही थी ... 1990 आते-आते जिम्बाब्वे में बेरोजगारी की दर 26 फीसदी तक पहुंच गई और देश की जीडीपी में लगातार गिरावट होती रही ... मुगाबे की नीतियों की वजह से देश में अमीर और गरीब वर्ग तैय़ार हो गय़ा ... कुछ लोग अमीर होते चले गए और इससे गरीब लोगों में अंसतोष बढ़ने लगा.. मुगाबे की पार्टी से जुड़े लोगों ने भी विदेशी निवेश के दम पर अपना बिजनेस अंपायर खड़ा कर लिया ... 
सत्ता में आते ही मुगाबे ने मास मीडिया ट्रस्ट बनाया .. इस ट्रस्ट ने देश में चल रहे सभी अखबारों को खरीद लिया... इन अखबारों में काम कर रहे अंग्रेज संपादक नौकरी से निकाल दिए गए और उनकी जगह पर सरकार के नुमाइंदे काम करने लगे .... नतीजा ये हुआ कि सारे अखबार सरकार का प्रोपगैंडा चलाने वाली मशीन बन चुके थे.. 
मुगाबे ने देश में नस्लीय खाई को भरने को वादा किया था शुरुआत में जिम्बाब्वे में रह रहे गोरों को इसका फायदा भी मिला ...उनका आर्थिक विकास भी हुआ .. नस्लीय भावनाओं को भड़का कर सरकार बनाने वाले मुगाबे की पार्टी जिम्बाब्वे में रह रहे गोरे लोगों के मन से डर नहीं निकाल पाई लिहाजा देश से उनका माइग्रेशन  शुरू हो गया ... 1981 में पार्टी हेडक्वार्टर पर हुए हमले के बाद मुगाबे का नज़रिया गोरों के खिलाफ बिल्कुल ही बदल गया ... इसके बाद से देश में दोनों  नस्लों के बीच की खाई चौड़ी होती चली गई और मुगाबे इस पर नियंत्रण नहीं कर पाया .. 
देश में राजनीतिक तौर पर भी अशांति बढती जा रही थी ... कभी विरोधियों को सरकार में जगह देने वाले मुगाबे देश में सारे अधिकारी अपनी पार्टी को देने के बारे में विचार करने लगे थे ... देश में मुगाबे समर्थक और विरोधी पार्टी के सदस्यों के बीच हिंसक झड़पें होने लगी थीं ... सैकड़ों लोग मारे जाने लगे ... अपने विरोधियों को सबक सिखाने के लिए मुगाबे ने फिफ्थ ब्रिगेड के नाम से एलीट आर्म्ड फोर्स बना ली .. इसके बाद कत्लेआम होने लगे ... पूछताछ के नाम पर लोगों को टॉर्चर किया जाने लगा ... कई आम नागरिक भी इसका शिकार हुए ... मुगाबे को पता था कि ऐसा हो रहा है .. मुगाबे ने कहा ‘We cant tell who is a dissident and who is not’.. यानि हम ये कैसे कह सकते हैं कि कौन विरोधी है कौन नहीं ... 
1987 में देश के संविधान में संशोधन करके मुगाबे देश के राष्ट्रपति बन गए ... लेकिन आने वाला वक्त  इकोनॉमिक फ्रंट पर चुनौतियों वाला था ... 90 के दशक में जिम्बाब्वे की अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता हो चुकी थी ... साल 2000 आते –आते देश में बेरोजगारी की दर 90 फीसदी पहुंच गई और महंगाई दर 23 करोड़ फीसदी ... कहा जाता है कि देश में गरीबी कम करने के लिए सरकार ने अंधाधुंध नोट छापने शुरू कर दिए थे ... लोगों के पास अफरात पैसे आ गए लेकिन ज़रूरी चीजों की कमी   हो गई लिहाजा सामान की कीमतें आसमान छूने लगीं और राशन खरीदने के लिए लोगों को ट्रॉली और सूटकेस में भरकर पैसे ले जाने पड़े... जो गरीब था वो भी करोड़पति था लेकिन उस पैसों की कोई अहमियत नहीं रह गई थी ... 
कहते हैं कि उस वक्त एक हजार लाख करोड़ जिम्बाब्वे डॉलर की कीमत महज 5 अमेरिकी डॉलर रह गई थी... हालात ये हो गए थे कि मुगाबे सरकार को अपने ही देश में अपनी करेंसी तक बंद करनी पड़ गई.... 
मुगाबे की आर्थिक नीतियों का खामियाजा देश की जनता भुगत रही थी ... 1997 में मुगाबे ने देश की जंग-ए-आज़ादी में शामिल हुए वरिष्ठ नागरिकों को लाखों डॉलर भुगतान करने का फैसला किया था ... ये पैसे जुटाने के लिए मनमाने तरीके से टैक्स वसूले गए .... इसके विरोध में देश में हड़ताल होने लगे और पार्टी में भी मुगाबे का विरोध होने लगा ... हालांकि इस फैसले ने देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह पटरी से उतार दिया था ... एक अनुमान के मुताबिक 2009 आते आते देश से 40 लाख लोगों ने पलायन कर दिया था .. ये वो लोग जो हुनरमंद थे और मुगाबे की लचर नीतियों को झेल नहीं पाए... 
मुगाबे की लैंड रिफॉर्म्स की नीतियां भी विवादास्पद रहीं.. मुगाबे ने ज़मीनों पर सरकारी कब्जे के लिए आर्मी का इस्तेमाल किया.... ये ज़मीनें गोरे लोगों की थीं ... कब्जे का विरोध करने पर उन्हें मार डाला गया... ये मामला अदालत में भी गया ... फैसला मुगाबे के विरोध में आया ... हालांकि इसके विरोध में अपना फैसला देने वाले सभी जजों को सरकार ने इस्तीफा देने को मजबूर कर दिया ... इस पूरे विवाद की वजह से देश में एग्रीकल्चर का विकास रुक गया.. देश का अन्न भंडार खाली होने लगा और ह्युमन राइट्स वॉच के मुताबिक देश की 50 फीसदी जनता के पास खाने पीने की कमी हो गई... 2005 आते आते देश के 80फीसदी लोग बेरोजगार हो गए .. 
हालांकि जिम्बाब्वे की माली हालत के लिए मुगाबे ने हमेशा पश्चिमी ताकतों को जिम्मेदार मानते रहे ...इन सबके बीच एक लंबे समय तक रॉबर्ट मुगाबे और ज़िम्बाब्वे एक-दूसरे का पर्याय रहे. कुछ लोगों के लिए तो मुगाबे तमाम विवादों के बावजूद एक हीरो रहे जिन्होंने देश को आज़ादी दिलाई.. खुद मुगाबे को ऐसा लगने लगा था कि उन्हें कोई सत्ता से बेदखल नहीं कर सकता.. देश में चुनाव होते थे लेकिन उस पर हमेशा सवालिया निशान खड़े होते ... 2008 की एक चुनावी रैली में मुगाबे ने कहा मुझे ईश्वर ने नियुक्त किया है, ईश्वर के अलावा कोई और मुझे हटा नहीं सकता.''
1996 में मुगाबे ने उम्र में 40 साल छोटी अपनी सेक्रेटरी ग्रेस से शादी कर ली थी ... भुखमरी से जूझ रहे जिम्बाब्वे ने एक बेहद खर्चीली  शादी देखी थी जिसें हजारों लोग शामिल थे .. ग्रेस के शौक इतने महंगे थे कि लोगों ने उसे अमेजिंग ग्रेस के नाम से बुलाना शुरू कर दिया था ...कहते हैं मुगाबे के पतन में उनकी इस दूसरी पत्नी की अहम भूमिका थी .. 
सत्ता में किसी भी कीमत पर बने रहने के लिए तिकड़म करने वाले मुगाबे को लोग अफ्रीकी तानशाह मानने लगे थे ... जिसने अपनी कुर्सी बचाने के लिए पूरे देश को तबाह कर दिया था... साल 1980 में जिन सपनों को दिखाकर मुगाबे पहली बार सत्ता में आए थे, वो सपने सामाजिक और आर्थिक पैमानों पर लगभग तीन दशक बाद भी पूरे नहीं हो पाए थे ... 
नतीजा ये हुआ कि साल 2017 में सेना ने मुगाबे को सत्ता से बेदखल कर दिया और इमरसन मननगागवा को राष्ट्रपति बनाया गया, जो कभी मुगाबे के ही ख़ास आदमी हुआ करते थे... 
मुगाबे के सत्ता से हटते ही लोगों ने जश्न मनाना शुरू कर दिया ... सड़क पर लोग नाचते गाते नज़र आए ... उनके लिए ये एक बुरे दौर का अंत था .. 
मुगाबे की सेहत हालांकि इस वक्त तक काफी खराब हो चुकी थी .. इलाज के लिए वो अक्सर सिंगापुर जाया करते थे ... उनकी मौत भी 95 साल की उम्र में इलाज के दौरान सिंगापुर में हुई .. अब मुगाबे को लोग अगर जिम्बाब्वे की आज़ादी के नायक के तौर पर याद करते हैं तो लोग उसके कार्यकाल को एक बुरे सपने की तरह भी देखते हैं .. जिसने अपने देश के लोगों की भलाई के लिए लिए कुछ नहीं किया ... 
मुगाबे की बुरी सेहत की वजह से अक्सर उसकी मौत की खबरें उड़ाई जातीं ...मुगाबे ने अपने 88वें जन्मदिन के मौके पर इन अफवाहों का मज़ाक उड़ाया था और कहा “I have died many times—that’s where I have beaten Christ. Christ died once and resurrected once,” यानि मैं इतनी बार मर चुका हूं कि मैंने जीसस क्राइस्ट को भी मात दे दी है ... क्राइस्ट अपने मरने के बाद भी जी उठे थे .. हालांकि तमाम विफलताओं के बाद भी अफ्रीका  में नेल्सन मंडेला के बाद अगर किसी नेता को याद किया जाएगा तो वो जिम्बाब्वे का ये तानाशाह रॉबर्ट मुगाबे ही होगा

Iraq

लगभग 24 साल तक इराक के राष्ट्रपति रहे सद्दाम हुसैन को दुनिया तानाशाह के रूप में जानती है ...सियासत में सद्दाम की एंट्री एक क्रांतिकारी के तौर पर हुई थी .. जिसने शुरुआती दिनों में अपने काम के लिए युनेस्को से सम्मान भी हासिल किया लेकिन यही सद्दाम हुसैन बाद में लाखों लोगों की मौत की वजह बना .... 
सद्दाम हुसैन के जन्म से कुछ महीने पहले कैंसर से उसके पिता और भाई की मौत हो गई थी .. सद्दाम की माँ उसे इस घटना के लिए जिम्मेदार मानती थी ... पति और बेटे की मौत के टूट चुकी माँ ने ये तय किया था कि वो सद्दाम को जन्म नहीं देंगी लेकिन परिवार के बाकी लोगों ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया .. 28 अप्रैल 1937 को सद्दाम ने इस दुनिया में कदम रखा ...हालांकि माँ ने सद्दाम को छोड़ दिया जिसके बाद उसकी परवरिश उसके अंकल ने की ..... इस पूरी घटना ने सद्दाम के मन पर गहरा असर डाला था .. सद्दाम के अंकल नाजीवाद से प्रभावित थे .... पर्शियन, यहूदियों और मक्खियों से सद्दाम के अंकल को नफरत थी .. सद्दाम का बचपन काफी चुनौतियों से भरा था दूसरे उसकी परवरिश नफरत से भरे वातावरण में हुई थी ... सद्दाम के बचपन से जवानी की दहलीज पर कदम रखने के दौरान इराक की राजनीति भी उथल पुथल से भरी थी  ... 1958 में जनरल अब्दुल करीम कासिम ने ब्रिटेन की कठपुतली रहे मोनार्की के खिलाफ विद्रोह कर दिया था ... राज परिवार के कई लोग मौत के घाट उतार दिए गए थे इसके साथ ही ब्रिटिश को इराक से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था .. 
हालांकि बहुत जल्द अब्दुल करीम कासिम को अपने ही देश में चुनौती मिलने वाली थी और ये चुनौती दी थी बाथ पार्टी ने .. बाथ पार्टी इराक में 50 के दशक की सबसे बड़ी एक्टिविस्ट पॉलिटिकल पार्टी थी ... जिसने पूरे देश में रेडिकल सेक्युलर नेशनलिस्ट मूवमेंट चलाया था ... सद्दाम हुसैन की विचारधारा काफी हद तक ऐसी थी लिहाजा उसने बाथ पार्टी ज्वाइन कर ली ... 
बाथ पार्टी की वैचारिक तौर पर अब्दुल करीमा कासिम का विरोध करती थी लिहाजा इराक में एक और तख्तापलट की तैयारी की जा रही थी ... बाथ पार्टी ने अब्दुल करीम कासिम की हत्या तक की तैयारी कर ली थी ... इसकी जिम्मेदारी उस वक्त 22 साल के सद्दाम हुसैन ने उठाई .. उन्होंने पहली बार 7 अक्टूबर 1959 को कासिम को घेर कर मारने की कोशिश की .. लेकिन कासिम दो गोलियां लगने के बाद भी बच गए ... सद्दाम हुसैन और उसके साथी कासिम को मरा समझकर वहां से भाग निकले थे .... इसके बाद चार साल तक सद्दाम हुसैन सीरिया और फिर इजिप्ट में रहा  ... 1963 में बाथ पार्टी ने रमादान रिवॉल्यूशन के ज़रिए अब्दुल करीम कासिम को सत्ता से बेदखल कर मौत के घाट उतार दिया ..और अब्दुल सलाम आरिफ इराक के राष्ट्रपति बन गए ... . ये वो वक्त था जब सद्दाम की इराक में वापसी होने वाली थी ... 
सद्दाम हुसैन इराक तो लौट आया लेकिन जनरल कासिम को मारने की नाकाम कोशिश की वजह  से सद्दाम पार्टी में अपनी मजबूत जगह नहीं बना पाया ... कहत हैं अपने वफादारों के साथ मिलकर सद्दाम ने अपनी ही पार्टी के राष्ट्रपति आरिफ को मारने की साजिश भी रची थी .. जिसके बाद 1964 में उसे गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया .. जेल में उसने दो साल बिताए... . हालांकि बहुत जल्द उसकी किस्मत बदलने वाली थी.... 
जुलाई 1968 में उसकी सद्दाम के करीबी अहमद हसन अल बाकर ने तख्तापलट के ज़रिए सत्ता हासिल कर ली ....  अल बाकर ने सद्दाम को सरकार में काफी पावरफुल बना दिय.... हालांकि उस वक्त अल बाकर को भी पता नहीं था कि सद्दाम इस पावर का कितना गलत इस्तेमाल करने वाला है .... सद्दाम बाथिस्ट सिक्युरिटी  सर्विस के नाम से अपनी सेना बना चुका था .. जिसमें उसने अपने ट्राइब के उन लोगों की भर्ती की जो ज्यादा पढे लिखे नहीं थे लेकिन मजबूत कद काठी के  थे ... सत्ता में नंबर 2 की पोजीशन पर रहने वाला सद्दाम ही दरअसल सरकार चला रहा था .. उस वक्त इराक में बहुत ज्यादा अनिश्चितता थी .. लोग कई ग्रुप में बंटे हुए थे ... शिया और सुन्नी एक दूसरे के खिलाफ थे ....अरब और कुर्द के बीच लड़ाइयां होती रहती थीं ... आर्थिक आधार पर भी लोग बंटे हुए थे ... सद्दाम ने शुरुआत के दिनों में इन सबको साथ लाने का काम किया साथ ही इराक की आर्थिक नीतियां भी बदल दीं ...  सत्तर के दशक में  सद्दाम ने ऑयल रिच इराक की समृद्धि का फायदा उठाकर "National Campaign for the Eradication of Illiteracy", Compulsory Free Education in Iraq के साथ साथ इराकी सैनिकों के परिवारों के लिए  free hospitalization और किसानों के लिए भारी सब्सिडी दिए जाने जैसे अभियान चलाए ... इसकी वजह से इराक में सद्दाम को एक प्रोग्रेसिव और प्रभावी राजनेता के तौर पर देखा जाने लगा ... इस दौरान इराक ने अपनी हेल्थ सर्विसेज इतनी बेहतर कर लीं कि सद्दाम को युनेस्को ने सम्मानित भी किया ... उस वक्त तक किसी को अंदाजा नहीं था कि आने वाले वक्त में सद्दाम हुसैन एक तानाशाह की तरफ व्यवहार करने लगेगा .... 
सद्दाम का असली नाम अब्द-अल-मजीद अल-टिकरीति था ... 1972 में अल बाकर के राष्ट्रपति रहते हुए इराक ने सोवियत संघ के साथ 15 साल तक सहयोग करने का एक समझौता किया था ...इस समझौते की वजह से इराक ने अमेरिका को अपना दुश्मन बना लिया...कहते हैं अमेरिका ने खुफिया तरीके से इराक में कुर्दिश विद्रोहियों की मदद करनी शुरू कर दी थी ... इराक में इसने तनाव को जन्म दिया... इधर अल बाकर बूढ़े हो चुके थे ..सरकार पूरी तरह से सत्ता में नंबर 2 सद्दाम हुसैन के मुताबिक चल रही थी ...  सद्दाम हुसैन ने सरकारी बैंकों पर परोक्ष रूप से अपना अधिकार कर लिया था... 
फिर आखिरकार वो साल आया जो सद्दाम हुसैन को ना सिर्फ राष्ट्रपति बनाने वाला था बल्कि दुनिया को एक तानाशाह से भी मिलवाने वाला था ... 1979 में अल बाकर ने सीरिया के साथ एक ट्रीटी साइन की थी ... इस ट्रीटी की वजह से सद्दाम हुसैन का एकछत्र राज खत्म हो सकता था.. इससे नाराज सद्दाम ने उनसे जबरन इस्तीफा दिलवा दिया ...  और खुद राष्ट्रपति बन गया ... 
राष्ट्रपति बनने के महज 6 दिन बाद 22 जुलाई 1979 को सद्दाम हुसैन ने बाथ पार्टी की मीटिंग बुलाई.. इस मीटिंग में उसने अदबेक हुसैन समेत पार्टी के कई सीनियर लीडर्स को अपने खिलाफ साजिश करने का दोषी बताया ... सद्दाम हुसैन ने एक के बाद एक 60 से ज्यादा लोगों के नाम लिए ... इन्हें धोखेबाज करार दिया गया और मौत की सज़ा सुना दी गई .. सद्दाम के फायरिंग स्कवॉड ने इन्हें मौत के घाट उतार दिया ... ये दरसअल सद्दाम का पार्टी के बाकी बचे लोगों को एक मैसेज था कि वफादार रहो नहीं तो अंजाम भुगतो.... ये अब भी इराक के इतिहास की सबसे खूनी घटना मानी जाती है ... इस घटना ने सद्दाम हुसैन को एक तानाशाह की भी पहचान दे दी .. यहीं से इराक में सद्दाम के 24 साल चले तानाशाही शासन की शुरुआत भी हुई ... 
सद्दाम हुसैन ने अपनी सेना में ज्यादातर ग्रामीण इलाकों से आए लड़कों की भर्ती की थी ... उन्हें पैसा, घर जैसी हर सुविधाएं दी जाती थीं .... वो सद्दाम हुसैन को ही अपना सबकुछ मानने लगे थे ... इसी सेना की बदौलत सद्दाम ने इराक के लोगों में खौफ पैदा करने लगा ... उसके शासनकाल नें विरोध  करने वालों को किडनैप कर लिया जाता.. उसे भयंकर यातनाएं दी जातीं और फिर हत्या कर दी जाती ... सद्दाम के सैनिक टॉर्चर करने के लिए तरह तरह के रौंगटे खड़े  कर देने वाले तरीके आजमाते ... 
सद्दाम कभी भी आर्मी में नहीं रहा था लेकिन हमेशा वो युनिफॉर्म में नज़र आता .. जिसमें खुद को दिए गए मेडल सजाकर रखता ... सद्दाम ने 1980 में ईरान के पानी और नए नेता खुमैनी से नाराज होकर युद्ध छेड़ दिया .. ये लड़ाई आठ साल तक चलती रही ... इराक की कुल आबादी के 60 फीसदी शिया समुदाय के थे जबकि सद्दाम खुद सुन्नी था ... उसे हमेशा अपनी सत्ता जाने का खतरा रहता था ... इसीलिए शिया बहुल ईरान भी उसे अपना दुश्मन नज़र आता ... 8 साल बाद बिना किसी नतीजे के ये लड़ाई खत्म हो गई लेकिन इसमें एक अनुमान के मुताबिक 10 लाख लोग मारे गए .. और दोनों देशों की आर्थिक हालत खस्ता हो गई ... 
सद्दाम ने अपने देश में अल अनफाल कैम्पेन चलाया... इसके तहत कुर्दिश लोगों का नरसंहार किया गया ... इस कैम्पेन के शबक, यज़ीदी, पेशमर्गा, तुर्कोमान लोगों को निशाना बनाया गया .. इनके गांव तबाह कर दिए गए .. कहते हैं इसमें लगभग 2 लाख लोग मौत के घाट उतार दिए गए ... इसमें सबसे घातक हमला इराक-ईरान की सीमा पर बसे हेलबजा शहर पर किया गया हमला था ... सद्दाम एकमात्र ऐसा तानाशाह है जिसने अपने ही लोगों पर अपनी आर्मी के जरिए केमिकल अटैक करवाया ... मिनटों में कुर्दों का हेलबजा शहर घातक मस्टर्ड गैस की वजह से कब्रिस्तान बन चुका था ... 
ईरान के साथ युद्ध के दौरान इराक कर्ज में डूब गया था ... सद्दाम हुसैन ने कुवैत से 30 बिलियन डॉलर का ये कर्ज माफ कर देने को कहा लेकिन कुवैत ने साफ मना कर दिया ... इसने सद्दाम को नाराज कर दिया था... कुवैत के साथ इराक के रिश्ते बिगड़ने लगे ... लिहाजा सद्दाम ने 1990 में कुवैत पर हमला कर दिया ... सद्दाम की इस हरकत के बाद युनाइटेड नेशंस को दखल देनी पड़ी... अपने तानाशाही रवैये की बदौलत सद्दाम अब पश्चिमी देशों को खटकने लगा था .. आखिरकार इस गल्फ वॉर में इराक की हार हुई और सद्दाम हुसैन को पीछे हटना पड़ा ... लेकिन लड़ाई यहीं नहीं रुकी ..  सद्दाम के अंत के साथ ही इसका अंत होना था ... 
खाड़ी युद्ध ने सद्दाम के खात्मे की स्क्रिप्ट तैयार कर दी थी ... खाड़ी युद्ध के बाद सद्दाम सरकार पर परमाणु हथियार बनाने पर रोक लगा दी गयी ... अमेरिका ने इराक को चेतावनी दी कि वो विश्व शांति के लिए परमाणु हथियारों के निर्माण को बिना शर्त बंद कर दे लेकिन सद्दाम ने अमेरिका की चेतावनी पर ध्यान नही दिया ....  इसके बाद अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय की ओर से इराक पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगे जिससे इराक की अर्थ व्यवस्था चरमराने लगी... 
इस हालात में इराक में जगह जगह  पर विद्रोह होने लगे.. सद्दाम को अपनी सत्ता जाने का भी खतरा सताने लगा था ... सद्दाम ने इस दौरान खुद को  सच्चा मुसलमान बताना शुरू किया ... वो इराक में मस्जिदें बनवाने लगा ... शरिया कानून के कुछ हिस्से को देश में लागू कर दिया गया .. यहाँ तक कि नेशनल फ्लैग में सद्दाम के हाथों लिखा गया अल्ला हू अकबर जोड़ दिया गया ... कहते हैं सद्दाम में एक कुरान लिखने के लिए अपना 26 लीटर खून दिया ... 605 पन्नों में सद्दाम के खून से लिखी गई ये कुरान आज भी सद्दाम की ही बनवाई एक मस्जिद में मौजूद है .. जिसे एक शीशे के केस में रखा गया है ... 
सद्दाम अपने निजी जीवन में भी सनकी था ... सद्दाम हुसैन की 3 बीवियाँ और 6 बच्चे थे ... कहते हैं कि उसके साथ कई मिस्ट्रेस भी रहा करती थीं ... सद्दाम हुसैन की एक ऐसी ही प्रेमिका का नाम शकरा था.. शकरा ने इराक के एक बिजनेसमैन से शादी की थी लेकिन सद्दाम ने उसे पाने के लिए बिजनेसमैन की हत्या करा दी थी .. बाद में शकरा ने खुद इसका खुलासा किया था ... शकरा के मुताबिक सद्दाम मारा पीटा करता था.. यहाँ तक कि सद्दाम के बेटे ने शकरा की बेटी के साथ रेप भी किया था ... आखिरकार सद्दाम के विरोधियों की मदद से शकरा भाग निकलने में कामयाब हुई थी ...
देश की खराब अर्थव्यवस्था और जाति विशेष को लेकर नफरत भरी कार्रवाई का नतीजा था कि अपने ही देश सद्दाम हुसैन की लोकप्रियता नफरत की शक्ल ले चुकी थी ...दूसरा अमेरिका और ब्रिटेन की नज़रों में तो वो खटक ही रहा था ... साल 2000 में अमेरिका में जॉर्ज बुश की ताजपोशी ने सद्दाम सरकार पर दबाव और ज्यादा बढ़ा दिया 
इराक पर वेपन्स ऑफ मास डिस्ट्रक्शन यानि नरसंहार के अस्त्र जुटाने के आरोप लग रहे थे ... साल 2002 में सयुंक्त राष्ट्र के दल ने इराक का दौरा किया और इस दौरान इराक की कई मिसाइलों को खत्म किया गया...  मार्च 2003 में अपने कुछ सहयोगी देशों के साथ मिलकर अमेरिका ने इराक पर हमला कर दिया ..  09 अप्रैल 2003 को सद्दाम हुसैन सरकार को गिरा दिया गया और 20 मार्च को इराकी सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया था ..  इसके बाद सद्दाम हुसैन अंडरग्राउंड हो गया था... बाद में सद्दाम की तलाश के ऑपरेशन रेड डॉन शुरू हुआ ...  सद्दाम हुसैन के लिए इराक के लोगों की नफरत उस वक्त सामने आई जब उसकी एक मूर्ति को अमेरिकी सैनिकों ने तोडना शुरू किया ... वहाँ मौजूद इराकी लोग भी इसमें शामिल हो गए और मूर्ति पर अपना गुस्सा उतारा 
13 दिसंबर 2003 को आखिरकार तिकरित के पास एक गड्ढे में छिपे हुए सद्दाम हुसैन को ढूंढ निकाला गया ... उसके खिलाफ अदालती कार्रवाई की गई और 5 नवंबर 2006 को सद्दाम हुसैन को फांसी की सज़ा सुना दी गई ....इसके 25 दिन बाद 30 दिसंबर को सद्दाम को फांसी पर लटका दिया गया ... फांसी दिए जाने की पूरी कार्रवाई को इराक के नेशनल टेलीविजन पर दिखाया गया ...  इराक के इस तानाशाह का कुछ इस तरह हुआ ... हालांकि इसके बाद भी सद्दाम हुसैन सुर्खियों में आता रहा है ... दफनाए जाने के 12 साल बाद अचानक सद्दाम हुसैन का शव कब्र से गायब हो गया था ... उसके गाँव में टूटी हुई खाली कब्र देखी गई .. फिर उसके शव का कोई पता नहीं चला .. हालांकि इराक में आज भी कुछ लोग सद्दाम को शहीद का दर्जा देते हैं और हर साल उसके दफनाए गए जगह पर लोगों का जमावड़ा लगता है

cuba

क्यूबा का करिश्माई नेता या तानाशाह ? 
क्यूबा के करिश्माई लीडर फिदेल कास्त्रो ने एक छोटे से आयरलैंड के नेता के तौर पर कई दशक तक दुनिया के सबसे ताकतवर माने जाने वाले देश की नाक में दम कर दिया था ... हालांकि फिदेल की नीतियों की वजह से उसके अपने देश के लोगों ने काफी बुरा वक्त देखा ..
एक समृद्ध परिवार में जन्मे फिदेल ने अपने देश में बदलाव के लिए सुविधाओं से भरी अपनी जिंदगी छोड़ दी थी ... अपनी ही सरकार की तानाशाही के खिलाफ इसने विद्रोह को जन्म दिया ... फिदेल की अगुवाई में क्यूबा में एक और तख्तापलट हुआ .. 
13 अगस्त 1926 को फिदेल कास्त्रो का जन्म एक समृद्ध गन्ना किसान के घर में हुआ था ..उसके पिता एंजेल कास्त्रो स्पेन से आकर क्यूबा में बस गए थे ... कहते हैं कि फिदेल कास्त्रो अपने पिता की नाजायज़ औलाद था .. और उसकी मां कास्त्रो परिवार की कुक थीं ... बाद में एंजेल कास्त्रो अपनी कुक से शादी कर ली ... फिदेल कास्त्रो 8 भाई बहनों में से एक था ... जिसकी शुरुआती शिक्षा कैथोलिक स्कूल में हुई थी... 
पढाई और खेलकूद में अच्छा होने की वजह से फिदेल को स्कूल और फिर कॉलेज में काफी पसंद किया जाता था .... कास्त्रो को 1944 में बेस्ट एथलीट भी चुना गया ... 1945 में कॉलेज ज्वाइन करने के बाद फिदेल कास्त्रो हवाना की युनिवर्सिटी में उस वक्त चल रहे कई राजनीतिक गुटों में से एक से जुड़ गया ... 
1950 में डिग्री हासिल करने से पहले फिदेल कास्त्रो राजनीति में एक्टिव हो चुका था ...फिदेल लॉ स्टूडेंट फेडरेशन लीड कर रहा था .. एक नए बने लिबरल रिफॉर्मिस्ट पार्टी की मेंबरशिप हासिल कर ली थी ...  कोलंबिया और जमैका में हुए दो बड़े पॉलिटिकल अपराइजिंग का हिस्सा रह चुका था ... .. लेकिन फिदेल के रिवल्यूशनरी बनने की शुरुआत जनरल बटिस्टा के मिलिट्री कूप के बाद सत्ता हथिया लेने की जबरन कोशिशों के बाद हुई
1952 में जनरल बटिस्टा ने विद्रोह कर क्यूबा की सत्ता पर जबरन कब्जा कर लिया था ... फिदेल कास्त्रो ने इसके साथ ही विद्रोह की शुरुआत कर दी ... गुरिल्ला वारफेयर से लड़ते हुए फिदेल देश में तख्तापलट की तैयारी कर रहा था .. 1953 में फिदेल कास्त्रो ने अपने भाई राउल कास्त्रो और 150 समर्थकों के साथ सैंटियागो डी कयूबा में मोंकाडा बैरक पर हमला कर दिया ... ये हमला विफल रहा .. कास्त्रो के कई समर्थक मारे गए और वो खुद गिरफ्तार हो गया... उस पर मुकदमा चलाया गया और 15 साल की कैद की सज़ा दी गई... ट्रायल के दौरान कास्त्रो ने जो कुछ कहा उनमें से कुछ पंक्तियां हमेशा याद की जाती हैं .. कास्त्रो ने कहा था कि कैद उनके लिए मुश्किल होगी लेकिन उन्हें इससे डर नहीं लगता ... ना ही उन्हें अपने 70 साथियों की जान लेने वाले तानाशाह से डर लगता है ... कास्त्रो ने इसी ट्रायल के दौरान कहा था 
“ Condemn me. It does not matter. History will absolve me.” यानि मुझे सज़ा दो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, इतिहास मुझे हर अपराध से मुक्त कर देगा” ... ये फिदेल कास्त्रो का ऐसा कथन है जिसे अभी भी याद किया जाता है ... 
कास्त्रो को जेल में डाल दिया गया .. हालांकि एक साल के बाद उसे रिहा भी कर दिया गया ... जिसके बाद मेक्सिको जाकर उसने  क्रांतिकारियों की नई सेना तैयार की जो क्यूबा का भविष्य बदलने वाली थी .... 
आखिरकार 1959 में फिदेल अपने समर्थकों के साथ तानाशाह जनरल बटिस्टा की सरकार को पलटने में कामयाब रहा ... करिश्माई व्यक्तित्व के धनी फिदेल कास्त्रो में क्यूबा की जनता को बेहतर भविष्य दिख रहा था ... फिदेल कास्त्रो ने भी लोगों से लोकतंत्र और आज़ादी का वादा किया .... इसी दौरान एक इंटरव्यू में लैटिन अमेरिकी देशों में तानाशाहों के राज पर पूछे गए सवाल के जवाब में फिदेल कास्त्रो ने कहा ... ‘क्यूबा पर अब किसी तानाशाह को राज करने की इजाज़त नहीं दी जाएगी ... और लोग निश्चिंत रहें कि जनरल बटिस्टा क्यूबा का आखिरी तानाशाह साबित होगा ...’ अपने ऐसे बयानो की वजह से फिदेल कास्त्रो लोगों में काफी लोकप्रिय होता जा रहा था 
क्यूबन रिवॉल्यूशन के नायक, क्यूबा के सशस्त्र बलों के कमांडर इन चीफ कास्त्रो ने उस वक्त प्रधानमंत्री रहे प्रोफेसर जोस मिरो कार्डोना को हटाकर खुद 16 फरवरी 1959 को क्यूबा के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ले ली ... लॉ के प्रोफेसर जोस मिरो कार्डोना को उदारवादी माना जाता था... उस वक्त क्यूबा के राष्ट्रपति रहे उदारवादी मैनुअल उर्रुटिया ने चुनाव कराने पर जोर दिया ... लेकिन कास्त्रो ने स्वतंत्र चुनाव का विरोध किया और नारा दिया ... ‘क्रांति पहले चुनाव बाद में ...’ 
प्रधानमंत्री बनते ही फिदेल ने अमेरिकी कब्जे वाली सारी संपत्तियों पर कब्जा करना शुरू कर दिया.. एक अनुमान के मुताबिक उस वक्त इनकी कीमत 1 बिलियन यूएस डॉलर थी   ... इस दौरान कई लोगों को क्रांति का दुश्मन करार दिया गया ,, उन्हें या तो जेल मे डाल दिया गया या फिर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई... मीडिया पर पूरी तरह से सरकार का कब्जा हो गया .. स्कूल का पाठ्यक्रम भी बदल दिया गया .. इससे परेशान होकर कई समृद्ध परिवार क्यूबा छोड़कर बाहर चले गए ... 
1960 में फिदेल सरकार ने सोवियत संघ के साथ तेल खरीदने को लेकर समझौता किया .... इससे अमेरिका के साथ संबंध और खराब हो गए ... परिणाम के तौर पर क्यूबा से अमेरिका ने सारे कूटनीतिक संबंध खत्म कर लिए ... परोक्ष रूप से अमेरिका ने फिदेल कास्त्रो को सत्ता से हटाने के लिए कई तरह की साजिश की .. जिसमें फिदेल की हत्या करने, आर्थिक प्रतिबंध लगाने, क्रांति के जरिए सत्ता पलटने जैसी साजिशें शामिल थीं ... 1961 में कभी फिदेल कास्त्रो के करीबी और क्यूबा के पूर्व प्रधानमंत्री प्रोफेसर जोस मिरो कार्डोना को आगे कर अमेरिका ने  बे ऑफ पिग्स इनवेजन की साजिश रची ... हालांकि अमेरिका की ये कोशिश विफल हो गई ...लगभग 1200 विद्रोही पकड़ लिए गए जिन्हें फिदेल सरकार ने 25 मिलियन यूएस डॉलर लेने के बाद वापस अमेरिका को सौंपा ... इस घटना ने लैटिन अमेरिकी देशों में फिदेल कास्त्रो की लोकप्रियता बढा दी लेकिन क्यूबा के कई मध्यमवर्गीय़ परिवार सरकार के निशाने पर आ गए ... कई लोग क्यूबा छोड़ने पर मजबूर हो गए... देश की राजनीति में भी कास्त्रो का विरोध शुरू हो गया था लेकिन बहुत जल्द विरोध करने वाले राष्ट्रपति को उनके पद से इस्तीफा देना पड़ा और कास्त्रो ने ओसवाल्डो डोर्तिकोस को नया राष्ट्रपति बना दिया ... 
1961 आते आते फिदेल ने क्यूबा को समाजवादी राष्ट्र घोषित कर दिया था ... और सरकारी तौर पर बहुदलीय चुनाव भी खत्म कर दिया... कहते है फिदेल डरने लगा था कि अगर चुनाव हुए तो उसे हार का सामना करना पड़ेगा ..... 1962 के मिसाइल संकट ने फिदेल की मुश्किलें और बढ़ा दीं ... 
अमेरिका से बढ़ते खतरे को देखते हुए फिदेल कास्त्रो ने सोवियत संघ को क्यूबा में मिसाइलें रखने की इजाज़त दे दी थी ... ये आइडिया  सोवियत संघ की तरफ से ही आया था ... सबकुछ काफी गुपचुप तरीके से किया गया लेकिन अमेरिकी टोही विमानों ने इसका पता लगा लिया था ... और उस वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति रहे जॉन एफ कैनेडी ने Naval blockade यानि नौसैनिकों की नाकाबंद के आदेश दे दिए .. 
अमेरिका ने इसे युद्ध की तैयारी के तौर पर देखा जबकि फिदेल कास्त्रो इसे क्यूबा  की सुरक्षा के लिए ज़रूरी बता रहे थे ... हालांकि ये विवाद बढ़ता रहा .. हालात इतने खराब हो गए कि ऐसा लगने लगा कि सोवियत संघ और अमेरिका के बीच परमाणु युद्ध शुरू हो जाएगा ... कहा जाता है कि उस वक्त फिदेल ने क्यूबा पर अमेरिकी हमले की दशा में सोवियत संघ से अमेरिका के खिलाफ परमाणु युद्ध छेड़ने की गुजारिश तक कर दी थी ... हालांकि सोवियत संघ और अमेरिका ने आपसी बातचीत के बाद मामला सुलझा लिया ... सोवियत संघ ने क्यूबा पर हमला ना करने की शर्त रखी और अमेरिका ने इसका प्रचार नहीं करने को कहा ... लिहाजा सोवियत ने क्यूबा से मिसाइलें हटा लीं
फिदेल कास्त्रो अपनी मनमानिय़ों की वजह से देश को युद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया था .. वहीं दूसरी तरफ देश में गरीबी बढ़ती जा रही थी .. अनिश्चितता का माहौल बनने लगा था ...  देश अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए दूसरे देशों की मदद पर निर्भर हो गया था .. ये लंबे वक्त तक चलता रहा .. विरोधियों को दबाते हुए फिदेल कास्त्रो एकतऱफा फैसले लेते जा रहे थे जिसका खामियाजा क्यूबा के नागरिकों को भुगतना पड़ रहा था ... जब 1991 में सोवियत संघ का विघटन हुआ तो क्यूबा को मिलने वाला आर्थिक मदद भी बंद हो गया ... लिहाजा देश में गरीबी और भुखमरी बढ़ने लगी .. लोग हजारों की संख्या में अमेरिका के दूसरे राज्यों का रुख करने लगे और उनसे शरण मांगने लगे ... अपने ही देश में फिदेल कास्त्रों की नीतिया विध्वंसकारी साबित हो रही थीं ... इसका असर लैटिन अमेरिका के उन देशों पर भी हो रहा था जो अब तक फिदेल से काफी प्रभावित रहे थे ... 
1994 आते आते क्यूबा में गैस, पानी, बिजली यहाँ तक कि भोजन की आपूर्ति पर भी संकट खड़ा हो गया था ... क्यूबा के इतिहास में इस पीरियड को विशेष अवधि कहा जाता है ... 
अपने देश में गंभीर हालात पैदा करने वाले फिदेल कास्त्रो ने अमेरिका के लिए मुश्किलें खड़ी की थीं... लिहाजा कहा जाता है कि अमेरिका लगातार फिदेल कास्त्रो के खात्मे की योजना पर काम कर रहा था ... एक आधिकारिक आंकड़े के मुताबिक फिदेल कास्त्रो को मारने की 638 बार कोशिश की गई .. कहते हैं सिगार पीने के शौकीन फिदेल कास्त्रो को एक बार विस्फोटक सिगार से मारने की कोशिश की गई थी ...फफूंद लगे ज़हरीले स्कूबा डाइविंग सूट, माफिया तरीके से शूट करने जैसे कई कोशिशों से फिदेल को मारने की साज़िश रची गई .. फिदेल की  प्रेमिका रही मारिता लॉरेन्ज ने भी CIA  के कहने पर फिदेल को ज़हर देने की कोशिश की थी ... कहते हैं कि फिदेल ने खुद ही मारिता के हाथ में पिस्तौल दे दिया था लेकिन मारिता उसे मार नहीं सकीं ... हर बार फिदेल खुद को बचाने में कामयाब रहा था... एक बार फिदेल कास्त्रो ने कहा था , ‘हत्या की कोशिशों से बचने पर अगर ओलंपिक का आयोजन किया जाता तो मैं स्वर्ण पदक जीत जाता ... ‘ फिदेल कास्त्रो की हत्या की कोशिशों पर 638 वेज़ टू किल कास्त्रो के नाम से एक डॉक्यूमेंट्री बनाई गई है जिसमें सारी साजिशों का खुलासा किया गया है... 
कहते हैं फिदेल कास्त्रो ने बचपन में ही सिगार पीना शुरू कर दिया था... लेकिन उसने कभी भी सिगार का धुंआ अंदर नहीं लिया ... और 1985 आते आते उसने सिगार छोड़ दी .. फिदेल की सेक्स लाइफ के बारे में एक बार उनके अधिकारी ने अजीबोगरीब खुलासे किए थे ... जिसके मुताबिक फिदेल रोजाना दो महिलाओं से संबंध बनाता था... और ऐसा लगभग चार दशकों तक चला .... फिदेल के बारे में ये भी मशहूर है कि वो हमेशा अपने पास एक पिस्तौल रखा करता था .. कहते हैं कि फिदेल कास्त्रो के कार्यकाल में क्यूबा आने वाले टूरिस्ट्स की संख्या बढ गई थी .. दरअसल लोग ये देखना चाहते थे कि कौन सा ऐसा देश है जिसने अमेरिका की नाक में दम कर रखा है ... 
फिदेल ने इतने लंबे समय तक क्यूबा पर शासन किया था कि उतने दिनों में अमेरिका ने आइज़ेन हावर से लेकर जॉर्ड डब्ल्यू बुश तक 10 राष्ट्रपति देखे ... सत्ता से बेदखल करने की तमाम कोशिशों के बाद आखिरकार फिदेल ने अपनी मर्जी से 2008 में सत्ता अपने भाई राउल कास्त्रो को सौंप दी थी ...
फिदेल कास्त्रो के नाम सबसे लंबा भाषण देने का भी रिकॉर्ड भी गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज है…  संयुक्त राष्ट्र में 29 सितंबर 1960 को फिदेल ने चार घंटे, 29 मिनट का भाषण दिया था... इसके अलावा फिदेल ने क्यूबा के हवाना में कम्युनिस्ट पार्टी कांग्रेस के कार्यक्रम में सात घंटे 10 मिनट का सबसे लंबा भाषण दिया था ... हालांकि अब ये रिकॉर्ड टूट चुका है ... 
90 साल की उम्र में फिदेल कास्त्रो अपनी स्वाभाविक मौत मरा ...फिदेल के भाई राउल कास्त्रो ने क्यूबा के नेशमल टेलीविजन पर उनकी मौत की खबर खुद दी ...  फिदेल की मौत पर क्यूबा में 9 दिन का राजकीय शोक भी मनाया गया ... 
फिदेल की जिंदगी से लेकर मौत हो जाने के बाद तक लोग अभी तक इसपर बहस करते हैं कि फिदेल कास्त्रो को एक क्रांतिकारी के तौर पर देखा जाए या फिर एक तानाशाह माना जाए .. फिदेल की मौत पर अमेरिकी राष्ट्रपति रहे बराक ओबामा ने कहा था कि इतिहास खुद ये तय करेगा कि फिदेल ने अपने लोगों और दुनिया पर कितना प्रभाव डाला .. वहीं रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा ‘आधुनिक विश्व इतिहास में फिदेस कास्त्रो को एक युग का प्रतीक माना जाएगा... फिदेल कास्त्रो रूस के एक ईमानदार और विश्वसनीय दोस्त थे। "