मंगलवार, 23 जून 2020

Indo china

बीते कुछ साल में भारत के पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद गहराता जा रहा है इसे लेकर हमारे रिश्ते भी खराब हुए हैं ... ऐसे में सवाल उठते हैं कि मौजूदा सरकार ने जिस तरह से विदेश नीति को संभाला है क्या इस पर विचार करने की ज़रूरत है ... एलएसी पर अपने 20 जवानों की शहादत, नेपाल का एकतरफा नक्शा बदल लेना और भारत पाकिस्तान की सीमा पर लगातार तनाव बना रहना... ऐसा एक साथ पहले कभी नहीं हुआ ....
देश में बीजेपी की अगुआई वाली सरकार के बाद से विदेश नीति में फर्क नज़र आ रहा है .. ऐसा भले ही लगता हो कि पड़ोसी देशों के दौरे और उनके नेताओं के साथ नजदीकी के जरिए रिश्ते मजबूत किए जा रहे हैं... भले ही ऐतिहासिक दोस्ती की मिसाल देने की कोशिश की गई हो लेकिन कथनी-करनी में फर्क साफ नज़र आता है .... 
भारत कभी विस्तारवादी नीतियों का पक्षधर नहीं रहा लेकिन अपने एक्शन और बयानबाजी के ज़रिए कई बार इस तरह के मैसेज देने की कोशिश की गई जिसने भारत के पड़ोसी देशों को असहज कर दिया है ... ये असहजता सिर्फ पड़ोसी देशों में नहीं बल्कि उन देशों में भी दिखी है जो कभी भारत के Non Align Movement के समर्थन वाली पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु की नीति की वजह से भारत के साथ सहज महसूस करते थे ... इसकी वजह अमेरिका के साथ नजदीकियां तो हैं हीं ... साथ ही अमेरिका के कुछ चुनिंदा देशों के विरोध वाली कार्रवाई पर खामोशी भी है । भारत -पाक मसला हो या फिर भारत चीन के बीच बिगड़ते संबंध हों, अमेरिका हर मामले में बिना बुलाए मध्यस्थता के लिए तैयार हो जाता है दूसरी तरफ भारत है जिसने अमेरिका से नजदीकियां बढाने की होड़ में अपने टाइम टेस्टेड दोस्तों के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई पर भी चुप्पी नहीं तोड़ी है, चाहे ये इराक के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई हो या फिर ईरान के खिलाफ ... यहाँ ये जानना ज़रूरी है कि इराक मिडिल ईस्ट के उन देशों में शामिल है जिसके साथ भारत ने 1947 में सबसे पहले राजनयिक संबंध बनाए थे ... रूस हमेशा से भारत का दोस्त रहा है और नाजुक वक्त में भारत के साथ मजबूती से खड़ा दिखा है । लेकिन रूस विरोधी अमेरिकी बयानों और नीतियों पर भी मौजूदा नेतृत्व ने खामोशी बनाए रखी है।
इतना ही नहीं भारत के अमेरिका की तरफ स्पष्ट झुकाव और Non Alignment की नीति से इतर होने की वजह से भी साउथ एशियन देशों में भी बेचैनी बढ़ी है .... अमेरिका के साथ भारत की नजदीकियां बढ़ते ही सीमा पर पाकिस्तान और चीन की बेजा हरकतें बढ़ने लगती हैं और भारत विरोधी बयान सामने आने लगते हैं। ऐसे में वर्तमान हालात में भारतीय विदेश नीति में ना तो स्पष्टता दिखती है ना हीं मजबूती ..
मौजूदा हालात में जब भारतीय सीमा विवाद गहराता जा रहा है तो देश एक बार फिर अपने Time Tested रिश्तों की तरफ देख रहा है ... यही वजह है कि रूस के साथ RIC की बैठक में भी विदेश मंत्री एस जयशंकर अंतर्राष्ट्रीय नियमों के पालन, साथी देशों के हितों का सम्मान और बहुपक्षीयता की वकालत करते नज़र आए हैं ... तो ने रूस हमेशा की तरह अपनी दोस्ती निभाते हुए भारत को यूएन में स्थायी सदस्यता दिलाए जाने की वकालत की है ...

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