गुरुवार, 25 जून 2020

indo china

भारत-चीन सीमा से लगातार परेशान करने वाली खबरें आ रही हैं .. भले ही सरकार की तरफ से कहा जा रहा हो कि बातचीत के जरिए विवाद का हल निकाला जा रहा है और सकारात्मक बातचीत हो रही है लेकिन असल तस्वीरें इन दावों से इतर हैं । चीन दो कदम आगे आता है और एक कदम पीछे हटता है ... विवादित जगह पर अपने टेंट लगाता है और भारत की पेट्रोलिंग पार्टी को रोकता है ऐसे सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह है कि भारत सरकार चीन की तरफ से एक के बाद एक पूर्व समझौतों के उल्लंघन के बावजूद उस तरह की आक्रामकता नहीं दिखा पा रही है। जिस तरह की 2014 के पहले देखने को मिला करती थी। जहां तक सैन्य ताकत का सवाल है, भारत की सेना दुनिया की श्रेष्ठतम सेनाओं में से एक है। सामरिक दृष्टि से भारत की तैयारी दुनिया के तमाम शक्तिशाली देशों के बराबर की है। बावजूद इसके भारत की तरफ से रक्षात्मक रुख के पीछे क्या व्यवसायिक और वाणिज्यिक दबाव है?

ये सर्वविदित है कि भारत की निर्भरता चीन से आयातित वस्तुओं पर ज़्यादा है। हम अपनी जरूरत की कई चीजों का करीब 80% इंपोर्ट करते हैं । इलेक्ट्रिक मशीनरी और इक्विपमेंट, रिएक्टर्स, बॉयलर्स मशीनरी, मेकैनिकल अप्लायंसेज, आर्गेनिक केमिकल्स, दवाइयां, प्लास्टिक, इलेक्ट्रॉनिक्स यहाँ तक की खाद भी चीन से इंपोर्ट करते हैं । हम चीन को अपना सामान बेचते भी हैं ... भारत चीन को कॉटन, कॉपर, हीरा और दूसरे प्राकृतिक रत्न, आईटी सेवाएं और इंजीनियरिंग सेवाएं देता हैं । ना सिर्फ व्यापार ब्लकि हमारे देश में स्टार्टअप बिजनेस में चीन का निवेश 3.9 बिलियन डॉलर का है....वहीं चीन का दावा है कि दिसंबर, 2019 तक उसने भारत में 8 बिलियन डॉलर का निवेश किया...अगर चीन के अलग-अलग स्रोतों से भारत में कुल निवेश जोड़ें तो ये करीब 26 बिलियन डॉलर का है, जो की कई भारतीय स्टार्टअप में पैसा लगाता है.....जिसमें पेटीएम, ओला, ओयो रूम्स, स्नैपडील, BYJU’S जैसी कंपनियां शमिल है....

जानकारों का मानना है कि अगर चीन से हमारे संबंध बिगड़ते हैं तो उसका सीधा असर भारतीय बाज़ार और भारतीय कंपनियों पर भी पड़ेगा।
सांकेतिक तौर पर भले ही हम चीन से इंपोर्ट घटाने और घरेलू मांग की आपूर्ति अपने है देश में पैदा करके पूरी करने कि बातें कर रहे हैं लेकिन सच्चाई इससे मीलों दूर है। पिछले कुछ वर्षों में हमारी स्थिति एक मैन्युफैक्चरिंग नेशन के बजाय एक ट्रेडर की रही है। हमारे देश की ज़्यादातर कंपनियों ने इंडिया में मैन्युफैक्चरिंग करने के बजाए चाइनीज़ प्रोडक्ट्स को इंपोर्ट करके उसकी ट्रेडिंग की है, और इससे बेतहाशा मुनाफा कमाया है।
वाणिज्यिक और व्यावसायिक दबाव के कारण ही हम शायद हम चीन के साथ लाल लाल आंखें करके अपनी बात कहने में थोड़े रक्षात्मक दिखाई दे रहे हैं। 1962 से छीन की रणनीति हमेशा से दगाबाजी और वादाखिलाफी की रही है। लेकिन 1962 की घटना के बाद से भारत की सरकारों ने चीन की इस दगाबाजी के कदम का बहादुरी से जवाब दिया था। कई बार चीन को शिकस्त भी दी। इंदिरा गांधी ने दो बार और राजीव गांधी ने एक बार कूटनीतिक और सामरिक तौर पर सबक सिखाया था।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों से चीन अपने पुराने रास्ते पर चल पड़ा है। उसकी रणनीति एक तरफ दोस्ती का नाटक करके  और कूटनीतिक वार्ताएं करके भारत को उलझाए रखने की और दूसरी तरफ LAC पर घुसपैठ जारी रखने की रही है। भारत सरकार ने खुद माना है कि बीते कुछ महीनों में चीन की तरफ से 170 बार घुसपैठ की कोशिश हुई है। चीन की नीयत को समझने के लिए हाल ही में लद्दाख में हुई घटनाओं पर नजर डालना ज़रूरी है। एक तरफ भारत और चीन के सैन्य अधिकारियों में बातचीत चल रही थी दूसरी तरफ चीन की सेना का जमावड़ा बढ़ रहा था जिसकी वजह से 20 भारतीय जवानों की शहादत हुए और कुछ अगवा करके छोड़े गए। 

भारत सरकार को व्यावसायिक और वाणिज्यिक हितों से ज़्यादा देश की रक्षा और संप्रभुता पर ध्यान देना चाहिए। और चीन के साथ चल रही वार्ताओं पर भरोसा करने से ज़्यादा अपने हितों के बारे में सोचना चाहिए।

मंगलवार, 23 जून 2020

Indo china

बीते कुछ साल में भारत के पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद गहराता जा रहा है इसे लेकर हमारे रिश्ते भी खराब हुए हैं ... ऐसे में सवाल उठते हैं कि मौजूदा सरकार ने जिस तरह से विदेश नीति को संभाला है क्या इस पर विचार करने की ज़रूरत है ... एलएसी पर अपने 20 जवानों की शहादत, नेपाल का एकतरफा नक्शा बदल लेना और भारत पाकिस्तान की सीमा पर लगातार तनाव बना रहना... ऐसा एक साथ पहले कभी नहीं हुआ ....
देश में बीजेपी की अगुआई वाली सरकार के बाद से विदेश नीति में फर्क नज़र आ रहा है .. ऐसा भले ही लगता हो कि पड़ोसी देशों के दौरे और उनके नेताओं के साथ नजदीकी के जरिए रिश्ते मजबूत किए जा रहे हैं... भले ही ऐतिहासिक दोस्ती की मिसाल देने की कोशिश की गई हो लेकिन कथनी-करनी में फर्क साफ नज़र आता है .... 
भारत कभी विस्तारवादी नीतियों का पक्षधर नहीं रहा लेकिन अपने एक्शन और बयानबाजी के ज़रिए कई बार इस तरह के मैसेज देने की कोशिश की गई जिसने भारत के पड़ोसी देशों को असहज कर दिया है ... ये असहजता सिर्फ पड़ोसी देशों में नहीं बल्कि उन देशों में भी दिखी है जो कभी भारत के Non Align Movement के समर्थन वाली पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु की नीति की वजह से भारत के साथ सहज महसूस करते थे ... इसकी वजह अमेरिका के साथ नजदीकियां तो हैं हीं ... साथ ही अमेरिका के कुछ चुनिंदा देशों के विरोध वाली कार्रवाई पर खामोशी भी है । भारत -पाक मसला हो या फिर भारत चीन के बीच बिगड़ते संबंध हों, अमेरिका हर मामले में बिना बुलाए मध्यस्थता के लिए तैयार हो जाता है दूसरी तरफ भारत है जिसने अमेरिका से नजदीकियां बढाने की होड़ में अपने टाइम टेस्टेड दोस्तों के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई पर भी चुप्पी नहीं तोड़ी है, चाहे ये इराक के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई हो या फिर ईरान के खिलाफ ... यहाँ ये जानना ज़रूरी है कि इराक मिडिल ईस्ट के उन देशों में शामिल है जिसके साथ भारत ने 1947 में सबसे पहले राजनयिक संबंध बनाए थे ... रूस हमेशा से भारत का दोस्त रहा है और नाजुक वक्त में भारत के साथ मजबूती से खड़ा दिखा है । लेकिन रूस विरोधी अमेरिकी बयानों और नीतियों पर भी मौजूदा नेतृत्व ने खामोशी बनाए रखी है।
इतना ही नहीं भारत के अमेरिका की तरफ स्पष्ट झुकाव और Non Alignment की नीति से इतर होने की वजह से भी साउथ एशियन देशों में भी बेचैनी बढ़ी है .... अमेरिका के साथ भारत की नजदीकियां बढ़ते ही सीमा पर पाकिस्तान और चीन की बेजा हरकतें बढ़ने लगती हैं और भारत विरोधी बयान सामने आने लगते हैं। ऐसे में वर्तमान हालात में भारतीय विदेश नीति में ना तो स्पष्टता दिखती है ना हीं मजबूती ..
मौजूदा हालात में जब भारतीय सीमा विवाद गहराता जा रहा है तो देश एक बार फिर अपने Time Tested रिश्तों की तरफ देख रहा है ... यही वजह है कि रूस के साथ RIC की बैठक में भी विदेश मंत्री एस जयशंकर अंतर्राष्ट्रीय नियमों के पालन, साथी देशों के हितों का सम्मान और बहुपक्षीयता की वकालत करते नज़र आए हैं ... तो ने रूस हमेशा की तरह अपनी दोस्ती निभाते हुए भारत को यूएन में स्थायी सदस्यता दिलाए जाने की वकालत की है ...

बुधवार, 17 जून 2020

Growth

20200615 Mr  Vasindra Mishra (Chief Editor Jantantra TV) delivers address at the  IIF Webinar on Essence of Life and Growth on 15th June 2020 from 7:30 - 8:45 PM moderated by IIF Prof Aman Agarwal (Indian Institute of Finance & Finance India) @ Copyright 2020 : Indian Institute of Finance (IIF)


Watch on IIF News & Broadcasting

https://youtu.be/EHOM9K0TfEY


Watch on FaceBook at

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10158749480277160&id=542762159


@ Copyright 2020 : Indian Institute of Finance (IIF)


*IIF Webinars (FREE)*

Prof Aman Agarwal invites you a 45 min interactive session on *June 15th, 2020 at 7 PM (IST)*


Topic: *Essence of Life & Growth*

Speaker : *Mr. Vasindra Mishra (INDIA)*

(Editor-in-Chief, Jantantra TV (Hindi National News Channel); formerly Editor, Network 18 Group; formerly Editor, Zee Media (Hindi Regional News Channel); formerly with Times of India, Hindustan Times, Amar Ujala, National Herald, INDIA)


 *Register at* https://forms.gle/BHN1qrehffj1Gd5e6


*Join Whats App Group*

https://chat.whatsapp.com/DwkkhiTAHiHF03tpjX0SCh


*Join Zoom Meeting* https://us04web.zoom.us/j/9999321585 

Meeting ID: 999-932-1585 [NO Password ] Room Opens 20 min before


*FREE IIF Webinar* All Welcome

*E-Certificate* processing fee @ Rs 250/- (Only if Reqd.)


*Indian Institute of Finance* www.iif.edu

Phone : 9999321585


मंगलवार, 9 जून 2020

techno war

कोरोना महामारी को लेकर भले ही देश भर में लॉकडाउन और अनलॉक के बीच जनता आर्थिक हालात और स्वास्थ्य को लेकर अपनी चिंताओं से जूझ रही हो देश के सियासी मिज़ाज पर कुछ खास फ़र्क़ नहीं पड़ा है । इतना ज़रूर है कि कोरोना ने अगर आपकी और हमारी जिंदगी में बदलाव ला दिए हैं तो सियासी संस्कृति भी बदल गई है । इन बदलावों को अपनाने में भी सबसे आगे भारतीय जनता पार्टी है। अमित शाह की वर्चुअल रैलियाँ इसका उदाहरण हैं । शाह बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में तकनीक के सहारे लाखों लोगों को संबोधित कर चुके हैं। वर्चुअल रैली के इस नए सियासी कल्चर में आपको विकसित पश्चिमी देशों की चुनावी रैलियों की झलक भी मिल सकती है। लॉकडाउन और महामारी के बीच मजबूरन ही सही लेकिन भारत में ये बदलाव नज़र आने लगा है। बीजेपी की वर्चुअल रैलियां, सोनिया, राहुल और प्रियंका गांधी की वर्चुअल बातचीत बदलते सियासी संस्कृति का उदाहरण हैं। 
इन रैलियों में पारंपरिक तौर पर स्टेडियम या बड़े मैदान में होने वाली रैलियों सी भीड़ नहीं है लेकिन ऑडिएंस है । ये ऑडिएंस स्मार्टफोन, यूट्यूब, फेसबुक लाइव, व्हाट्सएप ग्रुप और एलईडी स्क्रीन के जरिए जुट रही है। कोरोना महामारी के बाद बदले दौर में ये न्यू नॉर्मल बन रहा है जहाँ लाखों की संख्याँ में भीड़ नहीं जुटाई जा रही लेकिन एलईडी स्क्रीन की व्यवस्था की जा रही है । 
वर्चुअल रैलियों में पारंपरिक रैलियों सा दर्जनों बसों में भरे समर्थकों का शोर नहीं है, इन समर्थकों के लिए चाय-नाश्ता, भोजन पानी की व्यवस्था नहीं है। बैनर्स-पोस्टर्स के जरिए प्रचार नहीं हो रहा लेकिन प्रदेश के हजारों बूथों पर हज़ारो एलईडी लगाने के इंतजाम ज़रूर किए जा रहे हैं। वर्चुअल रैली में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए जनता तक पहुँचना आसान है । इसे आम रैली की तरह टीवी पर भी लाइव दिखाया जा सकता है। बाकी भीड़ के सबसे अच्छे शॉट्स दिखाकर शक्ति प्रदर्शन करने के बदले ज्यादा से ज्यादा लोगों को वर्चुअल रैली से जोड़ने का रिकॉर्ड बनाने की होड़ है। 
लेकिन इस सबने चुनावी खर्चे की बहस भी तेज कर दी है क्योंकि विपक्ष एलईडी लगाने जैसे खर्चीले माध्यम को लेकर बीजेपी पर हमले कर रहा है। अपनी एक रैली में केंद्रीय गृहमंत्री ने दावा किया कि उनकी रैली 72000 एलईडी स्क्रीन के जरिए लोगों तक पहुँच रही है । एक-एक एलईडी स्क्रीन की कीमत लाखों में होती है । विपक्ष इसीलिए ये आरोप लगा रहा है कि इतनी खर्चीली रैलियाँ बीजेपी ही आयोजित कर सकती है। 
भले ही अमित शाह इस बात पर जोर दे रहे हों कि इन रैलियों का चुनाव से लेना-देना नहीं है लेकिन ये सब जानते हैं कि बिहार और बंगाल में चुनाव हैं और वर्चुअल रैलियों के जरिए उन्होंने चुनावी बिगुल फूंक दिया है । ऐसे में एक बार फिर चुनावी खर्चों पर चर्चा शुरू हो गई है। सवाल ये उठते हैं कि एक-एक रैली पर अरबों खर्च करने वाली पार्टियाँ नैतिकता और साफ-सुथरी राजनीति का झंडा बुलंद करने की हिम्मत कैसे जुटा पाती हैं? 
भारत में साफ-सुथरे लोकतंत्र और स्वस्थ राजनीति को बढ़ावा देने के लिए चुनाव सुधार की बात लंबे अरसे से की जा रही है । पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था “राजनीति ज्यादा से ज्यादा पैसों पर निर्भर होती जा रही है । इसके साथ ही राजनीति से विचारधारा का भी लोप हो रहा है, लेकिन हमारे सोचने भर से भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो जाएगा। इस बुराई से हर स्तर पर लड़ने की ज़रूरत है । भ्रष्टाचार को खत्म करने की जंग राजनीति से धनबल के प्रभाव को खत्म करने के साथ शुरू होनी चाहिए । दूसरे इससे मुकाबले के लिए व्यापक स्तर पर चुनाव सुधार करने की ज़रूरत है।”  हालाँकि सालों बाद भी इसपर अमल नहीं किया जा सका है, इसके उलट चुनाव भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा ज़रिया बनता जा रहा है। 
चुनाव सुधार के लिए कई बार सुझाव दिए गए, ये भी कहा गया कि चुनाव के लिए फंडिंग सरकार के हाथों में ही हो लेकिन कभी भी आम राय नहीं बन पाई। फंडिंग की शर्तें क्या होंगी, कौन- कौन सी पार्टियाँ इसकी हक़दार होंगी, जैसे मुद्दों पर हमेशा बहस छिड़ी रही है। लिहाजा अभी तक चुनावी खर्चे की सीमा तय किए जाने के अलावा इस पर कुछ भी नहीं किया जा सका है और इस पर भी प्रभावी रोक कभी नहीं लगाई जा सकी है। 
कुल मिलाकर बदले माहौल में सियासत ने अपना रंग-ढंग बदल लिया है और सुधार जैसे पुराने मुद्दे हमेशा की तरह उलझे हुए हैं जिसके लिए किसी भी दल की सरकार में इच्छाशक्ति नहीं दिखती ।

सोमवार, 1 जून 2020

govt of india

Union Minister Anurag Thakur Exclusive - Samvaad With Vasindra Mishra
                                                                                                                                   https://youtu.be/25XbrLQktL8

bjp

https://youtu.be/cG2kueWiERw