बुधवार, 30 सितंबर 2020

babri demolition case

Babri Demolition Case : विवादित ढांचा विध्वंस मामले में फैसला                                                                                                                                                                           https://youtu.be/1a_-v1wk4Ts?t=119

शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

farmers

कॉरपोरेट्स के सामने हमेशा उपेक्षित रहे हैं किसान 

देश में आए दिन किसानों को अपने हक के लिए लड़ाई लड़नी होती है ... सरकार तक अपनी आवाज़ पहुंचाने के लिए सड़क पर उतर कर विरोध प्रदर्शन करना पड़ता है..  देश की अर्थव्यवस्था में योगदान के पैमाने पर कृषि का नंबर तीसरा है ... और आज भी देश की लगभग 60 फीसदी से ज्यादा आबादी सीधे या परोक्ष रूप से खेती पर निर्भर करती है... बावजूद इसके आज तक कृषि सेक्टर को उद्योग का दर्जा नहीं मिला है ... और किसानों की हमेशा उपेक्षा होती रही है... अब तीन नए अध्यादेश लाए गए हैं जिसका किसान तो विरोध कर ही रहे हैं... सरकार की सहयोगी पार्टी भी इस मुद्दे पर अपना विरोध जता रही है .. 
ये सच्चाई है कि देश की करीब 60 फीसदी से ज्यादा आबादी आजीविका के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर करती है .. बावजूद इसके...  इस सेक्टर की हमेशा से उपेक्षा होती आई है .... देश में जो भी सरकार रही वो कॉरपोरेट्स और MSME की चिंता करती रही .... किसानों की उतनी फिकर किसी को नहीं हुई जितनी होनी चाहिए थी ... किसानों को हमेशा एक वोटबैंक के तौर पर ही देखा गया... कभी ऋणमाफी तो कभी सस्ती बिजली सस्ते खाद के सपने दिखाकर उनका वोट लिया गया ... ऐसा हमेशा से होता आया है ... 
विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री बनने से पहले किसानों को ऋण माफी का वायदा किया था ...और सत्ता में आने के बाद इसे पूरा भी किया ... लेकिन उस समय के अर्थशास्त्रियों ने वीपी सिंह की उस नीति पर विरोध जताया ... इस नीति की तीखी आलोचना की गई ... आरोप लगे कि इस तरह की योजनाएं बैंकिंग सेक्टर को कमजोर कर देती हैं ... 
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री रहे वीर बहादुर सिंह के शासनकाल में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत ने बिजली बिलों की माफी के लिए बहुत ही सफल आंदोलन चलाया था .. जिसके बाद सरकार झुकना पड़ा और किसानों की मांगें माननी पड़ी... उस समय भी आरोप लगे कि उत्तर प्रदेश बिजली बोर्ड की वित्तीय हालत खराब होने में किसानों के बिजली बिलों का भुगतान एक अहम वजह थी ... जबकि सच्चाई कुछ और है ,,.
किसानों बुनकरों और मजदूरों को जब भी कोई आर्थिक पैकेज या रियायत देने की बात आती है तो ज्यादातर अर्थशास्त्री और नौकरशाह विरोध में खड़े नज़र आते हैं ... और अगर वही रियायत कॉरपोरेट घरानों को या MSME सेक्टर को देने की बात आती है किसी खेमे से विरोध के सुर सुनाई नहीं देते ... 
देश के वित्त मंत्री चाहे वो प्रणब मुखर्जी रहे हों, पी चिदंबरम रहे हों या फिर एनडीए की सरकार में अरुण जेटली ने वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली, ये सब कहीं ना कहीं कॉरोपोरेट लॉबी के हितों की रक्षा में खड़े दिखाई दिए .. और किसानों के सवाल पर खाली खजाना और खराब वित्तीय स्थिति का हवाला देकर चुप्पी साध लेते हैं .. इसकी असली वजह खेती का Unorganised Sector होना है । राजनैतिक दलों को इन Unorganised Sector में काम करने वाले किसानों और मजदूरों का वोट तो चाहिए लेकिन उन्हें रियायत देने के लिए उनके पास पैसा नहीं है । 
रियायतों के नाम पर अब तक जितने भी कानून बने हैं उनमें से ज्यादातर कानून इन वर्गों की जिंदगी को और मुश्किल में ही डालते रहते हैं, शायद यही वजह है कि देश के अलग-अलग हिस्सों से किसानों, बुनकरों और मजदूरों की आत्महत्या करने की खबरें आती रहती हैं और नेता उन घटनाओं पर घड़ियाली आंसू बहाकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं ।

बुधवार, 16 सितंबर 2020

uttar pradesh

पुलिस सुधार VS पुलिसिया राज 

उत्तर प्रदेश में एक तरफ पुलिस की कार्यशैली सवालों में घेरे में बनी हुई है दूसरी तरफ सूबे की सरकार उन्हें असीमित अधिकार देने की दिशा में काम कर रही है ... महोबा के  व्यापारी इंद्रकांत त्रिपाठी की हत्या मामले में आईपीएस अधिकारी मणिलाल पाटीदार की भूमिका को लेकर लोगों की हैरानी कम नहीं हुई थी कि सरकार ने स्पेशल सिक्युरिटी फोर्स बनाने का ऐलान कर दिया ... इस फोर्स का गठन अहम जगहों की सुरक्षा करने के मकसद से किया जा रहा है.... लेकिन इसे दिए गए असीमित अधिकारों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं .... इससे पहले पुलिस को ज्यादा से ज्यादा अधिकार दिए जाने को लेकर यूपी के नोएडा और लखनऊ में कमिश्नरी व्यवस्था लागू की जा चुकी है .. यानि कानून व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त करने के लिए तमाम उपाय किए जा रहे हैं लेकिन जिस राज्य में पुलिस की मौजूदा कार्यशैली पर लगातार गंभीर  सवाल खड़े हो रहे हों .. मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ाई जा रही हों वहां क्या ऐसे असीमित अधिकार दिया जाना सही है .. 
देश भर में 65 से ज्यादा जिलों में कमिश्नर प्रणाली लागू है .. इस व्यवस्था में  पुलिस को कार्रवाई से पहले जिलाधिकारी से इजाज़त लेने की जरूरत नहीं पड़ती .. आमतौर पर सुरक्षा के लिहाज से अहम माने जाने वाले जिलों में पुलिस को अधिक शक्तियां देने के लिए ये व्यवस्था की जाती है .. ठीक वैसे ही बिना वारंट गिरफ्तारी, बिना वारंट तलाशी जैसे अधिकार भी उन इलाकों के लिए पुलिस फोर्स को दिए जाते हैं जहां उग्रवाद, आतंकवाद हावी होता है ... अब जब उत्तर प्रदेश में सरकार ऐसे ही तमाम अधिकारों वाली स्पेशल सिक्युरिटी फोर्स बनाने जा रही है तो सवाल उठ रहे हैं कि सूबे में आखिर ऐसा क्या है कि पुलिस को इतने अधिकार दिए जा रहे हैं ... वो भी तब जब पिछले 4 साल से लगातार पुलिस की कार्यशैली सवालों के घेरे में है .. 
आबादी के हिसाब से देश के सबसे बड़े राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखना एक चुनौती से कम नहीं है लेकिन इससे ज्यादा बड़ी चुनौती है पुलिस और कानून व्यवस्था लोगों का भरोसा बनाए रखना .. जो महोबा के एसपी रहे मणिलाल पाटीदार जैसे अधिकारियों की वजह से हमेशा टूटता रहा है .. सवाल ये है कि जहाँ कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार आईपीएस अधिकारियों पर हीं संगीन आरोप लगते रहे हों वहां पुलिस रिफॉर्म के नाम पर इन्हें असीमित अधिकार देने से क्या ये समाज के लिए घातक साबित नहीं होगा.. उत्तर प्रदेश पुलिस को सवालों के घेरे में लाने वाले अकेले मणिलाल पाटीदार ही नहीं हैं .. कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं जिसमें पुलिस रिश्वतखोरी, जबरन उगाही, मारपीट जैसे आरोपों से घिरती है ... कई मामले ऐसे भी सामने आए हैं जिसमें एक आईपीएस अधिकारी ने दूसरे आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की है ... ऐसे में क्या रिफॉर्म के नाम पर मात्र अधिकार बढ़ाना काफी है ? 
पुलिस रिफॉर्म के नाम पर सूबे की सरकार ने नोएडा और लखनऊ में कमिश्नर सिस्टम लागू कर चुकी है .... कई और जिलों में भी ये व्यवस्था लागू करने पर विचार किया जा रहा है ... वो भी तब जब पहले इस तरह के प्रयोग सफल नहीं रहे हैं ..  कई साल पहले सत्तर के दशक में प्रदेश के कुछ जिलों में कमिश्नरी व्यवस्था लागू की गई थी जिसे बाद में आलोचना के बाद हटा दिया गया था ...  सवाल इस पर भी उठते रहते हैं कि मानकों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में पुलिस फोर्स है ही नहीं ...  2019  में आए आंकड़ों के मुताबिक यूपी में पुलिसबल में लगभग एक लाख तीस हज़ार पद खाली हैं ... क्या रिफ़ॉर्म से पहले कानून व्यवस्था सुधारने के लिए इन खाली पदों को भरने की ज़रूरत नहीं महसूस की जाती ... 
सरकार रिफॉर्म के नाम पर स्पेशल सिक्युरिटी फोर्स का गठन करने जा रही है जिसके पास बिना वारंट के तलाशी और गिरफ्तार करने जैसे अधिकार होंगे ... जहां भी पुलिस को असीमित अधिकार दिए जाते हैं वहां सिविल राइट्स, ह्यूमन राइट्स के उल्लंघन के मामलों में बढ़ोतरी देखी जाती है .. इसीलिए स्पेशल सिक्युरिटी फोर्स के गठन पर भी सवाल उठ रहे हैं ... सवाल उठने लाजिमी भी हैं वो भी तब-जब देश की ज्यादातर आबादी को आजतक अपने अधिकारों की समुचित जानकारी नहीं है ... 
नॉर्वे दुनिया के सबसे ज्यादा विकसित देशों में शुमार है .. शिक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था, साफ सफाई सबमें टॉप के देशों में आता है ... हैप्पीनेस इंडेक्स में भी फिनलैंड और डेनमार्क के बाद नॉर्वे का ही नंबर आता है ... नॉर्वे अपराध को कम करने के मामले में एक उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है ... हाल ही के दिनों में नॉर्वे में अपराधों की दर 24 साल के सबसे निचले स्तर पर है ... जबकि नॉर्वे की पुलिस अपने साथ हथियार लेकर नहीं चलती .... उनके हथियार गाड़ी में रखे होते हैं ... गौर करने लायक बात ये है कि उनकी पुलिस फोर्स और जनसंख्या का अनुपात अच्छा है । युनाइटेड नेशंस की एनालिसिस के मुताबिक नॉर्वे में 10 हज़ार की आबादी पर करीब 188 पुलिसकर्मी हैं जबकि भारत में 19 लाख 26 हज़ार लोगों पर 198 पुलिसकर्मी हैं  । 
ऐसे में पुलिस सुधार के नाम पर सिर्फ अधिकार दिए जाने की बात बेमानी ही लगती है खासकर भारत जैसे देश में जहां आम आदमी पुलिस पर भरोसा नहीं कर पाती, उन्हें जिलाधिकारी से बात करना ज्यादा आसान लगता है ।  अपने अधिकारों से अनजान लोग पुलिसिया ज्यादती के खिलाफ आवाज भी नहीं उठा पाते ... पुलिस और प्रशासनिक महकमे से ही पुलिस को ज्यादा अधिकार दिए जाने के खिलाफ आवाज़ें उठती रही हैं ... ऐसे में क्या पहले इंफ्रास्ट्रक्चर, पुलिस के रवैये को लेकर काम नहीं किया जाना चाहिए ?

गुरुवार, 10 सितंबर 2020

west bengal

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का ‘अधीर’ अस्त्र
पश्चिम बंगाल में सोमेन मित्रा के निधन के बाद खाली हुई कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी के लिए कांग्रेस ने एक बार फिर अपनी पार्टी से सांसद अधीर रंजन चौधरी पर भरोसा जताया है... अधीर रंजन चौधरी पश्चिम बंगाल के बहरामपुर से ही लोकसभा सांसद हैं और पहले भी फरवरी, 2014 से लेकर सितंबर 2018 तक प्रदेश में कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं ... पश्चिम बंगाल में अगले साल यानि 2021 के अप्रैल-मई में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव को देखते हुए अधीर रंजन की नियुक्ति को काफी अहम माना जा रहा है ... ऐसे में ये तो तय है कि पश्चिम बंगाल में टिकट के बंटवारे से लेकर गठबंधन तक में अधीर रंजन चौधरी की भूमिका अहम होने जा रही है ... 
हालांकि अधीर रंजन चौधरी की अध्यक्ष पद पर तैनाती से ये बात साफ हो रही कि आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने तृणमूल से किनारा कर लिया है और कड़ी चुनौती देने की तैयारी कर रही है ... ऐसा इसीलिए माना जा सकता है कि अधीर रंजन के ममता बनर्जी से मतभेद जगजाहिर हैं .. अधीर रंजन चौधरी ने बीते कुछ महीनों में ममता बनर्जी को कठघरे में खड़ा करने का कोई मौका नहीं छोड़ा है ... प्रवासी मजदूरों के मसले पर अधीर रंजन ने ममता बनर्जी पर प्रवासियों और गैर-प्रवासियों के बीच दरार पैदा करने का आरोप लगाया था ... अधीर रंजन ने कहा था कि ममता बनर्जी कोरोना वायरस के संक्रमण के लिए भी गलत तरीके से प्रवासी मजदूरों को जिम्मेदार ठहरा रही हैं .. इससे पहले मार्च के महीने में नागरिकता संशोधन कानून के मसले पर भी अधीर रंजन चौधरी ने ममता बनर्जी पर बीजेपी से गोपनीय तालमेल करने के आरोप लगाए थे ... अधीर रंजन चौधरी 2013 में बंगाल पंचायत चुनावों के दौरान ममता बनर्जी को पागल हाथी तक कह चुके हैं .. 
ये अदावत दोनों तरफ से है ... कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी को जब 2012 में केंद्र में सत्ता संभाल रही यूपीए ने रेल राज्य मंत्री बनाया था तो यूपीए से अलग हो चुकीं ममता बनर्जी ने आरोप लगाए थे कि कांग्रेस ने जानबूझकर उनके विरोधी को मंत्रिमंडल में जगह दी है ... दरअसल 1996 में पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के दौरान भी उस वक्त कांग्रेस में रहीं ममता बनर्जी ने मुर्शिदाबाद सीट से अधीर रंजन चौधरी को टिकट दिए जाने का विरोध किया था ... हालांकि तब अधीर रंजन चौधरी रंजन का ना सिर्फ टिकट मिला बल्कि वो जीत भी गए .. तब से लेकर अब तक वो चुनाव जीतते आ रहे हैं ... पिछली बार पश्चिम बंगाल के बरहामपुर से लोकसभा का चुनाव लगातार पांचवी बार जीते .. 
ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़ दी .. बाद में अपनी पार्टी तृणमूल का समर्थन भी कांग्रेस से वापस ले लिया... 2019 के लोकसभा चुनावों में ममता बनर्जी से शरद पवार को साथ लेकर तीसरा मोर्चा बनाने की कवायद भी की... ममता बनर्जी राहुल गांधी को नकार ही चुकी हैं ... कई मौकों पर उनके खिलाफ बयान देकर ममता ने कांग्रेस का विरोध ही किया है .. ऐसे में अब अधीर रंजन चौधरी को आगे कर कांग्रेस ने भी ममता बनर्जी को साफ संदेश दे दिया है ... 
वैसे भी माना जा रहा है कि राहुल गांधी जोड़-तोड़ की राजनीति को आगे बढ़ाने के मूड में नहीं हैं ... राहुल ने उन सभी पार्टियों या नेताओं से किनारा करना शुरू कर दिया है जो ना तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी का साथ दे रहे हैं, ना हीं उनके खिलाफ जाकर अपना स्पष्ट मत दे रहे हैं ... ऐसे सभी मिडिल पाथ बनाकर चलने वाली पार्टियों और नेताओं से राहुल गांधी ने किनारा करना शुरू कर दिया है ..
ये बात राहुल गांधी और कांग्रेस के फैसलों से भी साफ हो रही है ... कांग्रेस में रहकर कई दशकों तक सत्ता की मलाई खाने वाले नेताओं की पिछले कुछ वक्त  में सामने आई बेचैनी को राहुल गांधी ने भांप लिया है ... ऐसा लगता है कि राहुल गांधी समझ चुके हैं कि कपिल सिब्बल, आनंद शर्मा और गुलाम नबी आज़ाद सरीखे नेता Compromised हैं .. इसीलिए आज के दौर में जब जनाधार खोती जा रही कांग्रेस को दोबारा जमीन पाने के लिए फाइटर नेताओं की ज़रूरत है तो पार्टी अधीर रंजन चौधरी जैसे नेताओं को आगे कर रही है और उन नेताओं से किनारा किया जा रहा है जो  liaisoner, Fixer या फिर फ्लोर मैनेजर की भूमिका में रहे हैं ... ऐसे नेताओं को पीछठे किया जा रहा है जो अपने व्यवसायिक हितों को साधने की वजह से सरकार से सीधे confront करने की हालत में नहीं हैं .. इसी रणनीति के तहत केंद्र और राज्यों में कांग्रेस की नई लीडरशिप को प्रोमोट किया जा रहा है ... यही रणनीति है जिसके तहत Compromised gang of Congress को पीछे कर अधीर रंजन चौधरी, रणदीप सुरजेवाला जैसे नेताओं को आगे किया जा  रहा है .. अब ये अलग बात है कि ऐसे ही कुछ यंग नेता सत्ता और पॉलिटिकल फ्यूचर बदलने के लालच में पार्टी छोड़कर भाग गए हैं ...

बुधवार, 9 सितंबर 2020

government

AAJ KA MUDDA : देश बेरोजगार, कहां हो सरकार ?                                                                                                                                                                 https://youtu.be/IooeeHqKUIc?t=256

मंगलवार, 8 सितंबर 2020

Friendly fight in u p

बीजेपी-आप की सियासी नूराकुश्ती
दो साल बाद उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी इन राज्यों में सक्रिय हो गई है .. आम आदमी पार्टी से राज्यसभा सांसद संजय सिंह कई महीनों से उत्तर प्रदेश में जमकर बैठे हैं और अलग-अलग मुद्दों पर योगी सरकार को घेरने की कोशिश करते नज़र आ रहे हैं .... मुद्दा चाहे विधायक रहे निवेंद्र मिश्रा की हत्या का हो ... या फिर चिकित्सा उपकरणों की खरीद में कथित घोटाले का ... ऐसे में पूरे प्रदेश में संजय सिंह के खिलाफ 10 से ज्यादा FIR भी दर्ज हो गई हैं ... हालांकि संजय सिंह के खिलाफ कार्रवाई में उत्तर प्रदेश सरकार की वो आक्रामकता नहीं दिखती जैसी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू को लेकर है ... सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने वाले अजय कुमार लल्लू आए दिन गिरफ्तार होते रहते हैं.. लगभग एक महीना जेल में बिता चुके हैं ... ऐसे में सवाल ये उठते हैं कि क्या प्रदेश सरकार को आम आदमी पार्टी से कोई खतरा नहीं दिखता या फिर ये एक अलग तरह की सियासी रणनीति है ? 
दरअसल देश की सियासत में लगभग दस साल पुरानी आम आदमी पार्टी और केंद्र की सत्ता पर 6 साल से काबिज बीजेपी एक जैसे मुद्दों और वादों के साथ कुर्सी पर काबिज हुई है .. अन्ना के आंदोलन के बाद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी बनाई और दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो गए... भ्रष्टाचार विरोधी इसी आंदोलन का एक चेहरा थीं तेज़तर्रार आईपीएस अधिकारी रहीं किरण बेदी .. जिन्होंने केंद्र में बीजेपी की सरकार बनते ही पार्टी ज्वाइन कर ली और 2016 आते -आते पुडुचेरी की राज्यपाल बना दीं गईं ... उस वक्त सीएजी की रिपोर्ट्स चर्चा में रही थीं.. क्योंकि सीएजी विनोद राय की 2जी स्पेक्ट्रम के आवंटन पर दी हुई रिपोर्ट को भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का आधार माना गया था ... केंद्र में एनडीए की सरकार बनने के बाद सीएजी रहे विनोद राय को बैंकिंग बोर्ड ऑफ इंडिया का चेयरमैन नियुक्त किया गया था .. ये बात अलग है कि इस कथित घोटाले की लंबी जांच के बाद भी किसी भी आरोपी के खिलाफ सबूत नहीं मिल पाए और सीबीआई की अदालत ने सारे आरोपियों को बरी कर दिया था .... इस आंदोलन में 2009 में बने विवेकानंद फाउंडेशन की भी बड़ी भूमिका रही थी .. ऐसा कहा गया कि अन्ना हज़ारे, अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और रामदेव को एक साथ लाने और टीम अन्ना बनाने में इस फाउंडेशन ने अहम रोल निभाया ... इस फाउंडेशन के डायरेक्टर हैं अजित डोभाल जो अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं …. 
बीते कुछ वक्त में कई ऐसे मुद्दे रहे हैं जिसपर अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी बीजेपी से सीधे दो-दो हाथ करने के मूड में नज़र नहीं आई है .. चाहे वो दिल्ली में हुए दंगों का मामला हो या फिर अनुच्छेद 370 हटाए जाने का .. कोविड 19 को लेकर केंद्र सरकार की स्ट्रैटेजी पर अरविंद केजरीवाल और केंद्र सरकार में कोई गतिरोध नहीं दिखा है ... ऐसे में उत्तर प्रदेश में आम आदमी की सक्रियता सवाल खड़े  करती ही है... यूपी- उत्तराखंड दोनों ही राज्यों में बीजेपी की सरकार है ... जिस पार्टी की सरकार होती है उसे एंटी इनकंबेंसी का खतरा होता है ... मौजूदा हालात में उत्तर प्रदेश में सरकार की छवि वर्ग विशेष के विरोधी के तौर पर बनी हुई है ...खासकर ब्राह्मण वर्ग में पैदा हुए सरकार विरोधी माहौल का फायदा कांग्रेस या बीएसपी और एसपी को ना मिले इसीलिए आम आदमी पार्टी को मैदान में उतारा गया है ... 2011 से ही बीजेपी की बी टीम रही आम आदमी पार्टी एक बार फिर बीजेपी को मजबूती देने के लिए मुस्तैद नज़र आ रही है ... इसीलिए उनके नेता संजय सिंह उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों का मुद्दा जोर शोर से उठाते दिख रहे हैं ... लगातार योगी आदित्यनाथ पर सीधे हमले करने के बावजूद इनके खिलाफ गिरफ्तारी की कार्रवाई नहीं हुई है ..

सोमवार, 24 अगस्त 2020

congress crisis

कांग्रेस का मौजूदा संकट फिलहाल के लिए टलता दिख रहा है ... लेकिन इसने पार्टी को आत्ममंथन पर एक बार फिर मजबूर कर दिया है कि आखिर क्यों रह –रह कर पार्टी के नेता अपने ही दल को कमजोर करने में लगे हुए हैं .... 
दरअसल मौजूदा संकट कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी से पैदा हुआ है ... पार्टी के नेतृत्व और कार्यशैली पर सवाल उठाने वाले इनमें से कई नेता कांग्रेस में अहम पदों पर रहे हैं और पार्टी ने सरकार में रहते हुए इन्हें समय-समय पर  अहम जिम्मेदारियां भी दी हैं ...
इनमें से ज्यादातर नेताओं के राजनैतिक करियर का तीन चौथाई हिस्सा राज्यसभा में बीता है ... और अब राज्यसभा में इनका कार्यकाल खत्म होने जा रहा है .. कांग्रेस इस वक्त ऐसी स्थिति में नहीं है कि इन्हें वापस राज्यसभा भेज सके लिहाजा पार्टी की पूरी कार्यशैली पर इन्होंने सवालिया निशान लगाने शुरू कर दिए हैं ... जनाधार नहीं होने की वजह से इन नेताओं के लिए कोई चुनाव जीतना भी मुमकिन नहीं लगता ...ऐसे में अपने राजनीतिक जीवन के अवसान काल में ये भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए विकल्प ढूंढ रहे हैं ... 
चिट्ठी लिखकर पार्टी की कार्यशैली पर सवाल उठाने वाले ज्यादातर लोग. नेता कम व्यवसायी ज्यादा हैं .... इन सबके या तो अपने-अपने कारोबार हैं या फिर कारोबारी घराने में इनका रिश्ता है... और इनकी दिक्कत ये होती है कि सरकार से विरोध मोल लेकर कारोबार चलाना मुश्किल हो जाता है ... इसीलिए कांग्रेस में नेताओं की बड़ी फौज के बावजूद सरकार की नीतियों की आलोचना करने में भी राहुल गांधी ज्यादातर अकेले ही खड़े दिखाई देते हैं ... उल्टे अपना कारोबार बचाने के चक्कर में इन नेताओं की मजबूरी हो गई है कि ये राहुल गांधी का ही विरोध करें और सरकार की नीतियों के विरोध में उठ रही आवाज को ये अपनी मौन सहमति भी ना दें ..... 
हालांकि सियासी संकट की इस घड़ी में इन नेताओं के विरोधी सुर के पीछे राहुल गांधी की अपनी नीतियां भी एक हद तक जिम्मेदार हैं .... राहुल गांधी ने अपने नेतृत्व में जिन लोगों को बढ़ावा दिया और आगे लाने की कोशिश की, उनकी पार्टी में स्वीकार्यता काफी कम थी .... फिर चाहे वो केसी वेणुगोपाल हों या फिर मिलिंद देवड़ा ..कुमारी शैलजा, मल्लिकार्जुन खड़गे हों या फिर प्रताप बाजवा ... मुंबई कांग्रेस में संजय निरुपम की अपनी एक पहचान रही है जो मुखर वक्ता होने की वजह से पार्टी का पक्ष कामयाबी के साथ रख पाते थे लेकिन राहुल गांधी ने संजय निरुपम की जगह मिलिंद देवड़ा को आगे बढ़ाया जो कारोबारी परिवार से हैं.. और सियासत में वो अपनी पहचान मुरली देवड़ा के बेटे होने से ज्यादा की नहीं बना पाए हैं... 
कुछ यही हाल केरल में भी है ... के सी वेणुगोपाल और शशि थरूर दोनों ही केरल से हैं .. शशि थरूर की पहचान दुनिया भर में है लेकिन राहुल गांधी ने केसी वेणुगोपाल को पार्टी में बढ़ावा दिया  ... केसी वेणुगोपाल को AICC हेडक्वार्टर का इंचार्ज बना दिया गया और ऐसा लगने लगा कि आगे चलकर इन्हें पार्टी का अंतरिम अध्यक्ष भी बना दिया जाएगा... लिहाजा पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं में राहुल की इन नीतियों ने हलचल पैदा कर रखी है और इन्हें घुटन महसूस हो रही है ... ऐसे में ये नेता ममता बनर्जी, जगनमोहन रेड्डी और शरद पवार सरीखे नेताओं से अपने लिए विकल्प की उम्मीद लगाए बैठे हैं...जिन्होंने अपना एक जनाधार बना रखा है और उनकी पार्टी का समर्थन इन नेताओं को राज्यसभा पहुंचा सकता है ... राज्यसभा की सीट बची रही तो कॉरपोरेट जगत का पे-रोल भी चलता रहेगा और इसके ऐवज़ में कॉरपोरेट घरानों का बिजनेस इंटरेस्ट भी सुरक्षित रहेगा ... दरअसल लड़ाई इंटरेस्ट की ही है ... पार्टी में रहते हुए सभी नेता अपना इंटरेस्ट साध रहे हैं ... कोई इनसे पूछे कि पार्टी में सारे अहम पदों इतने साल से काबिज रहने के बाद भी अगर ये कार्यशैली का विरोध कर रहे हैं तो ये विरोध किसका है ... अगर पद इन्हें मिला है तो जिम्मेदारी एक परिवार की या एक शख्स की कैसे हो सकती है ?

सोमवार, 17 अगस्त 2020

mayawati

Bsp supremo मायावती आज कल उपदेशक की भूमिका में ज़्यादा नज़र आती हैं 
अपने मूल स्वभाव के विपरीत मायावती जी की भाषा ज़्यादा संयमित और मर्यादित है 
अब वे सरकारों की तीखी आलोचनाओं के वजाय  सलाह दे रही हैं 
इस बदलाव के पीछे की मजबूरी चाहें जो हों लेकिन लोकतंत्र में constructive opposition aur constructive criticism बहुत ही  सराहनीय है 
उमीद है की मायावती जी की यह कार्य शैली और भाषा भविस्य में भी बरक़रार रहेगी
आज के इस दौर में जब भारतीय राजनीति के एक से बड़कर एक महा रथी और पुरोधा मुँह पर टेप लगा कर बैठ गए हैं ऐसी स्थिति में मायावती जी के प्रयास  क़ाबिले तारीफ़ हैं 
लोक तंत्र में सवाल सत्ता और सत्ता रूढ़ दल से पूछने की रही है 
भारत में लगभग 64साल तक तो इसी परम्परा का निर्वहन होता रहा है विपछ से लेकर सभी संबिधानिक संस्थाएँ और मीडिया भी यही करता रहा है 
लेकिन सही मायने में सविधान और लोकतंत्र के मुताबिक़ देश अब चल रहा है हमारे सविधान को ब्रिटिश सविधान की नक़ल करके लिखा गया था 
ब्रिटिश सविधान में सत्तारूढ़ दल और सरकार से ज़्यादा विपछ को मर्यादा में रहकर  अपनी बात कहने की अपेछा की गयी है और वहाँ के लोग इसका पालन भी करते हैं 
अब वही काम भारत में भी हो रहा है हमारे देश के सबसे शीर्ष पद पर बैठे लोग तो पहले से सविधान और संसद के समछ नतमस्तक हो कर अपनी प्रतिवधता ज़ाहिर करते रहे हैं 
सुखद बात यह है की अब इसका पालन letter and spirit में सप्रीम कोर्ट सहित सबके द्वारा किया जा रहा  है 
हम सब सबके साथ सबके विश्वास और सबके विकास के रास्ते पर चल पड़े हैं 
भारत को आत्म निर्भर बनाने का नारा तो देश के पहले प्रधान मंत्री नेहरू जी से लेकर अब तक सुनने को मिलता रहा है 
लेकिन आर्थिक और करोना महामारी ने हमें अवसर दिया है आपदा को अवसर में बदलने में हम लोग पहले से ही पारंगत है इसका लाभ उठाकर हम नया भारत ज़रूर बनाएँगे 
नया भारत जिसमें मायावती जी जैसे नेता उपदेशक बन जाएँगे और तमाम धर्म गुरु और कथा बाचक कारागारों के भीतर होंगे 
वैसे भी हमारे देश में जेल जाना सम्मान की बात हैं हमारे आराध्य और सोलह कलाओं से परिपूर्ण भगवान कृष्ण तो जेल में ही पैदा हुए थे 
नेहरू जी भी लम्बे समय तक जेल में रहने के बाद देश के प्रधान मंत्री बने थे

शनिवार, 15 अगस्त 2020

uttar pradesh

उत्तर प्रदेश और बिहार में आने वाले समय में विधान सभा के चुनाव हैं
शायद इसीलिए सभी दलों के नेता एक बार फिर सक्रिय हैं 
जाति और धर्म का सहारा लेकर मतों के polarisation की कोशिस चल रही है script aur 
Formula पुराना है किरदार बदल गए हैं 
भाजपा की तरफ़ से इस बार मोदी योगी और अमित शाह जी टीम है 
दूसरी तरफ़ अखिलेश यादव प्रियंका गांधी मायावती और आम आदमी पार्टी से संजय सिंह हैं 
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए एक बार फिर भूमि पूजन और शिलान्यास हो चुका है 
समाजवादी पार्टी इटावा में कृष्ण और लखनऊ में परशुराम की मूर्ति लगवाने का ऐलान कर चुकी है 
मायावती ने भी ब्राह्मण समाज के ढेर सारे ऐलान किए हैं फ़िलहाल तो उन्होंने अभी अपनी ही कुछ मूर्तियाँ लखनऊ के प्रेरणा केंद्र में लगा ली है 
इस दौड़ में संजय सिंह भी शामिल हैं उन्होंने योगी सरकार पर जाति वादी होने के गम्भीर आरोप लगाए हैं 
उत्तर प्रदेश के chief secretary d g p aur additional chief secretary sabhi brahmin hain phir bhi yogi sarkar par el jati vishes ke liye kam karne ke arop hain 
संजय सिंह के मुताबिक़ भाजपा से 58 ब्राह्मण विधायक है उनका दावा है की ब्राह्मण विधायक भी नाराज़ हैं 
इन घटनाओं और बयानो से v p singh ke daur ki rajniti yaad aa rahi hai 
Pradhanmantri ke rup me apni sarkar vachane ke liye v p singh ne mandir card ke mukabale mandal card lagu kar diya tha 
Wavjud iske unki sarkar to nahi vachi lekin desh aur samaj ko bhari nukshan uthana pada tha 
संजय  सिंह और बाक़ी नेताओं की राजनीति देश और समाज को एक वार फिर उसी तरह के हालात की ओर ले जा रही है 
आर्थिक और करोना महामारी के चलते तबाही झेल रहे प्रदेशों और मुल्क को एक नए तरीक़े के संकट में धकेलने से बचना चाहिए 
समाज देश और लोकतंत्र अगर बचा रहा तो राजनैतिक सत्ता तो आगे पीछे मिलती ही रहेगी वक़्त की नज़ाकत इस समय आर्थिक और करोनामहामारी से एक जुट होकर लड़ने की है इसके लिए साम्प्रदायिक और सामाजिक सद्भाव की  बेहद अवस्यकता है 
सियासी दलों से गुज़ारिश है की खुदा के लिए आने वाली नस्लो को तबाही से बचाने की कोशिस करें

RSS vs Congress

स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर rss और congress की तरफ़ से भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और संघर्ष को अपने अपने ढंग से परिभासित करते हुए तथ्य सार्वजनिक किए गए हैं
इन संघटनो की कोशिस सराहनीय और स्वागत योग्य है इन कोशिसो के चलते आम लोगों ख़ास कर नौजवानो को भारतीय इतिहास के सभी पहलुओं की विस्तृत जानकारी मिलेगी 
और सार्वजनिक जीवन में एक healthy debate की शुरुआत होगी
इसी पोस्ट में दो नो संघठनो के लिंक हैं
अब आप सभी लोग दो नो के विचारों से रूबरू हो सकते हैं।
https://www.indiatv.in/india/national-rss-role-in-independence-movement-of-india-733733
*Shri Rahul Gandhi on Twitter*

कांग्रेस की धरोहर, देश की धरोहर।

बुधवार, 12 अगस्त 2020

south africa

अफ्रीका महाद्वीप का एक छोटा सा देश है कैमरून .. पूरे अफ्रीका में कैमरून सबसे ज्यादा साक्षरता दर के लिए जाना जाता है लेकिन आर्थिक विकास के मुद्दे पर ये पिछड़ा हुआ है और इसकी वजह है यहां की सत्ता पर पिछले तीन दशकों से एक ही शख्स का काबिज होना.. ये शख्स हैं पॉल बिया... पॉल बिया  अफ्रीका में सबसे लम्बे समय तक शासन करने वाले गैर-शाही शासक हैं.. देश में बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, सरकारी संस्थानों का दुरुपयोग जैसी तमाम दिक्कतें मौजूद हैं ... लेकिन पॉल बिया लगातार कुर्सी पर काबिज हैं ... देश में लगातार प्रदर्शन होते रहते हैं लेकिन 87 साल के पॉल बिया की सियासत पर पकड़ कमजोर नहीं हुई है ... 
पॉल बिया साल 2018 में आठवीं बार चुनाव में खड़े हुए थे...  ये ऐसा चुनाव था जिसके नतीजे की जानकारी लोगों को पहले से ही थी .. 8 उम्मीदवारों न चुनौती देने की कोशिश की थी लेकिन कोई चमत्कार होना नहीं था....  क्योंकि पॉल बिया ने बहुदलीय व्यवस्था होने के बावजूद पिछले सभी सातों चुनाव जीते थे ... और तख्तापलट की दो कोशिशें नाकाम कर दी थीं .... लिहाजा 37 बीत चुके हैं और पॉल बिया कैमरून की सत्ता पर काबिज हैं ... 
अफ्रीका के कई देशों ने एक से बढकर एक तानाशाह देखे हैं ... कैमरून भी ऐसे ही देशों में शामिल है जहां 80 के दशक से एक ही नेता हर बार चुनाव जीतता आ रहा है ... 37 साल में देश की जनता ने कई बार पॉल बिया की सत्ता के खिलाफ आवाज उठाई है ..  खासकर पिछले कुछ साल में  कैमरून में लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे है ... लेकिन इससे ना तो देश में होने वाले चुनावों के परिणाम पर कोई फर्क पड़ता है ना हीं कैमरून के राष्ट्रपति पॉल बिया पर .. 
पॉल बिया 1982 में पहली बार कैमरून के राष्ट्रपति बने थे लेकिन इससे पहले 1975 से लेकर 1982 तक पॉल बिया देश के प्रधानमंत्री भी रहे हैं ...  कैमरून की सरकार को फ्रांस का समर्थन मिला हुआ है .. देश में तेल से लेकर इंश्योरेंस सेक्टर तक 10 से ज्यादा फ्रेंच कंपनियां मौजूद हैं ... देश में फ्रांस के इस दखल का जिक्र करना इसीलिए ज़रूरी है क्योंकि कैमरून का एक जटिल इतिहास है जो आज भी देश में कई तरह की परेशानियां खड़ी करता है ... 
1884 में जर्मनी ने कैमरून को अपनी कॉलोनी बनाया था लेकिन 1916 में ब्रिटिश और फ्रांस की सेना ने जर्मनी को कैमरून से खदेड़ दिया .. लगभग तीन साल बाद कैमरून का बंटवारा हुआ जिसमें 80 फीसदी हिस्सा फ्रांस और 20 फीसदी हिस्सा ब्रिटेन के कब्जे में आया ... बाद में 1960 में जब कैमरून स्वतंत्र हुआ तो देश में इंग्लिश और फ्रेंच दोनों ही आधिकारिक भाषाएं बनाईं गई ... लेकिन फ्रेंच बोलने वालों की तादाद कहीं ज्यादा है ... ऐसे में अब तक देश में भाषाई आधार पर गुट बने हुए हैं ... जो कई बार विरोध प्रदर्शन की वजह बनते हैं ... जिसे पॉल बिया की सरकार पूरी ताकत से मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हुए दबाती है ... खुद पॉल बिया फ्रेंच बोलते हैं ऐसे में देश में अंग्रेजी बोलने वाले अक्सर भेदभाव की शिकायत करते रहते हैं ... 
पॉल बिया का जन्म 1933 में कैमरून के दक्षिणी हिस्से एक छोटे से गांव में हुआ था ... हालांकि इनकी पढ़ाई लिखाई देश की राजधानी योन्डे में हुई थी.. बाद में हायर एजुकेशन के लिए पॉल बिया फ्रांस चले गए ... पॉल बिया ने पेरिस से पब्लिक लॉ में ग्रेजुएशन किया ... दरअसल उस वक्त तक कैमरून का 80 फीसदी हिस्सा फ्रांस के कब्जे में था.. देश के इस हिस्से को 1960 में आज़ादी मिली थी ... 
देश के आज़ाद होने के बाद पहले राष्ट्रति अहमदौ अहिदजो के शासन काल में ही पॉल बिया काफी प्रभावशाली हो चुके थे ... कई अहम पदों पर रहते हुए 30 जून 1975 को पॉल बिया देश के प्रधानमंत्री बन गए ... 1979 में कैमरून में एक नया कानून आया जिसकी बदौलत पॉल बिया के अगले राष्ट्रपति बनने का रास्ता साफ हो गया था .... इस कानून के मुताबिक प्रधानमंत्री को राष्ट्रपति का उत्तराधिकारी बना दिया गया था ... ऐसे में जब साल 1982 में अहमदौ अहिदजो ने अचानक इस्तीफा दिया तो पॉल बिया कैमरून के राष्ट्रपति बन गए ... 
पॉल बिया ने बतौर राष्ट्रपति कैमरून की कमान संभाल ली थी ....लेकिन सत्तारूढ पार्टी कैमरून नेशनल यूनियन के प्रेसीडेंट उनके पूर्ववर्ती अहिदजो ही थे ... पॉल बिया को बहुत जल्द पार्टी की सेंट्रल कमिटी और पॉलिटिकल ब्यूरो में शामिल कर लिया गया और वो पार्टी के वाइस प्रेसीडेंट भी बना दिए गए ... शुरुआती दिनों में पॉल बिया ने अहिदजो के साथ मिलकर काम किया ..लेकिन कुछ ही महीनों के अंदर ही दोनों के बीच कभी ना भरने वाली दरार पैदा हो गई .. कहा जाता है कि ऐसा पॉल बिया के अति महात्वाकांक्षी होने की वजह से हुआ था ... 
दरअसल अहिदजो के पॉल बिया को अपना उत्तराधिकारी बनाने पर ही सियासी गुटों ने हैरानी जताई थी .... पॉल बिया कैमरून के दक्षिणी इलाके से आने वाले क्रिश्चियन नेता हैं वहीं अहिदजो कैमरून के उत्तरी इलाके से आने वाले मुस्लिम नेता थे... कहते हैं कि अहिदजो के फ्रेंच डॉक्टर ने उनके हेल्थ को लेकर कुछ चिंता जाहिर की थी जिसकी वजह से अहिदजो ने रिजाइन किया था और ठीक होने के बाद दोबारा राष्ट्रपति बनना चाहते थे लेकिन पॉल बिया ने ऐसा नहीं होने दिया ... पहले अहिदजो ने खुद पॉल बिया के राष्ट्रपति बनने का विरोध करने वालों को पार्टी से निकाल दिया था बाद में अहिदजो के समर्थकों के सारे अधिकार पॉल बिया ने छीन लिए... अहिदजो निर्वासन में चले गए पार्टी प्रेसीडेंट के पद से इस्तीफा दे दिया ... इसके बाद पॉल बिया ने कैमरून को आज़ादी दिलाने के नायक रहे अहिदजो की सारी निशानियों को खत्म करना शुरू किया जिसमें देश के नेशनल एंथम से उनका नाम हटाना भी शामिल था ... पॉल बिया की तानाशाही विचारधारा तभी से दिखनी शुरू हो गई थी ... 
अहिदजो ने निर्वासन में रहते हुए बिया की नीतियों की आलोचना शुरू कर दी .. उन्हें देश की एकता के लिए खतरा करार दिया... कहते हैं कि इसके बाद 1983 में अहिदजो ने पॉल बिया के तख्तापलट की भी कोशिश की ... 1984 की फरवरी में इसके लिए अदालत ने अहिदजो को मौत की सज़ा सुनाई.. जिसे पॉल बिया ने उम्रकैद में तब्दील कर दिया... हालांकि इसी साल अप्रैल में एक और तख्तापलट की कोशिश हुई ... ये ऐसी कोशिश थी जो हमेशा  के लिए कैमरून के इतिहास में दर्ज हो गई ... 
दरअसल अप्रैल 1984 में पॉल बिया ने राष्ट्रपति भवन के सभी गार्ड्स को हटाने के निर्देश दे दिए थे .. ऐसा इसीलिए किया गया था क्योंकि ये सारे गार्ड्स कैमरून के उत्तरी इलाके से आने वाले मुस्लिम थे ..ऐसे मे पॉल बिया को दूसरे तख्तापलट की कोशिश का शक था ... कहते हैं कि पॉल बिया को इसकी भनक लग गई थी ... उस वक्त देश की एयरफोर्स पॉल बिया के लिए पूरी तरह लॉय़ल थी .. पॉल के गार्ड्स को राजधानी यॉन्डे से हटा देने के आदेश की वजह से तख्तापलट की ये दूसरी कोशिश भी नाकाम रही हालांकि विद्रोही मान लिए गए गार्ड्स और सुरक्षा बलों के बीच कई दिनों तक मुठभेड़ चलती रही ... जो इन गार्ड्स के मारे जाने के बाद ही खत्म हो पाई .... आधिकारिक आंकड़े के मुताबिक 70 लोग मारे गए थे हालांकि एक रिपोर्ट कहती है कि इसमें लगभग 1000 लोगों की मौत हुई थी ...... वहीं बाद में हुई कार्रवाई में करीब एक हज़ार लोगों को गिरफ्तार किया गया जिनमें से 35 लोगों को देशद्रोह के आरोप में मौत की सज़ा दी गई ... कहते हैं इस तख्तापलट के मास्टरमाइंड अहमदौ अहिदजो ही थे .. हालांकि ये आरोप कभी साबित नहीं हुए... लेकिन इस घटना के बाद पॉल बिया ने सारी शक्तियां राष्ट्रपति पद के इर्द गिर्द समेट लीं और अगले ही साल पार्टी को कैमरून पीपुल्स डेमोक्रैटिक मूवमेंट के नाम से रिलॉन्च कर दिया ....  
पॉल बिया कैमरून पीपुल्स डेमोक्रैटिक मूवमेंट के प्रेसीडेंट बन गए और 1988 में देश में हुए राष्ट्रपति चुनाव में दोबारा चुन भी लिए गए ... कहते हैं इसके बाद कुछ वक्त तक पॉल बिया ने पूरे देश में शांति बहाल करने के लिए काम किया ... देश में 1990 आते-आते उन्होंने मल्टी पार्टी सिस्टम लागू करा दिया ... लेकिन क्या इससे कैमरून को फायदा होने वाला था ... 
कहने को देश में बहुदलीय व्यवस्था थी .. लेकिन संविधान के तहत कार्यपालिका और विधायिका से लेकर न्यायपालिका तक की सारी शक्तियां राष्ट्रपति पॉल बिया के पास थीं ... नेशनल असेंबली की भूमिका पॉल बिया की नीतियों पर मुहर लगाने की रह गई थी ... इसके बाद देश में चुनाव होते रहे .. 1992, 1997 और फिर 2004 .. हर चुनाव में पॉल बिया को शानदार जीत हासिल होती रही ... विपक्षी पार्टियां हर बार चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली के आरोप लगाती रहीं.. उन्होंने चुनाव का बायकॉट भी किया लेकिन इससे पॉल बिया को फायदा ही मिला ...  हालांकि इसके बाद संविधान के मुताबिक 2011 में होने वाले राष्ट्रपति पद का चुनाव पॉल बिया नहीं लड़ सकते थे लिहाजा उन्होंने 2008 में संविधान में संशोधन कर दिया ... पॉल बिया ने नए साल पर शुभकामनाएं देते हुए कहा कि लोगों के पसंदीदा शख्स के लिए टर्म लिमिट रखना लोकतंत्र के खिलाफ होगा ... इसके बाद 2011 में भी पॉल बिया के राष्ट्रपति चुना जाना तय हो चुका था ... हालांकि कैमरून की जनता को ये बात पसंद नहीं आई थी .. जिसका नतीजा बड़े पैमांने पर हुई हिंसा के रूप में सामने आया.... सरकार ने इसे दबाने के लिए सेना भेजी ... कई लोग मारे गए ... पॉल बिया की सरकार ने इसके बाद कई लोकलुभावन फैसले लिए ... तेल की कीमतें घटा दी गईं ... सिविल सर्वेंट्स और  सैनिकों की सैलरी बढ़ा दी गई ... खाने-पीने की चीजों पर से टैक्स कम कर दिया गया .. हालांकि सरकार ने इसके साथ ही कई मीडिया संस्थानों, पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी ... एक रिपोर्ट के मुताबिक तीन मीडिया संस्थानों को बंद कर दिया गया और पत्रकारों के साथ मारपीट भी की गई ... और सरकार ने ऐसा देश में शांति व्यवस्था को बनाए रखने के नाम पर किया ... 
नीतियों पर सवाल उठाने वाली और विरोध में उठने वाली हर आवाज को दबाया जाने लगा .. जिसके बाद से देश में विरोध प्रदर्शनों की बाढ़ आने लगी ... अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी कैमरून सरकार पर सवाल खड़े होने लगे ... देश में चुनाव में होने वाली धांधली, मनमाने तरीके से होने वाली गिरफ्तारियों ने दुनिया भर में मानवाधिकार के लिए काम करने वाली एजेंसियों को ध्यान खींचा ... 
2008 से बाद से अब तक कैमरून में प्रेस फ्रीडम पर सवाल उठते रहे हैं .... .पत्रकारों को संवेदनशील माने जाने वाले विषय़ों की रिपोर्टिंग करने पर गिरफ्तारी का डर रहता है... विपक्षी पार्टियां भी इससे अछूती नहीं है .., 2014 में एक विपक्षी नेता को कैमरून की नीतियों की आलोचना करने पर 25 साल की जेल की सज़ा सुनाई गई ... 
2016-17 में देश में एक बार फिर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे .. कई महीनों तक चलने वाले इस प्रदर्शन को कॉफिन रिवॉल्यूशन का नाम दिया गया... ये प्रदर्शन अंग्रेजी भाषा बोलने वाले इलाकों में फ्रेंच भाषा थोपने की सरकार की नीतियों की वजह से हुआ था ... देश के उत्तर-पश्चिमी और दक्षिण-पश्चिमी इलाक़े अंग्रेज़ी बोलने वालों का गढ़ माने जाते हैं.. इन इलाकों में अब अलगाववादियों के एक दर्जन से ज्यादा गुट सक्रिय हो चुके हैं .. सरकार की फेल हो चुकी नीतियों की वजह से इन इलाकों में अलग राष्ट्र बनाने की मांग तेज होती जा रही है ... अलगाववादी इस इलाके में अलग देश अंबाजोनिया की स्थापना करना चाहते हैं... इन अलगाववादियों को लगता है कि फ्रेंच बोलने वाली सरकार उन्हें हाशिए पर धकेल रही है ... सरकार और इनके बीच जारी संघर्ष में अब तक 3000 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है ... और एक रिपोर्ट के मुताबिक 10 लाख लोग विस्थापित हुए हैं ... इस इलाके में होने वाली मौतों को नरसंहार के तौर पर भी देखा जाता है ... कहते हैं विरोध को दबाने के नाम पर यहां छोटे बच्चों को भी मौत के घाट उतार दिया जाता है ... 
2009 में एक मैगजीन ने दुनिया के 20 सबसे क्रूर तानाशाहों की लिस्ट में पॉल बिया को शामिल किय़ा था ... 
पॉल बिया को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एबसेंटी प्रेसीडेंट कहा जाता है क्योंकि वो ज्यादातर वक्त विदेशों में ट्रैवल करते हुए बिताते हैं ... जिनमें लाखों डॉलर खर्च होते हैं .. 
हालांकि इसके बावजूद पॉल बिया  को 2018 में हुए चुनावों में जीतने से कोई रोक नहीं पाया है ... पॉल बिया 2025 तक के लिए राष्ट्रपति चुने जा चुके हैं ...

शनिवार, 8 अगस्त 2020

south africa

अफ्रीका का एक छोटा सा देश है चाड .. जहाँ की जनसंख्या एक करोड़ अड़सठ लाख के आसपास है... गोल्ड और युरेनियम के साथ साथ यहाँ तेल का भी भंडार है .. ऐसे में इस देश को समृद्ध औऱ संपन्न होना चाहिए लेकिन प्रभावी नेतृत्व के अभाव में ये देश गरीबी से जूझ रहा है .. हालांकि मौजूदा इदरिसी डेबी की सरकार एक तानाशाह के शासन को खत्म कर सत्ता में आई थी और ऐसा लगा था कि अब देश के हालात बदल जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ ... 
इदरिस डेबी ने 1990 में एक नाटकीय तरीके से देश की सत्ता हासिल की थी .. चाड उस वक्त हिसेन हाब्रे की तानाशाही से त्रस्त था ... आर्मी कमांडर रहे इदरिस डेबी ने 1989 में  हिसेन हाब्रे की तख्तापलट की नाकाम कोशिश थी ... हालात बिगड़े तो इदरिस ने सूडान में जाकर शरण ली और लीबिया की मदद से अपने समर्थकों के साथ मिलकर पैट्रियॉटिक साल्वेशन मूवमेंट चलाया .. इस मूवमेंट के तहत इदरिस डेबी ने अपने समर्थकों औरप हाब्रे के विरोधियों के साथ मिलकर चाड की सीमा पर हमले करने शुरू किए ... आखिर 1990 के दिसंबर इदरिस डेबी ने हाब्रे का तख्तापलट कर दिया और सत्ता पर काबिज हो गया ... तब से लेकर अब तक चाड में इदरिस डेबी की सरकार है .. और इन तीन दशकों में प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर चाड आंतरिक संकट से जूझ रहा है .. आम लोग गरीबी की मार झेल रहे हैं और इन सबकी वजह है चाड की सत्ता पर काबिज इदरिस डेबी 
इदरिस डेबी का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था ...बिदायत वंश के इदरिस डेबी के पिता एक चरवाहे थे .. डेबी ने हालांकि एक इस्लामिक स्कूल में शिक्षा ली और आगे चलकर साइंस में ग्रेजुएशन किया ... इसके बाद 1976 आते आते इदरिस डेबी प्रोफेशनल पायलट का भी कोर्स कर चुके थे ... कहते हैं 1979 तक इदरिस डेबी देश की आर्मी और प्रेसीडेंट के लिए Loyal  रहे .. लेकिन 1979 में देश में कई छोटे छोटे हथियारबंद ग्रुप बन गए थे जो देश की सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे ..इन्हीं में से एक ग्रुप हिसने हाब्रे का था .. इदरिस ने हिसने हाब्रे का ग्रुप ज्वाइन कर लिया .. इसीलिए जब 1982 में हिसने हाब्रे ने तख्तापलट कर अपनी सरकार बना ली तो इदरिस डेबी को कमांडर इन चीफ बनाया गया ... तब हिस्ने हाब्रे को ये भनक नहीं रही होगी कि यही इदरिस डेबी आगे चलकर उसकी सरकार गिरा देगा ... हिसने हाब्रे खुद एक तानाशाह था जिसके 8 साल के कार्यकाल में देश में 40 हज़ार से ज्यादा लोग मौत के घाट उतार दिए गए ... और जिसने अपनी आर्मी को लोगों के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई की छूट दे दी थी जिसमें महिलाओं के साथ रेप करना भी शामिल था ... देश में चल रही इस तरह की कार्रवाई को इदरिस डेबी का नेतृत्व हासिल था ... 1986 आते आते इदरिस डेबी हिसने हाब्रे का चीफ मिलिट्री एडवाइजर बन चुका था..... 1987 में इदरिस डेबी ने लीबिया-चाड युद्ध में लीबिया की सेना को भारी नुकसान पहुंचाया ... कहा जाता है कि इसमें इदरिस डेबी को फ्रांस का समर्थन मिला हुआ था .. हालांकि इस दौरान और इसके आने वाले सालों में इदरिस डेबी और हिसने हाब्रे के बीच मतभेद उभरने लगे थे ... इसकी वजह थी हिसने हाब्रे की वो सेना जो देश में उसके विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई कर रही थी .. कहा जाता है कि हिसने हाब्रे मानवाधिकार को ताक पर रखकर अपने ही देश में कत्लेआम मचा रखा था .. जिसका निशाना इदरिस के समुदाय के लोग भी हो रहे थे .. लिहाजा इदरिस हिस्ने हाब्रे के खिलाफ हो गया ... आने वाले तीन सालों में दोनों के बीच की दुश्मनी इतनी ज्यादा बढ़ गई कि इदरिस ने हिस्ने हाब्रे का तख्तापलट कर सत्ता पर काबिज हो गया ... हालांकि उस दौरान देश में हाब्रे के समर्थको का समूह मौजूद था लिहाजा कई बार इदरिस को सत्ता से बेदखल करने की कोशिश की गई .. लेकिन विरोधियों को इसमें कामयाबी हासिल नहीं हुई और इदरिस अभी तक चाड की सत्ता पर काबिज है .. 
चाड एक ऐसा देश है जो स्वतंत्र होने के बाद से ही अस्थिरता का शिकार रहा है ... देश कई कबीलों में बंटा हुआ है और इनमें आपस में झड़पें होती रहती हैं .. देश में मुस्लिमों और क्रिश्चियंस की आबादी है .. इदरिस डेबी के सत्ता संभालने के वक्त भी देश में मुश्किलें कम नहीं थीं .. हाब्रे के समर्थक नई सरकार के लिए मुश्किलें पैदा कर रहे थे ... खासकर तेल का मुद्दा गर्माता जा रहा था ... डोबा बेसिन से तेल निकाले जाने पर सरकारी कब्जे को लेकर देश मे विरोध तेज हो रहा था .. लोगों में ये भावना घर कर गई थी कि डेबी की सरकार इससे फायदा उठा रही है.... और देश की इस प्राकृतिक संपदा पर राष्ट्रपति ने अपना नियंत्रण कर लिया है ... इसके विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए.. तेज हो रहे प्रदर्शनों को डेबी की सरकार ने पूरी ताकत से दबाने की कोशिश की .. माना जाता है कि इसमें सैकड़ों लोग मारे गए ... हालांकि कुछ साल में इदरिस डेबी ने देश में प्रदर्शनों पर काबू पा लिया और वर्ल्ड बैंक और इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड के साथ मिलकर देश में आर्थिक सुधारों पर काम करने लगा ... 
1996 में चाड में नया संविधान लागू किया गया जिसके बाद देश में राष्ट्रपति चुनाव हुए और इदरिस डेबी ने सेकेंड राउंड में बहुमत हासिल कर ली .. डेबी को उनहत्तर फीसदी वोट मिले थे ... 
2001 में देश में एक बार फिर चुनाव हुए.. इसी साल देश में बहुदलीय लोकतंत्र की स्थापना की गई थी... चुनाव हुए  जिसमे डेबी ने बहुमत हासिल किया और एक बार फिर देश की राष्ट्रपति बनने में कामयाब रहा लेकिन आने वाले दिनों में देश में गृहयुद्ध शुरू होने वाला था... शांति और स्थिरता का माहौल बस 2003 तक चला ... देश में चाड की नीतियों के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा था ... संयुक्त मोर्चा फॉर डेमोक्रेटिक चेंज, डेवलपमेंट एंड डेमोक्रेसी के लिए संयुक्त मोर्चा जैसे अलग अलग समूह बन गए .. .. कहते हैं इदरिस डेबी ने अपने वंश और जाति को देश से भी ऊपर रखा था लिहाजा लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही थी ... 2005 में देश में मुस्लिम और क्रिश्चियन के बीच सिविल वॉर शुरू हो गई ... पड़ोसी देश सूडान के साथ भी तनाव बढ़ चुका था ... लिहाजा इदरिस को सत्ता से बेदखल करने की कोशिशें होने लगीं ...कहते हैं 2006 में इदरिस के विमान को भी निशाना बनाया गया … इदरिस एक समिट में भाग लेकर देश लौट रहे थे तभी सूडान के दारफुर इलाके से उसके विमान को निशाना बनाया गया था .... दारफुर वो इलाका था जिसमें चाड के विद्रोहियों ने शरण ले रखी थी .... इस मामले में इदरिस के कई करीबियों पर ही आरोप लगे ... आर्मी के दो सीनियर अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया ... ये वो दौर था जब इदरिस की अपनी आर्मी के कई लोग उसके खिलाफ साजिश कर रहे थे और विद्रोहियों से मिलकर इदरिस को सत्ता से बेदखल करने की कोशिशों में लगे थे ... इस घटना के बाद इदरिस से सूडान के साथ किया गया शांति समझौता भी तोड़ दिया ... इसी साल यानि 2006 के अगस्त में चाड में एक बार फिर राष्ट्रपति चुनाव हुए थे जिसमें इदरिस डेबी को कामयाबी मिली ..2005 में संविधान में संशोधन कर दिया गया था ... इसी संशोधन की बदौलत तीसरी बार भी इदरिस चुनाव लड़ पाए थे ... 2008 में इदरिस को एक बार फिर अपने ही देश में बड़े विद्रोह का सामना करना पड़ा .. विद्रोही देश की राजधानी तक पहुंच गए .. हालांकि इदरिस की सेना ने उनपर काबू पा लिया ... इदरिस ने सूडान पर विद्रोहियों की मदद करने के आरोप लगाए और ऐलान किया कि अब उसकी सेना ना सिर्फ राजधानी बल्कि पूरे देश को टोटल कंट्रोल में ले चुकी है ... 
कहने को चाड लोकतांत्रिक देश है लेकिन कमान इदरिस डेबी के हाथ में आने के पहले से ही देश में लोकतंत्र की जड़े बहुत गहरी नहीं थीं .... कई कबीलों में बंटे इस देश में हमेशा आंतरिक शांति को पर खतरा मंडराता रहता था ... खुद इदरिस भी ऐसी ही अशांति के बाद जन्मे नेता थे...सेना के कमांडर के तौर पर देश में मौजूद अशांति को खत्म करने का एक्सपीरियंस इदरिस पहले ही हासिल कर चुके थे ... ऐसे में देश में लोकतंत्र और मानवाधिकार की उम्मीद करना बेमानी साबित हो रहा था 
2011 में इदरिस डेबी चौथी बार देश के राष्ट्रपति चुने गए थे .. इस दौरान देश में तेल का भंडार सामने आ गया था .. चाड एक तेल निर्यातक देश बन चुका था .. इसने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार को जन्म दिया ...आरोप लग रहे थे कि इदरिस डेबी की सरकार तेल से पैदा होने वाले रेवेन्यू का इस्तेमाल सेना की शक्तियां बढ़ाने के लिए कर रही थी .... भ्रष्टाचार इतना बढ़ चुका था कि 2006 में फोर्ब्स पत्रिका ने दुनिया के भ्रष्टतम देशों की कैटेगरी में चाड को सबसे ऊपर रखा था ... 2012 आते आते ये अपने चरम पर पहुंच गया ... सरकार की छवि हद से ज्यादा खराब हो गई इसे ठीक करने के लिए इदरिस डेबी ने देश में ऑपरेशन कोबरा की शुरुआत की ... मकसद था भ्रष्टाचार पर काबू पाना और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करना ... हालांकि आरोप लगे कि इस बहाने इदरिस ने अपने सभी विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई करनी शुरू कर दी ...और भ्रष्टाचार में अपने साथी रहे लोगों को इससे फायदा पहुंचाया... 
इसी दौरान कट्टर इस्लामिक आतंकी संगठन बोको हरम ने भी अपने पैर पसारने शुरू कर दिए थे .... इदरिस ने इससे निपटने के लिए मल्टीनेशनल टास्क फोर्स में चाड को भी शामिल कर लिया.. अफ्रीका के कई देशों ने मिलकर बोको हरम के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था ... डेबी अपनी सेना को सूडान में विद्रोहियों के ठिकाने दारफुर और माली में इस्लामिक संगठन से निपटने के लिए भी भेजना शुरू कर दिया था ... 2015 में इदरिस ने ऐलान किया था कि मल्टीनेशनल टास्क फोर्स ने बोको हरम के अस्तित्व को खत्म कर दिया है ... हालांकि बोको हरम अभी तक आतंकी गतिविधियों को चला रहा है... अपनी सेना के दम पर इदरिस डेबी ने अपना प्रभाव अफ्रीकी देशों में काफी बढ़ा लिया था ...शायद इसीलिए इदरिस को 2016 में अफ्रीकन युनियन का चेयरमैन भी बनाया गया .. इदरिस ने  जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे की जगह ली थी ... चेयरमैन बनाए जाने पर इदरिस ने कहा था कि अफ्रीका में चल रहे विद्रोहों को खत्म करना ही होगा फिर चाहे ये रणनीति की बदौलत हो या फिर बल प्रयोग से ... इसी साल इदरिस ने मल्टीनेशनल टास्क फोर्स में सैनिकों की संख्या बढ़ाकर 10 हज़ार करने पर सहमति बना ली थी ... 
2016 आते आते चाड में बदलाव की मांग तेज होने लगी थी ... भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी सरकार को लोग सत्ता से बेदखल करना चाहते थे .. वहीं देश में आर्थिक संकट भी गहराने लगा था लेकिन देश को अभी भी इसके लिए इंतजार ही करना होता ... आने वाले चुनाव में भी सत्ता पर इदरिस ही काबिज होने वाले थे ... 
देश में सरकार विरोधी सुर तेज हो रहे थे ... देश में तमाम तरह की पाबंदियां थीं ... 2008 में ही सरकार फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया अकाउंट्स पर पाबंदी लगा चुकी थी ... अभी तक चाड में सोशल मीडिया का इस्तेमाल चुनिंदा लोग ही कर पाते हैं .... मीडिया पर सरकार का हमेशा से नियंत्रण रहा है ... रेडियो औऱ टेलीविजन पर सरकार के पक्ष में ही खबरें दिखाई जाती रही हैं.. सरकार की नीतियों के खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होती रही है .. इन सबके बीच 2016 में चाड में एक बार फिर राष्ट्रपति चुनाव हुए थे... इस चुनाव में भी इदरिस डेबी ने खुद को उम्मीदवार बनाया .... इदरिस ने चुनाव में राष्ट्रपति के टर्म लिमिट को भी मुद्दा बनाया था ... चाड ने कहा We must limit terms, we must not concentrate on a system in which a change in power becomes difficult.... हालांकि चाड खुद पांचवी बार राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहे थे जिसमें उन्हें 10 उम्मीदवारों से टक्कर मिली... इदरिस डेबी 2016 में भी चुनाव जीत गई .. कहते हैं मीडिया और सरकारी संस्थानों पर नियंत्रण ही चाड के काम आया था ... हालांकि 2018 में इदरिस डेबी ने संविधान में एक और बदलाव किया जिसकी बदौलत अब वो 2033 तक राष्ट्रति रह सकते हैं ... 
लगभग एक करोड़ अड़सठ लाख की आबादी वाले उत्तरी अफ्रीकी देश चाड के ज़्यादातर लोग अपनी जीविका कृषि से ही चलाते हैं...  जबकि इस देश में ऊपजाऊ ज़मीन कम और रेगिस्तान अधिक है....  हालाँकि चाड के पास खनिज भंडार की कमी नहीं है, यहाँ सोना तो है ही यूरेनियम भी है लेकिन बुनियादी सुविधाओं का काफ़ी अभाव है....
प्राकृतिक संपदा से समृद्ध इस देश ने आर्थिक तरक्की भी नहीं की है ….संयुक्त राष्ट्र के आकलन के मुताबिक़ चाड दुनिया के सबसे पिछड़े देशों में से एक है... यहाँ की 40 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे बसती है .... कहते हैं परोक्ष रूप से देश के सभी संसाधनों पर सरकारी कब्जे की वजह से देश की ये दुर्दशा है ... 2017 तक देश की बजट डेफिसिट 400 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया था ... 
अक्सर लोगों को सैलरी तक नहीं मिल पाती .. हाल ही में देश में सैलरी की मांग को लेकर सिविल सर्विसेज से जुड़े लोगों ने हड़ताल भी की थी ... यहां तक कि अस्पताल और स्कूल भी बंद रहे ... देश नकदी की समस्या से भी जूझ रहा है ... सरकार बोनस और भत्तो में पहले ही पचास फीसदी तक की कटौती कर चुकी है ... पिछले कुछ साल में तेल निर्यात की कीमत में गिरावट आने के बाद से चाड की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। देश की ज्य़ादातर आबादी गरीबी में जी रही है। सियासी अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता के मामले में चाड सबसे बुरे देशों में शामिल है ...

शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

belarussia

एक देश में जहाँ नेता चुनने के लिए चुनाव होते हों वहाँ कोई तानाशाह आखिर बन कैसे जाता है ... और तानाशाह की परिभाषा आखिर होती क्या है .. लोकतंत्र के मायने ये हैं कि जहाँ जनता जिसे चाहे वही नेता बने और जनता जो चाहे वही नेता करे ... लेकिन तानाशाही ऐसे नहीं चलती ...कहने को लोकतंत्र वाले देश में भी तानाशाह रवैये के वाला नेता वही करता है जो वो चाहता है और सिस्टम वैसे ही चलने लगता है जैसे तानाशाह चाहता है .. फिर तानाशाह के सक्षम रहने तक लोकतंत्र की कोई आवाज़ नहीं रह जाती ... 
आधुनिक इतिहास में जिन देशों में लोकतंत्र यानि चुनाव के जरिए नेता चुनने का रिवाज़ है वहाँ भी कई चुने गए नेता तानाशाह बन कर बैठे हैं ... एक ऐसा ही देश  है बेलारूस ... रूस जैसे शक्तिशाली देश की सीमा से लगा बेलारूस छोटा सा देश है लेकिन इसके नेता अलेक्जेंडर लुकाशेंको का प्रभाव काफी बड़ा है ...लुकाशेंको 1994 से इस छोटे से देश के नेता बने बैठे हैं और देश को वैसे ही चलाते हैं जैसे अपनी मनमर्जी से कोई अपना घर चलाता है ...देश के राष्ट्रपति के तौर पर एलेक्जेंडर लुकाशेंको पहले ही कह चुके हैं कि ‘आपको देश को नियंत्रण में रखना ही पड़ता है असल मुद्दा ये है कि लोगों की जिंदगी बर्बाद नहीं होनी चाहिए ...’  लेकिन बेलारूस की सड़कों पर होने वाले विरोध प्रदर्शन बताते हैं कि वहां जनता की जिंदगी बर्बाद हो रही है 
कहते हैं लोकतांत्रिक देश में भी सत्ता में बने रहने का नुस्खा अलेक्जेंडर लुकाशंको ने ही तैयार किया .. 1994 में अलेक्जेंडर लुकाशंको बेलारूस के राष्ट्रपति बने थे और तब से लेकर अब तक अपनी गद्दी पर कायम हैं .. इसके लिए उन्होंने 2004 में ही बेलारूस के संविधान में संशोधन करवा दिया था इस संशोधन के जरिए उन्होंने दो टर्म तक राष्ट्रपति रहने के प्रावधान को खत्म करवाया .. इसके बाद ही अलेक्जेंडर के ताउम्र राष्ट्रपति बने रहने का रास्ता साफ हो गया था ...
अलेक्जेंडर लुकाशेंको का जन्म एक बहुत ही साधारण परिवार में हुआ था .. पिता के बारे में कोई जानकारी नहीं थी .. माँ ने दूध बेचकर पाला पोसा ... अलेक्जेंडर लुकाशेंको ने एग्रीकच्लर एकेडमी से ग्रेजुएशन किया था  .. 1975 से 1977 तक अलेक्जेंडर लुकाशेंको ने बॉर्डर गार्ड के पॉलिटिकल इंस्ट्रक्टर के तौर पर काम किया था ..इसी दौरान लुकाशेंको कम्युनिस्ट यूथ ऑर्गनाइजेशन कोम्सोमॉल से भी जुड़े हुए थे ... इसके बाद उन्होंने 80 के दशक में सोवियत आर्मी ज्वाइन कर ली ... 1982 से लेकर 1990 तक लुकाशेंको ने पार्टी में कई पदों पर काम किया ..जिसके साथ लुकाशेंको अपना एक स्टेट फार्म भी चला रहे थे .... 1990 में सोवियत संघ के विघटन से ठीक पहले लुकाशेंको बेलारुस की सुप्रीम काउंसिल के लिए चुने गए थे ... कहते हैं लुकाशेंको बेलारूस की सुप्रीम काउंसिल के एकमात्र नेता थे जिन्होंने सोवियत संघ के विघटन के अग्रीमेंट का विरोध किया था ... लुकाशेंको ने कम्युनिस्ट फॉर डेमोक्रेसी के नाम से एक धड़ा तैयार कर लिया था ... 1994 में रूस की संसद को संबोधित करते हुए  अलेक्जेंडर लुकाशेंको ने सोवियत संघ के तर्ज पर एक नया युनियन बनाने की भी अपील की थी ... 25 अगस्त, 1991 को सोवियत संघ से अलग होकर बेलारूस आज़ाद देश बन गया था इसके बाद बेलारूस ने अपना नया संविधान बनाया.... 1994 में आए संविधान में राष्ट्रपति शासन प्रणाली अपनाई गई थी ... इसी व्यवस्था के तहत जून 1994 को बेलारूस में हुए पहले राष्ट्रपति चुनाव में लुकाशेंको बेलारूस के पहले राष्ट्रपति चुने गए... 
राष्ट्रपति चुने जाने के बाद लुकाशेंको ने रूस के साथ अपनी नजदीकियां बनाईं रखीं ... उस वक्त रूस में बोरिस येल्तसिन का शासन हुआ करता था.... दोनों देशों में कई तरह के दोस्ताना समझौते हुए थे जिसमें आपसी सहयोग का भरोसा था ... राष्ट्रपति बनने के अगले साल ही लुकाशेंको ने रेफरेंडम के जरिए देश का राष्ट्रीय चिन्ह बदलवा दिया और रूसी भाषा को बेलारूसी भाषा जितनी ही मान्यता दिला दी .... कहने को ये जनमत संग्रह लेकिन विरोधियों को ये रास नहीं आया और इसका विरोध शुरू हो गया ... नतीजा ये हुआ कि 20 सांसद भूख हड़ताल पर बैठ गए जिनकी हड़ताल मारपीट कर तुड़वा दी गई .. अपनी शक्तियां बढ़ाने की चाह को पूरा करने में लुकाशेंको ने बिल्कुल देर नहीं लगाई और राष्ट्रपति बनने के दो साल के अंदर जनमत संग्रह के जरिए संविधान में संशोधन कर दिया ...इस संशोधन के बाद 1999 में होने वाले चुनावों को आगे बढ़ाकर 2001 में कर दिया गया .. इसी संशोधन के जरिए देश का स्वतंत्रता दिवस भी 27 जुलाई से बदलकर 3 जुलाई कर दिया गया था .. हालांकि इस संशोधन को लेकर हुए रेफरेंडम पर भी सवाल उठे .. इसका विरोध ना सिर्फ देश बल्कि युरोपियन युनियन और युनाइटेड स्टेट्स ने भी किया ... हालांकि इससे लुकाशेंको को कोई फर्क नहीं पड़ा .. अपनी संसद में महाभियोग का सामना कर रहे लुकाशेंको ने अपने वफादारों को लेकर अलग पार्लियामेंट्री असेंबली बना ली ... महाभियोग का याचिका को खारिज कर दिया गया ... इस नई संसद को पश्चिमी देशों ने मान्यता नहीं दी ... 
1998 में रूस के सेंट्रल बैंक ऑफ रशिया ने बेलारूस की करेंसी रूबल में किसी तरह का व्यापार खत्म कर लिया .. इसका असर ये हुआ कि बेलारूस की करेंसी रूबल की वैल्यू बेतहाशा गिर गई ... इस पर कंट्रोल करने के लिए लुकाशेंको ने नेशनल बैंक ऑफ दी रिपब्लिक ऑफ बेलारूस की कमान अपने हाथ में ले ली और बैंक के सभी उच्च अधिकारियों  को बर्खास्त कर दिया .. लुकाशेंको ने इस आर्थिक संकट का पूरा दोष पश्चिमी देशों पर मढ़ दिया ... अपनी कार्रवाई को आगे बढ़ाते हुए लुकाशेंको ने दूसरे देशों के राजदूतों के खिलाफ भी कार्रवाई की .. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसे लेकर काफी हंगामा हुआ और नतीजे के तौर पर युरोपियन युनियन के देशों और युनाइटेड स्टेट्स में लुकाशेंको की यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया गया ... 
2001 में बेलारूस में फिर चुनाव हुए और लोगों को बेहतर जिंदगी, कृषि और उद्योगों के क्षेत्र में बड़े बदलाव के वादे के साथ लुकाशेकों एक बार फिर राष्ट्रपति चुन लिए गए .. हालांकि इस चुनाव में भी लुकाशेंको पर धांधली के आरोप लगे थे ... कहते हैं इस चुनाव को जीतने में लुकाशेंको की मदद रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने की थी .. और इसके पीछे एक गैस पाइपलाइन को लेकर किया गया समझौता था ... कहते हैं 2003 में अमेरिका ने इराक पर कार्रवाई शुरू की थी तो बेलारुस सद्दाम के समर्थकों की मदद कर रहा था ... इतना ही नहीं लुकाशेंको ईरान और इराक के साथ हथियारों की डील भी कर रहे थे ... इसने अमेरिका को काफी नाराज कर दिया था ... इसी का नतीजा था कि 2005 में अमेरिका के राष्ट्रपति रहे जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने बेलारूस को "the last remaining true dictatorship in the heart of Europe" करार दिया था ... 
अपनी गतिविधियों से लुकाशेंको सिर्फ अमेरिका की आलोचना का शिकार नहीं हो रहे थे बल्कि उन्होंने य़ुरोपियन युनियन को परेशान भी कर दिया था .. इसकी वजह थी उस गैस पाइपलाइन की सुरक्षा जो रूस से बेलारूस होते हुए युरोप के देशों तक आ रही थी ... पोलैंड, लिथुआनिया और लात्विया के शामिल होने के बाद युरोपियन युनियन देशों की करीब 1000 किलोमीटर की सीमा बेलारूस से लगती है ... 
इसी बीच अपनी लुकाशेंको अपनी शक्तियां बढ़ाने के लिए काम कर रहे थे ... उस वक्त के संविधान के मुकाबिक लुकाशेंको सिर्फ दो टर्म के लिए प्रेसीडेंट रह सकते थे ... लिहाजा 7 सितंबर 2004 को नेशनल टेलीविजन पर आकर लुकाशेंको ने ऐलान किया कि वो एक बार फिर संविधान में संशोधन करने जा रहे हैं .. ये संशोधन राष्ट्रपति की टर्म लिमिट को हटाने के लिए था ... अगले साल 2005 में बेलारूस मे राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हुए ... विरोधियो ने मिलकर फैसला किया कि लुकाशेंको को हराने के लिए सभी मिलकर एक ही उम्मीदवार उतारेंगे ... उस उम्मीदवार का नाम था अलेक्जेंडर मिलिंकीविच ... इस चुनाव के दौरान अलेक्जेंडर लुकाशेंको ने खुले तौर पर चेतावनी दी थी कि अगर कोई भी विरोधी पार्टियों के प्रदर्शन में शामिल होता है तो उसे आतंकी माना जाएगा ... लुकाशेंको ने कहा  "We will wring their necks, as one might a duck"... 
हालांकि लुकाशेंको की धमकियों का कोई असर नहीं हुआ .. एक्जिट पोल के नतीजे आते आते ही सड़क पर प्रदर्शनकारी जुटने लगे और बेलारूस ने उस वक्त तक का सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन देखा ... लुकाशेंको चुनाव जीत गए ... युरोपियन युनियन के देशों ने इसे अवैध करार दिया ... यहां तक कि रूस ने भी इस चुनाव में धांधली की बात कही .... चुनाव जीतने के कुछ ही दिनों के अंदर लुकाशेंको ने 2011 में फिर चुनाव में हिस्सा लेने की बात का ऐलान कर दिया .. हालांकि अगला चुनाव 2010 में ही हुआ और एक बार फिर लुकाशेंको की ही जीत हुई ... इस बार राष्ट्रपति पद के लिए 10 उम्मीदवार खड़े हुए थे ...चुनाव से पहले ही सेंट्रल इलेक्शन कमीशन ने लुकाशेंको के जीतने का भरोसा जता दिया था .. कहते हैं जिस दिन चुनाव हुए पुलिस ने राष्ट्रपति पद के दो उम्मीवारों की पिटाई की ... सात उम्मीदवार गिरफ्तार कर लिए गए .. नतीजा एक बार फिर बड़े विरोध प्रदर्शन के तौर पर सामने आया ,,,हजारों लोग राजधानी मिंस्क में सड़कों पर उतर आए...जिस पर नियंत्रण करने के लिए सुरक्षा बलों ने सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया और कई लोगों की पिटाई भी की गई .. इसके बाद 2015 का चुनाव भी लुकाशेंको ने ही जीता और तब से अब तक वो राष्ट्रपति पद पर काबिज हैं ..
एक बार फिर बेलारूस में चुनाव हैं और एलेक्जेंडर लुकाशेंको राष्ट्पति पद के उम्मीदवार हैं ... इस बार उन्हें 37 साल की स्वेतलाना तिखानोवस्काया नाम की एक टीचर चुनौती दे रही हैं ... स्वेतलाना कभी भी राजनीति में नहीं आना चाहती थीं लेकिन अपने पति की बेवजह गिरफ्तारी के बाद उन्होंने लुकाशेंको को चुनौती देने की ठानी ... स्वेतलाना को बड़े पैमाने पर समर्थन मिल रहा है और बेलारूस को बदलाव की उम्मीद है ... 
एलेक्जेंडर लुकाशेंको बेलारूस को अपने तौर तरीकों से चलाना चाहते हैं लिहाजा सब कुछ सरकार के कब्जे में है... लुकाशंको की आर्थिक नीति अनिश्चित और कथित मार्क्सवादी दृष्टिकोण वाली रही है... यहां के 80 फीसदी संसाधन पर सरकार का नियंत्रण है .... और लुकाशेंको की नीतियों की वजह से बेलारूस की अर्थव्यवस्था रूस पर निर्भर है ...  रूसी समर्थन की वजह से ही बेलारूस में समय पर वेतन और पेंशन का भुगतान हो पा रहा है... 
बेलारूस को रूस में मिलाए जाने की खबरें भी यहां की जनता को परेशान करती रहती है ... क्रीमिया पर रूस के कब्जे के बाद लोगों में ये डर और बढ़ चुका है ... लुकाशेंको बोरिस येल्तसिन के समय मे भी इस तरह के समझौते पर चर्चा कर चुके हैं ऐसे में लोगों को लगता है कि एक बार फिर ऐसे किसी समझौते के जरिए बेलारूस और रूस मे कोई गठजोड़ हो सकता है ... 
बेलारूस में मानवाधिकार हनन के कई मामले सामने आते रहते हैं .. विपक्षी दलों के नेताओं को नजरबंद करने की खबरें आम हो चुकी हैं ... कहते हैं लुकाशंको की कैबिनेट के ही दो सदस्य रहस्यमय तरीके से गायब हो चुके हैं..मीडिया पर सरकार का ही नियंत्रण है ... बेलारूस कई मायनों में यूरोप के दूसरे देशों से अलग है...  ये यूरोप का आख़िरी ऐसा देश है जहां अब भी मौत की सज़ा का प्रावधान है... 
जून 2016 में एलेक्जेंडर ने कहा था कि मैं जो इस मंच से बोल रहा हूं वही आपके लिए कानून है ... कुछ इसी तरह से लुकाशेंको अपना देश चला रहे हैं ... दरअसल अपने तानाशाही मिजाज की झलक लुकाशेंको ने 2003 में ही दे दी थी जब उन्होंने कहा था An authoritarian style of rule is characteristic of me, and I have always admitted it," लुकाशेंको ने ये भी कहा "You need to control the country, and the main thing is not to ruin people's lives."

सोमवार, 3 अगस्त 2020

ram nam ki

राम नाम की लूट में कांग्रिस पार्टी कूद पड़ी है
अब उसके नेता कमल नाथ दिग्विजय सिंह सहित ज़्यादातर लोग राम भक्त बन गए है 
इन नेताओं का आत्मविश्वास भाजपा नेता subrmaniyam स्वामी के बयान के वाद आया है
श्री स्वामी जी के मुताबिक़ अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का क्रेडिट राजीव गांधी को देना चाहिए 
उनका कहना है की राम राज्य की स्थापना का नारा भी राजीव गांधी ने उस समय के फ़ैज़ाबाद में आयोजित एक चुनावी रैली में दिया था 
श्री स्वामी का यह बयान काफ़ी हद तक सही है भलहि इसका मक़सद राजनैतिक हो 
अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद में राम लला को कांग्रिस के शासन काल में रखा गया था 
फिर विवादित पूजा घर का ताला कांग्रिस के ही समय में खोला गया 
राम मंदिर के लिए प्रस्तावित मंदिर का भूमि पूजन और शिलान्यास भी कांग्रिस के समय ही हुआ
विवादित पूजा स्थल भी कांग्रिस के समय ही गिराया गया 
विवादित पूजा स्थल के चारों तरफ़ लगभग 68 acre land का अधिग्रहण भी कांग्रिस के ही वक़्त में हुआ अब भव्य मंदिर का निर्माण इसी भू भाग पर होने जा रहा है
कांग्रिस पार्टी नेहरु जी के बाद से लेकर अब तक soft hindutva के अजेंडा पर चलती रही है 
शायद यही कारण है की उसको लम्बे समय तक सत्ता में रहने का अवसर मिला 
अब देश के अलग अलग राज्यों में चुनाव हैं
कांग्रिस पार्टी soft hindutva aur nationalism को लेकर जनता के बीच में जाना चाहती है 
इसीलए चीन और राम अब कोंग्रेसियों को सपने में भी दिखायी दे रहे हैं

covid 19

जो काम कॉर्ल मार्क्स से लेकर दुनिया के तमाम समाजवादी - communist philosophers नहीं कर पाए उस काम को चीन के मौजूदा हुकूमत ने कर दिखाया है 
कोविद19 के ज़रिए दुनिया में मौजूद ग़ैर बराबरी को एक ही झटके में समाप्त कर दिया है 
कोविद १९ के सामने आमिर ग़रीब राजा रैंक सब बराबर हैं यह महामारी सबको एक नज़र से देख रही है 
धर्म के ठेकेदारों और देवी देवताओं के प्रति भी कोविद १९ का नज़रिया समता मूलक है
चीन के rastrapati zi zin ping ने दुनिया  के सम्पूर्ण मानव समाज को covid 19 के रूप में चमत्कारी तोहफ़ा दिया है 
इस तोहफ़ा के माध्यम से उन्होंने एक बार फिर आस्तिक और नास्तिक के debate ko ज़िंदा कर दिया है 
अब तय सम्पूर्ण मानव समाज को करना है कि
Rationality vs superstition में कौन सा मार्ग बेहतर है
जिस bilogical weapons of mass destruction का आरोप लगा कर अमेरिका ने इराक़ और वहाँ के president सद्दाम हुसैन को मारा था वही अमेरिका covid १९ के सामने ज़मीन पर लेटे हुए नज़र आ रहा है चीन के real virus ने दुनिया के dictators  arrogants god’s goddesses  और धर्म के ठेकेदारों के सामने जो चुनौती पेश की है उसका जवाब तो फ़िलहाल किसी के पास नहीं है

शनिवार, 1 अगस्त 2020

turkey

तुर्की एक ऐसा देश है जो मुस्मिल बहुल आबादी के बाद भी सेक्युलर था और युरोपियन युनियन का हिस्सा हो सकता था ... उस देश को आज NATO यानि North Atlantic Treaty Organoisation से भी बाहर किए जाने की मांग उठने लगी है ... और इसकी वजह हैं तुर्की के राष्ट्रपति रेचप तैयब अर्दोआन .... अर्दोआन ने देश को विकास के जरिए एक नई दिशा देने से शुरुआत की थी लेकिन इस्लामिक कट्टरपंथी रवैये से अर्दोआन ने देश को बर्बादी की दिशा में धकेल दिया है ... 
2016 में तुर्की की राजधानी अंकारा और इंस्तांबुल की सड़कों पर आर्मी के टैंक दौड़ते हुए नज़र आए थे ... ये दरअसल कोशिश थी 13 साल से सत्ता पर काबिज रेचप तैयब अर्दोआन की तख्तापलट की ... हालांकि इस बात को 4 साल बीत चुके हैं लेकिन रेचप तैयब अर्दोआन की सत्ता कायम है और वो अभी भी तुर्की के राष्ट्रपति बने हुए हैं ... एक ऐसे राष्ट्रपति जिसके खिलाफ रह रहकर तुर्की में हिंसक विरोध प्रदर्शन होते रहते हैं ... सड़कों पर जनता उतरकर अर्दोआन की नीतियों का खुलकर विरोध करती है लेकिन अर्दोआन हर मुमकिन तरीके अपना कर ऐसे विरोध प्रदर्शनों को दबाने में कामयाब रहते हैं ... 
दरअसल तुर्की में कट्टरपंथी और  उदारवादियों के बीच वैचारिक लड़ाई चलती रहती है ... जनता के लगातार विरोधों और सेना की तख्तापलट की कोशिशों के बावजूद रेचप तैयब अर्दोआन की सत्ता पर पकड़ कमजोर नहीं पड़ रही ... संविधान में बार बार संशोधन कर रेचप तैयब अर्दोआन सेना, बजट, संसद सब पर अपना एकाधिकार कर लिया है .... ये एकाधिकार रेचप ने जनमत संग्रह के ज़रिए ही हासिल किया है लेकिन विरोधी इस जनमत संग्रह की पारदर्शिता पर हमेशा सवाल खड़े करते आए हैं ... लिहाजा रेचप तैयब अर्दोआन भले ही खुद को तानाशाह कहे जाने पर नाराजगी जाहिर करते आए हों लेकिन सत्ता चलाने के उनके तौर तरीकों को देखते हुए उन्हें आधुनिक दुनिया में एक तानाशाह के तौर ही देखा जाता है ... 
तुर्की की मौजूदा राजनैतिक और सामाजिक स्थिति की बुनियाद दशकों पहले पड़ चुकी है ... 2016 में तख्तापलट की असफल कोशिश से पहले सेना ने कई बार सफल तख्तापलट को अंजाम दिया है .... एक्सपर्ट मानते हैं कि ऐसा तुर्की के समाज में व्याप्त कमाल अतातुर्क की आधुनिक विचारधारा वर्तमान सरकार की पारंपरिक कट्टरवाजी इस्लामिक विचारधारा में टकराव की वजह से है ... तुर्की की फौज कमालिस्ट आइडिय़ोलॉजी की तरफ झुकाव रखती है वहीं तुर्की के तानाशाह अर्दोआन ने फौज के एक धड़े समेत देश की बड़ी आबादी खासकर रवायती मुसलमान समुदाय में व्यापक समर्थन हासिल कर रखा है .... 
कमालिस्ट आइडिय़ोलॉजी के समर्थक तुर्की को एक नया आधुनिक और प्रगतिशील देश मानते हैं लेकिन राष्ट्रपति अर्दोआन की नीतियां इससे थोड़ी अलग हैं ... 
इसे अर्दोआन के इस्तांबुल के ऐतिहासिक हागिया सोफिया म्यूज़ियम को दोबारा मस्जिद में बदलने के आदेश से समझा जा सकता है ... छठी सदी में बना हागिया सोफिया दुनिया के सबसे बड़े चर्चों में से एक था जिसे बाद में मस्जिद बना दिया गया था ... पहले विश्व युद्ध के बाद जब तुर्की में उस्मानिया सल्तनत के खात्मे के बाद मुस्तफा कमाल पाशा का शासन शुरू हुआ... तब मस्जिद बना दिए गए चर्च हागिया सोफिया को म्यूजियम में बदलने का फैसला लिया गया था ... उस वक्त पाश के उस फैसले को आधुनिक तुर्की के अहम फैसलों में से एक माना गया था .. हालांकि 2019 के चुनाव में इसे वापस म्यूजियम बना देने के वादे के साथ आए अर्दोआन ने 1934 में लिए गए कैबिनेट के उस फैसले को रद्द कर दिया और युनेस्को की तरफ से विश्व विरासत घोषित की जा चुकी इस इमारत को म्यूजियम से वापस मस्जिद में बदलने का आदेश दे दिया ... माना जा रहा है कि ये अर्दोआन की तरफ से दुनिया को एक संदेश है कि तुर्की बदल चुका है ... 
अर्दोआन तुर्की की सत्ता पर काबिज होने से काफी पहले से ही राजनीति में सक्रिय रहे हैं .. 70- 80 के दशक में अर्दोआन कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा के लोगों से जुड़ गए थे.. उस दौरान अर्दोआन ने नेकमातिन एरबाकन वेलफेयर पार्टी ज्वाइन कर ली थी ... इसी इस्लामिस्ट वेलफेयर पार्टी के कैंडिडेट के तौर पर अर्दोआन 1994 में इस्तांबुल के मेयर चुने गए .. एक मेयर के तौर पर अर्दोआन ने अच्छी छवि बनाई थी .. शहर में हज़ारों किलोमीटर वॉटर पाइपलाइन बिछाई गई ... वायु प्रदूषण कम करने के लिए पूरे शहर को हरा-भरा बना दिया ... कई पुल और हाइवे बनाकर शहर से ट्रैफिक जाम की दिक्कत को काफी हद तक कम कर दिया गया... हालांकि इसके बाद भी अपनी कट्टरपंथी विचारधारा की वजह से अर्दोआन को मेयर की कुर्सी गंवानी पड़ी तब किसको पता था कि ये शख्स देश की सर्वोच्च कुर्सी पर काबिज होने वाला है .. 
1998 में वेलफेयर पार्टी पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया .. और धार्मिक नफरत को बढ़ावा देने के आरोप में अर्दोआन 4 महीनों तक जेल में रहे ..... इसके बाद कुछ समय तक के लिए अर्दोआन ने अपनी कट्टरपंथी छवि से किनारा कर लिया और अपने सहयोगी अब्दुल्ला ग्यूल के साथ मिलकर एके पार्टी बनाई.... इस एके पार्टी को 2002 में तुर्की के चुनावों में शानदार जीत मिली .... तब अर्दोआन प्रतिबंधों का सामना कर रहे थे लिहाजा अबदुल्ला ग्यूल ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और अर्दोआन पर लगे सारे प्रतिबंध हटा दिए गए ... 2003 में ग्यूल को पद से हटाकर अर्दोआन ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली ... 
अर्दोआन इस्तांबुल के सबसे पुराने शहर कसीमपासा में पैदा हुए .. बाद में उनका परिवार यहां से उत्तरी पूर्वी तुर्की के रिजे प्रांत में बस गया .. 1954 में पैदा हुए अर्दोआन के पिता तुर्की के कोस्टगार्ड में कैप्टन थे... जब अर्दोआन 13 साल के थे तो उनके पिता ने तुर्की के काला सागर तट से इस्तांबुल आने का फैसला किया... परिवार के पास ज्यादा पैसे नहीं थे लिहाजा बचपन के दिनों में अर्दोआन ने अपनी पॉकेटमनी से पोस्टकार्ड और पानी खरीद कर उन्हें बेचना शुरू किया ताकि ज्यादा पैसे कमा सकें .... उन्होंने इस्तांबुल की सड़कों पर नींबू पानी और बन भी बेचा .. अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान एर्दोआन ने कुरान, पैगंबर मोहम्मद की जीवनी और अरबी भाषा की पढ़ाई की थी .. कहते हैं स्कूल में अर्दोआन के साथी उन्हें मुस्लिम टीचर कहा करते थे ... इसके बाद अर्दोआन ने इस्तांबुल की मारमरा यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट की पढ़ाई की ... यूनिवर्सिटी में ही उनकी मुलाक़ात नेकमातिन एरबाकन से हुई जो तुर्की के पहले इस्लामी कट्टरपंथी प्रधानमंत्री बने और इस तरह तुर्की का इस्लामी कट्टरपंथी आंदोलन शुरू हुआ.... जिसकी सीढियां चढ़ते हुए अर्दोआन पहले मेयर और फिर प्रधानमंत्री बन गए ... 
प्रधानमंत्री बनने के बाद रेचप तैयब अर्दोआन उसी छवि के अनुकूल काम शुरू किया था जो उन्होंने इस्तांबुल के मेयर रहते हुए बनाई थी ... अर्दोआन जब प्रधानमंत्री बने तब तुर्की की अर्थव्यवस्था सुधार की ओर बढ़ रही थी ... इन्होंने मैक्रो इकोनोमी पर काम किया, विदेशी निवेशक जुटाने शुरू कर दिए ..लिहाजा 2003 से लेकर 2012 के बीच में तुर्की की जीडीपी 64 फीसदी और पर कैपिटा इनकम (Per Capita Income) में 43 फीसदी की ग्रोथ देखने को मिली ... 2002 में महंगाई दर 32 फीसदी लेकिन अर्दोआन के शासन के पहले दो साल में महंगाई की दर गिरकर  9 फीसदी पर आ गई ... अर्दोआन ने लेबर लॉज (Labor Laws) में भी बदलाव किए ... नीतियों कर्मचारियों के हितों को ध्यान मे रखकर बनाई गईं ...working hours घटा दिए गए ... ओवरटाइम की लिमिट तय कर दी गई ..उन्हें कई तरह की कानूनी सुरक्षा भी दी गई... अर्दोआन ने शिक्षा के लिए बजट भी बेतहाशा बढ़ा दिया... 2002 में तुर्की का शिक्षा बजट 7.5 फीसदी लीरा हुआ करता जो 2011 आते आते 34 बिलियम लीरा कर दिया गया ... देश में युनिसेफ की मदद से अर्दोआन की सरकार ने  Come on girls, let's go to school!" नाम से एक कैंपेन शुरू किया गया ... 12 साल तक की उम्र के लिए शिक्षा अनिवार्य कर दी गई .... बच्चों के लिए किताबें फ्री कर दी गईं ..  अर्दोआन के काल मे देश में विश्विद्यालयों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई थी .. ऐसा ही विकास हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर में भी देखने को मिला था .. अर्दोआन ने हेल्थ ट्रांसफॉर्मेशन प्रोग्राम शुरू किया जिसके जरिए देश के सभी नागरिकों को क्वालिटी हेल्थकेयर की गारंटी मिली ... अर्दोआन ने देश में एंटी स्मोकिंग कैंपेन भी शुरू किया जिसके तहत सार्वजनिक स्थानों सिगरेट पीना बैन कर दिया गया .. अर्दोआन ने इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी काम किया .. एयरपोर्ट्स की संख्या बढ़ गई ... देश में हाई स्पीड ट्रेनें चलनी लग गईं ... देश में एक अंडर सी रेल टनल भी बनाया गया ...2004 में रेचप तैयब अर्दोआन ने तुर्की में मौत की सज़ा का प्रावधान खत्म कर दिया .. युरोपियन युनियन ने इस कदम की काफी तारीफ की थी. ... हालांकि न्यायपालिका में नियुक्ति को लेकर अर्दोआन विवादों में रहे .. खासकर तब जब कुछ जजों ने मीडिया के सामने आकर अर्दोआन पर आरोप लगाए .. अर्दोआन ने विदेश नीति के मसले पर don't make enemies, make friends की नीति अपनाई .. और पड़ोसियों के साथ जीरो प्रॉब्लम पर काम करना शुरू किया ...अर्दोआन ने तुर्की को युरोपियन युनियन का सदस्य बनने के लिए भी निगोसिएशन शुरू किया... लेकिन बहुत जल्द परिस्थितियां बदलने वालीं थीं.. 
अर्दोआन ने अपने पड़ोसी देशों में आर्मेनिया को छोड़कर बाकी सारे देशों का दौरा किया .... अपने रिश्ते सुधारने की कोशिश में सीरिया के साथ भी तुर्की के रिश्ते कुछ वक्त के लिए ठीक रहे ... यही हाल इजरायल के साथ भी हुआ... अर्दोआन ने इजरायल का भी दौरा किया था ताकि रिश्ते सुधर सकें ... लेकिन ऐसा ज्यादा दिनों तक नहीं चल सका ... 
एक प्रधानमंत्री के तौर पर लोकप्रिय होने, सुधार के कई काम करने के बावजूद अर्दोआन देश की जनता के मन से अपने कट्टर इस्लामिक होने की छवि नहीं बदल पाए थे .. लिहाजा 2007 में होने वाले चुनावों के दौरान तुर्की में विरोध प्रदर्शन देखे गए .. ये प्रदर्शन राष्ट्रपति अर्दोआन के राष्ट्रपति पद के लिए संभावित उम्मीदवारी को लेकर था ... 3 लाख से ज्यादा प्रदर्शनकारियों ने राजधारी अंकारा की सड़कों पर प्रदर्श किया उन्हें डर  था अगर अर्दोआन राष्ट्रपति बने तो वो तुर्की के धर्मनिरपेक्ष समाज को तहस-नहस कर देंगे ...हालांकि अर्दोआन ने अपने सहयोगी अब्दुल्ला गुल को उम्मीदवार घोषित कर दिया ... अर्दोआन की पार्टी एकेपी को ऐतिहासिक जीत मिली और अब्दुल्ला गुल राष्ट्रपति बना दिए गए ... अर्दोआन एक बार फिर प्रधानमंत्री बने ... इसके बाद से अब तक अर्दोआन ने राष्ट्रपति चुनावों से लेकर जनमत संग्रह तक लगभग 14 चुनावों का सामना किया है .. और सभी में जीत हासिल की है .. 
अपने शुरुआती कामों की वजह से रेचप तैयब अर्दोआन ने तुर्की की छवि एक विकासशील देश की बनाई थी लेकिन देश में विरोध पनप रहा था ... ये विरोध रेचप तैयब अर्दोआन की रूढिवादी इस्लामिक छवि के खिलाफ था जो गाहे बगाहे उनकी नीतियों के जरिए देश के सामने आ रही थी .... 
आधुनिक तुर्की के संस्थापक माने जाने वाले मुस्तफा कमाल अतातुर्क के लिए फैसलों की आलोचना करने और उनकी बनाई सेक्युलर परंपरा के खिलाफ कदम उठाकर अर्दोआन ने देश की अवाम के बड़े हिस्से के दिलों में अपने लिए संदेह पैदा कर लिया था ... 
2013 आते आते अर्दोआन की सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर चुकी थी ... भ्रष्टाचार के आरोप में चार मंत्रियों का इस्तीफा भी हुआ .. हालांकि इसके साथ ही अर्दोआन ने मीडिया और सोशल मीडिया पर नकेल कसनी शुरू कर दी ... अर्दोआन पर विरोध में खबर छापने वाले संपादकों को सीधा फोन कर धमकाने के आरोप भी लगे ..
इसी साल मई के महीने में इस्तांबुल के तकसीम गेज़ी पार्क के पुनर्विकास के काम के खिलाफ लोगों ने प्रदर्शन शुरू कर दिए .. ये प्रदर्शन सरकार के रवैयों के खिलाफ और उग्र हो गया और देखते ही देखते पूरे देश में फैल गया ... देश में अब रेचप तैयब अर्दोआन के खिलाफ लोग मुखर होने लग गए थे ... 
हालांकि अगले ही साल हुए चुनावों में इसका असर नहीं दिखा और अगस्त 2014- अर्दोआन पहली बार सीधे जनता के द्वारा चुन कर पहले राष्ट्रपति बने... लोकतंत्र वाले सेक्युलर देश में तानाशाही की शुरुआत हो चुकी जहाँ आने वाले वक्त में इस्लामिक कट्टरपंथ भी सिर उठाने वाला था .. 
2016  में इस्तांबुल में एक भाषण के दौरान अर्दोआन ने कहा था, ''महिलाओं की यह ज़िम्मेदारी है कि वो तुर्की की आबादी को दुरुस्त रखें.... हमें अपने वंशजों की संख्या बढ़ाने की ज़रूरत है..... लोग आबादी कम करने और परिवार नियोजन की बात करते हैं लेकिन मुस्लिम परिवार इसे स्वीकार नहीं कर सकता है.... हमारे अल्लाह और पैग़म्बर ने यही कहा था और हम लोग इसी रास्ते पर चलेंगे....'' अर्दोआन का ये बयान भी काफी विवादित रहा था जिसमें उन्होंने कहा था महिलाओं और पुरुषों को बराबर नहीं आंका जा सकता... 
2016 में ही अर्दोआन को तख्तापलट की कोशिश का भी सामना करना पड़ा ... जिसे अर्दोआन ने बहुत सख्ती से कुचला ... अर्दोआन ने सोशल मीडिया के जरिए अपने समर्थकों से अपील की ... जिसका नतीजा ये हुआ कि तख्तापलट की कोशिश करने वाले सैनिकों की सरेआम बेरहमी से पिटाई की गई ... इसके बाद 50 हज़ार से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया .... मीडिया पर अर्दोआन ने परोक्ष रूप से कब्जा कर लिया ..देश में मौत की सज़ा बहाल कर दी गई ... 
अर्दोआन ने संविधान में संशोधन भी कर दिए .. जिसकी बदौलत अब रेचप बहुत ताकतवर हो चुके हैं ... अब तुर्की में संसदीय व्यवस्था की जगह राष्ट्रपति शासन व्यवस्था हो चुकी है और अर्दोआन तुर्की के सर्वेसर्वा बन चुके हैं .. नए नियमों के मुताबिक अगले दस साल अर्दोआन राष्ट्रपति रह सकते हैं जिसके पास वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर मंत्रियों, जजों और उप राष्ट्रपति तक को नियुक्त करने की ताकत है ... यहां तक कि न्यायिक व्यवस्था में भी वो दखल दे सकते हैं और देश के बजट का भी बंटवारा कर सकते हैं .. इतने अधिकारों के बाद कोई भी अब तुर्की में उनके अधिकारों की समीक्षा नहीं कर सकता ... अर्दोआन अब अमेरिका के व्हाइट हाउस और रूस के क्रेमलिन से भी बड़े प्रेसीडेंशियल पैलेस में रहने लगे हैं .. 
इसी बीच तुर्की आर्थिक संकट से घिरता जा रहा है ...  अमेरिका और तुर्की के बीच तकरार काफी बढ़ चुकी है .. लीरा की कीमत डॉलर के मुकाबले गिरती जा रही है .. और महंगाई की दर 100 फीसदी की रफ्तार से आगे बढ़ रही है .. तुर्की विदेशी कर्जों के तले भी दबा हुआ है .. 
रेचप तैयब अर्दोआन अपने इस्लामिक कट्टरपंथ को आगे बढ़ाने के मकसद से ऐसे देशों से अपनी नजदीकियां भी बढ़ा रहे हैं .. पाकिस्तान के अपने दौरे पर भारत विरोधी बयान भी उनके ऐसे अभियान का हिस्सा है. ऐसे में उनपर इस्लामिक चरमपंथ को बढ़ावा देने के आरोप भी लग रहे हैं ... 
फिलहाल उनके तौर तरीकों से उन पर भले ही तानाशाह होने के आरोप लगें लेकिन अर्दोआन को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता ... ये 2016 में दिए गए उनके बयान से भी साफ हो चुका है जिसमें उन्होंने कहा था ... "I don't care if they call me a dictator or whatever else. It goes in one ear, out the other."

गुरुवार, 30 जुलाई 2020

iran

अयातुल्लाह सय्यद अली होसैनी ख़ामेनेई  .. इस नाम से ज्यादातर लोग परिचित हैं... ईरान के सर्वोच्च नेता के तौर पर खामेनेई ने पूरी दुनिया में अपनी एक पहचान बना रखी है खासकर अमेरिका से अपनी दुश्मनी निभाने को लेकर ... खामेनेई बचपन से ही अपने पिता की तरह मौलवी बनना चाहते थे और तब किसी ने नहीं सोचा था कि खामेनेई एक दिन ईरान के सर्वोच्च नेता होंगे और एक तानाशाह की तरह सरकार चलाएंगे ... 
अयातुल्लाह अली खामेनेई का जन्म 1939 में इरान के पवित्र माने जाने वाले शहर मशहद में हुआ था ...अपनी उम्र के बाकी बच्चों से अलग खामेनेई ने जब मौलवी बनने का फैसला किया था तो वैसे कपड़े भी पहनने लग गए थे ... अक्सर बाकी बच्चे खामेनेई का मज़ाक उड़ाया करते .. लेकिन इससे खामेनेई के इरादों में कोई फर्क नहीं आया .. 
खामेनेई 8 भाई बहनों में से एक हैं ... इनके दो भाई मौलवी हैं जबकि एक भाई मौलवी होने के साथ साथ एक अखबार का संपादक भी है ... खामेनेई की पढ़ाई चार साल की उम्र में शुरू हो गई थी जब इन्होंने एक मकतब में कुरान पढ़ना शुरू किया था ... मौलवी बनने के लिए आगे की पढ़ाई खामेनेई ने मशहद शहर के सेमीनरी और हवजा से की .. हालांकि धार्मिक शिक्षा के साथ साथ खामेनेई राजनीति में भी काफी सक्रिय थे ..
अयातुल्लाह अली खामेनेई को जानने वाले कहते हैं कि खामेनेई एक आम इंसान की तरह ही पले बढ़े ... उन्हें कविताओं का बहुत शौक है...  लेकिन एक चीज जो खामेनेई को उनके साथ के लोगों से अलग करती थी वो थी स्मोकिंग की आदत... अक्सर खामेनेई को सार्वजनिक जगहों पर स्मोक करते हुए देखा जा सकता था ....जबकि इस्लामिक शिक्षा से जुड़े लोगों के लिए ये आम बात नहीं है... 
खामेनेई की राजनीतिक महात्वाकांक्षा सत्तर के दशक में ही सामने आ गई थी जब ये  इस्लामिक लीडर और अपने गुरु अयातुल्‍लाह रुहोल्लाह खोमैनी की देश वापस के लिए चल रहे आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था ... उस वक्त देश में मोहम्मद रजा शाह पहलवी का शासन हुआ करता था... देश में कहने को लोकतंत्र था लेकिन जनता के चुने प्रधानमंत्री की कोई अहमियत नहीं थी ... पहलवी राजवंश के मोहम्मद रजा शाह पहलवी का ही परोक्ष रूप सत्ता पर नियंत्रण हुआ करता था ...जो एक तरह से अमेरिका की कठपुतली था... जनता में इसके खिलाफ बगावत जन्म ले रही थी... इस बगावत की अगुआई करने वाले अयातुल्लाह रुहोल्लाह खोमैनी को देश निकाला दे दिया गया था लेकिन ईरान में शाह के खिलाफ हमेशा प्रदर्शन होते रहते थे रुहोल्लाह खोमैनी की देश में वापसी की मांग की जाती थी ... ईरान के मौजूदा सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई भी 70 के दशक में होने वाले इस विरोध प्रदर्शनों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया करते थे ... कहते हैं इस दौरान अली खामेनेई को 6 बार गिरफ्तार भी किया गया ...
शाह के खिलाफ हुई ईरानी क्रांति का नतीजा था कि 1979 में एक जनमत संग्रह के बाद ईरान को इस्लामी गणतंत्र घोषित किया गया.. और वर्तमान सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई के गुरू रहे अयातुल्लाह रुहोल्लाह खोमैनी को देश का सर्वोच्च नेता चुना गया... तभी ईरान में प्रधानमंत्री का पद खत्म कर राष्ट्रपति का पद कायम किया गया ... और एक तरह ईरान में अमेरिका की कठपुतली सरकार भी तभी से खत्म हो गई ... जो अली खामेनेई के शासन काल में भी जारी है ... 
रुहोल्लाह खोमैनी के ईरान के सर्वोच्च नेता बनने के बाद से अक्सर खामेनेई उनके साथ नज़र आया करते थे ... खोमैनी के कार्यकाल में खामेनेई को डिप्टी डिफेंस मिनिस्टर भी बनाया गया ... कहते हैं इसमें उस वक्त सांसद रहे हसन रुहानी की अहम भूमिका थी ... जो अब ईरान के राष्ट्रपति हैं ... खामेनेई के विरोधी कहते हैं कि उनके बारे में उस वक्त लोग सिर्फ इतना जानते थे कि इन्हें कई बार जेल हुई है .... 
खोमैनी ने अली खामेनेई को 1980 में तेहरान में होने वाली शुक्रवार की नमाज के लिए इमाम भी नियुक्त किया था... कहते हैं इस्लामिक देश बन चुके ईरान में सत्ता में तेजी से बढ़ते कदम की वजह से अली खामेनेई अपने विरोधियों की नज़रों में आ गए थे जिसकी वजह से अली खामेनेई के खात्मे की साजिश रची जाने लगी थी..
अली खामेनेई पर 1981 में पीपुल्स मुजाहिदीन ऑर्गनाइजेशन ऑफ इरान ने एक घातक हमला किया था ... इस हमले में खामेनेई की जान बच गई लेकिन दाहिना हाथ खराब हो गया .. कहा जाता है कि जान बच जाने पर खामेनेई ने कहा था कि खुदा ने उन्हें किसी वजह से बचाया है .. इस हादसे के कुछ ही दिनों बाद ईरान में हुए राष्ट्रपति चुनाव में खामेनेई को 97 फीसदी वोट के साथ जीत हासिल हुई... राष्ट्रपति बनने के बाद अपने पहले भाषण में खामेनेई ने deviation, liberalism और American-influenced leftists के खात्मे की बात कही थी .. और आने वाले सालों में ऐसा ही हुआ ... 
उस वक्त ईरान में एक वर्ग इस्लामिक शासन के खिलाफ था और इसका पुरजोर विरोध किया जा रहा था ... ईरान चैंबर के मुताबिक खामेनेई के राष्ट्रपति बनने के बाद ऐसे सभी विरोधों पर सरकार ने कड़ी कार्रवाई शुरू कर दी .. हज़ारों विद्रोहियों को मौत की सजा दी गई ... हालांकि इसमें सबसे चर्चित रहा था जर्मनी के माइकोनोस रेस्टोरेंट में हुआ हत्याकांड .. 
जर्मनी की राजधानी बर्लिन के इस रेस्टोरेंट में 1992 में तीन ईरानी मूल के नेताओं और उनके ट्रांसलेटर की हत्या हुई थी ... जिसका मुकदमा जर्मनी की अदालत में चला.. अदालत ने 1997 में इसका फैसला देते हुए इसमें खामेनेई के शामिल होने की बात कही थी .. 
1989 के जून में ईरान के पहले सुप्रीम लीडर रहे रुहोल्लाह खोमैनी की मौत हो गई ... इसके बाद ईरान के असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स ने खामेनेई को ईरान का सुप्रीम लीडर बना दिया ... कहते हैं तब ईरान के संविधान के मुताबिक सर्वोच्च नेता बनने के लिए मरजा की उपाधि होना ज़रूरी था लेकिन खामेनेई के पास ये उपाधि नहीं थी लिहाजा संविधान में संशोधन कर दिया गया ... तब से लेकर अब तक अली खामेनेई ईरान के सर्वोच्च नेता के पद पर बने हुए हैं .. 
खामेनेई को ईरान का सर्वोच्च नेता बने हुए 30 साल हो चुके हैं ... खामेनेई को ईरान की इस्लामिक क्रांति के संरक्षण के लिए ही सुप्रीम लीडर चुना गया था ... जो पहले सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खोमैनी के विचारों को आगे बढ़ाता ... कहते हैं खामेनेई ने खोमैनी के एक ग्रुप के समानांतर दूसरे ग्रुप को ताकतवर बनाने की पॉलिसी को काफी अच्छे तरीके से आगे बढ़ाया है .... ईरान में खामेनेई की तरह ही मौलवी रहे और अब खामेनेई की बायोग्राफी लिख रहे मेहदी खालाजी ने एक बार कहा था कि  देश के आर्मी और इंटेलीजेंस एजेंसी समेत सभी बड़े संस्थानों में खामेनेई ने एक पैरेलल स्ट्रक्चर खड़ा कर रखा है जो खामेनेई के लिए काम करता है साथ ही आर्मी और इंटेलीजेंस एजेंसी को कभी भी बहुत ताकतवर नहीं होने देता ... 
आमतौर पर विनम्र और एक आम आदमी की तरह व्यवहार करने वाले खामेनेई के लिए ये भी कहा जाता है कि इन्होंने राष्ट्रपति की शक्तियां भी अपने पास रखी हुई हैं.. राजनैतिक विरोधी तो हैं ही नहीं .... इस तरह खामेनेई अब ईरान के तानाशाह बन चुके है ...
1997 से 2005  तक ईरान के राष्ट्रपति रहे मोहम्मद खातमी ने ईरान में कई तरह के रिफ़ॉर्म्स की शुरुआत की थी .. इससे ईरान की राजनैतिक और सामाजिक व्यवस्था में बदलाव आता लेकिन खामेनेई ने इस तरह के सारे प्रस्तावों पर रोक लगा दी थी ... मोहम्मद खातमी को उदारवादी माना जाता था जिसकी पश्चिमी देशों में भी अच्छी छवि थी ...कहते हैं कि खामेनेई की कट्टरपंथी ताकतों ने मोहम्मद खातमी की नीतियों को विफल करने में अहम भूमिका निभाई थी ... 
कहते हैं सिर्फ मोहम्मद खातमी ही नहीं बल्कि खामेनेई के कार्यकाल के दौरान ईरान में राष्ट्रपति रहे अकबर हाशमी रफसंजानी और महमूद अहमदीनेजाद को भी नीतियों के सवाल पर खामेनेई से विरोध का सामना करना पड़ा ... जबकि अहमदीनेजाद को आलोचक खामेनेई का शागिर्द कहते आए हैं .... और 2009 में अहमदीनेजाद के राष्ट्रपति पद पर दोबारा चुने जाने के पीछे खामेनेई के तंत्र का हाथ बताया गया था .. चुनाव में धांधली के आरोप लगे थे जिसकी वजह से  देश ने इस्लामिक क्रांति के बाद का सबसे हिंसक आंदोलन देखा था..सौ से ज्यादा लोग गिरफ्तार किए गए थे ... ईरान ने देश के साथ साथ विदेशी मीडिया के कवरेज पर भी आंशिक रोक लगा दी थी ... 
खामेनेई ने 2007 में सारे सरकारी बिजनेस कंपनियों का निजीकरण कर दिया था ...जिसमें बैंक, टेलीफोन कंपनियां यहां तक कि छोटी छोटी ऑयल कंपनियां भी शामिल थीं .... खामेनेई के तेजी से निजीकरण के ये फैसले भी ईरान की आर्थिक व्यवस्था को नहीं सुधार पाए ...इसका नतीजा था कि 2008 में ईरान की आर्थिक हालत खस्ता हो गई ... हालात खाने पीने की चीजों की कमी तक पहुंच गए थे .. यूएन ने स्टेट ऑफ इमरजेंसी डिक्लेयर कर दी थी लेकिन खामेनेई को कोई फर्क नहीं पड़ा था ...खामेनेई ने सरकारी अधिकारियों को आर्थिक दिक्कतों पर ध्यान नहीं देने की हिदायत देते हुए कहा था कि I advise you to keep in your mind that this great nation is never afraid of economic sanctions" ... हालांकि ईरान की जनता त्रस्त हो चुकी थी और आने वाले वक्त में खामेनेई जनता के विरोध का सामना करने वाले थे 
एक सुप्रीम नेता के तौर पर खामेनेई ही ईरान की विदेश नीति तय करते हैं …  कई बार खामेनेई की विदेश नीतियों पर सवाल खड़े होते रहे हैं .. ह्यूमन राइट्स की बात  करने वाली संस्थाओं ने भी खामेनेई की आलोचना की है ... 
खामेनेई एक तरफ बांग्लादेश में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ होने वाली कार्रवाई की आलोचना करते हैं और आंग सान सू की को ब्रूटल वुमन कहते हैं लेकिन दूसरी तरफ चीन में उईगर मुसलमानों की दुर्दशा पर चुप्पी साधे रहते हैं ... 
खामेनेई पर अपने विरोधियों को दबाने के आरोप भी लगते रहे हैं ... एक रिपोर्ट के मुताबिक humble नज़र आने वाले खामेनेई ने दुनिया भर में 160 से ज्यादा विरोधियों की हत्या कराई है ... देश में इस्लामिक गणतंत्र का विरोध करने वाले हज़ारों लोगों को मौत की सज़ा दी है ... 
एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक ईरान में फ्रीडम ऑफ स्पीच और फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन नहीं है ... विरोध करने वाले प्रदर्शनकारियों से सख्ती से निपटा जाता है .. विरोध में आवाज उठाने वालों की हत्या तक कर दी जाती है ... महिलाओं को समान अधिकार नहीं मिले हुए हैं और अल्पसंख्यकों के साथ अक्सर बुरा व्यवहार किया जाता है ... 
पत्रकारों के साथ भी बुरा व्यवहार किया जाता है ... सरकार के भ्रष्टाचार को उजागर करने  या विरोध प्रदर्शन के कवरेज करने को गुनाह माना जाता है ... व्यवस्था पर सवाल उठाने वालों को सुप्रीम लीडर का अपमान करने वाले के तौर पर देखा जाता है .... 
देश में स्वतंत्र चुनाव पर हमेशा सवाल खड़े होते हैं ... उम्मीदवारों का चुनाव ईरान की गार्डियन काउंसिल करती है ... जो उम्मीदवार इस्लामिक गणतंत्र की नीतियों का समर्थन नहीं करते हैं उन्हें रिजेक्ट कर दिया जाता है ... उदारवादियों और कट्टरपंथियों के बीच हमेशा जीत कट्टरपंथियों की ही होती है ... ऐसे में चुनाव बेमानी साबित होते हैं .. 
ईरान पर लंबे वक्त से आर्थिक प्रतिबंध लगे हुए हैं .. और खामेनेई की तरफ से इसे खत्म करने की कोई सार्थक पहल भी नहीं होती लिहाजा देश की अर्थव्यवस्था गर्त में जा चुकी है .. महंगाई और बेरोजगारी की वजह से गरीबी चरम पर पहुंच चुकी है ... 2018 में ईरान में एक डॉलर के मुकाबले ईरानी करेंसी रियाल की कीमत 1 लाख डॉलर तक पहुंच गई थी ... 
लिहाजा रह रह कर ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शन होते रहते हैं ... 2017 के दिसंबर में तेहरान यूनिवर्सिटी में हुए प्रदर्शन में अली खामेनेई को सत्ता छोड़ने को कहा गया था .. सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों की संख्या हर दिन बढ़ती जा रही है ...2018 में देश में महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन हुए ... 2019 में ईरान में तेल की कीमतें 300 फीसदी बढ़ गईं... प्रदर्शन में 200 से ज्यादा लोग मारे गए और 7 हज़ार से ज्यादा लोग गिरफ्तार कर लिए गए ...ईरान की तरफ से यूक्रेन का प्लेन गिराए जाने की खबरें कंफर्म होने के बाद फिर देश में हिंसक विरोध प्रदर्शन होने लगे ... पिछले एक साल में 1500 से ज्यादा लोग इसकी वजह से मारे जा चुके हैं ... विरोध प्रदर्शन को दबाने के लिए सरकार हर मुमकिन कोशिश करती है ... वहीं मरने वालों की संख्या को लेकर अलग अलग रिपोर्ट्स आती रही हैं ... 
ये विरोध प्रदर्शन चाहे किसी भी घटना से ट्रिगर होते हों इनमें खामेनेई को हटाने और इस्लामिक गणतंत्र के खात्मे का शोर भी सुनाई देता है ... लगातार प्रदर्शन के बीच खामेनेई इसे पश्चिमी देशों की साजिश करार देते हैं ...और देश की गंभीर आर्थिक समस्या को एक बीमारी कहते हैं जो वक्त आने पर खुद ठीक हो जाएगी ...

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

ethopia

सत्तर, अस्सी और नब्बे के दशक में दुनिया ने कई तानाशाह देखे हैं ... खासकर लैटिन अमेरिकी, अफ्रीकी और मिडिल ईस्ट के देशों में  ऐसी शख्सियतों ने सत्ता संभाली जिन्होंने लगभग एक जैसी नीतियां बनाईं ... लगभग एक जैसे नारे दिए और इन सभी देशों का हाल लगभग एक जैसा ही हुआ ... ज्यादातर देशों की अर्थव्यवस्था खोखली हो गई और आम लोगों का जीवन तहस नहस हो गया….. 
ऐसा ही एक नाम था मेनगिस्तु हाइले मरियम का ... इथियोपिया फर्स्ट जैसे नारों के साथ सत्ता संभालने वाले मेनगिस्तो ना सिर्फ इथियोपिया बल्कि पूरे अफ्रीका के इतिहास में सबसे क्रूर शासकों में एक साबित हुआ ... इथियोपिया के लिए ये एक ऐसा शासक साबित हुआ जिस पर नरसंहार के आरोप में मुकदमा चला ... और सज़ा-ए-मौत का फरमान सुनाया गया .... मेनगिस्तु हाइले मरियम का नाम भले ही आज आम लोग नहीं जानते हों लेकिन इथियोपिया में लोग इसे कभी नहीं भुला पाएंगे ..
1937 में जन्मा मेनगिस्तु हाइले मरियम ने बहुत कम उम्र में अपनी मां को खो दिया था .. जिसके बाद अपने दो भाई बहनों के मेनगिस्तु का बचपन अपनी नानी के साथ बीता .. मेनगिस्तु के पिता आर्मी में थे और बहुत कम उम्र में मेनगिस्तु ने भी आर्मी ज्वाइन कर ली थी... जहां जनरल अमन एन्डम की नजर में आने के बाद मेनगिस्तु सार्जेन्ट बना दिया गया ... मेनगिस्तु ने इथियोपिया के दो सबसे अच्छे मिलिट्री स्कूलों में शुमार होलेता मिलिट्री से ग्रेजुएशन किया था ... सेना में अपने करियर की शुरुआत में जनरल अमन एन्डम के तौर पर मेनगिस्तु को गॉडफादर मिल गया था ... 1964 में मेनगिस्तु को अमेरिका के इलियोनाइस स्टेट भेज दिया गया जहाँ से उसने मिलिट्री की एडवांस ट्रेनिंग ली थी ..इसके बाद 1970 तक मेनगिस्तु कई बार ट्रेनिंग के लिए अमेरिका आता जाता रहा ... कहते हैं इस दौरान मेनगिस्तु हाइल मरियम को नस्लीय भेदभाव का शिकार होना पड़ा था .. इसी भेदभाव की वजह से उसकी मानसिकता अमेरिका के खिलाफ होती जा रही थी ... मेनगिस्तु पर इसका असर हुआ था कि उसने इसे इथियोपिया में अमीर गरीब के भेदभाव से भी जोड़ा .. कहते हैं सत्ता संभालते ही उसने ये बात साफ कर दी थी कि इथियोपिया के कुलीन वर्ग के लोग काली रंगत और मोटे होंठ वाले लोगों को अपना दास समझते हैं... ऐसे लोगों को बहुत जल्द सबक सिखाया जाएगा ... 
मेनगिस्तु एक तरफ आर्मी में पावरफुल होता जा रहा था दूसरी तरफ देश में राजशाही के खिलाफ माहौल बनता जा रहा था .. इथियोपिया में सूखा पड़ा था .... अनाज की कमी हो गई थी .. भुखमरी बढ़ती जा रही थी... बादशाह हेली सेलसई की सरकार से जनता का भरोसा टूट चुका था ... इथियोपिया में एक क्रांति का माहौल तैयार हो चुका था ...  उस वक्त कोई नहीं जानता था कि आने वाले वक्त मे क्या होने वाला है .,.. 
1974 में इथियोपिया में हुए तख्तापलट में में बादशाह हेली सेलसई को सत्ता से उखाड़ फेंका गया ... और देश में अतनाफु अबाते नाम के एक सैनिक की अगुआई में सेना की सरकार बन गई ... इथियोपिया की सेना को डर्ग कहा जाता था ... 1975 में मेनगिस्तु अतनाफु अबाते की तरह सेना यानि डर्ग का डिप्टी चेयरमैन बन गया था हालांकि सेना में जनरल रैंक के कई लोग मेनगिस्तु को परेशानी खड़ा करने वाले सैनिक के तौर पर जानते थे... जो अनुशासन में रहना पसंद नहीं करता था ... 1975 में इथियोपिया के सम्राट रहे हेली सेलसई की हत्या कर दी गई ... कहा जाता है कि मेनगिस्तु ने ही तकिए से उनका दम घोंटकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया था ... 
मेनगिस्तु पर सम्राट रहे हेली सेलसई की हत्या के आरोप लगत रहे लेकिन मेनगिस्तु ने कभी भी इस अपराध को confess नहीं किया... उस वक्त इथियोपिया में कई तरह के समूह बने हुए थे ... सब अपने अपने स्तर पर सम्राट हेली सेलसई के खिलाफ काम करते रहे थे लेकिन सत्ता डर्ग यानि मिलिट्री के हाथ में आ गई थी ... डर्ग को सोवियत संघ का समर्थन मिला हुआ था लिहाजा इथियोपिया की सत्ता पर अब कम्युनिस्ट काबिज हो चुके थे .. डर्ग के सत्ता में आते ही मेनगिस्तु ने विरोधियों के खिलाफ काम करना शुरू किया ... कहते हैं 1974 में मेनगिस्तु ने सम्राट के शासनकाल में अधिकारी रहे 61 लोगों की हत्या करा दी थी ...इतना ही नहीं आने वाले सालों में मेनगिस्तु ने डर्ग के सहारे कई अधिकारियों और विरोधियों के मौत के घाट उतरवाया .... डर्ग के सैनिकों ने बाद में इस नरसंहार का खुलासा करते वक्त कहा था कि मेनगिस्तु हाइले मरियम ने पूरी प्लानिंग के साथ ये हत्याएं कराईं थीं . हालांकि मेनगिस्तु ने कभी भी ये कबूल नहीं किया.. 
मेनगिस्तु अभी तक डर्ग में नंबर 2 की तरह काम कर रहा था लेकिन इथियोपिया में सिविल वॉर जैसे हालात थे ... एक तरफ थी इथियोपिया की नई बनी मिलिट्री जनता कम्युनिस्ट गवर्नमेंट तो दूसरी तरफ थे सरकार विरोधी विद्रोही ... 1977 में ब्रिगेडियर रहे तफारी बंती की हत्या हो गई थी .. इस हत्या के बाद में डर्ग में आपस में संघर्ष हुआ ... एक तरफ था मेनगिस्तु तो दूसरी तरफ था अब तक उसका करीबी अनताफु अबाते ... ये दोनों ही डिप्टी चेयरमैन रहे थे ... इस लड़ाई में मेनगिस्तु जीत गया जिसका नतीजा ये हुआ कि अनताफु अबाते और उसके वफादार रहे 40 लोगों की हत्या करा दी गई ... अब इथियोपिया की मिलिट्री डर्ग का सबसे पावरफुल शख्स बन गया मेनगिस्तु हाइले मरियम ... इसके बाद इथियोपिया में रेड टेरर का जन्म हुआ ... 
सिविल वॉर से जूझ रहे इथियोपिया में एरित्रिया विद्रोहियों से मेनगिस्तु को सबसे ज्यादा खतरा था... मेनगिस्तु ने डर्ग की मदद से के शिबिर (Qey Shibir)  यानि रेड टेरर अभियान की शुरुआत की ... इसका एक ही मकसद था विद्रोह करने वालों को हर मुमकिन तरीके से खत्म कर देना ...ये भीषण लड़ाई मेनगिस्तु के देश छोड़कर भागने से पहले खत्म नहीं होने वाली थी 
इथियोपिया से मोनार्की खत्म करने और लोकतंत्र की स्थापना करने जैसे इरादों के साथ 1972 में इथियोपियन पीपल्स रिवॉल्यूशनरी पार्टी का गठन किया गया था ..... सम्राट हेली सेलसई को सत्ता से हटाने में इस पार्टी की अहम भूमिका रही थी लेकिन सत्ता पर काबिज होने का इपीआरपी (EPRP) का सपना पूरा नहीं हो पाया था ....  देश की सरकार मेनगिस्तु की अगुआई में डर्ग चला रही थी ... EPRP ने देश के ग्रामीण इलाकों में गुरिल्ला वॉर के जरिए सरकार का विरोध जारी रखा ... इस पर काबू पाने के लिए मेनगिस्तु ने रेड टेरर अभियान की शुरुआत की.... मेनगिस्तु को समाजवादी विचारधारा से जुड़े ऑल इथियोपिया सोशलिस्ट मूवमेंट का सपोर्ट हासिल हो गया था ... 1976 आते आते देश में सिविल वॉर चरम पर था.. मेनगिस्तु और उसके समर्थकों को खत्म करने के लिए EPRP ने अहम लोगों, इमारतों को निशाना बनाना शुरू कर दिया ... इसे व्हाइट टेरर का नाम दिया गया .. खिसियाए मेनगिस्तु ने एक पब्लिक स्पीच दी जिसमें उसने सबके सामने चिल्ला कर कहा .... Death to counterrevolutionaries! Death to the EPRP! य़ानि क्रांति के विरोध में अभियान चलाने वाले लोगों को मौत दो ... EPRP को मौत दो ... कहते हैं इसके साथ ही मेनगिस्तु ने एक के बाद एक तीन बोतलें ज़मीन पर पटक कर तोड़ दी थीं जिसमें लाल रंग भरा हुआ था .. इसके बाद अगले दो साल में इथियोपिया की सड़कों पर लाशें मिलती रहीं जो उसके विरोधियों की थीं ... 
कहते हैं इन हत्याओं के पीछे वार्ड लेवल पर प्रशासन चलाने वाले मेनगिस्तु के लोग थे ... इन्होंने ना सिर्फ हज़ारों लोगों को मौत के घाट उतारा बल्कि इनका शव देने के लिए परिजनों से टैक्स भी वसूला जिसे नाम दिया गया था दी वेस्टेड बुलेट (the wasted bullet) .. 1977 में स्वीडन की सेव दी चिल्ड्रेन संस्था के मुताबिक इथियोपिया में उस दौरान 1000 से ज्यादा बच्चे भी मारे गए थे जिनके शवों को राजधानी अदीस अबाबा की सड़कों पर फेंक दिया गया था .. एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक इथियोपिया में मेनगिस्तु के चलाए रेड टेरर अभियान में 2 साल के अंदर 50 हज़ार से ज्यादा लोगों की हत्या कर दी गई थी .. 
70 के दशक में मार्क्सवाद और लेनिनवाद काफी लोकप्रिय हो चुका था ... ज्यादातर देशों में राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी पार्टियां इनकी नीतियों के मुताबिक काम कर रही थी .. इथियोपिया में इसकी शुरुआत मेनगिस्तु हाइले मरियम ने की थी ... सत्ता में आते ही उसने लैंड रिफॉर्म शुरू कर दिया ... ग्रामीण इलाकों की जमीनों पर भी सरकारी कब्जा हो गया ... देश विदेश की सारी कंपनियों पर भी सरकारी नियंत्रण हो गया .... यहां तक कि सरकार ने निजी व्यवसाय, बैंक, इंश्योरेंस कंपनियों, रीटेल बिजनेस पर भी सरकार ने कब्जा कर लिया ... सरकार ने ये सारी संपत्ति ब्यूरोक्रेसी के नियंत्रण में दे दी.. एग्रीकल्चर प्रॉडक्ट भी अब फ्री मार्केट का हिस्सा नहीं रह गए थे ...इनकी खरीद बिक्री का जिम्मा ने सरकार ने अपने नियंत्रण में कर लिया था .. 
सिविल वॉर, अनियंत्रित आर्थिक नीतियों ने 1983 में इथियोपिया में अकाल को जन्म दिया ... ये अकाल इस सदी का सबसे भीषण अकाल साबित हुआ ... लोग भूखों मरने लगे ... दो वक्त के खाने के लिए जंग छिड़ गई ... नतीजा ये हुआ 1985 तक इस अकाल ने लगभग 12 लाख लोगों की जान ले ली... चार लाख लोगों ने देश छोड़ दिया .. करीब 25 लाख लोग अपने ही देश में बेघर हो गए और करीब 2 लाख बच्चे अनाथ हो गए ... 
1984 में मेनगिस्तु की अगुआई में डर्ग ने वर्कर्स पार्टी ऑफ इथियोपिया बनाई थी ... जिसके जरिए अब वो देश में सरकार चलाने वाला था ... मेनगिस्तु इसका जनरल सेक्रेट्री बन गया... 1985 में इसने देश में सोवियत से प्रभावित नया संविधान लागू कर दिया और पार्टी का नाम बदलकर पीपुल्स डेमोक्रैटिक रिपब्लिक ऑफ इथियोपिया रखा .. मेनगिस्तु पार्टी प्रेसीडेंट बन चुका था और कहने को देश में लोकतांत्रिक सरकार थी ... लेकिन मेनगिस्तु की तानाशाही का बहुत जल्द अंत होने वाला था 
मेनगिस्तु को सोवियत का समर्थन मिला हुआ था .. उसने 1977 से 1984 के बीच 7 बार सोवियत संघ की यात्रा की थी ... वो क्यूबा के तानाशाह फिदेल कास्त्रो और जिम्बाब्वे के तानाशाह रॉबर्ट मुगाबे से बहुत प्रभावित था ... डेमोक्रैटिक सरकार के गठन के बावजूद उसने कार्यपालिका और विधायिका की तमाम शक्तियां अपने पास रखी थीं लेकिन ये ज्यादा दिन तक नहीं चलने वाला था 
1989 में एरित्रियन वॉर ऑफ इनडिपेंडेंस शुरू हो गया... इस युद्ध में मेनगिस्तु की सेना हार गई .. 15 हज़ार लोग मारे गए ... एक साल बाद एक और युद्ध हुआ इसमें मेनगिस्तु को हार मिली .. आंतरिक तौर पर मेनगिस्तु काफी कमजोर हो चुका था 1989 में इथियोपिया में तख्तापलट की असफल कोशिश हुई ..... आखिरकार दो साल बाद Ethiopian People’s revolutionary Front ने  मेनगिस्तु को देश छोड़कर भागने पर मजबूर कर दिया ... इथियोपिया फर्स्ट का नारा देकर देश में तख्तापलट के जरिए सत्ता में आए मेनगिस्तु हाइले मरियम को तख्तापलट के जरिए देशनिकाला मिल गया .. जिम्बाब्वे ने मेनगिस्तु को शरण दे दी ... जहां उसे मारने की असफल कोशिश भी हुई ... इथियोपिया की नई सरकार ने मेनगिस्तु को नरसंहार का दोषी माना.. उसपर मुकदमा भी चलाया गया .. 2006 में उसे दोषी मानते हुए इथियोपिया की अदालत ने मौत की सज़ा सुनाई लेकिन जिम्बाब्वे से प्रत्यर्पण नहीं होने की वजह से बूढा हो चुका मेनगिस्तो हाइले मरियम अभी भी ज़िंदा है ..

सोमवार, 27 जुलाई 2020

china

पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ने माओ जेंदोग के विनाशकारी राज के बाद नीतियों में बदलाव किए थे ताकि कोई भी इतने लंबे समय तक सत्ता पर निरंकुश शासन ना कर सके ... लेकिन जब शी जिनपिंग चीन के संविधान में बदलाव कर खुद को आजीवन राष्ट्रपति बना लिया तो ये सवाल उठने लगे कि चीन तानाशाही की तरफ बढ गया है ... और शी जिनपिंग आधुनिक दुनिया के तानाशाहों में शुमार हो गए हैं ... चीन की खोखली आंतरिक व्यवस्था भी इसी की गवाही देती है ... 
चीन के मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग दुनिया के सबसे ताकतवर लोगों में से एक हैं ...माओ जेदोंग के बाद चीन में अब तक के सभी नेताओं में शी जिनपिंग दूसरे सबसे ताकतवर नेता माने जाते हैं... ऐसा कम लोगों को पता होगा कि शी जिनपिंग के पिता शी जॉन्गशुन एक क्रांतिकारी थे और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना के बाद उन्होंने माओ जेदोंग की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना में कई अहम पदों पर काम किया था ... 
1953 में जन्मे शी जिनपिंग के लिए बचपन आरामदेह था....10 साल की उम्र तक शी जिनपिंग ने बीजिंग में अच्छे स्कूलों में पढ़ाई की थी और यहीं पर ल्यू हे से शी जिनपिंग की दोस्ती हुई थी जो अब तक बरकरार है .. ल्यू हे चीन के अर्थशास्त्री हैं और वर्तमान में पोलित ब्यूरो के सदस्य हैं.. 1960 में चीन में हुए राजनीतिक उथल- पुथल का शी जिनपिंग के परिवार पर खासा असर पड़ा था ... माओ जेदोंग की विफल रही नीतियों की वजह से चीन की हालत बुरी हो चुकी थी .. पार्टी पर जेदोंग की पकड़ कमजोर हो गई थी .. लिहाजा अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने और देश को एक बार फिर कब्जे में करने के लिए माओ जेदोंग ने कल्चरल रिवॉल्यूशन की शुरुआत कर दी .. शी जिनपिंग के पिता शी जॉन्गशुन भी माओ जेंदोंग के पॉलिटिकल पर्ज (Political Purge) का शिकार हो गए ... लिहाजा 1963 आते आते शी जिनपिंग के पूरे परिवार को बीजिंग छोड़कर सुदूर गाँवों में जाकर छिपना पड़ा .. जहां पूरा परिवार गुफा में रहा करता था .. 
चीन में सांस्कृतिक क्रांति 1966  से लेकर 1976 तक चली थी ...क्रांति के नाम पर बुद्धिजीवियों पर कहर ढाया जा रहा था ... विरोध करने वाले मौत के घाट उतारे जा रहे थे ... पुरानी संस्कृति, पुरानी विचारधारा, पुराने रीति रिवाज और पुरानी परंपराओं को खत्म करने  के चेयरमैन माओ की सनक को पूरा करने में उसके रेड गार्ड्स लगे हुए थे ... इनकी कारस्तानियों से गुफा में छुपकर रह रहा शी जिनपिंग का परिवार भी बच नहीं पाया ... मां पर जिनपिंग के पिता को क्रांति विरोधी होने का दबाब डाला गया.. बाद में इसी आरोप में पिता को जेल में डाल दिया गया ... बड़ी बहन ने खुदकुशी कर ली और शी जिनपिंग को 15 साल की उम्र में दूर के किसी गाँव में काम करने को भेज दिया गया ... 
शी जिनपिंग इस दौरान लगातार कम्युनिस्ट यूथ लीग ऑफ चाइना से जुड़ना चाहता था ...कहते हैं 7 बार इसमें फेल रहने के बाद आखिरकार 1971 में किसी तरह शी जिनपिंग इसमें कामयाब हो गया और 1974 आते आते शी जिनपिंग देश की सत्तारूढ पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना का सदस्य बनने में भी कामयाबी हासिल की... कहते हैं शीन जिनपिंग ने 1973 से लेकर 1974 के बीच कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना से जुड़ने के लिए 10 बार एप्लीकेशन दी थी .. ये वही वक्त था जब चीन में माओ जेदोंग की सास्कृतिक क्रांति खत्म होने के कगार पर थी और माओ जेदोंग का भी अंत नजदीक आ चुका था... 
शी जिनपिंग ने 1975  से लेकर 1979 तक शिन्हुआ युनिवर्सिटी में केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी लेकिन कहते हैं इसी दौरान शी जिनपिंग मार्क्सवाद, लेनिनवाद और माओवाद की पढ़ाई भी करता रहा .. शी जिनपिंग के ये साल आगे चलकर चीन की राजनैतिक दिशा तय करने वाले थे  
शी जिनपिंग ने पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत चीन के सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के जेनरल सेक्रेटरी रहे गेंग ब्याओ के सेक्रेटरी के तौर पर की ... यहीं से शी जिनपिंग को मिलिट्री के बारे में पता चला ... शी जिनपिंग ने एक डेलीगेट के तौर अमेरिका में भी कुछ दिन बिताए ..जहां शी जिनपिंग एलेनोर ड्वोरचाक के घर में कुछ दिन रहे थे.... इन दोनों ही बातों ने शी जिनपिंग के व्यक्तित्व पर असर डाला ... 
1998 से लेकर 2002 तक शी जिनपिंग ने मार्क्सिस्ट (Marxist Theory) की भी पढ़ाई की ... इस दौरान शी जिनपिंग फुजियान के गवर्नर बना दिए गए ..  2002 में शी जिनपिंग फुजियान से निकलकर झेझियांग (Zhejiang) पहुंच गए जहां आने वाले 5 साल तक उन्होंने पार्टी चीफ के तौर पर काम किया .. इस दौरान शी जिनपिंग की इमेज एक इमानदार नेता की बनी .... 2008 में शी जिनपिंग को वाइस प्रेसीडेंट बना दिया गया था ... अगले चार साल में शी जिनपिंग ने दुनिया भर का दौरा कर राष्ट्रपति बनने की रिहर्सल कर ली... 2009 में शी जिनपिंग ने मेक्सिको में एक कार्यक्रम में अपनी सोच की एक झलक दी थी जिसमें उन्होंने कहा था  ‘दुनिया की कुछ बेहतर अर्थव्यवस्था वाले देशों के लोगों के पास हमारी नीतियों पर सवाल उठाने के अलावा कोई काम नहीं है ... चीन कभी क्रांति, गरीबी और भुखमरी का निर्यात नहीं करता .. कभी आपके लिए मुश्किलें खड़ी नहीं करता आप क्यों चीन की आलोचना करते रहते हो ...’
2012 में शी जिनपिंग चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेता बने..... हू जिंताओ के उत्तराधिकारी के रूप में नवंबर 2012 में उन्हें चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव बनाया गया... वो कम्युनिस्ट पार्टी के तमाम खेमों के आम सहमति से चुने गए नेता थे.... लेकिन किसी को भी ये अंदाज़ा नहीं था कि अगले पांच सालों में वो कैसे नेता बनकर उभरने वाले हैं.... मार्च 2013 में शी जिनपिंग ने चीन का राष्ट्रपति पद संभाला.....  इसके पहले पार्टी प्रमुख का पद स्वीकार करने के बाद अपने भाषण में शी ने कहा था, ‘‘पार्टी के पास कई बड़ी चुनौतियां हैं और ऐसी कई परेशानियां हैं पार्टी के भीतर जिन्हें सुलझाना होगा, खास तौर से भ्रष्टाचार, लोगों से अलग होना और नौकरशाही, जिसे कुछ पार्टी अधिकारियों की वजह से बढ़ावा मिला है.’’
इसके बाद से शी जिनपिंग ने अपने इन्हीं कथनों पर काम किया.... सत्ता संभालते ही शी जिनपिंग ने भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करना शुरू किया.. कई ऊंचे पदों पर काम करने वाले अधिकारियों और स्थानीय कर्मचारियों पर शिकंजा कसा गया .... कहते हैं इसका मकसद अपने सारे राजनीतिक विरोधियों का सफाया था ...इसमें चाऊ योंगकांग भी शामिल थे जो कभी चीन के अर्धसैनिक बलों, जेलों और खुफिया ऑपरेशन के अगुआ हुआ करते थे..... हालांकि चाऊ के हिमायती कहते हैं कि पार्टी में शी जिनपिंग के विरोधी रहे चाऊ को बड़ी ही सफाई से निपटा दिया गया ... 
कहते हैं भ्रष्टाचार पर रोक के नाम पर पार्टी के हर नेता के दफ्तर के साइज़ से लेकर नेताओं के लंच या डिनर में इस्तेमाल होने वाले बर्तनों की संख्या को लेकर भी शी जिनपिंग ने नियम बना दिए.... लेकिन इस दौरान शी जिनपिंग के कई रिश्तेदार अमीर होते चले गए ... हालांकि ये किसी तरह साबित नहीं किया जा सका कि इसमें शी जिनपिंग की कोई भूमिका रही.. 
शी जिनपिंग जब बड़े हो रहे थे तो चीन विनाशकारी आंदोलन के दौर से गुजर रहा था ... माओ के उस सांस्कृतिक क्रांति की मार शी जिनपिंग के पूरे परिवार पर पड़ी थी ... शायद इसीलिए जिनपिंग किसी आंदोलन को पसंद नहीं करते ... लेकिन इसी बात ने शी जिनपिंग को माओ जेदोंग से ज्यादा खतरनाक बना दिया है ... 
कहते हैं कि चीन में आज भी माओ और उसकी क्रांति के खिलाफ आवाज़ उठाना गुनाह है .. माओ की नीतियों की वजह से करोड़ो लोग मारे गए लेकिन शी जिनपिंग की सत्ता इसके खिलाफ बोलने वालों को सबक सिखाती है .. शी जिनपिंग खुद को माओ का वारिस समझते हैं .. शी के तानाशाही रवैयों का निशाना उनके अपने करीबी भी होते हैं ... कहते हैं रिसर्च स्कॉलर शू झियोंग को सिर्फ इसीलिए देशद्रोह के आरोप में जेल में डाल दिया गया क्योंकि उसने बेघर और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए लोगों के हितों की वकालत शुरू कर दी थी... जेल से कुछ साल शू रिहा हो गया था लेकिन तब से अभी तक उसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली .. 
कई बार तो ऐसे लोगों को सज़ा सुनाने से पहले मुकदमों का टीवी पर सीधा प्रसारण किया गया ... लोगों ने अपनी ग़लतियां पूरे देश के सामने मानीं....  शी जिनपिंग के राज में कई नेता और कारोबारियों के लापता होने की खबरें आती रही हैं । मुसलमान, ईसाई, मज़दूर कार्यकर्ता, ब्लॉगर, पत्रकार वक़ीलों की गिरफ्तारी होती रही है । 
शी जिनपिंग अक्सर अपने देश के लोगों को ..नेशन फर्स्ट की थ्योरी समझाते नज़र आते हैं .,... उन्हें सलाह देते हैं कि वो देश से प्यार करें.... चीन की संस्कृति और जीवन मूल्यों को जानें-समझें....
चीन में इंटरनेट के इस्तेमाल पर भी काफी पाबंदी है... कहते हैं कि शी जिनपिंग ने अरब देशों में चल रही क्रांति के वक्त ही चीन की सत्ता संभाली थी ऐसे में इंटरनेट के जरिए ऐसी किसी भी क्रांति के पैदा हो जाने से जिनपिंग डरते हैं ... 
बराक ओबामा और शी जिनपिंग की तस्वीर के सामने आने और उस पर हुए कमेंट्स के बाद से चीन में इंटरनेट के इस्तेमाल पर पाबंदियां और कड़ी कर दी गई हैं ... इस तस्वीर में जिनपिंग और ओबामा की चहलक़दमी की तुलना, कार्टून कैरेक्टर विनी द पू से की गई थी... चीन में 75 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं....  ये तादाद यूरोप और अमरीका में मिलकर इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों से ज़्यादा है.... लेकिन जिनपिंग इस पर काबू रखना चाहते हैं वो भी तब शी जिनपिंग का सपना चीन को साइबर सुपरपावर बनाने का है ... 
इंटरनेट की सुविधा देने वाले और सोशल मीडिया साइट पर सख्ती से सेंसर लागू किया जाता है..... कोई भी फर्जी खाता बनाकर चीन में सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं कर सकता.... साइबर सुरक्षा को शी जिनपिंग देश की सुरक्षा का मुद्दा बना चुके हैं ... इसीलिए इस पर बड़े पैमाने पर सरकारी निवेश भी किया जा रहा है ... 
चीन में नागरिकों को वफादार बनाने की मुहिम चलाई जा रही है ... इसीलिए यूनिवर्सिटी में कम्यूनिस्ट पार्टी की पहुंच बढ़ाई जा रही है....  क़िताबों में से पश्चिमी सभ्यता के निशान मिटाए जा रहे हैं... निजी कंपनियों में भी कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता की शाखाएं खोली जा रही हैं... 
मीडिया पर चीन की पाबंदी जगजाहिर है ... चीन के बारे में जानकारी सिर्फ सरकारी न्यूज एजेंसी सिन्हुआ देती है ... यहां प्रेस की आज़ादी...आम लोगों के अधिकारों .. और स्वतंत्र अदालतों की बात करने की मनाही है ... आंतरिक विरोधों की खबरें दबा दी जाती हैं... राष्ट्रपति के फैसले लेने की प्रक्रिया को अपने हाथ तक सीमित कर चुके हैं....  देश का हर फैसला वही होता है जो शी जिनपिंग चाहते हैं... .शायद इसीलिए ब्रिटेन की इकोनॉमिस्ट पत्रिका ने एक बार शी जिनपिंग को "चैयरमैन ऑफ एवरीथिंग" कहा था .. 
चीन में ह्यूमन राइट्स को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं ... ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक चीन ने ऐसी नीतियां बनाई हैं जिसमें लोगों की आलोचना को दबाने के लिए आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है ...जिनमें चीन के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र शिनचियांग में उइगुर मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों ने चीन में मानवाधिकारों पर और गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं .. ह्यूमन राइट्स वॉच ने 2020 में जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के तहत चीनी सरकार घरेलू मानवाधिकार सक्रियता को "अस्तित्ववादी खतरे" के रूप में देखती है.. 
शी जिनपिंग को विरासत  में एक ताकतवर चीन मिला है ..शी जिनपिंग ने इसका मुजाहिरा करने में कोई कसर भी नहीं छोड़ी है लेकिन चमक दमक के पीछे कई आर्थिक दिक्कतें भी हैं .. चीन की विकास की रफ्तार धीमी हो रही है ... अब तक अपने जोर जुल्म पर शी जिनपिंग आर्थिक तरक्की का मुलम्मा चढ़ाते आए हैं लेकिन आने वाली राह बहुत कठिन साबित होने वाली है .. वो भी तब, जब दुनिया के तमाम देश चीन की नीतियों पर शक की निगाह से देख रहे हैं ...