सोमवार, 15 अक्तूबर 2018

गठजोड़ सियासत और बिखरता लोकतंत्र !

राजभर की सार्वजनिक तौर पर बयानबाज़ी के चलते एक बार फिर एकल दलीय सरकार बनाम बहुदलीय सरकार पर बहस शुरु हो गई है। भारतीय संविधान में सामूहिक दायित्व की व्यवस्था है और सरकार में शामिल हर मंत्री को संविधान के अनुरूप अपने सामूहिक दायित्वों का निर्वहन करना पड़ता है । यूपी में सरकार बनने के दिन से लेकर अब तक ओमप्रकाश राजभर लगातार सरकारी फैसलों का विरोध करते रहे हैं और अपनी सरकार के मंत्रियों, प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ धरना प्रदर्शन करते रहे हैं।

एकल दलीय बनाम गठबंधन की सरकारों को लेकर पूरी दुनिया में डिबेट होती रही है। गठबंधन की राजनीति के पैरोकारों का ये दावा रहा है कि गठबंधन की सरकारें जनता के प्रति ज्यादा जवाबदेह रहती हैं और उनकी नीतियों और कार्यक्रमों में जनता का हित सर्वोपरि रहता है। सरकारों की निरंकुशता पर गठबंधन की सरकारों के जरिए अंकुश लगाना ज्यादा आसान रहता है। वहीं दूसरी तरफ सिंगल पार्टी सरकार का समर्थन करने वालों का मानना है कि जनता के पक्ष में त्वरित और असरकार फैसले सिंगल पार्टी सरकार में आसानी से लिए जा सकते हैं। सिंगल पार्टी सरकारों में प्रेशर पॉलिटिक्स, ब्लैकमेलिंग, बारगेनिंग की गुंजाइश कम रहती है जबकि इसके ठीक विपरीत गठबंधन में शामिल राजनीतिक दल क्षेत्रियता, जातीयता, सांप्रदायिकता और अपने वोटबैंक को ध्यान में रखकर सरकार पर दबाव बनाते रहते हैं। सरकार में शामिल बड़े घटक दलों से बारगेन करते रहते हैं।

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यदि हम भारत के राजनीतिक और संसदीय इतिहास पर नज़र डालें तो राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की राजनीति की शुरुआत  वीपी सिंह के वक्त हुई। लेकिन इसका अनुभव बहुत खराब रहा। तत्कालीन पीएम वीपी सिंह ने सत्ता में बने रहने के मकसद से और बीजेपी द्वारा एल के अडवाणी की अगुवाई में चलाए जा रहे राम मंदिर आंदोलन को निष्प्रभावी बनाने के लिए मंडल कमीशन की अरसे से लंबित सिफारिशों को लागू कर दिया था। वी पी सिंह के जल्दबाज़ी में लिए गए इस फैसले के चलते देश का सामाजिक सद्भाव बुरी तरह से छिन्न-भिन्न हो गया। इस सामाजिक सद्भाव की खाई को पाटने में लंबा वक्त लग गया।

 

राजीव गांधी की हत्या के बाद पी वी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में गठबंधन की सरकार बनी निजी तौर पर भले ही नरसिम्हा राव देश में नई अर्थव्यवस्था के पितामह माने जाते हैं लेकिन प्रशासनिक तौर पर हवाला स्कैम और यूरिया स्कैम जैसे बड़े घोटाले गठबंधन की राजनीति के ही परिणाम थे।

गठबंधन की सरकार को चलाने में कामयाबी तो पंडित अटल बिहारी वाजपेयी को भी मिली थी लेकिन अपने पूरे कार्यकाल के दौरान वाजपेयी ममता बनर्जी और जयललिता को मनाने में ही व्यस्त रहे। हालात तो कई बार इस हद तक बिगड़े कि जॉर्ज फर्नांडीज़ को जयललिता को मनाने के लिए बार-बार भागकर चेन्नई जाना पड़ता था

मनमोहन सिंह की बदनामी का बी सबसे बडा कारण गठबंधन की सरकार में शामिल घटक दलों के मंत्रियों की मनमानी थी और यही कारण है कि बीजेपी ने मनमोहन सिंह जैसे ईमानदार प्रधानमंत्री के नेतृत्व में चलने वाली यूपीए-2 की सरकार पर शताब्दी की सबसे भ्रष्ट सरकार होने का आरोप लगाया था। गठबंधन का ही नतीजा है कि पूर्ण बहुमत की सरकार होते हुए भी नरेन्द्र मोदी को आंध्रप्रदेश के सीएम और टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू की सौदेबाज़ी लंबे वक्त तक बर्दाश्त करनी पड़ी। वैसे भी चंद्रबाबू  नायडू की गिनती देश के कुछ चुनिंदा पॉलिटिकल बारगेनर्स में होती रही है। वी पी सिंह की सरकार में नायडू की भूमिका एक किंगमेकर की थी और उन्होने अपनी इस स्थिति का भरपूर राजनीतिक फायदा उठाया। भारत के संसदीय इतिहास में आजादी के बाद दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में गठबंधन की सरकारें जरुर बनीं थीं। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इसका क्रियान्वयन वीपी सिंह, नरसिम्हा राव और अटल जी की रहनुमाई में ठीक तरीके से हुआ।

2014 के चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने भी कोऑपरेटिव-फेडरलिज़्म का नारा दिया था लेकिन पीएम बनने के बाद उनको भी शिवसेना, टीडीपी सरीखे अपने सहयोगी दलों को नियंत्रण में रखने के लिए शरद पवार की एनसीपी और केसीआर की टीआरएस से गलबहियां करनी पड़ीं। गठबंधन की राजनीति सत्ता हासिल करने के लिए एक उपयुक्त माध्यम हो सकता है लेकिन गुड गवर्नेंस, त्वरित फैसले और असरकारी सरकार के रास्ते में ज्यादातर मौकों पर व्यवधान ही पैदा करती है । राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की सियासत के चलते क्षेत्रवाद, जातिवाद,सेक्टरवाद और सांप्रदायिकता को ही ज्यादा बढ़ावा मिलता है।

– वासिन्द्र मिश्र   

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