गुरुवार, 18 अक्तूबर 2018

आरक्षण क्यों बना ‘पॉलिटिकल स्टंट’ ?

आजादी के बाद से लेकर अबतक समाज के वंचित और शोषित वर्गों को उनका बाजिव हक दिलाने के लिए जितने भी सामाजिक और राजनैतिक आंदोलन चलाए गए है । उनका मकसद सामाजिक विध्वंस बढ़ाना नहीं था बल्कि हजारों सालों से शोषण के शिकार वर्गों को उनका राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक हक वापस दिलाना था । उन आंदोलनों के पीछे भी राजनैतिक ताकतों का हाथ रहता था । लेकिन एजेंडा बहुत साफ था । आज की तुलना में उस दौर के नेताओं और समाज सुधारकों की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था ।

छत्रपति शाहू  जी महाराज, रामास्वामी नायकर उर्फ पेरियार, डॉ. भीमराव अंबेडकर, कांशीराम, डॉ. लोहिया और महात्मा गांधी सरीखे तमाम नेताओं ने समय-समय पर अपने-अपने तरीके से दलितों, शोषितों और वंचितों की आवाज को बुलंद करने की कोशिश की थी । लेकिन उन नेताओं की नीति और नियत में किसी को संदेह नहीं था ।

सत्ता में बने रहने के मकसद से शोषितों, वंचितों को वोट बैंक बनाने की परंपरा की शुरूआत विश्वनाथ प्रताप सिंह के कार्यकाल में हुई और जो आज भी बदस्तूर जारी है । सही मायने में देखें तो सिर्फ चेहरे बदल गए है, कामकाज का तरीका वही पुराना है ।

और नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण का जितना ढ़िढोरा पीटा जा रहा है । धरातल सच्चाई इससे कोसों दूर है । ज्यादातर सरकारी विभागों में बहुत ही सुनियोजित तरीके से नौकरियां समाप्त की जा रही है और दूसरी तरफ प्रमोशन में आरक्षण का ढोल पीटा जा रहा है । पहले नौकरी मिले तब कही जाकर प्रमोशन की आवश्यकता पड़ती है । यहां तो नौकरियों के ही लाले पड़े है ।

आरक्षण के चलते एक बार फिर पूरे देश में सामाजिक सदभाव बिगड़ता नजर आ रहा है । समाज पूरी तरह से जातियों और उपजातियों में बंटकर मूलभूत रोजी रोटी के मुद्दों से भटक गया है । सत्ता का अपना एक अलग ही चरित्र होता है और सत्ता में बैठे लोगों की कोशिश हमेशा से ही जनता का ध्यान मूलभूत समस्याओं से हटाकर अपना राजनैतिक उल्लू सीधा करने की रही है । जनता को चाहिए की नेताओं के कुचक्र से सजग रहते हुए रोजमर्रा के सवालों पर उनसे जबाव मांगे ।

-वासिन्द्र मिश्र

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