रविवार, 14 अक्तूबर 2018

कृष्ण की भूमिका में ‘नेता जी’ ?

 मुलायम सिंह यादव आज भले ही किसी दल के अध्यक्ष नहीं हैं लेकिन इसके बावजूद भी आखिर किस वजह से वो सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। भारतीय राजनीति में सक्रिय नेताओं के मुकाबले मुलायम सिंह आज भी सबसे ज्यादा प्रासंगिक और सक्रिय दिखाई देते हैं, चाहे UPA की सरकार हो या फिर NDA की सरकार, मुलायम सिंह के निजी रिश्ते तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, नरसिम्हा राव मनमोहन सिंह चंद्रशेखर राजीव गांधी औऱ मौजूदा पीएम नरेन्द्र मोदी से बहुत ही मधुर रहे हैं। विपरीत विचारधाराओं और कार्य संस्कृतियों वाले लोगों  साथ समायोजन और संयोजन करके अपने राजनीतिक एजेंडा को आगे बढ़ाने की कला मुलायम सिंह से ज्यादा शायद ही किसी नेता के पास होगी।

अगर हम पौराणिक गाथाओं पर भरोसा करें तो ये कहा जा सकता है कि मुलायम सिंह यादव भगवान कृष्ण की तरह सभी कलाओं में पारंगत रहे हैं शायद यही वजह है कि दूसरे दलों के कद्दावर नेताओं सहित दो धड़ों में बंटा यादव परिवार भी उनके आस पास ही परिक्रम करते दिखाई दे रहा है कभी वो खुद को पुत्र मोह में फंसे पिता के रुप में दिखते हैं तो कभी भ्रातप्रेम मे विवश एक बड़े भाई के रुप में परिवार में चल रही मौजूदा राजनीतिक कलह मुलायम सिंह के संपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक जीवन की सबसे बड़ी चुनौती है और शायद यही कारण है कि वो आज भी इस पारिवारिक कलह रूपी चक्रव्यूह को तोड़ने की कोशिश में लगे हैं मुलायम ने अपने लंबे सियासी करियर में तमाम विरोधियों को अलग अलग समय पर शिकस्त दी मुलायम के राजनीतिक मूड को सर्वाधिक निकटस्थ भी नहीं समझ पाते हैं।

लेकिन आज वहीं मुलायम पारिवारिक कलह के चलते कई मौकों पर असहाय दिखाई देते हैं लखनऊ में जिस सरकारी बंगले को शिवपाल के नाम पर आवंटित किया गया है उस सरकारी बंगले का रोचक इतिहास है, समाजवादी पार्टी बनाने से पहले मुलायम सिंह यादव लोकदल के प्रमुख नेता और कर्ताधर्ता के तौर पर उसी कार्यालय से काम किया करते थे सत्ता में आने से पहले विपक्षी नेता के  तौर पर मुलायम सिंह ने उसी कार्यालय से पार्टी के कामकाज भी निपटाते थे और प्रदेश के कोनेकोने से आने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं से मिलते थे समाजावादी पार्टी का मौजूदा कार्यालय और लोहिया ट्रस्ट तो मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद आवंटित हुआ था ऐसा लगता है कि समाजवादी सेक्युलर मोर्चा के संस्थापक शिवपाल सिंह यादव मुलायम की उसी राजनीतिक विरासत को लेकर बढ़ना चाह रहे हैं। समाजवादी सेक्युलर मोर्चा का झंडा और उसपर एक तरफ मुलायम सिंह यादव का फोटो शिवपाल के मुलायम की विरासत पर कब्जा जमाने की कोशिश भी हो सकती है ।

उत्तरप्रदेश का सियासी इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि जब चौधरी चरण सिंह की विरासत को लेकर उनके बेटे चौधरी अजीत सिंह और मुलायम सिंह के बीच संघर्ष शुरु हुआ तो आखिर में प्रदेश की जनता ने चौधरी अजित सिंह के मुकाबले मुलायम सिंह यादव को उनकी राजनीतिक विरासत सौंपना मुनासिब समझा था कहा जाता है कि History repeats itself . ऐसी स्थिति में यादव कुनबे का ये झगड़ा अपने चरम पर दिखाई दे रहा हैतो क्या ये माना जाए कि आने वाले समय में मुलायम सिंहके समर्थक शिवपाल के खेमे में जाते दिखाई देंगे?

मुलायम सिंह की कोशिश पिछले कई सालों में से परिवार के बुजुर्ग मुखिया की रही है जो अंतिम क्षणों तक पार्टी और परिवार को विभाजन और बिखराव से बचाने में लगा रहा । हाल के दो वर्षों पर नज़र डालें तो जिस समय निर्वाचन आयोग के सामने पारिवारिक कलह के चलते पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह जब्त करने की स्थिति पैदा हो गई थी तो उस समय मुलायम सिंह ने अपना सियासी कदम पीछे खींचते हुए बेटे अखिलेश यादव का साथ दिया था । उस अखिलेश यादव का जिन्होने खुद मुलायम सिंह को पार्टी अध्यक्ष के पद से हटाकर पार्टी और संसाधनों पर कब्जा कर लिया था । कहा जाता है कि मुलायम सिंह तमाम कोशिशों के विफल होने के बाद शिवपाल सिंह यादव ने उनके आशीर्वाद और इजाजत से नए मोर्चे का गठन किया है राजनीति में स्थिति का सियासी फायदा उठाना पुरानी परंपरा रही है बीजेपी भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए शिवपाल सिंह को परोक्ष रुप से हर संभव साधन और सुविधाएं मुहैया करा रही है और उस मुहिम में मुलायम सिंह यादव की भी रजामंदी शामिल है।

अगर यादव परिवार की ये आतंरिक कलह ऐसे ही बरकरार रही तो आने वाले लोकसभा चुनाव में इसका सबसे ज्यादा फायदा बीजेपी को ही मिलेगा । ऐसा लगता है कि मुलायम सिंह यादव आज भी शिवपाल सिंह को प्रेशर ग्रुप के तौर पर इस्तेमाल करना चाहते हैं । उनकी कोशिश है कि अखिलेश यादव इस कड़वी सच्चाई को समझ लें और पार्टी  और परिवार के हित को ध्यान में रखते हुए शिवपाल यादव से सुलह कर लें। मुलायम सिंह की दूसरी कोशिश अखिलेश और मायावती के संभावित राजनीतिक गठबंधन को रोकने की भी है औऱ ये गठबंधन तभी रुक सकता है जब शिवपाल समाजवादी सेक्युलर मोर्चा  के जरिए अपनी सियासी ताकत का प्रदर्शन करते रहें। मुलायम सिंह यादव के व्यक्तित्व उनकी रणनीति , उनकी कूटनीति और उनके राजनीतिक जीवन दर्शन पर सैकड़ों किताबें लिखी जा सकती हैं।

अभी तो फिलहाल इतना ही कहा जा सकता है कि बगैर किसी पार्टी और पद के मुलायम सिंह यादव आज भी भारतीय राजनीति में उतने ही प्रांसगिक हैं जितना पहले हुआ करते थे पहले कांग्रेस की आपसी गुटबाजी में मुलायम नारायण दत्त तिवारी के मुकाबले वीर बहादुर सिंह की मदद किया करते थे और आज अपने राजनीतिक फैसलों और भाषणों से एक साथ कई लोगों की मदद और नुकसान पहुंचा रहे हैं ।

-वासिन्द्र मिश्र 

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