बुधवार, 24 अक्तूबर 2018

गुरुवार, 18 अक्तूबर 2018

आरक्षण क्यों बना ‘पॉलिटिकल स्टंट’ ?

आजादी के बाद से लेकर अबतक समाज के वंचित और शोषित वर्गों को उनका बाजिव हक दिलाने के लिए जितने भी सामाजिक और राजनैतिक आंदोलन चलाए गए है । उनका मकसद सामाजिक विध्वंस बढ़ाना नहीं था बल्कि हजारों सालों से शोषण के शिकार वर्गों को उनका राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक हक वापस दिलाना था । उन आंदोलनों के पीछे भी राजनैतिक ताकतों का हाथ रहता था । लेकिन एजेंडा बहुत साफ था । आज की तुलना में उस दौर के नेताओं और समाज सुधारकों की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था ।

छत्रपति शाहू  जी महाराज, रामास्वामी नायकर उर्फ पेरियार, डॉ. भीमराव अंबेडकर, कांशीराम, डॉ. लोहिया और महात्मा गांधी सरीखे तमाम नेताओं ने समय-समय पर अपने-अपने तरीके से दलितों, शोषितों और वंचितों की आवाज को बुलंद करने की कोशिश की थी । लेकिन उन नेताओं की नीति और नियत में किसी को संदेह नहीं था ।

सत्ता में बने रहने के मकसद से शोषितों, वंचितों को वोट बैंक बनाने की परंपरा की शुरूआत विश्वनाथ प्रताप सिंह के कार्यकाल में हुई और जो आज भी बदस्तूर जारी है । सही मायने में देखें तो सिर्फ चेहरे बदल गए है, कामकाज का तरीका वही पुराना है ।

और नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण का जितना ढ़िढोरा पीटा जा रहा है । धरातल सच्चाई इससे कोसों दूर है । ज्यादातर सरकारी विभागों में बहुत ही सुनियोजित तरीके से नौकरियां समाप्त की जा रही है और दूसरी तरफ प्रमोशन में आरक्षण का ढोल पीटा जा रहा है । पहले नौकरी मिले तब कही जाकर प्रमोशन की आवश्यकता पड़ती है । यहां तो नौकरियों के ही लाले पड़े है ।

आरक्षण के चलते एक बार फिर पूरे देश में सामाजिक सदभाव बिगड़ता नजर आ रहा है । समाज पूरी तरह से जातियों और उपजातियों में बंटकर मूलभूत रोजी रोटी के मुद्दों से भटक गया है । सत्ता का अपना एक अलग ही चरित्र होता है और सत्ता में बैठे लोगों की कोशिश हमेशा से ही जनता का ध्यान मूलभूत समस्याओं से हटाकर अपना राजनैतिक उल्लू सीधा करने की रही है । जनता को चाहिए की नेताओं के कुचक्र से सजग रहते हुए रोजमर्रा के सवालों पर उनसे जबाव मांगे ।

-वासिन्द्र मिश्र

सोमवार, 15 अक्तूबर 2018

गठजोड़ सियासत और बिखरता लोकतंत्र !

राजभर की सार्वजनिक तौर पर बयानबाज़ी के चलते एक बार फिर एकल दलीय सरकार बनाम बहुदलीय सरकार पर बहस शुरु हो गई है। भारतीय संविधान में सामूहिक दायित्व की व्यवस्था है और सरकार में शामिल हर मंत्री को संविधान के अनुरूप अपने सामूहिक दायित्वों का निर्वहन करना पड़ता है । यूपी में सरकार बनने के दिन से लेकर अब तक ओमप्रकाश राजभर लगातार सरकारी फैसलों का विरोध करते रहे हैं और अपनी सरकार के मंत्रियों, प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ धरना प्रदर्शन करते रहे हैं।

एकल दलीय बनाम गठबंधन की सरकारों को लेकर पूरी दुनिया में डिबेट होती रही है। गठबंधन की राजनीति के पैरोकारों का ये दावा रहा है कि गठबंधन की सरकारें जनता के प्रति ज्यादा जवाबदेह रहती हैं और उनकी नीतियों और कार्यक्रमों में जनता का हित सर्वोपरि रहता है। सरकारों की निरंकुशता पर गठबंधन की सरकारों के जरिए अंकुश लगाना ज्यादा आसान रहता है। वहीं दूसरी तरफ सिंगल पार्टी सरकार का समर्थन करने वालों का मानना है कि जनता के पक्ष में त्वरित और असरकार फैसले सिंगल पार्टी सरकार में आसानी से लिए जा सकते हैं। सिंगल पार्टी सरकारों में प्रेशर पॉलिटिक्स, ब्लैकमेलिंग, बारगेनिंग की गुंजाइश कम रहती है जबकि इसके ठीक विपरीत गठबंधन में शामिल राजनीतिक दल क्षेत्रियता, जातीयता, सांप्रदायिकता और अपने वोटबैंक को ध्यान में रखकर सरकार पर दबाव बनाते रहते हैं। सरकार में शामिल बड़े घटक दलों से बारगेन करते रहते हैं।

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यदि हम भारत के राजनीतिक और संसदीय इतिहास पर नज़र डालें तो राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की राजनीति की शुरुआत  वीपी सिंह के वक्त हुई। लेकिन इसका अनुभव बहुत खराब रहा। तत्कालीन पीएम वीपी सिंह ने सत्ता में बने रहने के मकसद से और बीजेपी द्वारा एल के अडवाणी की अगुवाई में चलाए जा रहे राम मंदिर आंदोलन को निष्प्रभावी बनाने के लिए मंडल कमीशन की अरसे से लंबित सिफारिशों को लागू कर दिया था। वी पी सिंह के जल्दबाज़ी में लिए गए इस फैसले के चलते देश का सामाजिक सद्भाव बुरी तरह से छिन्न-भिन्न हो गया। इस सामाजिक सद्भाव की खाई को पाटने में लंबा वक्त लग गया।

 

राजीव गांधी की हत्या के बाद पी वी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में गठबंधन की सरकार बनी निजी तौर पर भले ही नरसिम्हा राव देश में नई अर्थव्यवस्था के पितामह माने जाते हैं लेकिन प्रशासनिक तौर पर हवाला स्कैम और यूरिया स्कैम जैसे बड़े घोटाले गठबंधन की राजनीति के ही परिणाम थे।

गठबंधन की सरकार को चलाने में कामयाबी तो पंडित अटल बिहारी वाजपेयी को भी मिली थी लेकिन अपने पूरे कार्यकाल के दौरान वाजपेयी ममता बनर्जी और जयललिता को मनाने में ही व्यस्त रहे। हालात तो कई बार इस हद तक बिगड़े कि जॉर्ज फर्नांडीज़ को जयललिता को मनाने के लिए बार-बार भागकर चेन्नई जाना पड़ता था

मनमोहन सिंह की बदनामी का बी सबसे बडा कारण गठबंधन की सरकार में शामिल घटक दलों के मंत्रियों की मनमानी थी और यही कारण है कि बीजेपी ने मनमोहन सिंह जैसे ईमानदार प्रधानमंत्री के नेतृत्व में चलने वाली यूपीए-2 की सरकार पर शताब्दी की सबसे भ्रष्ट सरकार होने का आरोप लगाया था। गठबंधन का ही नतीजा है कि पूर्ण बहुमत की सरकार होते हुए भी नरेन्द्र मोदी को आंध्रप्रदेश के सीएम और टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू की सौदेबाज़ी लंबे वक्त तक बर्दाश्त करनी पड़ी। वैसे भी चंद्रबाबू  नायडू की गिनती देश के कुछ चुनिंदा पॉलिटिकल बारगेनर्स में होती रही है। वी पी सिंह की सरकार में नायडू की भूमिका एक किंगमेकर की थी और उन्होने अपनी इस स्थिति का भरपूर राजनीतिक फायदा उठाया। भारत के संसदीय इतिहास में आजादी के बाद दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में गठबंधन की सरकारें जरुर बनीं थीं। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इसका क्रियान्वयन वीपी सिंह, नरसिम्हा राव और अटल जी की रहनुमाई में ठीक तरीके से हुआ।

2014 के चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने भी कोऑपरेटिव-फेडरलिज़्म का नारा दिया था लेकिन पीएम बनने के बाद उनको भी शिवसेना, टीडीपी सरीखे अपने सहयोगी दलों को नियंत्रण में रखने के लिए शरद पवार की एनसीपी और केसीआर की टीआरएस से गलबहियां करनी पड़ीं। गठबंधन की राजनीति सत्ता हासिल करने के लिए एक उपयुक्त माध्यम हो सकता है लेकिन गुड गवर्नेंस, त्वरित फैसले और असरकारी सरकार के रास्ते में ज्यादातर मौकों पर व्यवधान ही पैदा करती है । राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की सियासत के चलते क्षेत्रवाद, जातिवाद,सेक्टरवाद और सांप्रदायिकता को ही ज्यादा बढ़ावा मिलता है।

– वासिन्द्र मिश्र   

रविवार, 14 अक्तूबर 2018

कृष्ण की भूमिका में ‘नेता जी’ ?

 मुलायम सिंह यादव आज भले ही किसी दल के अध्यक्ष नहीं हैं लेकिन इसके बावजूद भी आखिर किस वजह से वो सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। भारतीय राजनीति में सक्रिय नेताओं के मुकाबले मुलायम सिंह आज भी सबसे ज्यादा प्रासंगिक और सक्रिय दिखाई देते हैं, चाहे UPA की सरकार हो या फिर NDA की सरकार, मुलायम सिंह के निजी रिश्ते तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, नरसिम्हा राव मनमोहन सिंह चंद्रशेखर राजीव गांधी औऱ मौजूदा पीएम नरेन्द्र मोदी से बहुत ही मधुर रहे हैं। विपरीत विचारधाराओं और कार्य संस्कृतियों वाले लोगों  साथ समायोजन और संयोजन करके अपने राजनीतिक एजेंडा को आगे बढ़ाने की कला मुलायम सिंह से ज्यादा शायद ही किसी नेता के पास होगी।

अगर हम पौराणिक गाथाओं पर भरोसा करें तो ये कहा जा सकता है कि मुलायम सिंह यादव भगवान कृष्ण की तरह सभी कलाओं में पारंगत रहे हैं शायद यही वजह है कि दूसरे दलों के कद्दावर नेताओं सहित दो धड़ों में बंटा यादव परिवार भी उनके आस पास ही परिक्रम करते दिखाई दे रहा है कभी वो खुद को पुत्र मोह में फंसे पिता के रुप में दिखते हैं तो कभी भ्रातप्रेम मे विवश एक बड़े भाई के रुप में परिवार में चल रही मौजूदा राजनीतिक कलह मुलायम सिंह के संपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक जीवन की सबसे बड़ी चुनौती है और शायद यही कारण है कि वो आज भी इस पारिवारिक कलह रूपी चक्रव्यूह को तोड़ने की कोशिश में लगे हैं मुलायम ने अपने लंबे सियासी करियर में तमाम विरोधियों को अलग अलग समय पर शिकस्त दी मुलायम के राजनीतिक मूड को सर्वाधिक निकटस्थ भी नहीं समझ पाते हैं।

लेकिन आज वहीं मुलायम पारिवारिक कलह के चलते कई मौकों पर असहाय दिखाई देते हैं लखनऊ में जिस सरकारी बंगले को शिवपाल के नाम पर आवंटित किया गया है उस सरकारी बंगले का रोचक इतिहास है, समाजवादी पार्टी बनाने से पहले मुलायम सिंह यादव लोकदल के प्रमुख नेता और कर्ताधर्ता के तौर पर उसी कार्यालय से काम किया करते थे सत्ता में आने से पहले विपक्षी नेता के  तौर पर मुलायम सिंह ने उसी कार्यालय से पार्टी के कामकाज भी निपटाते थे और प्रदेश के कोनेकोने से आने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं से मिलते थे समाजावादी पार्टी का मौजूदा कार्यालय और लोहिया ट्रस्ट तो मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद आवंटित हुआ था ऐसा लगता है कि समाजवादी सेक्युलर मोर्चा के संस्थापक शिवपाल सिंह यादव मुलायम की उसी राजनीतिक विरासत को लेकर बढ़ना चाह रहे हैं। समाजवादी सेक्युलर मोर्चा का झंडा और उसपर एक तरफ मुलायम सिंह यादव का फोटो शिवपाल के मुलायम की विरासत पर कब्जा जमाने की कोशिश भी हो सकती है ।

उत्तरप्रदेश का सियासी इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि जब चौधरी चरण सिंह की विरासत को लेकर उनके बेटे चौधरी अजीत सिंह और मुलायम सिंह के बीच संघर्ष शुरु हुआ तो आखिर में प्रदेश की जनता ने चौधरी अजित सिंह के मुकाबले मुलायम सिंह यादव को उनकी राजनीतिक विरासत सौंपना मुनासिब समझा था कहा जाता है कि History repeats itself . ऐसी स्थिति में यादव कुनबे का ये झगड़ा अपने चरम पर दिखाई दे रहा हैतो क्या ये माना जाए कि आने वाले समय में मुलायम सिंहके समर्थक शिवपाल के खेमे में जाते दिखाई देंगे?

मुलायम सिंह की कोशिश पिछले कई सालों में से परिवार के बुजुर्ग मुखिया की रही है जो अंतिम क्षणों तक पार्टी और परिवार को विभाजन और बिखराव से बचाने में लगा रहा । हाल के दो वर्षों पर नज़र डालें तो जिस समय निर्वाचन आयोग के सामने पारिवारिक कलह के चलते पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह जब्त करने की स्थिति पैदा हो गई थी तो उस समय मुलायम सिंह ने अपना सियासी कदम पीछे खींचते हुए बेटे अखिलेश यादव का साथ दिया था । उस अखिलेश यादव का जिन्होने खुद मुलायम सिंह को पार्टी अध्यक्ष के पद से हटाकर पार्टी और संसाधनों पर कब्जा कर लिया था । कहा जाता है कि मुलायम सिंह तमाम कोशिशों के विफल होने के बाद शिवपाल सिंह यादव ने उनके आशीर्वाद और इजाजत से नए मोर्चे का गठन किया है राजनीति में स्थिति का सियासी फायदा उठाना पुरानी परंपरा रही है बीजेपी भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए शिवपाल सिंह को परोक्ष रुप से हर संभव साधन और सुविधाएं मुहैया करा रही है और उस मुहिम में मुलायम सिंह यादव की भी रजामंदी शामिल है।

अगर यादव परिवार की ये आतंरिक कलह ऐसे ही बरकरार रही तो आने वाले लोकसभा चुनाव में इसका सबसे ज्यादा फायदा बीजेपी को ही मिलेगा । ऐसा लगता है कि मुलायम सिंह यादव आज भी शिवपाल सिंह को प्रेशर ग्रुप के तौर पर इस्तेमाल करना चाहते हैं । उनकी कोशिश है कि अखिलेश यादव इस कड़वी सच्चाई को समझ लें और पार्टी  और परिवार के हित को ध्यान में रखते हुए शिवपाल यादव से सुलह कर लें। मुलायम सिंह की दूसरी कोशिश अखिलेश और मायावती के संभावित राजनीतिक गठबंधन को रोकने की भी है औऱ ये गठबंधन तभी रुक सकता है जब शिवपाल समाजवादी सेक्युलर मोर्चा  के जरिए अपनी सियासी ताकत का प्रदर्शन करते रहें। मुलायम सिंह यादव के व्यक्तित्व उनकी रणनीति , उनकी कूटनीति और उनके राजनीतिक जीवन दर्शन पर सैकड़ों किताबें लिखी जा सकती हैं।

अभी तो फिलहाल इतना ही कहा जा सकता है कि बगैर किसी पार्टी और पद के मुलायम सिंह यादव आज भी भारतीय राजनीति में उतने ही प्रांसगिक हैं जितना पहले हुआ करते थे पहले कांग्रेस की आपसी गुटबाजी में मुलायम नारायण दत्त तिवारी के मुकाबले वीर बहादुर सिंह की मदद किया करते थे और आज अपने राजनीतिक फैसलों और भाषणों से एक साथ कई लोगों की मदद और नुकसान पहुंचा रहे हैं ।

-वासिन्द्र मिश्र 

गुरुवार, 9 अगस्त 2018

Pt Nehru bed in nehru museum

article 370 and 35 A

The special status of jammu and kashmir including leh was granted by maharaja of kashmir long before independence 
Keeping the insecurity in their minds it were kashmiri pundits and dogras who first of all demanded the special status
It was applicable for united kashmir 
I am failed to understand why only kasmiri muslims are being targeted for the special status like artilcle 370 and article 35-A