मंगलवार, 7 मार्च 2017

अयोध्या, अदालत और सियासत..

सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश के बाद बाबरी मस्जिद विध्वंस केस का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है और इसके साथ ही भारतीय जनता पार्टी के शीर्षस्थ नेताओं लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के राजनीतिक भविष्य पर भी ग्रहण लग गया है। 6 दिसंबर 1992 से लेकर आजतक बाबरी मस्जिद विध्वंस केस में दर्जनों बार उतार चढ़ाव आया है और इस उतार चढ़ाव का सीधा असर विध्वंस केस की पैरवी कर रही जांच एजेंसी पर भी पड़ता रहा है। केन्द्र में स्थापित सरकारों की राजनीतिक प्रतिबद्धता के मद्देनजर मुकदमे की पैरवी में भी समय-समय पर पैंतरेबाजी होती रही है।
मामले में अंतिम फैसला चाहे जो भी हो लेकिन तात्कालिक तौर पर 6 मार्च 2017 के सुप्रीम कोर्ट के ऑब्ज़र्वेशन का सीधा असर देश में होने वाले अगले राष्ट्रपति चुनाव पर भी पड़ सकता है। अभी तक माना जाता था कि बीजेपी की तरफ से अगले राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी में से किसी एक का नाम आगे किया जा सकता था। लेकिन कानूनी विवाद में फंसने की वजह से इन दोनों शीर्षस्थ नेताओं की संभावित उम्मीदवारी खटाई में पड़ सकती है।
ऐसी स्थिति में मौजूदा लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन राष्ट्रपति पद के लिए बीजेपी की तरफ से अगली उम्मीदवार बनाई जा सकती हैं। दरअसल 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरने के बाद दो एफआईआर दर्ज हुई। एफआईआर नंबर 197/92 कारसेवकों के खिलाफ, जबकि एफआईआर नंबर 198/92 लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और छह अन्य के खिलाफ। 27 फरवरी 1993 को सीबी-सीआईडी ने मामला क्रमांक 198/92 में ललितपुर की विशेष अदालत में आडवाणी और सात अन्य के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया।
25 अगस्त 1993 को ये मामले जांच के लिए सीबी-सीआईडी से सीबीआई को ट्रांसफर किया गया। 8 सितंबर 1993 को लखनऊ में सीबीआई की एक विशेष अदालत गठित की गई। 5 अक्टूबर 1993 को जांच एजेंसी ने सभी 49 आरोपियों के खिलाफ संयुक्त चार्जशीट दाखिल की। 8 अक्टूबर 1993 को लखनऊ की विशेष अदालत में मामला क्रमांक 198/92 में अन्य आरोपियों को शामिल कराने के लिए नई अधिसूचना जारी की गई। इसी अधिसूचना को बाद में हाई कोर्ट ने दोषपूर्ण करार दिया, जिससे आडवाणी और अन्य को बचाव का रास्ता मिल गया।
12 फरवरी 2001 को हाई कोर्ट ने 8 अक्टूबर 1993 की दोषपूर्ण अधिसूचना के आधार पर आडवाणी समेत आठ आरोपियों के खिलाफ अभियोग को वापस लिया। इसी को नज़ीर बनाते हुए 4 मई 2001 को सीबीआई की लखनऊ की विशेष अदालत के न्यायाधीश एस. के. शुक्ला ने कल्याण सिंह समेत 13 और आरोपियों के खिलाफ अभियोग को वापस लिया और इसी समय सीबीआई ने संयुक्त चार्जशीट को दो हिस्सों में बांट दिया। बाद में ये मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा। जहां हाईकोर्ट ने भी 2010 में इन आरोपियों को बरी कर दिया। 
दिलचस्प बात ये है कि जांच एजेंसी की तरफ से इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के उस फैसले को चुनौती देने में देर जानबूझ कर की गई या किसी दबाव में इसका जवाब तो एजेंसी ही देंगी लेकिन अगर जांच एजेंसी की तरफ से सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल होती है तो इन नेताओं की मुश्किल बढ़ सकती है। दूसरी तरफ रायबरेली में मामला चलता रहा। केंद्र में चाहे अटल जी की सरकार रही हो या कांग्रेस की, राज्य में चाहे समाजवादी पार्टी की सरकार रही हो या बहुजन समाज पार्टी की सभी ने हीलाहवाली की और मामले की पैरवी में ढिलाई बरती।
हर बार जांच एजेंसी ने मामले को ढीला किया। जिस आदेश में सेशन जज ने आरोपियों को एक्यूटल दिया था उसके खिलाफ जांच एजेंसी को तभी अपील करनी चाहिए थी। जो तब नहीं किया गया और अब जांच एजेंसी वही काम करने जा रही हैं। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि बाबरी मस्जिद का ये मुद्दा कानूनी कम राजनीतिक ज़्यादा है और इससे जुड़ा हर पक्ष अपनी-अपनी तरह से इसका इस्तेमाल करता रहा है। इससे हमारी संवैधानिक प्रक्रिया भी प्रभावित होती है।

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