बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

किसका होगा उत्तर प्रदेश?

2017 के विधानसभा चुनाव को 2019 का सेमीफाइनल समझा जा रहा है। साथ ही ये दो सरकारों मोदी और अखिलेश सरकार के कामकाज का रेफरेंडम भी माना जा रहा है। चुनावों का परिणाम दो सरकारों के कामकाज का मूल्यांकन करेगा। इससे ये भी पता चलेगा कि सत्ता विरोधी लहर का असर अखिलेश या मोदी सरकार किसके खिलाफ ज्यादा रहा।
इन चुनावों का परिणाम देश की दो प्रमुख राजनैतिक पार्टियों के युवा नेतृत्व की स्वीकार्यता पर भी मोहर लगाएगा। अगर पौराणिक कथाओं के लिहाज से इन चुनाव की तस्वीरों का मूल्यांकन करें तो कहा जा सकता है, इन चुनावों के परिणाम महाभारत की कथाओं को एक बार फिर सजीव कर देते है। भारतीय राजनीति में अपनी सक्रियता के दौर में शायद यह पहला मौका है जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में चुनाव प्रचार से बाहर है।
ये भी पहली बार हो रहा है कि बगैर विधिवत कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने राहुल गांधी ने चुनावी गठबंधन का फैसला किया और पूरी कांग्रेस पार्टी राहुल के इस फैसले के साथ खड़ी नजर आ रही है। वो राहुल गांधी जो यूपी में पूरे 4 साल अखिलेश सरकार के खिलाफ अभियान चला रहे थे, वही राहुल गांधी अखिलेश के सम्मान में कसीदे पढ़ रहे हैं। कांग्रेस और अखिलेश सरकार के बीच के चुनावी गठबंधन से एक बात लगभग तय हो चुकी है कि राहुल गांधी और पार्टी आलाकमान मोदी से मुकाबला करने में खुद को असहाय मान चुके हैं। शायद यही कारण है कि राजनैतिक तौर पर 36 का रिश्ता रखने वाले नेताओं से भी समझौता करने में कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी को अब कोई ऐतराज नहीं है।
कांग्रेस के इतिहास में ये पहली बार नही हो रहा, इससे पहले भी दक्षिण भारत के राज्यों में कांग्रेस पार्टी क्षेत्रीय दलों से समझौता करके चुनाव लड़ती रही है और केंद्र में अपनी सरकार चलाती रही है। वो कांग्रेस पार्टी जो अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनाए गए एनडीए के पहले तक देश में गठबंधन पॉलिटिक्स की सबसे बड़ी विरोधी रही, वह कांग्रेस पार्टी जो एक दौर में अम्बरैला पॉलिटिक्स के चलते देश के राजनैतिक क्षितिज पर शहंशाह के रुप में काबिज रही। वहीं कांग्रेस पार्टी आज बदले राजनैतिक हालात में गठबंधन पॉलिटिक्स की सबसे बड़ी पैरोकार बनकर खड़ी है। इसका ये मतलब नहीं कि कांग्रेस पार्टी के मूल चरित्र में कोई बदलाव आ गया है, बल्कि इसका मतलब नरेंद्र मोदी सरीखे सशक्त राजनैतिक प्रतिद्वंदी से मुकाबला करना है।
दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी सरीखे कुशल और परिपक्व नेतृत्व के मुकाबले समाजवादी पार्टी का वह युवा नेतृत्व है जो लगभग पूरे साढ़े 4 साल तक यूपी की सरकार चलाते हुए महाभारत के अभिमन्यु की तरह अपने द्वारा बनाए गए चक्रव्यूह में उलझा रहा और अपने कन्विक्शन और डिटरमिनेशन के दम पर चक्रव्यूह भेदने के साथ ही नरेंद्र मोदी से दो-दो हाथ करने के लिए मैदान में है। इन चुनाव में मायावती की मौजूदगी और यूपी में अपने जनाधार को बचाए रखने की जद्दोजहद नरेंद्र मोदी, राहुल, अखिलेश को कड़ी चुनौती दे रही है।
बीजेपी के पास नरेंद्र मोदी के अलावा ऐसा कोई भी विश्वसनीय चेहरा नही है। जिसको प्रोजेक्ट करके वह यूपी और उत्तराखंड में चुनावी समर में कामयाबी हासिल करे। विश्वसनीय चेहरे के अभाव में बीजेपी को यूपी और उत्तराखंड में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इन राज्यों के चुनाव परिणाम चाहे जो भी लेकिन एक बात तय है, कि 2019 के आम लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को राहुल, अखिलेश, हरीश रावत, नीतीश कुमार, अरविंद केजरीवाल, हार्दिक पटेल, कैप्टन अमरिंदर सिंह सरीखे नेताओं से जूझना पड़ेगा। साथ ही मौजूदा हालात को देखते हुए ये कहना मुनासिब होगा कि बीजेपी को 2019 के आम चुनाव जीतने से पहले इन विधानसभा चुनावों में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिए। सही मायने में इन राज्यों के चुनाव परिणाम 2019 के आम चुनाव के सेमीफाइनल के तौर पर देखे जा रहे हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें