गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

जाति संघर्ष से वर्ग संघर्ष तक

बीएमसी समेत महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों में बीजेपी को बड़ी कामयाबी मिली है...10 में से आठ निकाय पर बीजेपी ने कब्जा कर लिया जबकि बीएमसी में शिवसेना को कांटे की टक्कर दी है...नोटबंदी के बाद ये तीसरा निकाय चुनाव है जिसमें बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन किया है... बड़ा सवाल ये है कि नोटबंदी के सहारे पीएम मोदी ने आखिर ऐसा कौन सा दांव चला है कि जहां बीजेपी का ज्यादा आधार भी नहीं था वहां भी बीजेपी मजबूती से उभर रही है..

पहले चंडीगढ़...फिर ओडिशा और अब महाराष्ट्र...इन तीनों राज्यों के स्थानीय चुनावों की दो सबसे बड़ी खासियतें हैं...पहली ये कि यहां चुनाव नोटबंदी के फैसले के बाद हुए और दूसरी ये कि इन सभी जगहों पर बीजेपी को बड़ी बढ़त मिली...चंडीगढ़ नगर निगम हो, ओडिशा के पंचायती निकाय या फिर बीएमसी...बीजेपी नोटबंदी से पहले इन जगहों पर बेहद कमजोर मानी जाती थी लेकिन नोटबंदी के बाद बीजेपी यहां मजबूती के साथ उभरी है... बड़ा सवाल ये है कि नोटबंदी से ऐसा क्या हुआ जो बीजेपी को अचानक इतनी ताकत मिल गई...अचानक ऐसी जगहों पर जहां बीजेपी का कोई आधार नहीं था वहां भी बीजेपी मजबूती से खड़ी हो गई...

दरअसल, पीएम मोदी ने नोटबंदी के सहारे भारतीय समाज को सीधे-सीधे दो वर्गों में बांटने की कोशिश की है....अमीर और गरीब...जो भारतीय समाज अभी तक अपनी पहचान जाति, उपजाति और धर्म से करता है...नोटबंदी के बाद वो अमीर और गरीब के बीच बंटता नजर आने लगा...

नोटबंदी के फैसले के पहले ही दिन से पीएम मोदी बार-बार हर मंच से एक ही बात दोहरा रहे हैं...कि इस फैसले से देश की गरीब जनता को फायदा होगा और ब्लैकमनी वाले परेशान होंगे... 

मोदी की इस मुहिम का सीधा असर धर्मनिरपेक्षता की सियासत करने वाले दलों की रणनीति पर पड़ा है...धर्मनिरपेक्षता की सियासत करने वाले राजनैतिक दलों की कोशिश हमेशा 85 फीसदी हिंदू समाज को जातियों में बांटकर रखने की रही है... लेकिन वक्त-वक्त पर हिंदुओं को एक करने की कोशिशें की गई... महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी ने गणेश उत्सव के नाम पर हिंदू समाज को जोड़ने की कोशिश की थी... तो कुछ ऐसी ही कोशिश बीजेपी ने राम के नाम पर की थी... इन कोशिशों का उद्देश्य समाज में कास्ट सिस्टम को कमजोर कर सभी को एक साथ लाना था...

पीएम मोदी ने इसी मुहिम को नोटबंदी के सहारे आगे बढ़ाया... मोदी राजनीति विज्ञान के छात्र रहे है और बखूबी जानते है कि समाज में जब वर्ग संघर्ष बढ़ेगा तो जातिय संघर्ष खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगा...और जातिय संघर्ष खत्म होगा तो ही हिंदू समाज को एकजुट करने का राष्ट्रीय स्वंय सेवक का सपना भी साकार होगा... इसीलिए नोटबंदी के बाद पीएम मोदी ने हर मंच से अमीर-गरीब की बात की... यानी सीधे-सीधे गरीब के नाम पर वोट बढ़ाने की कोशिशें की... 

कुछ ऐसी ही कोशिश पूर्व प्रधानमंत्री इंडिया गांधी ने भी की थीं...1971 में इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था .. इंदिरा ने कहा था... गरीबी हटाओ, देश बचाओ... जबकि उनके विरोधी उस वक्त नारा दे रहे थे इंदिरा हटाओ देश बचाओ....इसका असर ये हुआ था कि इंदिरा अपनी हर रैली में कहती थीं कि हम देश से गरीबी हटाने की बात कर रहे हैं और विरोधी मुझे हटाने की बात कर रहे हैं... 

तब से लेकर आज तक देश में गरीबी और भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर की राजनीति हो रही है...हालांकि न गरीबी खत्म हुई है और न भ्रष्टाचार...लेकिन इस सब से बेखर आम जनता को नोटबंदी से एक बार फिर उम्मीद जगी है... गरीब अपनी परेशानियां भूल अमीर को परेशान देखकर शकून महसूस कर रहा हैं... लोग मुद्दे भूल गए है...विकास के नारे आज पीछे छूट गए है... 
विकास, भ्रष्टाचार और governance के मुद्दे पर चुनाव जीतकर सत्ता में आए नरेंद्र मोदी अब गरीबी हटाने की बात कर रहे हैं...

यानी सीधे-सीधे गरीबों का सायकोलॉजिकल फायदा उठाने की कोशिश की जा रही है...या सियासी जुबां में कहे तो कमजोर को हक दिलाने के नाम पर वोट बैंक बढ़ाया जा रहा है...

अमेरिका और आतंकवाद

अपने खत्म हो रहे खज़ाने से अंतिम सफर की ओर बढ़ रहे इस्लामिक स्टेट ने दुनिया में अमन चैन चाहने वालों को सुकून की सांसें ज़रूर दे दी हैं लेकिन क्या इस्लामिक स्टेट का खात्मा इस बात की गारंटी देता है कि भविष्य में दहशतगर्दी फैलाने वाले ऐसे ग्रुप पैदा नहीं होंगे ... खासकर तब जब दुनिया में सुपरपावर की पहचान रखने वाला अमेरिका इस्लामिक स्टेट को दुनिया से खत्म करने की बात कर रहा हो ... ये सवाल इसीलिए है क्योंकि परोक्ष रूप से सीरिया के फ्रीडम फाइटर्स को इस्लामिक स्टेट का बैनर देने वाला अमेरिका ही है .. और इस्लामिक स्टेट ही क्यों अलकायदा, ओसामा बिन लादेन और सद्दाम हुसैन इन सब को मजबूती देने वाला अमेरिका ही रहा है ।

मौजूदा वक्त में इस्लामिक स्टेट के खिलाफ लड़ाई अपने अंतिम दौर में है ... इंटरनेशनल सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ रैडिकलाइजेशन एंड पॉलिटिकल वॉयलेंस की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक इस्लामिक स्टेट की इनकम साल 2014 में 1.9 अरब डॉलर से घटकर 2016 में 87 करोड़ डॉलर तक ही रह गई है... तेल, डोनेशन के तौर पर पाने वाली रकम और अपने कब्जे वाले इलाकों में टैक्स के जरिए कमाई करने वाला ISIS अपनी ताकत के साथ साथ कमाई का जरिया भी खोता जा रहा है ... अगस्त 2014 से अब तक  IS,  इराक में सीरिया में इस्लामिक स्टेट अपने काफी इलाकों को खो चुका है। 

अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस्लामिक स्टेट को लेकर अपने इरादे साफ कर चुके  हैं ... लेकिन ये अमेरिका ही है जिसने तेल वाले इलाकों पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लालच में सीरिया के फ्रीडम फाइटर्स को हथियार और ट्रेनिंग दी .... वही फ्रीडम फाइटर्स बाद में आईएसआईएस के बैनर तले लड़ रहे हैं ... सीरियालीबिया और इराक तीनों ही मुल्कों की पहचान उनके तेल के खजाने को लेकर है... लेकिन इन मुल्कों को अपनी ही ज़मीन में मौजूद खजाने का कभी फायदा नहीं मिल सका..और इसी तेल को अपनी मिल्कियत बनाने के लिए अमेरिका ने ISIS को आगे बढ़ाया..अमेरिका के इस नापाक काम में उस वक्त सऊदी अरब और तुर्की ने भी उसकी मदद की... इंसानियत के लिए आर्थिक मदद के नाम पर अमेरिका ने इन आतंकवादियों का पेट भरा.. उस वक्त इंटरनेशनल फोरम ने भी अमेरिका की धौंस के सामने चुप्पी साधे रखी ...लेकिन अमेरिका की ये चाल भी अल-कायदा की तरह उलटी पड गई...कभी सीरिया में पनपने वाले इस्लामिक स्टेट के आतंक की आंच में अब पूरी दुनिया जल रही है...और तेल के खजानों पर कब्जे के लिए शुरू की गई ये नापाक लड़ाई अब ग्लोबल टेररिज्म बनकर पुरी दुनिया को अपनी चपेट में ले चुकी है...

इतना ही नहीं दुनिया को 1980 का वो दशक भी याद है जब ईरान के खिलाफ इस्तेमाल के लिए केमिकल हथियार देकर अमेरिका ने सद्दाम को सद्दाम हुसैन बनाया... इसका अंजाम क्या हुआ ये भी दुनिया को याद है ... इसी तरह अमेरिका के ही हाथों अल कायदा और ओसामा बिन लादेन का जन्म हुआ ... बाद में अमेरिका को इनके खिलाफ अमेरिका को अपनी पूरी ताकत लगानी पड़ रही है ... अमेरिका ने हाल ही में सत्ता परिवर्तन देखा है ... डोनाल्ड ट्रंप ने ना सिर्फ ISIS बल्कि ऐसे किसी भी Radical terrorist group को खत्म करने की बात कही है बल्कि इनकी फंडिंग के खात्मे के लिए इंटरनेशनल लेवल पर काम करने की बात भी कर रहे हैं ... लेकिन क्या ऐसा होगा ...


आतंकवाद के इतिहास पर नज़र डाले तो दुनिया के जिन मुल्कों ने आतंकवाद को बढ़ावा दिया उन्होंने बाद में उसकी कीमत चुकाई है, फिर वह देश चाहे भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, रूस या अमेरिका कोई भी हो... इसलिए ज़रूरत है कि आतंकवाद के खिलाफ ज़मीनी और जातिय सीमाओं से बाहर आकर निपटा जाए और पूरी ईमानदारी के साथ निपटा जाए... आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई महायुद्ध तक जारी रखी जाए, जब तक ये पूरी तरह से खत्म न हो जाए, क्योंकि सही मायने में आतंकवाद पूरी मानवता के खिलाफ है..

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

किसका होगा उत्तर प्रदेश?

2017 के विधानसभा चुनाव को 2019 का सेमीफाइनल समझा जा रहा है। साथ ही ये दो सरकारों मोदी और अखिलेश सरकार के कामकाज का रेफरेंडम भी माना जा रहा है। चुनावों का परिणाम दो सरकारों के कामकाज का मूल्यांकन करेगा। इससे ये भी पता चलेगा कि सत्ता विरोधी लहर का असर अखिलेश या मोदी सरकार किसके खिलाफ ज्यादा रहा।
इन चुनावों का परिणाम देश की दो प्रमुख राजनैतिक पार्टियों के युवा नेतृत्व की स्वीकार्यता पर भी मोहर लगाएगा। अगर पौराणिक कथाओं के लिहाज से इन चुनाव की तस्वीरों का मूल्यांकन करें तो कहा जा सकता है, इन चुनावों के परिणाम महाभारत की कथाओं को एक बार फिर सजीव कर देते है। भारतीय राजनीति में अपनी सक्रियता के दौर में शायद यह पहला मौका है जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में चुनाव प्रचार से बाहर है।
ये भी पहली बार हो रहा है कि बगैर विधिवत कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने राहुल गांधी ने चुनावी गठबंधन का फैसला किया और पूरी कांग्रेस पार्टी राहुल के इस फैसले के साथ खड़ी नजर आ रही है। वो राहुल गांधी जो यूपी में पूरे 4 साल अखिलेश सरकार के खिलाफ अभियान चला रहे थे, वही राहुल गांधी अखिलेश के सम्मान में कसीदे पढ़ रहे हैं। कांग्रेस और अखिलेश सरकार के बीच के चुनावी गठबंधन से एक बात लगभग तय हो चुकी है कि राहुल गांधी और पार्टी आलाकमान मोदी से मुकाबला करने में खुद को असहाय मान चुके हैं। शायद यही कारण है कि राजनैतिक तौर पर 36 का रिश्ता रखने वाले नेताओं से भी समझौता करने में कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी को अब कोई ऐतराज नहीं है।
कांग्रेस के इतिहास में ये पहली बार नही हो रहा, इससे पहले भी दक्षिण भारत के राज्यों में कांग्रेस पार्टी क्षेत्रीय दलों से समझौता करके चुनाव लड़ती रही है और केंद्र में अपनी सरकार चलाती रही है। वो कांग्रेस पार्टी जो अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनाए गए एनडीए के पहले तक देश में गठबंधन पॉलिटिक्स की सबसे बड़ी विरोधी रही, वह कांग्रेस पार्टी जो एक दौर में अम्बरैला पॉलिटिक्स के चलते देश के राजनैतिक क्षितिज पर शहंशाह के रुप में काबिज रही। वहीं कांग्रेस पार्टी आज बदले राजनैतिक हालात में गठबंधन पॉलिटिक्स की सबसे बड़ी पैरोकार बनकर खड़ी है। इसका ये मतलब नहीं कि कांग्रेस पार्टी के मूल चरित्र में कोई बदलाव आ गया है, बल्कि इसका मतलब नरेंद्र मोदी सरीखे सशक्त राजनैतिक प्रतिद्वंदी से मुकाबला करना है।
दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी सरीखे कुशल और परिपक्व नेतृत्व के मुकाबले समाजवादी पार्टी का वह युवा नेतृत्व है जो लगभग पूरे साढ़े 4 साल तक यूपी की सरकार चलाते हुए महाभारत के अभिमन्यु की तरह अपने द्वारा बनाए गए चक्रव्यूह में उलझा रहा और अपने कन्विक्शन और डिटरमिनेशन के दम पर चक्रव्यूह भेदने के साथ ही नरेंद्र मोदी से दो-दो हाथ करने के लिए मैदान में है। इन चुनाव में मायावती की मौजूदगी और यूपी में अपने जनाधार को बचाए रखने की जद्दोजहद नरेंद्र मोदी, राहुल, अखिलेश को कड़ी चुनौती दे रही है।
बीजेपी के पास नरेंद्र मोदी के अलावा ऐसा कोई भी विश्वसनीय चेहरा नही है। जिसको प्रोजेक्ट करके वह यूपी और उत्तराखंड में चुनावी समर में कामयाबी हासिल करे। विश्वसनीय चेहरे के अभाव में बीजेपी को यूपी और उत्तराखंड में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इन राज्यों के चुनाव परिणाम चाहे जो भी लेकिन एक बात तय है, कि 2019 के आम लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को राहुल, अखिलेश, हरीश रावत, नीतीश कुमार, अरविंद केजरीवाल, हार्दिक पटेल, कैप्टन अमरिंदर सिंह सरीखे नेताओं से जूझना पड़ेगा। साथ ही मौजूदा हालात को देखते हुए ये कहना मुनासिब होगा कि बीजेपी को 2019 के आम चुनाव जीतने से पहले इन विधानसभा चुनावों में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिए। सही मायने में इन राज्यों के चुनाव परिणाम 2019 के आम चुनाव के सेमीफाइनल के तौर पर देखे जा रहे हैं।