मंगलवार, 3 जनवरी 2017

2017 का चुनाव परिणाम तय करेगा मोदी अखिलेश का राजनैतिक भविष्य

उत्तर प्रदेश का चुनाव लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों के लिए आग का दरिया है । इस राज्य का चुनाव परिणाम जहां एक तरफ देश की दशा और दिशा तय करेगा वहीं ये मोदी और अखिलेश के लिए भी उनका भविष्य तय करने वाला साबित होगा । देश के सबसे बड़े राज्य के इस चुनाव पर सभी प्रमुख राजनैतिक दलों और नेताओं का भविष्य टिका है । जाति-धर्म और क्षेत्रवाद के भंवरजाल में फंसा उत्तर प्रदेश का मतदाता किसे विजयी बनाएगा ये तो अभी बता पाना मुश्किल है लेकिन मौजूदा राजनैतिक हालात के आधार पर कहा जा सकता है कि इस बार का चुनाव राजनैतिक दृष्टि से बेहद complicated और Challenging रहेगा ।

उत्तर प्रदेश में चुनाव की तारीखों के ऐलान से पहले ही घमासान मचा हुआ है। दंगल में दांव समाजवादी पार्टी के ही दो धड़े लगा रहे हैं,  बाकी दल अखाड़े के इर्द-गिर्द खड़े होकर अपने सियासी नफा-नुकसान के आंकलन में लगे हैं या इस घमासान से ज्यादा से ज्यादा नफा कमाने की कोशिश कर रहे हैं । बाकी दलों की नज़र समाजवादी पार्टी के वोटबैंक पर है जो हो सकता इनके कमजोर होने से बंट जाए । ऐसे में विरोधियों की कोशिश है कि समाजवादी पार्टी के झगड़े में अगर उनका वोटबैंक बंटता है तो उसे अपने पाले में लाया जाए, या फिर पार्टी के किसी एक खेमे के साथ मिलकर सियासत की नई ज़मीन तैयार की जाए, ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या ऐसा होगा ? अगर नहीं हुआ तो क्या वोट बैंक को एकजुट करने के लिए गठबंधन के जरिए कुर्सी हासिल करने की कोशिश की जाएगी, हालांकि दस साल से उत्तर प्रदेश में गठबंधन की सरकार नहीं बनी है ।

उत्तर प्रदेश की सियासत दरअसल unique है ।  जाति-धर्म की सियासत का स्कूल माने-जाने उत्तर प्रदेश में एकजुटता ना तो धर्म और ना ही जाति के नाम पर नज़र आती है । एक ही धर्म या जाति के नाम अलग-अलग नेता हैं जिनका क्षेत्र के हिसाब से प्रभाव दिखता है । अगर मुसलमान की बात करें तो पूरे प्रदेश में कोई एक ऐसा नेता नहीं है जिसके कहने पर इस धर्म को मानने वाले सारे लोग एकजुट होकर उस पर भरोसा दिखा सकें । देवबंद जिसे Nationalist माना जाता था, जो खुलकर कांग्रेस और गांधी परिवार का समर्थक माना जाता था, उसमें ही फूट पड़ चुकी है,  चाचा अरशद मदनी और भतीजे महमूद मदनी के नेतृत्व में बंट चुका ये दो धड़ा अलग-अलग पार्टियों को Support करता है । इनका प्रभाव पश्चिमी यूपी के मुसलमानों पर है लेकिन यही दो नेता नहीं हैं, इनके अलावा जामा मस्जिद के शाही इमाम मौलाना बुखारी भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत में अपना दखल रखते हैं । यानि सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तीन नेताओं का प्रभाव है । वहीं रुहेलखंड इलाके में बरेलवी स्कूल ऑफ थॉट अपना प्रभाव रखता है ।

इसके अलावा प्रदेश के बाकी हिस्सों का भी यही हाल है । पूर्वी उत्तर प्रदेश में आपराधिक छवि के अंसारी बंधु का वर्चस्व है, मुख्तार अंसारी और अफज़ाल अंसारी चाहे कितने भी विवादों में रहें चुनाव में अपना दबदबा दिखाने में कामयाब साबित होते रहे हैं । वहीं इलाहाबाद में अतीक अहमद का प्रभाव दिखता है ।

ये हाल सिर्फ एक धर्म विशेष का नहीं है अगर जाति के आधार पर भी देखें तो पूरे प्रदेश में कई खेमे में हैं जिनका अपने क्षेत्र विशेष पर प्रभाव है । वाराणसी का कुर्मी वर्ग अनुप्रिया पटेल को अपना नेता मानता है तो इलाहाबाद में रामपूजन पटेल का दबदबा है । बाराबंकी और फैज़ाबाद में ये वर्ग बेनी वर्मा को समर्थन देता है । पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित Empowered हैं तो इनका नेता अलग है वहीं East UP खासकर बिहार बॉर्डर के पास रह रहे दलित आज भी काफी गरीब हैं तो उनका नेता अलग है । ऐसे में सवाल ये उठता है कि किसी एक पार्टी के टूटने से उसके समर्थक हों या विरोधी वो क्या एकजुट होकर दूसरी पार्टी पर भरोसा जता पाएंगे । क्या प्रदेश के विपक्षी दल इस हालत में हैं कि वो इस टूट का फायदा उठाने में कामयाब साबित हों ?


तो क्या सियासी हालात महागठबंधन की ओर इशारा कर रहे हैं जहां एक बार फिर बिहार की तर्ज पर चुनाव लड़ा जाएगा, कोशिश होगी कि एक साथ आकर गैर बीजेपी वोटों का बंटवारा होने से रोका जाए ? वहीं बीजेपी की पूरी कोशिश इस Grand Alliance को रोकने की है ताकि वोटर्स के consolidate होने से होने वाले वाले नुकसान को रोका जा सके ?

आखिरकार ये चुनाव अखिलेश यादव और नरेंद्र मोदी के लिए लिटमस टेस्ट है .. दोनों को Anti incumbency factor से लड़ना है, दोनों के पास चुनौतियां हैं । अगर अखिलेश यादव अपने परिवार के घमासान के बीच खुद को विकासपुरुष साबित करने में लगे हैं तो नरेंद्र मोदी की कोशिश प्रदेश की सभी पार्टियों को कमजोर बताकर बीजेपी को एकमात्र विकल्प बताने की है, लेकिन ये राह दोनों के लिए आसान नहीं है ।

समाजवादी पार्टी Infighting से अगर उबर भी जाती है तो confuse हो चुके कैडर की वजह से उनकी राह मुश्किल हो चुकी है तो वहीं बीजेपी 2014 के लहर को खो चुकी है, दूसरा पार्टी को फोकस शिफ्ट हो रहा है । बीजेपी का traditional vote bank जहां Upper cast औैर व्यापारी वर्ग है वहां पार्टी अब OBC Politics की ओर बढ़ रही है । ऐसे में बीजेपी में भी सीट को लेकर Infighting सामने आ सकती है और हो सकता है पार्टी का फोकस OBC की ओर होने से बीजेपी का मौजूदा कैडर और वोटबैंक भी confuse हो जाए ।

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