मंगलवार, 17 जनवरी 2017

महापुरुषों पर सवाल क्यों ?

दुनिया में एक अजीब सा trend शुरू हो चुका है, जो ना सिर्फ आने वाली पीढी पर असर डाल रहा है, बल्कि हमारे इतिहास में शामिल लोगों के अस्तित्व पर भी सवाल उठा रहा है । दुनिया के जो भी फ्रीडम फाइटर्स हैं, चाहे वो भारत के महात्मा गांधी हों या फिर सोवियत यूनियन के जोसेफ स्टालिन, सभी के अस्तित्व पर, उनके फैसलों पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं ... इस फेहरिस्त में चीन के जनक माओ ज़ेदोंग भी शामिल हैं....आज लोग इनके फैसले और मानसिकता पर सवाल उठा रहे हैं ... लेकिन क्या ये ज़रूरी नहीं कि इनके फैसलों पर राय बनाने से पहले उस दौर के हालात को भी समझने की कोशिश की जाए ... क्यों ना ये समझने की कोशिश की जाए कि क्यों इनकी प्रतिमाएं लगाई गईं, इनके नाम से दिवस मनाए गए और क्यों इन धुरंधरों को इतिहास में ये दर्जा दिया गया । दरअसल इन तमाम कवायदों का एकमात्र मकसद आज की और आगे आने वाली पीढियों तक इन शख्सियतों की विचारधारा को पहुंचाना है, दुनिया को उनके योगदान से रूबरू कराना है...
इंसान के व्यक्तित्व में उसकी जड़ें काफी अहमियत रखती हैं, उसका इतिहास और अनुभव ही मिलकर उसका आने वाला भविष्य तय करता है... इतिहास के अनुभव आपके भविष्य के फैसलों को संवार सकते हैं ... ऐसे में ऐसी शख्सियतों के योगदान पर सवाल उठाना इतिहास से बेइमानी करने जैसा है .. दुनियाभर के फासिस्ट की सोच मिली-जुली सी ही है, माओ को मानने वाले जोसेफ स्टालिन का विरोध कर सकते हैं... अंबेडकर को जो मानते हैं, वो गांधी पर सवाल उठा सकते हैं, लेकिन सोच पर सवाल उठाने से समस्या का समाधान मिलना मुश्किल है ... आप व्यवस्था को तो हटा सकते हैं लेकिन विकल्प क्या है ? सवाल उठाना आसान होता है लेकिन समाधान देना नहीं, और इन्हीं सवालों की वजह से आजतक मिडिल ईस्ट आग में झुलस रहा है...

जो democratic सोच रखते हैं, co-existence में विश्वास रखते है, वो विकल्प की तलाश करते हैं ... सवाल सम्राट अशोक और अकबर पर भी उठ चुके हैं, जो तलवार के बूते देश नहीं बल्कि अपने बूते दिल जीतने का माद्दा रखते थे... ऐसे में सिर्फ सवाल उठाना कहां तक लाजिमी है ।


दरअसल इतिहास की गवाही ही लक्ष्य तक पहुंचने की कुंजी बन सकती है, अगर इतिहास से सबक नहीं लिया गया तो लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो जाएगा... चाहे वो एक इंसान का व्यक्तित्व हो या फिर देश का भविष्य 

मोदी बनाम महागठबंधन !

समाजवादी पार्टी का चुनाव निशान साइकिल अखिलेश यादव गुट को मिलने के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का पूरा स्वरूप ही बदलता दिख रहा है। समाजवादी पार्टी में अखिलेश और मुलायम गुट के झगड़े की वजह से ऐसी परिस्थितियां बन रहीं थीं कि ये चुनाव अब तक बीजेपी के लिए walkover माना जा रहा था । इस झगड़े का सबसे ज्यादा फायदा बीजेपी को मिलता दिखाई दे रहा था । हालांकि चुनाव आयोग के इस फैसले के बाद चुनावी समीकरण पूरी तरह बदलते नज़र आ रहे हैं ।

उत्तर प्रदेश का चुनाव अब त्रिकोणीय ना होकर Bipolar होता नज़र आ रहा है । यही नहीं अगर अखिलेश यादव अगर राहुल गांधी और अजित सिंह के साथ मिलकर मजबूत महागठबंधन बना लेते हैं तो संभावित गठबंधन की भूमिका उत्तर प्रदेश में ठीक वैसी ही होगी जैसी बिहार चुनाव में नीतीश के नेतृत्व में बने महागठबंधन की थी ।
साइकिल का चुनाव निशान अखिलेश यादव को मिलने का समाजवादी पार्टी पर तो असर पड़ा ही है साथ ही साथ इसका सीधा असर भारतीय जनता पार्टी पर भी पड़ने जा रहा है । समाजवादी पार्टी और यादव परिवार के झगड़े से फायदा उठाने की ताक में बैठी बीजेपी को अब पूरी रणनीति पर फिर से विचार करना होगा । माना जा रहा है कि संभावित गठबंधन का एजेंडा caste और Communal मुद्दों से अलग government और development का होगा । संभावित महागठबंधन गरीबी, बेरोज़गारी, भुखमरी, क्षेत्रीय असंतुलन और नोटबंदी से पैदा हुई दुश्वारियों को लेकर जनता के बीच जाएगा ।

राजनैतिक समीकरण के बदलने के साथ ही ये चुनाव अब किसी के लिए cakewalk नहीं रह गया है, बल्कि अब लड़ाई बराबर की है । अब प्रत्याशियों का चयन बेहद खास और महत्वपूर्ण हो गया है, चाहे बीजेपी हो या फिर संभावित महागठबंधन, किसी ने भी प्रत्याशियों के चयन में थोड़ी भी लापरवाही बरती तो इन दलों को इसका सीधा राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए अब सभी दलों के लिए प्रत्याशियों का चयन सबसे बड़ी चुनौती है। अगर प्रत्याशियों के चयन की प्रतिक्रिया में आंतरिक विद्रोह बढ़ा, तो विद्रोही प्रत्याशी उन दलों के political prospects को बुरी तरह प्रभावित करेंगे। 

मंगलवार, 3 जनवरी 2017

2017 का चुनाव परिणाम तय करेगा मोदी अखिलेश का राजनैतिक भविष्य

उत्तर प्रदेश का चुनाव लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों के लिए आग का दरिया है । इस राज्य का चुनाव परिणाम जहां एक तरफ देश की दशा और दिशा तय करेगा वहीं ये मोदी और अखिलेश के लिए भी उनका भविष्य तय करने वाला साबित होगा । देश के सबसे बड़े राज्य के इस चुनाव पर सभी प्रमुख राजनैतिक दलों और नेताओं का भविष्य टिका है । जाति-धर्म और क्षेत्रवाद के भंवरजाल में फंसा उत्तर प्रदेश का मतदाता किसे विजयी बनाएगा ये तो अभी बता पाना मुश्किल है लेकिन मौजूदा राजनैतिक हालात के आधार पर कहा जा सकता है कि इस बार का चुनाव राजनैतिक दृष्टि से बेहद complicated और Challenging रहेगा ।

उत्तर प्रदेश में चुनाव की तारीखों के ऐलान से पहले ही घमासान मचा हुआ है। दंगल में दांव समाजवादी पार्टी के ही दो धड़े लगा रहे हैं,  बाकी दल अखाड़े के इर्द-गिर्द खड़े होकर अपने सियासी नफा-नुकसान के आंकलन में लगे हैं या इस घमासान से ज्यादा से ज्यादा नफा कमाने की कोशिश कर रहे हैं । बाकी दलों की नज़र समाजवादी पार्टी के वोटबैंक पर है जो हो सकता इनके कमजोर होने से बंट जाए । ऐसे में विरोधियों की कोशिश है कि समाजवादी पार्टी के झगड़े में अगर उनका वोटबैंक बंटता है तो उसे अपने पाले में लाया जाए, या फिर पार्टी के किसी एक खेमे के साथ मिलकर सियासत की नई ज़मीन तैयार की जाए, ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या ऐसा होगा ? अगर नहीं हुआ तो क्या वोट बैंक को एकजुट करने के लिए गठबंधन के जरिए कुर्सी हासिल करने की कोशिश की जाएगी, हालांकि दस साल से उत्तर प्रदेश में गठबंधन की सरकार नहीं बनी है ।

उत्तर प्रदेश की सियासत दरअसल unique है ।  जाति-धर्म की सियासत का स्कूल माने-जाने उत्तर प्रदेश में एकजुटता ना तो धर्म और ना ही जाति के नाम पर नज़र आती है । एक ही धर्म या जाति के नाम अलग-अलग नेता हैं जिनका क्षेत्र के हिसाब से प्रभाव दिखता है । अगर मुसलमान की बात करें तो पूरे प्रदेश में कोई एक ऐसा नेता नहीं है जिसके कहने पर इस धर्म को मानने वाले सारे लोग एकजुट होकर उस पर भरोसा दिखा सकें । देवबंद जिसे Nationalist माना जाता था, जो खुलकर कांग्रेस और गांधी परिवार का समर्थक माना जाता था, उसमें ही फूट पड़ चुकी है,  चाचा अरशद मदनी और भतीजे महमूद मदनी के नेतृत्व में बंट चुका ये दो धड़ा अलग-अलग पार्टियों को Support करता है । इनका प्रभाव पश्चिमी यूपी के मुसलमानों पर है लेकिन यही दो नेता नहीं हैं, इनके अलावा जामा मस्जिद के शाही इमाम मौलाना बुखारी भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत में अपना दखल रखते हैं । यानि सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तीन नेताओं का प्रभाव है । वहीं रुहेलखंड इलाके में बरेलवी स्कूल ऑफ थॉट अपना प्रभाव रखता है ।

इसके अलावा प्रदेश के बाकी हिस्सों का भी यही हाल है । पूर्वी उत्तर प्रदेश में आपराधिक छवि के अंसारी बंधु का वर्चस्व है, मुख्तार अंसारी और अफज़ाल अंसारी चाहे कितने भी विवादों में रहें चुनाव में अपना दबदबा दिखाने में कामयाब साबित होते रहे हैं । वहीं इलाहाबाद में अतीक अहमद का प्रभाव दिखता है ।

ये हाल सिर्फ एक धर्म विशेष का नहीं है अगर जाति के आधार पर भी देखें तो पूरे प्रदेश में कई खेमे में हैं जिनका अपने क्षेत्र विशेष पर प्रभाव है । वाराणसी का कुर्मी वर्ग अनुप्रिया पटेल को अपना नेता मानता है तो इलाहाबाद में रामपूजन पटेल का दबदबा है । बाराबंकी और फैज़ाबाद में ये वर्ग बेनी वर्मा को समर्थन देता है । पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित Empowered हैं तो इनका नेता अलग है वहीं East UP खासकर बिहार बॉर्डर के पास रह रहे दलित आज भी काफी गरीब हैं तो उनका नेता अलग है । ऐसे में सवाल ये उठता है कि किसी एक पार्टी के टूटने से उसके समर्थक हों या विरोधी वो क्या एकजुट होकर दूसरी पार्टी पर भरोसा जता पाएंगे । क्या प्रदेश के विपक्षी दल इस हालत में हैं कि वो इस टूट का फायदा उठाने में कामयाब साबित हों ?


तो क्या सियासी हालात महागठबंधन की ओर इशारा कर रहे हैं जहां एक बार फिर बिहार की तर्ज पर चुनाव लड़ा जाएगा, कोशिश होगी कि एक साथ आकर गैर बीजेपी वोटों का बंटवारा होने से रोका जाए ? वहीं बीजेपी की पूरी कोशिश इस Grand Alliance को रोकने की है ताकि वोटर्स के consolidate होने से होने वाले वाले नुकसान को रोका जा सके ?

आखिरकार ये चुनाव अखिलेश यादव और नरेंद्र मोदी के लिए लिटमस टेस्ट है .. दोनों को Anti incumbency factor से लड़ना है, दोनों के पास चुनौतियां हैं । अगर अखिलेश यादव अपने परिवार के घमासान के बीच खुद को विकासपुरुष साबित करने में लगे हैं तो नरेंद्र मोदी की कोशिश प्रदेश की सभी पार्टियों को कमजोर बताकर बीजेपी को एकमात्र विकल्प बताने की है, लेकिन ये राह दोनों के लिए आसान नहीं है ।

समाजवादी पार्टी Infighting से अगर उबर भी जाती है तो confuse हो चुके कैडर की वजह से उनकी राह मुश्किल हो चुकी है तो वहीं बीजेपी 2014 के लहर को खो चुकी है, दूसरा पार्टी को फोकस शिफ्ट हो रहा है । बीजेपी का traditional vote bank जहां Upper cast औैर व्यापारी वर्ग है वहां पार्टी अब OBC Politics की ओर बढ़ रही है । ऐसे में बीजेपी में भी सीट को लेकर Infighting सामने आ सकती है और हो सकता है पार्टी का फोकस OBC की ओर होने से बीजेपी का मौजूदा कैडर और वोटबैंक भी confuse हो जाए ।