गुरुवार, 7 सितंबर 2017

Dress code for mithali raj

Mithali raj से लेकर सानिया मिर्ज़ा के ड्रेस पर सवाल उठाने वाले तालिबानी सोच के समर्थक हैं 
इसी तरह की आलोचना पहले सानिया मिराज के ड्रेस पर होती रही है 
और अब इस मानसिकता की शिकार mithali raj को बनाया  जा रहा है 
ऐसे लोगों को पब्लिक्ली condemn किया जाना चाहिए 
और ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ legal action लेना चाहिए

बुधवार, 6 सितंबर 2017

rss game plan

भाजपा वेस्ट बेंगॉल कर्नाटक और केरल में अपनी राजनीतिक ताक़त मज़बूत करना चाहती है 
यह सबको मालूम है की बग़ैर  r s s भाजपा का अपना कोई वजूद नहीं है 
भाजपा संघ का पलिटिकल आउट्फ़िट है 
और संघ का अजेंडा अब इन राज्यों मे सरकार बनाने का है 
संघ के लाखों ऐक्टिविस्ट पिछले कई सालों से इन राज्यों में कार्य कर रहे हैं 
संघ को लगता है की पहले नोर्थ इंडिया फिर नोर्थ ईस्ट इंडिया केवराज्यों पर क़ब्ज़े के वाद अब इन राज्यों पर क़ब्ज़े का सही वक़्त है 
शायद इसीलिये संघ और भाजपा की तरफ़ से सभी तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं 
परिणाम चाहें जो हो लेकिन आज की तारीख़ में भाजपा संघ अपने विरोधियों के मुक़ाबले मज़बूत दिखायी दे रहें हैं

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

मोदी कैबिनेट expansion

मोदी कैबिनेट का २ September को विस्तार होने वाला है 
२ September को बक़रीद भी है 
Goats and scapegoats की तलाश जारी है 
Goats  की तलाश क़ुर्बानी के लिए और scapegoats की तलाश अपनी सरकार की विफलता छिपाने  के लिए 
आख़िर विफलता के लिए कुछ लोगों की क़ुर्बानी ज़रूरी है 
सुना है कुछ लोगों को identify कर लिया गया है

शनिवार, 26 अगस्त 2017

failure of political executive or lust for vote bank

हरियाणा मे राम रहीम के समर्थकों द्वारा जारी हिंसा एक बार फिर उत्तर प्रदेश में ६ डिसेम्बर १९९२ को अयोध्या में हुयी हिंसा की याद को ताज़ा कर दिया है 
हरियाणा हाई कोर्ट के निर्देशों के ववजूद हरियाणा सरकार रहीम समर्थकों को इकट्ठा होने दिया 
खट्टर सरकार ने ठीक वैसे ही काम किया जिस तरह ६ डिसेम्बर १९९२ को उत्तर प्रदेश की कल्याण सरकार ने किया था 
उस समय भी कोर्ट के आदेशों की अवहेलना की गयी 
और लाखों की तादाद में कारसेवकों को अयोध्या में जुटाने दिया गया 
जिन्होंने बाबरी मस्जिद को ज़मींदोज़ कर दिया
बाद में केंद्र की प व नरसिम्हा राउ सरकार ने उत्तर प्रदेश सहित भाजपा की चार राज्य सरकारों को बर्खास्त कर दिया था 
आज भी हरियाणा और पंजाब सरकारों की मदद के लिए हज़ारों की तादाद सेंट्रल सिक्यरिटी फ़ॉर्सेज़ के जवान मौजूद थे 
लेकिन खट्टर सरकार की तरफ़ से साफ़ संकेत ना मिलने की वजह से दंगाई हिंसा करने में कामयाब रहे और सिक्यरिटी फ़ॉर्सेज़ डिफ़ेन्सिव मुद्रा में

Gurmeet ram Rahim

गुरमीत राम रहीम के वारे में फ़ैसला देने वाले जज पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट और वे  बेटियाँ बधाई के योग्य हैं
उनके हौसले के चलते आज देश में एक वार फिर ऐसे नापाक गठजोर का ख़ुलासा हुआ है 
वैसे पिछले कुछ दिन से पाकिस्तान और इंडिया की जूडिशीएरी ने तमाम ऐतिहासिक जज्मेंट दिया है 
पाकिस्तान में पहले जेनरल मुशारफ़ फिर ज़रदारी और अब नवाज़ शरीफ़ को जाना 
इंडिया में भी जब समाज के तमाम संस्थाएँ अलग अलग कारणों से बोल नहीं रही हैं ऐसी हालातमें जूडिशीएरी के तमाम फ़ैसले इंदीयन डिमॉक्रेसी कॉन्स्टिटूशन सॉसाययटी और वैल्यूज़ को बचाने में कारगर साबित होंगी

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

maya ----Lalu

मायावती ने राज्य सभा से इस्तीफ़ा देकर देश में चल रही ग़ैर भाजपा राजनीति की कोशिस को रफ़्तार दे दी है मायावती के साथ लालू यादव भी हैं 
वैसे तो भारत में लालू और मायावती की छवि दाग़दार नेता की रही है 
बावजूद इसके इन नेताओं का अपना अपना  वोट बैंक है इसी वोट बैंक के चलते दोनों भारतीय राजनीति में relevant बने हुए हैं
बिहार इसके पहले भी भारत की राजनीति को  दिशा देता रहा है 
लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने congress के ख़िलाफ़ संपूर्ण क्रांति का बिगुल पटना के गांधी मैदान में फूँका था 
लालू नीतीश सहित तमाम नेता संपूर्ण क्रांति की ही उपज हैं 
अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आंदोलन भी महात्मा गांधी ने बिहार के चंपारन से शुरू किया था 
आधुनिक भारत में  l k Advani के रथ यात्रा को भी चीफ़ मिनिस्टर के रूप में लालू ने ही रोकी थी 
लेकिन बदले हालात में लालू मायावती सहित सम्पूर्ण विपछ नरेंद्र मोदी के मुक़ाबले अपनी साख खो चुका है 
नरेंद्र मोदी के बेदाग़ छवि सम्पूर्ण विपछ पर भारी  दिखायी दे रही है 
शायद यही कारण है की ३६ का  रिश्ता रखने वाली समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी बिहार में मोदी के ख़िलाफ़ लालू द्वारा आयोजित की जाने वाली रैली में एक साथ सामिल होने वाले हैं
लालू यादव इस political polarisation के ज़रिये नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ भले ही चुनौती पेश ना कर पायें लेकिन नीतीश को तो परेशानी में डाल सकते हैं 
और अखिलेश मायावती को समर्थन देकर बिहार में यादव मुस्लिम और दलित vote bank ko consolidate कर सकते हैं

मंगलवार, 20 जून 2017

church and Roman Empire VS society

कुछ दिन पहले सोचा था की राजनीति पर आने वाले कुछ दिन तक नहीं लिखूँगा 
लेकिन आज फिर मन को रोक नहीं पाया 
आज सुबह ब्रह्म महर्रत से ही इतिहास में वर्णित रोमन एम्पायअर और चर्च की सप्रेमसी याद आ रही है 
चर्च के अत्याचारों से परेशान रोमन सॉसाययटी ने renaissance and religious reformation का आंदोलन चलाया था 
हिंदुस्तान में भी बाद में आंदोलन चला था 
आंदोलन से पहले रोमन एम्पायअर और चर्च की साँठ गाँठ से जनता को धर्म का ओपीयम खिलाकर बेसिक प्राब्लम्ज़ से अटेन्शन डिवर्ट किया जाता था
वाद में रेफ़र्मेशन मूव्मेंट चला और वहाँ की सॉसाययटी ने चर्च और रोमन एम्पायअर के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया था 
परिणाम बदलाव के रूप में देखने को मिला 
आज वक वार फिर पूरी दुनिया में कमोवेश वैसी हालत  बनती  दिखायी दे रही है
ज़्यादातर मुल्कों के हुक्मरान जनता को अन्नेसेसेरी इशूज़ में  उलझा कर सत्ता का सुख भोग रहें हैं 
और बेचारी  जनता एम्प्लॉमेंट हेल्थ रोड पावर वोटर इंटर्नल सिक्यरिटी लॉ एंड ऑर्डर जैसे मसलों पर ध्यान ना देकर अपने पुनर जन्म को ठीक करने में उलझती जा रही है 
ऐसी हालत ना तो किसी सॉसाययटी के लिए अछी है और ना दुनिया के लिए 
इस पर विचार करना चाहिए 
एक तरफ़ हम global village aur universal brotherhood ki  वात करते हैं और दूसरी तरफ़ territorial boundaries and non issues par समय बर्बाद कर रहे हैं

शनिवार, 17 जून 2017

journalist VS news trader

पिछले लगभग तीस साल से जर्नलिज़म के लिए समर्पित हमारी कोशिस रही है की समाज को साँची patrakarita से रूबरू कराया जाय 
जर्नलिज़म में विचारधारा आधारित जर्नलिज़म ज़रूरी है चाहे वह कोई भी विचारधारा क्यों ना हो 
विचारधारा विहीन व्यक्ति अच्छा पत्रकार नहीं हो सकता हाँ वह न्यूज़ ट्रेडर  ज़रूर हो सकता है 
माफ़ करिएगा न्यूज़ ट्रेडर कह कर पत्रकारों को सम्बोधित करने की शुरुआत हमारे देश के एक लीडर ने की है 
मेरा मानना है की जर्नलिज़म जैसे पवित्र व्यवसाय से ज़ुरे हम सभी लोगों की ज़िम्मेदारी गुड जर्नलिस्ट तैयार करने की है 
बेस्ट जर्नलिस्ट तैयार करके हम सही मायने में समाज और देश की सेवा कर सकते हैं 
क्योंकि बेस्ट जर्नलिस्ट अपनी राइटिंग के ज़रिए जनता तक सही जानकारी पहुँचाएगा 
अपने अब्जेक्टिव राइटिंग और रिपोर्टिंग के  माध्यम से समाज को मिस्लेड होने से बचाएगा 
काम सचमुच मुश्किल है लेकिन अपने अनुभव के आधार पर यह कह सकता हूँ की हर वक़्त और दौर में भी मालिकों को कुछ प्रफ़ेशनल जर्नलिस्ट्स की रेक्वायअर्मेंट रहती है जिनकी क्रेडिबिलिटी हो 
जिनकी रिपोर्ट्स पर समाज भरोसा करताहो
इसलिए हम प्रफ़ेशनल जर्नलिस्ट्स को न्यूज़ ट्रेडर के बजाय अपनी पहचान जर्नलिस्ट्स की  ही बनाए रखने की कोशिस जारी रखनी चाहिए

गुरुवार, 15 जून 2017

योगी आदित्यनाथ सरकार के १०० दिन

क्या उत्तर प्रदेश में एकसे अधिक power centre हैं 
पिछली सरकार में तो इस तरह का नज़ारा देखने को मिलता था 
लेकिन इस सरकार में भी वही हालत क्यों है 
लखनऊ से लेकर दिल्ली तक इसकी गूँज सुनाई दे रही है 
योगी सरकार के १०० दिन पूरे होने वाले हैं लेकिन अभी तक सरकारी मशीनरी पूरी तरह सक्रिय नहीं है 
राज्य के ज़्यादातर क़द्दावर मंत्री दिल्ली में बैठे   सीन्यर नेताओं के सम्पर्क में हैं 
संघ परिवार और भाजपा के नेताओं की दखलंदाजी भी चीफ़ मिनिस्टर आदित्य नाथ के रास्ते का पथेर साबित हो रहा है 
इसके अलावा चीफ़ मिनिस्टर आदित्य नाथ की प्रशासनिक अनुभवहीनता उनकी सरकार के प्रति जनता में मायूसी पैदा कर रही है 
आगामी लोकसभा चुनाव के माद्दे नज़र भाजपा हाई कमैंड को उत्तर प्रदेश सरकार के कामकाज को गतिशील बनाने के लिए दबाव बनाना चाहिए

योगी आदित्य नाथ चीफ़ मिनिस्टर उ प

उत्तर प्रदेश के चीफ़ मिनिस्टर की कुर्सी पर बैठते ही वह व्यक्ति ख़ुद को देश के प्रधान मन्त्री बनने का ख़्वाब देखने लगता है 
आज़ादी के वाद बने चीफ़ मिनिस्टर गोविंद बल्लभ पंत तो अपने को पंडित नेहरु से सीन्यर मानते थे।

हेमावती नंदन बहुगुणा से इंदिरा जी की नाराज़गी के पीछे भी चीफ़ मिनिस्टर के रूप में बहुगुणा का  डिवेलप होता पलिटिकल प्रोफ़ायल था।

नारायण दत्त तिवारी मुलायम सिंह यादव मायावती और अखिलेश यादव भी अपने अपने ढंग से ख़ुद को नैशनल लीडर प्रोजेक्ट करने की कोशिस करते रहे हैं 
और अब बारी चीफ़ मिनिस्टर आदित्य नाथ की है।

उन्होंने भी आज बिहार में आयोजित  जनसभा को सम्बोधित करके इसकी शुरुआत कर दी है।

आदित्य नाथ के लिए उत्तर प्रदेश जैसे जटिल राज्य की समस्याएँ राक्षसी सुरसा की तरह मुँह खोले मौजूद हैं।

ऐसी हालत में इन समस्याओं  का समाधान खोजने के बजाय दूसरे राज्यों का दौरा करना राजनीतिक और अड्मिनिस्ट्रेटिव तौर पर कितना मुंसिव होगा यह तो वक़्त बताएगा।

लेकिन ऐसा ना हो की खुदा मिले ना विशाल ए सनम।

आदित्य नाथ ने बिहार की जनसभा में भाजपा को सत्ता में लाने तक बिहार में संघर्ष जारी रखने का ऐलान किया है।

मंगलवार, 7 मार्च 2017

अयोध्या, अदालत और सियासत..

सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश के बाद बाबरी मस्जिद विध्वंस केस का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है और इसके साथ ही भारतीय जनता पार्टी के शीर्षस्थ नेताओं लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के राजनीतिक भविष्य पर भी ग्रहण लग गया है। 6 दिसंबर 1992 से लेकर आजतक बाबरी मस्जिद विध्वंस केस में दर्जनों बार उतार चढ़ाव आया है और इस उतार चढ़ाव का सीधा असर विध्वंस केस की पैरवी कर रही जांच एजेंसी पर भी पड़ता रहा है। केन्द्र में स्थापित सरकारों की राजनीतिक प्रतिबद्धता के मद्देनजर मुकदमे की पैरवी में भी समय-समय पर पैंतरेबाजी होती रही है।
मामले में अंतिम फैसला चाहे जो भी हो लेकिन तात्कालिक तौर पर 6 मार्च 2017 के सुप्रीम कोर्ट के ऑब्ज़र्वेशन का सीधा असर देश में होने वाले अगले राष्ट्रपति चुनाव पर भी पड़ सकता है। अभी तक माना जाता था कि बीजेपी की तरफ से अगले राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी में से किसी एक का नाम आगे किया जा सकता था। लेकिन कानूनी विवाद में फंसने की वजह से इन दोनों शीर्षस्थ नेताओं की संभावित उम्मीदवारी खटाई में पड़ सकती है।
ऐसी स्थिति में मौजूदा लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन राष्ट्रपति पद के लिए बीजेपी की तरफ से अगली उम्मीदवार बनाई जा सकती हैं। दरअसल 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरने के बाद दो एफआईआर दर्ज हुई। एफआईआर नंबर 197/92 कारसेवकों के खिलाफ, जबकि एफआईआर नंबर 198/92 लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और छह अन्य के खिलाफ। 27 फरवरी 1993 को सीबी-सीआईडी ने मामला क्रमांक 198/92 में ललितपुर की विशेष अदालत में आडवाणी और सात अन्य के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया।
25 अगस्त 1993 को ये मामले जांच के लिए सीबी-सीआईडी से सीबीआई को ट्रांसफर किया गया। 8 सितंबर 1993 को लखनऊ में सीबीआई की एक विशेष अदालत गठित की गई। 5 अक्टूबर 1993 को जांच एजेंसी ने सभी 49 आरोपियों के खिलाफ संयुक्त चार्जशीट दाखिल की। 8 अक्टूबर 1993 को लखनऊ की विशेष अदालत में मामला क्रमांक 198/92 में अन्य आरोपियों को शामिल कराने के लिए नई अधिसूचना जारी की गई। इसी अधिसूचना को बाद में हाई कोर्ट ने दोषपूर्ण करार दिया, जिससे आडवाणी और अन्य को बचाव का रास्ता मिल गया।
12 फरवरी 2001 को हाई कोर्ट ने 8 अक्टूबर 1993 की दोषपूर्ण अधिसूचना के आधार पर आडवाणी समेत आठ आरोपियों के खिलाफ अभियोग को वापस लिया। इसी को नज़ीर बनाते हुए 4 मई 2001 को सीबीआई की लखनऊ की विशेष अदालत के न्यायाधीश एस. के. शुक्ला ने कल्याण सिंह समेत 13 और आरोपियों के खिलाफ अभियोग को वापस लिया और इसी समय सीबीआई ने संयुक्त चार्जशीट को दो हिस्सों में बांट दिया। बाद में ये मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा। जहां हाईकोर्ट ने भी 2010 में इन आरोपियों को बरी कर दिया। 
दिलचस्प बात ये है कि जांच एजेंसी की तरफ से इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के उस फैसले को चुनौती देने में देर जानबूझ कर की गई या किसी दबाव में इसका जवाब तो एजेंसी ही देंगी लेकिन अगर जांच एजेंसी की तरफ से सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल होती है तो इन नेताओं की मुश्किल बढ़ सकती है। दूसरी तरफ रायबरेली में मामला चलता रहा। केंद्र में चाहे अटल जी की सरकार रही हो या कांग्रेस की, राज्य में चाहे समाजवादी पार्टी की सरकार रही हो या बहुजन समाज पार्टी की सभी ने हीलाहवाली की और मामले की पैरवी में ढिलाई बरती।
हर बार जांच एजेंसी ने मामले को ढीला किया। जिस आदेश में सेशन जज ने आरोपियों को एक्यूटल दिया था उसके खिलाफ जांच एजेंसी को तभी अपील करनी चाहिए थी। जो तब नहीं किया गया और अब जांच एजेंसी वही काम करने जा रही हैं। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि बाबरी मस्जिद का ये मुद्दा कानूनी कम राजनीतिक ज़्यादा है और इससे जुड़ा हर पक्ष अपनी-अपनी तरह से इसका इस्तेमाल करता रहा है। इससे हमारी संवैधानिक प्रक्रिया भी प्रभावित होती है।

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

जाति संघर्ष से वर्ग संघर्ष तक

बीएमसी समेत महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों में बीजेपी को बड़ी कामयाबी मिली है...10 में से आठ निकाय पर बीजेपी ने कब्जा कर लिया जबकि बीएमसी में शिवसेना को कांटे की टक्कर दी है...नोटबंदी के बाद ये तीसरा निकाय चुनाव है जिसमें बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन किया है... बड़ा सवाल ये है कि नोटबंदी के सहारे पीएम मोदी ने आखिर ऐसा कौन सा दांव चला है कि जहां बीजेपी का ज्यादा आधार भी नहीं था वहां भी बीजेपी मजबूती से उभर रही है..

पहले चंडीगढ़...फिर ओडिशा और अब महाराष्ट्र...इन तीनों राज्यों के स्थानीय चुनावों की दो सबसे बड़ी खासियतें हैं...पहली ये कि यहां चुनाव नोटबंदी के फैसले के बाद हुए और दूसरी ये कि इन सभी जगहों पर बीजेपी को बड़ी बढ़त मिली...चंडीगढ़ नगर निगम हो, ओडिशा के पंचायती निकाय या फिर बीएमसी...बीजेपी नोटबंदी से पहले इन जगहों पर बेहद कमजोर मानी जाती थी लेकिन नोटबंदी के बाद बीजेपी यहां मजबूती के साथ उभरी है... बड़ा सवाल ये है कि नोटबंदी से ऐसा क्या हुआ जो बीजेपी को अचानक इतनी ताकत मिल गई...अचानक ऐसी जगहों पर जहां बीजेपी का कोई आधार नहीं था वहां भी बीजेपी मजबूती से खड़ी हो गई...

दरअसल, पीएम मोदी ने नोटबंदी के सहारे भारतीय समाज को सीधे-सीधे दो वर्गों में बांटने की कोशिश की है....अमीर और गरीब...जो भारतीय समाज अभी तक अपनी पहचान जाति, उपजाति और धर्म से करता है...नोटबंदी के बाद वो अमीर और गरीब के बीच बंटता नजर आने लगा...

नोटबंदी के फैसले के पहले ही दिन से पीएम मोदी बार-बार हर मंच से एक ही बात दोहरा रहे हैं...कि इस फैसले से देश की गरीब जनता को फायदा होगा और ब्लैकमनी वाले परेशान होंगे... 

मोदी की इस मुहिम का सीधा असर धर्मनिरपेक्षता की सियासत करने वाले दलों की रणनीति पर पड़ा है...धर्मनिरपेक्षता की सियासत करने वाले राजनैतिक दलों की कोशिश हमेशा 85 फीसदी हिंदू समाज को जातियों में बांटकर रखने की रही है... लेकिन वक्त-वक्त पर हिंदुओं को एक करने की कोशिशें की गई... महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी ने गणेश उत्सव के नाम पर हिंदू समाज को जोड़ने की कोशिश की थी... तो कुछ ऐसी ही कोशिश बीजेपी ने राम के नाम पर की थी... इन कोशिशों का उद्देश्य समाज में कास्ट सिस्टम को कमजोर कर सभी को एक साथ लाना था...

पीएम मोदी ने इसी मुहिम को नोटबंदी के सहारे आगे बढ़ाया... मोदी राजनीति विज्ञान के छात्र रहे है और बखूबी जानते है कि समाज में जब वर्ग संघर्ष बढ़ेगा तो जातिय संघर्ष खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगा...और जातिय संघर्ष खत्म होगा तो ही हिंदू समाज को एकजुट करने का राष्ट्रीय स्वंय सेवक का सपना भी साकार होगा... इसीलिए नोटबंदी के बाद पीएम मोदी ने हर मंच से अमीर-गरीब की बात की... यानी सीधे-सीधे गरीब के नाम पर वोट बढ़ाने की कोशिशें की... 

कुछ ऐसी ही कोशिश पूर्व प्रधानमंत्री इंडिया गांधी ने भी की थीं...1971 में इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था .. इंदिरा ने कहा था... गरीबी हटाओ, देश बचाओ... जबकि उनके विरोधी उस वक्त नारा दे रहे थे इंदिरा हटाओ देश बचाओ....इसका असर ये हुआ था कि इंदिरा अपनी हर रैली में कहती थीं कि हम देश से गरीबी हटाने की बात कर रहे हैं और विरोधी मुझे हटाने की बात कर रहे हैं... 

तब से लेकर आज तक देश में गरीबी और भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर की राजनीति हो रही है...हालांकि न गरीबी खत्म हुई है और न भ्रष्टाचार...लेकिन इस सब से बेखर आम जनता को नोटबंदी से एक बार फिर उम्मीद जगी है... गरीब अपनी परेशानियां भूल अमीर को परेशान देखकर शकून महसूस कर रहा हैं... लोग मुद्दे भूल गए है...विकास के नारे आज पीछे छूट गए है... 
विकास, भ्रष्टाचार और governance के मुद्दे पर चुनाव जीतकर सत्ता में आए नरेंद्र मोदी अब गरीबी हटाने की बात कर रहे हैं...

यानी सीधे-सीधे गरीबों का सायकोलॉजिकल फायदा उठाने की कोशिश की जा रही है...या सियासी जुबां में कहे तो कमजोर को हक दिलाने के नाम पर वोट बैंक बढ़ाया जा रहा है...

अमेरिका और आतंकवाद

अपने खत्म हो रहे खज़ाने से अंतिम सफर की ओर बढ़ रहे इस्लामिक स्टेट ने दुनिया में अमन चैन चाहने वालों को सुकून की सांसें ज़रूर दे दी हैं लेकिन क्या इस्लामिक स्टेट का खात्मा इस बात की गारंटी देता है कि भविष्य में दहशतगर्दी फैलाने वाले ऐसे ग्रुप पैदा नहीं होंगे ... खासकर तब जब दुनिया में सुपरपावर की पहचान रखने वाला अमेरिका इस्लामिक स्टेट को दुनिया से खत्म करने की बात कर रहा हो ... ये सवाल इसीलिए है क्योंकि परोक्ष रूप से सीरिया के फ्रीडम फाइटर्स को इस्लामिक स्टेट का बैनर देने वाला अमेरिका ही है .. और इस्लामिक स्टेट ही क्यों अलकायदा, ओसामा बिन लादेन और सद्दाम हुसैन इन सब को मजबूती देने वाला अमेरिका ही रहा है ।

मौजूदा वक्त में इस्लामिक स्टेट के खिलाफ लड़ाई अपने अंतिम दौर में है ... इंटरनेशनल सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ रैडिकलाइजेशन एंड पॉलिटिकल वॉयलेंस की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक इस्लामिक स्टेट की इनकम साल 2014 में 1.9 अरब डॉलर से घटकर 2016 में 87 करोड़ डॉलर तक ही रह गई है... तेल, डोनेशन के तौर पर पाने वाली रकम और अपने कब्जे वाले इलाकों में टैक्स के जरिए कमाई करने वाला ISIS अपनी ताकत के साथ साथ कमाई का जरिया भी खोता जा रहा है ... अगस्त 2014 से अब तक  IS,  इराक में सीरिया में इस्लामिक स्टेट अपने काफी इलाकों को खो चुका है। 

अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस्लामिक स्टेट को लेकर अपने इरादे साफ कर चुके  हैं ... लेकिन ये अमेरिका ही है जिसने तेल वाले इलाकों पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लालच में सीरिया के फ्रीडम फाइटर्स को हथियार और ट्रेनिंग दी .... वही फ्रीडम फाइटर्स बाद में आईएसआईएस के बैनर तले लड़ रहे हैं ... सीरियालीबिया और इराक तीनों ही मुल्कों की पहचान उनके तेल के खजाने को लेकर है... लेकिन इन मुल्कों को अपनी ही ज़मीन में मौजूद खजाने का कभी फायदा नहीं मिल सका..और इसी तेल को अपनी मिल्कियत बनाने के लिए अमेरिका ने ISIS को आगे बढ़ाया..अमेरिका के इस नापाक काम में उस वक्त सऊदी अरब और तुर्की ने भी उसकी मदद की... इंसानियत के लिए आर्थिक मदद के नाम पर अमेरिका ने इन आतंकवादियों का पेट भरा.. उस वक्त इंटरनेशनल फोरम ने भी अमेरिका की धौंस के सामने चुप्पी साधे रखी ...लेकिन अमेरिका की ये चाल भी अल-कायदा की तरह उलटी पड गई...कभी सीरिया में पनपने वाले इस्लामिक स्टेट के आतंक की आंच में अब पूरी दुनिया जल रही है...और तेल के खजानों पर कब्जे के लिए शुरू की गई ये नापाक लड़ाई अब ग्लोबल टेररिज्म बनकर पुरी दुनिया को अपनी चपेट में ले चुकी है...

इतना ही नहीं दुनिया को 1980 का वो दशक भी याद है जब ईरान के खिलाफ इस्तेमाल के लिए केमिकल हथियार देकर अमेरिका ने सद्दाम को सद्दाम हुसैन बनाया... इसका अंजाम क्या हुआ ये भी दुनिया को याद है ... इसी तरह अमेरिका के ही हाथों अल कायदा और ओसामा बिन लादेन का जन्म हुआ ... बाद में अमेरिका को इनके खिलाफ अमेरिका को अपनी पूरी ताकत लगानी पड़ रही है ... अमेरिका ने हाल ही में सत्ता परिवर्तन देखा है ... डोनाल्ड ट्रंप ने ना सिर्फ ISIS बल्कि ऐसे किसी भी Radical terrorist group को खत्म करने की बात कही है बल्कि इनकी फंडिंग के खात्मे के लिए इंटरनेशनल लेवल पर काम करने की बात भी कर रहे हैं ... लेकिन क्या ऐसा होगा ...


आतंकवाद के इतिहास पर नज़र डाले तो दुनिया के जिन मुल्कों ने आतंकवाद को बढ़ावा दिया उन्होंने बाद में उसकी कीमत चुकाई है, फिर वह देश चाहे भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, रूस या अमेरिका कोई भी हो... इसलिए ज़रूरत है कि आतंकवाद के खिलाफ ज़मीनी और जातिय सीमाओं से बाहर आकर निपटा जाए और पूरी ईमानदारी के साथ निपटा जाए... आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई महायुद्ध तक जारी रखी जाए, जब तक ये पूरी तरह से खत्म न हो जाए, क्योंकि सही मायने में आतंकवाद पूरी मानवता के खिलाफ है..

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

किसका होगा उत्तर प्रदेश?

2017 के विधानसभा चुनाव को 2019 का सेमीफाइनल समझा जा रहा है। साथ ही ये दो सरकारों मोदी और अखिलेश सरकार के कामकाज का रेफरेंडम भी माना जा रहा है। चुनावों का परिणाम दो सरकारों के कामकाज का मूल्यांकन करेगा। इससे ये भी पता चलेगा कि सत्ता विरोधी लहर का असर अखिलेश या मोदी सरकार किसके खिलाफ ज्यादा रहा।
इन चुनावों का परिणाम देश की दो प्रमुख राजनैतिक पार्टियों के युवा नेतृत्व की स्वीकार्यता पर भी मोहर लगाएगा। अगर पौराणिक कथाओं के लिहाज से इन चुनाव की तस्वीरों का मूल्यांकन करें तो कहा जा सकता है, इन चुनावों के परिणाम महाभारत की कथाओं को एक बार फिर सजीव कर देते है। भारतीय राजनीति में अपनी सक्रियता के दौर में शायद यह पहला मौका है जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में चुनाव प्रचार से बाहर है।
ये भी पहली बार हो रहा है कि बगैर विधिवत कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने राहुल गांधी ने चुनावी गठबंधन का फैसला किया और पूरी कांग्रेस पार्टी राहुल के इस फैसले के साथ खड़ी नजर आ रही है। वो राहुल गांधी जो यूपी में पूरे 4 साल अखिलेश सरकार के खिलाफ अभियान चला रहे थे, वही राहुल गांधी अखिलेश के सम्मान में कसीदे पढ़ रहे हैं। कांग्रेस और अखिलेश सरकार के बीच के चुनावी गठबंधन से एक बात लगभग तय हो चुकी है कि राहुल गांधी और पार्टी आलाकमान मोदी से मुकाबला करने में खुद को असहाय मान चुके हैं। शायद यही कारण है कि राजनैतिक तौर पर 36 का रिश्ता रखने वाले नेताओं से भी समझौता करने में कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी को अब कोई ऐतराज नहीं है।
कांग्रेस के इतिहास में ये पहली बार नही हो रहा, इससे पहले भी दक्षिण भारत के राज्यों में कांग्रेस पार्टी क्षेत्रीय दलों से समझौता करके चुनाव लड़ती रही है और केंद्र में अपनी सरकार चलाती रही है। वो कांग्रेस पार्टी जो अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनाए गए एनडीए के पहले तक देश में गठबंधन पॉलिटिक्स की सबसे बड़ी विरोधी रही, वह कांग्रेस पार्टी जो एक दौर में अम्बरैला पॉलिटिक्स के चलते देश के राजनैतिक क्षितिज पर शहंशाह के रुप में काबिज रही। वहीं कांग्रेस पार्टी आज बदले राजनैतिक हालात में गठबंधन पॉलिटिक्स की सबसे बड़ी पैरोकार बनकर खड़ी है। इसका ये मतलब नहीं कि कांग्रेस पार्टी के मूल चरित्र में कोई बदलाव आ गया है, बल्कि इसका मतलब नरेंद्र मोदी सरीखे सशक्त राजनैतिक प्रतिद्वंदी से मुकाबला करना है।
दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी सरीखे कुशल और परिपक्व नेतृत्व के मुकाबले समाजवादी पार्टी का वह युवा नेतृत्व है जो लगभग पूरे साढ़े 4 साल तक यूपी की सरकार चलाते हुए महाभारत के अभिमन्यु की तरह अपने द्वारा बनाए गए चक्रव्यूह में उलझा रहा और अपने कन्विक्शन और डिटरमिनेशन के दम पर चक्रव्यूह भेदने के साथ ही नरेंद्र मोदी से दो-दो हाथ करने के लिए मैदान में है। इन चुनाव में मायावती की मौजूदगी और यूपी में अपने जनाधार को बचाए रखने की जद्दोजहद नरेंद्र मोदी, राहुल, अखिलेश को कड़ी चुनौती दे रही है।
बीजेपी के पास नरेंद्र मोदी के अलावा ऐसा कोई भी विश्वसनीय चेहरा नही है। जिसको प्रोजेक्ट करके वह यूपी और उत्तराखंड में चुनावी समर में कामयाबी हासिल करे। विश्वसनीय चेहरे के अभाव में बीजेपी को यूपी और उत्तराखंड में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इन राज्यों के चुनाव परिणाम चाहे जो भी लेकिन एक बात तय है, कि 2019 के आम लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को राहुल, अखिलेश, हरीश रावत, नीतीश कुमार, अरविंद केजरीवाल, हार्दिक पटेल, कैप्टन अमरिंदर सिंह सरीखे नेताओं से जूझना पड़ेगा। साथ ही मौजूदा हालात को देखते हुए ये कहना मुनासिब होगा कि बीजेपी को 2019 के आम चुनाव जीतने से पहले इन विधानसभा चुनावों में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिए। सही मायने में इन राज्यों के चुनाव परिणाम 2019 के आम चुनाव के सेमीफाइनल के तौर पर देखे जा रहे हैं।

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

महापुरुषों पर सवाल क्यों ?

दुनिया में एक अजीब सा trend शुरू हो चुका है, जो ना सिर्फ आने वाली पीढी पर असर डाल रहा है, बल्कि हमारे इतिहास में शामिल लोगों के अस्तित्व पर भी सवाल उठा रहा है । दुनिया के जो भी फ्रीडम फाइटर्स हैं, चाहे वो भारत के महात्मा गांधी हों या फिर सोवियत यूनियन के जोसेफ स्टालिन, सभी के अस्तित्व पर, उनके फैसलों पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं ... इस फेहरिस्त में चीन के जनक माओ ज़ेदोंग भी शामिल हैं....आज लोग इनके फैसले और मानसिकता पर सवाल उठा रहे हैं ... लेकिन क्या ये ज़रूरी नहीं कि इनके फैसलों पर राय बनाने से पहले उस दौर के हालात को भी समझने की कोशिश की जाए ... क्यों ना ये समझने की कोशिश की जाए कि क्यों इनकी प्रतिमाएं लगाई गईं, इनके नाम से दिवस मनाए गए और क्यों इन धुरंधरों को इतिहास में ये दर्जा दिया गया । दरअसल इन तमाम कवायदों का एकमात्र मकसद आज की और आगे आने वाली पीढियों तक इन शख्सियतों की विचारधारा को पहुंचाना है, दुनिया को उनके योगदान से रूबरू कराना है...
इंसान के व्यक्तित्व में उसकी जड़ें काफी अहमियत रखती हैं, उसका इतिहास और अनुभव ही मिलकर उसका आने वाला भविष्य तय करता है... इतिहास के अनुभव आपके भविष्य के फैसलों को संवार सकते हैं ... ऐसे में ऐसी शख्सियतों के योगदान पर सवाल उठाना इतिहास से बेइमानी करने जैसा है .. दुनियाभर के फासिस्ट की सोच मिली-जुली सी ही है, माओ को मानने वाले जोसेफ स्टालिन का विरोध कर सकते हैं... अंबेडकर को जो मानते हैं, वो गांधी पर सवाल उठा सकते हैं, लेकिन सोच पर सवाल उठाने से समस्या का समाधान मिलना मुश्किल है ... आप व्यवस्था को तो हटा सकते हैं लेकिन विकल्प क्या है ? सवाल उठाना आसान होता है लेकिन समाधान देना नहीं, और इन्हीं सवालों की वजह से आजतक मिडिल ईस्ट आग में झुलस रहा है...

जो democratic सोच रखते हैं, co-existence में विश्वास रखते है, वो विकल्प की तलाश करते हैं ... सवाल सम्राट अशोक और अकबर पर भी उठ चुके हैं, जो तलवार के बूते देश नहीं बल्कि अपने बूते दिल जीतने का माद्दा रखते थे... ऐसे में सिर्फ सवाल उठाना कहां तक लाजिमी है ।


दरअसल इतिहास की गवाही ही लक्ष्य तक पहुंचने की कुंजी बन सकती है, अगर इतिहास से सबक नहीं लिया गया तो लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो जाएगा... चाहे वो एक इंसान का व्यक्तित्व हो या फिर देश का भविष्य 

मोदी बनाम महागठबंधन !

समाजवादी पार्टी का चुनाव निशान साइकिल अखिलेश यादव गुट को मिलने के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का पूरा स्वरूप ही बदलता दिख रहा है। समाजवादी पार्टी में अखिलेश और मुलायम गुट के झगड़े की वजह से ऐसी परिस्थितियां बन रहीं थीं कि ये चुनाव अब तक बीजेपी के लिए walkover माना जा रहा था । इस झगड़े का सबसे ज्यादा फायदा बीजेपी को मिलता दिखाई दे रहा था । हालांकि चुनाव आयोग के इस फैसले के बाद चुनावी समीकरण पूरी तरह बदलते नज़र आ रहे हैं ।

उत्तर प्रदेश का चुनाव अब त्रिकोणीय ना होकर Bipolar होता नज़र आ रहा है । यही नहीं अगर अखिलेश यादव अगर राहुल गांधी और अजित सिंह के साथ मिलकर मजबूत महागठबंधन बना लेते हैं तो संभावित गठबंधन की भूमिका उत्तर प्रदेश में ठीक वैसी ही होगी जैसी बिहार चुनाव में नीतीश के नेतृत्व में बने महागठबंधन की थी ।
साइकिल का चुनाव निशान अखिलेश यादव को मिलने का समाजवादी पार्टी पर तो असर पड़ा ही है साथ ही साथ इसका सीधा असर भारतीय जनता पार्टी पर भी पड़ने जा रहा है । समाजवादी पार्टी और यादव परिवार के झगड़े से फायदा उठाने की ताक में बैठी बीजेपी को अब पूरी रणनीति पर फिर से विचार करना होगा । माना जा रहा है कि संभावित गठबंधन का एजेंडा caste और Communal मुद्दों से अलग government और development का होगा । संभावित महागठबंधन गरीबी, बेरोज़गारी, भुखमरी, क्षेत्रीय असंतुलन और नोटबंदी से पैदा हुई दुश्वारियों को लेकर जनता के बीच जाएगा ।

राजनैतिक समीकरण के बदलने के साथ ही ये चुनाव अब किसी के लिए cakewalk नहीं रह गया है, बल्कि अब लड़ाई बराबर की है । अब प्रत्याशियों का चयन बेहद खास और महत्वपूर्ण हो गया है, चाहे बीजेपी हो या फिर संभावित महागठबंधन, किसी ने भी प्रत्याशियों के चयन में थोड़ी भी लापरवाही बरती तो इन दलों को इसका सीधा राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए अब सभी दलों के लिए प्रत्याशियों का चयन सबसे बड़ी चुनौती है। अगर प्रत्याशियों के चयन की प्रतिक्रिया में आंतरिक विद्रोह बढ़ा, तो विद्रोही प्रत्याशी उन दलों के political prospects को बुरी तरह प्रभावित करेंगे। 

मंगलवार, 3 जनवरी 2017

2017 का चुनाव परिणाम तय करेगा मोदी अखिलेश का राजनैतिक भविष्य

उत्तर प्रदेश का चुनाव लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों के लिए आग का दरिया है । इस राज्य का चुनाव परिणाम जहां एक तरफ देश की दशा और दिशा तय करेगा वहीं ये मोदी और अखिलेश के लिए भी उनका भविष्य तय करने वाला साबित होगा । देश के सबसे बड़े राज्य के इस चुनाव पर सभी प्रमुख राजनैतिक दलों और नेताओं का भविष्य टिका है । जाति-धर्म और क्षेत्रवाद के भंवरजाल में फंसा उत्तर प्रदेश का मतदाता किसे विजयी बनाएगा ये तो अभी बता पाना मुश्किल है लेकिन मौजूदा राजनैतिक हालात के आधार पर कहा जा सकता है कि इस बार का चुनाव राजनैतिक दृष्टि से बेहद complicated और Challenging रहेगा ।

उत्तर प्रदेश में चुनाव की तारीखों के ऐलान से पहले ही घमासान मचा हुआ है। दंगल में दांव समाजवादी पार्टी के ही दो धड़े लगा रहे हैं,  बाकी दल अखाड़े के इर्द-गिर्द खड़े होकर अपने सियासी नफा-नुकसान के आंकलन में लगे हैं या इस घमासान से ज्यादा से ज्यादा नफा कमाने की कोशिश कर रहे हैं । बाकी दलों की नज़र समाजवादी पार्टी के वोटबैंक पर है जो हो सकता इनके कमजोर होने से बंट जाए । ऐसे में विरोधियों की कोशिश है कि समाजवादी पार्टी के झगड़े में अगर उनका वोटबैंक बंटता है तो उसे अपने पाले में लाया जाए, या फिर पार्टी के किसी एक खेमे के साथ मिलकर सियासत की नई ज़मीन तैयार की जाए, ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या ऐसा होगा ? अगर नहीं हुआ तो क्या वोट बैंक को एकजुट करने के लिए गठबंधन के जरिए कुर्सी हासिल करने की कोशिश की जाएगी, हालांकि दस साल से उत्तर प्रदेश में गठबंधन की सरकार नहीं बनी है ।

उत्तर प्रदेश की सियासत दरअसल unique है ।  जाति-धर्म की सियासत का स्कूल माने-जाने उत्तर प्रदेश में एकजुटता ना तो धर्म और ना ही जाति के नाम पर नज़र आती है । एक ही धर्म या जाति के नाम अलग-अलग नेता हैं जिनका क्षेत्र के हिसाब से प्रभाव दिखता है । अगर मुसलमान की बात करें तो पूरे प्रदेश में कोई एक ऐसा नेता नहीं है जिसके कहने पर इस धर्म को मानने वाले सारे लोग एकजुट होकर उस पर भरोसा दिखा सकें । देवबंद जिसे Nationalist माना जाता था, जो खुलकर कांग्रेस और गांधी परिवार का समर्थक माना जाता था, उसमें ही फूट पड़ चुकी है,  चाचा अरशद मदनी और भतीजे महमूद मदनी के नेतृत्व में बंट चुका ये दो धड़ा अलग-अलग पार्टियों को Support करता है । इनका प्रभाव पश्चिमी यूपी के मुसलमानों पर है लेकिन यही दो नेता नहीं हैं, इनके अलावा जामा मस्जिद के शाही इमाम मौलाना बुखारी भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत में अपना दखल रखते हैं । यानि सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तीन नेताओं का प्रभाव है । वहीं रुहेलखंड इलाके में बरेलवी स्कूल ऑफ थॉट अपना प्रभाव रखता है ।

इसके अलावा प्रदेश के बाकी हिस्सों का भी यही हाल है । पूर्वी उत्तर प्रदेश में आपराधिक छवि के अंसारी बंधु का वर्चस्व है, मुख्तार अंसारी और अफज़ाल अंसारी चाहे कितने भी विवादों में रहें चुनाव में अपना दबदबा दिखाने में कामयाब साबित होते रहे हैं । वहीं इलाहाबाद में अतीक अहमद का प्रभाव दिखता है ।

ये हाल सिर्फ एक धर्म विशेष का नहीं है अगर जाति के आधार पर भी देखें तो पूरे प्रदेश में कई खेमे में हैं जिनका अपने क्षेत्र विशेष पर प्रभाव है । वाराणसी का कुर्मी वर्ग अनुप्रिया पटेल को अपना नेता मानता है तो इलाहाबाद में रामपूजन पटेल का दबदबा है । बाराबंकी और फैज़ाबाद में ये वर्ग बेनी वर्मा को समर्थन देता है । पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित Empowered हैं तो इनका नेता अलग है वहीं East UP खासकर बिहार बॉर्डर के पास रह रहे दलित आज भी काफी गरीब हैं तो उनका नेता अलग है । ऐसे में सवाल ये उठता है कि किसी एक पार्टी के टूटने से उसके समर्थक हों या विरोधी वो क्या एकजुट होकर दूसरी पार्टी पर भरोसा जता पाएंगे । क्या प्रदेश के विपक्षी दल इस हालत में हैं कि वो इस टूट का फायदा उठाने में कामयाब साबित हों ?


तो क्या सियासी हालात महागठबंधन की ओर इशारा कर रहे हैं जहां एक बार फिर बिहार की तर्ज पर चुनाव लड़ा जाएगा, कोशिश होगी कि एक साथ आकर गैर बीजेपी वोटों का बंटवारा होने से रोका जाए ? वहीं बीजेपी की पूरी कोशिश इस Grand Alliance को रोकने की है ताकि वोटर्स के consolidate होने से होने वाले वाले नुकसान को रोका जा सके ?

आखिरकार ये चुनाव अखिलेश यादव और नरेंद्र मोदी के लिए लिटमस टेस्ट है .. दोनों को Anti incumbency factor से लड़ना है, दोनों के पास चुनौतियां हैं । अगर अखिलेश यादव अपने परिवार के घमासान के बीच खुद को विकासपुरुष साबित करने में लगे हैं तो नरेंद्र मोदी की कोशिश प्रदेश की सभी पार्टियों को कमजोर बताकर बीजेपी को एकमात्र विकल्प बताने की है, लेकिन ये राह दोनों के लिए आसान नहीं है ।

समाजवादी पार्टी Infighting से अगर उबर भी जाती है तो confuse हो चुके कैडर की वजह से उनकी राह मुश्किल हो चुकी है तो वहीं बीजेपी 2014 के लहर को खो चुकी है, दूसरा पार्टी को फोकस शिफ्ट हो रहा है । बीजेपी का traditional vote bank जहां Upper cast औैर व्यापारी वर्ग है वहां पार्टी अब OBC Politics की ओर बढ़ रही है । ऐसे में बीजेपी में भी सीट को लेकर Infighting सामने आ सकती है और हो सकता है पार्टी का फोकस OBC की ओर होने से बीजेपी का मौजूदा कैडर और वोटबैंक भी confuse हो जाए ।