सोमवार, 26 दिसंबर 2016

अखिलेश का आगाज़, सपा में 'कामराज'

समाजवादी पार्टी के घरेलु संग्राम में शिवपाल सिंह यादव और अखिलेश यादव के बीच मोर्चा खुल गया है, उत्तर प्रदेश के मौजूदा सियासी हालात ऐसे हैं कि टिकट बंटवारे के मसले पर परिवार और पार्टी में बंटवारे के हालात बनते जा रहे हैं । राजनीति होती ही ऐसी है जहां  व्यक्तिगत Political Future और Agenda रिश्तों और भावनात्मक जुड़ाव पर हावी हो जाता है, और इन सबके बीच लगता है कांग्रेस अपने उस रिवाइवल प्लान पर काम कर रही है जैसा वो पहले करती आई है ।

जहां तक अखिलेश यादव और उनके विरोध से पैदा हो रहे हालात की बात है तो समाजवादी पार्टी ऐसी पहली पार्टी नहीं है जो इस मुश्किल से गुज़र रही हो, भारतीय राजनीति के इतिहास के पन्नों पर नज़र डालें तो इससे पहले भी ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जब पार्टी के अंदर ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ बगावत हुई हो और पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के खिलाफ पार्टी में ही बने दूसरे ग्रुप ने अपना उम्मीदवार खड़ा कर उसे जिता दिया हो । अगर सीधे बात करें तो इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति चुनाव में पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतारा और उन्हें समर्थन दिलाने में कामयाबी भी हासिल की, इसके कुछ समय बाद कांग्रेस में विभाजन हो गया था और पूरी पार्टी पर इंदिरा गांधी ने कब्जा कर लिया । शायद अखिलेश यादव भी इसी राह पर चल रहे हैं ।

कांग्रेस पार्टी की ये खासियत रही है कि वो अपने रिवाइवल के लिए या अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने के लिए मौका मिलने पर धुर विरोधियों से भी हाथ मिला सकती है, या अपने विरोधी को मात देने के लिए किसी को भी समर्थन दे सकती है । 1977 में लगी इमरजेंसी के बाद कांग्रेस की हालत ये थी कि खुद इंदिरा गांधी अपनी सीट नहीं बचा पाई । कुछ समय तक शांत रहकर कांग्रेस ने तत्कालीन सियासी हालात में खुद को दोबारा स्थापित करने की कोशिश शुरू कर दी थी । देश में जनता पार्टी की सरकार थी जिसमें चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में मतभेद शुरू हो गए थे । इंदिरा गांधी ने इस मतभेद को बढ़ावा देना शुरू किया था । बाद में कांग्रेस की मदद से चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बनने में कामयाब हो गए लेकिन कांग्रेस ने कुछ ही महीनों में अपना समर्थन वापस ले लिया और चौधरी चरण सिंह की सरकार गिर गई । इस Political disturbance की वजह से इंदिरा गांधी की पार्टी Congress (I) को स्थापित होने का मौका मिला और 1980 में हुए आम चुनावों में कामयाबी भी हासिल हुई ।

कांग्रेस को एक बार फिर हार का स्वाद तब चखना पड़ा था जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे ... कांग्रेस से हटकर वी पी सिंह ने पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी.. वी पी सिंह ने कई छोटी पार्टियों को मिलाकर जनता दल बनाया, बाद में इनकी सरकार बनी और वी पी सिंह प्रधानमंत्री बन गए । कांग्रेस सत्ता से बाहर होकर जनता दल के अंदरूनी हालात पर नज़र रख रही थी ।  इसीलिए जब जनता दल का अंदरूनी कलह सतह पर आने लगा तो वी पी सिंह के शुरू से ही विरोधी रहे चंद्रशेखर को राजीव गांधी ने बाहर से समर्थन दे दिया । चंद्रशेखर अपने समर्थकों को लेकर जनता दल से अलग हो गए और कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री भी बन गए ।  हालांकि ये गठबंधन ज्यादा दिन तक नहीं चला, कुछ ही महीनों में राजीव गांधी ने समर्थन वापस ले लिया और चंद्रशेखऱ की सरकार गिर गई । ये परंपरा सोनिया गांधी और राहुल गांधी के वक्त में भी जारी रही ... जब सोनिया गांधी ने पार्टी को मजबूत करने के लिए उन लोगों का समर्थन लेने से भी परहेज़ नहीं किया जिन पर राजीव गांधी की हत्या की साजिश करने वालों में शामिल होने के आरोप लगते रहे थे ... तो राहुल गांधी UPA 2 की सरकार के दौरान विरोधी पार्टी बीजेपी के साथ सरकार चला रहे नीतीश कुमार की तारीफ करने से कभी नहीं चूके और बाद में नीतीश कुमार के बीजेपी से अलग होने पर जेडीयू के समर्थन में आ गए ।

उत्तर प्रदेश के मौजूदा सियासी हालात को देखकर ये कहा जा सकता है कि अखिलेश यादव भारतीय राजनीति की इन घटनाओं से काफी प्रभावित हैं,  उनके लिए शायद ये पार्टी पर कब्जा करने, अपनी साफ और बेदाग छवि के आधार पर पार्टी पर एकाधिकार बनाए रखने का उपयुक्त मौका है ।  बीते दिनों अखिलेश ने पार्टी आलाकमान के खिलाफ जाकर कई बार पर अपनी अलग Identity, अलग image बनाने की कोशिश की है, अपने फैसलों को पार्टी और सरकार पर थोपना चाहा है।  पिछले कुछ दिनों से  जिस तरह की घटनाएं देखने को मिल रही हैं और जिस तरह की खतो-किताबत का दौर एक बार फिर शुरू हो गया है, उससे लगता है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव पार्टी के अंदर ही एक प्रेशर ग्रुप बनाकर पार्टी आलाकमान को या तो मजबूर करेंगे कि उनके नेतृत्व को, उनकी कार्यशैली को पार्टी में accept किया जाए और अगर पार्टी आलाकममान या पार्टी का रैंक एंड फाइल उनकी इस कार्यशैली के खिलाफ है तो उसके विरुद्ध अखिलेश अपने प्रेशर ग्रुप के जरिए parallel संगठन खड़ा करने की कोशिश करेंगे और इस चुनाव में अपने चहेते लोगों को टिकट देकर चुनाव लड़ाएंगे ।

अब जब एक बार फिर ये लग रहा है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी दो फाड़ होने की कगार पर है तो कांग्रेस अपनी पुरानी सियासी चाल चलने को बेताब है । बीते कुछ महीनों में हुए development में यादव परिवार के झगड़े से कमजोर पड़ी समाजवादी पार्टी में  युवा वर्ग और कुछ वरिष्ठ नेता अखिलेश यादव के साथ हैं तो समाजवादी पार्टी के ज्यादातर veteran शिवपाल सिंह यादव के साथ नज़र आ रहे हैं । ऐसे में लग रहा है कि अखिलेश यादव इंदिरा गांधी के नक्शेकदम पर चलना चाहते हैं ... और कांग्रेस पार्टी परिवार से अलग हो रहे अखिलेश के इस डगमगाते हुए सियासी कदम में उनका सहारा बनने को तैयार है । 

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

Demonetization से हट जाएगी गरीबी ?

इंडिया में दूसरी बार गरीबों का नाम लेकर वोट बैंक बढाने की कोशिश हो रही है ... पहली बार 1971 में इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था .. इंदिरा ने कहा,  गरीबी हटाओ देश बचाओ,  जबकि उनके विरोधी उस वक्त नारा दे रहे थे इंदिरा हटाओ देश बचाओ । इसका असर ये था कि इंदिरा अपनी हर रैली में अपने विरोधियों पर अपनी हर जनसभा में कहती थीं कि हम देश से गरीबी हटाने की बात कर रहे हैं तो वहीं विरोधी मुझे हटाने की बात कर रहे हैं । तब से लेकर आज तक देश की राजनीति गरीबी और भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर होती रही है ।

भ्रष्टाचार, विकास और governance के मुद्दे पर चुनाव जीतकर सत्ता में आए नरेंद्र मोदी भी सरकार में ढाई साल पूरे होने के बाद गरीबी हटाने की ही बात कर रहे हैं, और उनका मानना है कि गरीबों की दशा और दिशा बदलने के लिए नोटबंदी सबसे कारगर फैसला है और demonetization की कामयाबी के साथ ही देश से गरीबी समाप्त हो जाएगी ।

पहले तीन दिन, फिर 50 दिन और अब अनिश्चितकाल की मांग करने वाले नरेंद्र मोदी गरीबी मिटाने में कितना
कारगर साबित होंगे इसका आंकलन तो आने वाला समय करेगा, फिलहाल demonetization के बाद सामने आए आंकड़ों पर नज़र डालें तो देश में कैश के रूप में ब्लैक मनी रखने वालों की संख्या महज 6 फीसदी ही सामने आई है ।

अब सवाल ये उठता है कि क्या Demonetization अमीर और गरीब के बीच की बढ़ती खाई को पाटने में कारगर साबित होगा ? क्या Demonetization सही मायनों में गांधी, दीनदयाल और डॉ लोहिया द्वारा पारिभाषित अर्थव्यवस्था स्थापित करने में सहयोगी होगा ? क्या Demonetization देश में ग्राम स्वराज (Village Republic) और Integral Humanism के जीवन दर्शन को साकार कर पाएगा ?

ये सवाल इसलिए क्योंकि 2015 के युनाइटेड नेशंस के आंकड़ों के मुताबिक भारत की लगभग 1 अरब 20 करोड़ की आबादी में से करीब 24 फीसदी आबादी गरीब है ...  वर्ल्ड वेल्थ रिपोर्ट के मुताबिक भारत की 1 फीसदी सुपर रिच आबादी के पास देश के total wealth का लगभग 59 फीसदी हिस्सा है, यानि बाकी के 99 फीसदी लोग बाकी बचे चालीस फीसदी वेल्थ पर निर्भर करते हैं । भारत में भले ही 1991 के Economic liberalization के बाद गरीबों का प्रतिशत घटा है लेकिन ये भी सच है कि अमीरों के गरीबों के बीच का फासला लगातार बढ़ता जा रहा है । इसी साल आए India Human Development Survey (IHDS) की रिपोर्ट के मुताबिक आम भारतीय नागरिक गरीब है, सुपर रिच और रिच के बाद जो वेल्थ गरीबों के खाते में बचता है वो देश के total wealth का सिर्फ चार फीसदी है । Credit Suisse data के मुताबिक साल 2000 में भारत के सुपर रिच के पास total wealth का महज 36 फीसदी ही था जो 2016 में 59 फीसदी हो चुका है ।

नोटबंदी को लेकर ज्यादातर economists ने भी शंका ज़ाहिर की है नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने Demonetization को Despotic action यानि तानाशाही या स्वच्छंद कार्रवाई करार दिया है तो Black Economy in India के लेखक प्रोफेसर अरुण कुमार ने भी ये साफ कर दिया है कि Demonetization देश से ब्लैक मनी का खात्मा करने में कामयाब नहीं होगा और हो सकता है कि देश की अर्थव्यवस्था पर इससे बुरा असर पड़े । अरुण कुमार ने साफ किया है कि ब्लैक मनी पर रोक लगाने के लिए ब्लैक इनकम को रोकना जरूरी है । अरुण कुमार मानते हैं कि नोटबंदी black wealth generation को रोकने में कामयाब नहीं होगा ।

वहीं जेएनयू के प्रोफेसर रहे अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक का कहना है कि नोटबंदी ने एक तरफ अगर शॉर्ट टर्म के लिए जनता को परेशान किया है तो लॉन्ग टर्म में अर्थव्यवस्था के लिए भी नुकसानदेह है .. प्रभात पटनायक की दलील है कि demonetization के बाद बैंक में लगभग नब्बे फीसदी scrapped notes का वापस आ जाना ये साबित करता है कि नोटबंदी का ये कदम ब्लैक मनी को खत्म नहीं कर रहा...

हालांकि  Demonetization को कई लोग सही भी करार दे रहे हैं इसमें reserve bank of India के पूर्व गवर्नर सी रंगराजन और डी सुब्बाराव भी शामिल हैं । डी सुब्बाराव कहते हैं कि नोटबंदी से अर्थव्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ेगी जो कारोबारी सहूलियत को बढा देगा तो वहीं इससे कई हज़ार रुपए के बाहर आ जाने से भारत की उत्पादन क्षमता बढ़ेगी । पूर्व गवर्नर सी रंगराजन मोदी सरकार के Demonetization के फैसले को black money के खिलाफ एक कामयाब कदम बता चुके हैं । वहीं ICICI बैंक की एमडी चंदा कोचर भी Demonetization को game-changer बता चुकी हैं और मानती हैं कि इससे महंगाई कम करने में मदद मिलेगी तो एक्सिस बैंक की एमडी शिखा शर्मा ने इसे सरकार का bold move करार दिया है जो ब्लैक मनी और terror funding के खिलाफ एक कारगर कदम साबित हो सकता है ।

तमाम दलीलों के बीच सवाल यही उठता है कि क्या demonetization गरीबों के लिए फायदेमंद है ? क्या सचमुच इससे black money खत्म हो जाएगी,  गरीबी खत्म हो जाएगी, terrorists को Fund मिलना बंद हो जाएगा ? इसका जवाब शायद आने वाले दिनों में मिल पाए ।