मंगलवार, 29 नवंबर 2016

रैली है बहाना, मोदी हैं निशाना

नोटबंदी के खिलाफ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की लखनऊ में रैली किसी को भी हैरान कर सकती है ... सवाल सियासी मायनों का है .. आखिर ममता बनर्जी ने प्रदर्शन के लिए लखनऊ को क्यों चुना ये विरोध तो पश्चिम बंगाल में भी रहकर जताया जा सकता था या फिर दिल्ली में ...  लेकिन ये सियासत है जहां हवा का रुख पहचान कर दांव खेले जाते हैं ..

लखनऊ की रैली के बहाने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच नजदीकियां देखी जा रही हैं ...मसला नोटबंदी का है, ममता बनर्जी शुरु से ही इसका मुखर विरोध करती रही हैं ... अखिलेश यादव भी इस पर सवाल उठा चुके हैं ..... इसीलिए अखिलेश यादव ममता बनर्जी को मेहमान और सीनियर बताकर उनसे मिलने पहुंच गए तो वहीं ममता ने लखनऊ आने का मकसद मौजूदा हालात का विरोध करना बताया है ... हालांकि इन सभी घटनाक्रमों के सियासी मायने हैं ... सवाल ये उठता है कि क्या नोटबंदी के बहाने ममता और अखिलेश अपना कोई सियासी मकसद पूरा करना चाहते हैं... उत्तर प्रदेश में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस की युनिट सक्रिय नहीं है ऐेसे में ग्राउंड लेवल पर बिना किसी सपोर्ट के इतनी बड़ी रैली कर पाना क्या मुमकिन है .. इससे भी बड़ा सवाल ये कि बिना किसी सियासी मकसद के कोई भी राजनीतिक पार्टी ऐसी रैली करेगी ही क्यों .... ऐसे में साफ है कि इस रैली के सियासी मायने भी हैं और इसमें समाजवादी पार्टी को भी अपना फायदा नज़र आ रहा है .. नहीं तो अखिलेश यादव ममता बनर्जी का खुले दिल से स्वागत करते ही क्यों .. और तृणमूल कांग्रेस की रैली के आयोजन को सफल बनाने  के लिए समाजवादी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता क्यों दिन-रात एक करते ... असल में अखिलेश को उत्तर प्रदेश में तो ममता को बंगाल में बीजेपी और खासतौर पर प्रधानमंत्री मोदी से कड़ी चुनौती मिल रही है...  

 पश्चिम बंगाल में बीजेपी लगातार मज़बूत हो रही है , बंगाल में हाल के उपचुनाव में बीजेपी दूसरे नंबर पर रही, ये परिणाम तृणमूल कांग्रेस के लिए एक चेतावनी हैं ...दूसरे ममता बनर्जी खुद को राष्ट्रीय स्तर का नेता प्रोजेक्ट करना चाहती हैं इसीलिए मसला चाहे नोटबंदी का हो कोशिश मोदी की सियासी धार कुंद करने की है...  कमोबेश यही हाल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का भी है .. प्रदेश में अखिलेश यादव को सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी से मिल रही है और मौजूदा हालात में बीजेपी की सबसे बड़ी सियासी ताकत खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं ...

हालांकि समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के बीच पहले भी नजदीकियां देखी गईं हैं लेकिन उस वक्त इनका ब्रेकअप होने में भी ज्यादा वक्त नहीं लगा था .. मसला ज्यादा पुराना नहीं है ... मौका था 2012 में हुए राष्ट्रपति चुनाव का, जब तृणमूल कांग्रेस प्रणब मुखर्जी को वोट देने के पक्ष में नहीं थी ... मुलायम सिंह यादव कई दिनों तक ममता बनर्जी के इस फैसले का समर्थन करते रहे थे लेकिन ऐन वक्त पर मुलायम ने अपना पाला बदल लिया ... जिसके बाद दोनों पार्टियों के रिश्तों में खटास आ गई थी ... हालांकि
इस बात को अब एक अरसा गुज़र चुका है और देश के सियासी हालात भी बदल गए हैं ... तो एक बार फिर नोटबंदी के बहाने अखिलेश यादव और ममता बनर्जी नई सियासी जुगलबंदी में जुटे हैं ... 

सोमवार, 21 नवंबर 2016

मार्क्स, गांधी और मोदी के सपनों का भारत

समाज में समानता का सपना तो देश-दुनिया के कई चिंतकों ने देखा....साम्यवाद के जन्मदाता कार्ल मार्क्स से लेकर एकात्म मानववाद का दर्शन देने वाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय तक ने समाज में गैर बराबरी और HAVES AND HAVE NOTS के बीच की खाई को पाटने की बात कही... लेकिन हकीकत के धरातल पर इस सपने को उतारा नरेंद्र मोदी ने...

महात्मा गांधी और समाजवाद के पुरोधा डॉक्टर राममनोहर लोहिया भी गैर बराबरी मिटाने के पक्षधर थे...लेकिन जिस साहस से नरेंद्र मोदी ने कदम उठाया, उतना साहस शायद ही इतिहास में किसी महान नेता या चिंतक ने दिखाया हो... ये दावा नरेंद्र मोदी के समर्थकों का है... मोदी समर्थकों का मानना है कि Demonetization की वजह से जहां एक तरफ काले धन पर लगाम लगेगी तो वहीं दूसरी तरफ आर्थिक विषमता और आर्थिक गैर बराबरी का खात्मा होगा....खुद पीएम मोदी भी कमोबेश ऐसा ही दावा कर रहे हैं...

Demonetization के फैसले के साथ खड़े लोगों का मानना है कि ये फैसला समाज के आधार में मूलचूल परिवर्तन लाने वाला साबित होगा... धनकुबेरों की तिजोरियां खाली होंगी... तो गरीब और किसान के हाथ में पूंजी आएगी....समाज में संसाधनों का समान बंटवारा होगा....यही मार्क्स का साम्यवादी समाज है...

मार्क्स ने अपनी थ्योरी में कहा था कि इस दुनिया में दो तरह के लोग है...एक वो जिनके पास है, दूसरे वो जिनके पास नहीं है... यानी 'HAVES & HAVE-NOTS' ... HAVES को मार्क्स ने पूंजीपति कहा और HAVE-NOTS को श्रमिक वर्ग बताया... समाज में धन-दौलत के इसी असमान बंटवारे को मार्क्स ने बताया... मोदी अब इसी असमान बंटवारे को खत्म कर रहे हैं ...

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भी कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति की बात की.... मोदी समर्थकों का दावा है कि Demonetization से सबसे ज्यादा ये कतार में खड़ा समाज का अंतिम व्यक्ति ही मजबूत होगा...समाज में गैरबराबरी मिटेगी....और अमीर और गरीब के बीच की खाई पट जाएगी ....

लोहिया समाजवादी थे... राजनीतिक अधिकारों के पक्षधर रहे डॉ. लोहिया ऐसी समाजवादी व्यवस्था चाहते थे जिसमें सभी की बराबर की हिस्सेदारी रहे...  वह कहते थे कि सार्वजनिक धन समेत किसी भी प्रकार की संपत्ति प्रत्येक नागरिक के लिए होनी चाहिए ... लोहिया की सारी चिंता मानव विकास की यात्रा में बढ़ती असमानता थी... वे मानते थे कि उसी असमानता से गुलामी और दमन का रास्ता साफ होता है और बाद में उसी से युद्ध की स्थितियां बनती हैं... लेकिन, उनकी खासियत यह थी कि विकास की इन स्थितियों की व्याख्या वे पूंजीवाद और साम्यवाद के प्रभावों से मुक्त होकर करना चाहते थे...

उदारीकरण के बाद भारत में समाज के बीच आर्थिक और सामाजिक असमानता की खाई और चौड़ी हुई... अगर ये असमानता सिर्फ मेहनत और नियमों के भीतर युक्ति के आधार पर होती तो सामाजिक असमानता कुछ हद तक संयत रहती.... लेकिन ऐसा हुआ नहीं....नियम-कायदों से अलग देश की अर्थव्यवस्था में भयंकर उथल-पुथल मची....आए दिन नये नये घोटाले ना सिर्फ सामने आना शुरु हुए... बल्कि विकास के नाम पर होने वाले हर काम में एक ऐसी समानान्तर अर्थव्यवस्था खड़ी हो गयी...जिसमें सरकारी खजाना कागजों में समृद्ध हुआ... लेकिन आम जनता को उसका लाभ अत्यंत सीमित रुप में मिला... अब उम्मीद है कि नोटबंदी का फैसला इस सीमित लाभ को व्यापक तौर पर इस आम आदमी तक पहुंचाएगा...

दूसरी तरफ महात्मा गांधी ने अपने सपनों के भारत में जिस दृष्टि की कल्पना की थी
उसमें व्या‍पकता थी....ग्रामीण विकास की तरफ महात्मा गांधी की दृष्टि हमेशा सजग रही ... ग्रामीण विकास के लिए जिन बुनियादी चीजों को वे जरूरी समझते थे, उनमें ग्राम स्वराज, पंचायतराज, ग्रामोद्योग, महिलाओं की शिक्षा, गांवों की सफाई, गांवों का आरोग्य और समग्र ग्राम विकास प्रमुख हैं...गांधी चाहते थे कि भारत का अगर सही मायनों में विकास होना है तो सरकारें पंचायतों को मजबूत करें....कुटीर उद्योगों....स्थानीय बाजार को विकसित करें....और लोगों को स्वावलंबी बनाने के लिए प्रेरित करें..और अब एतिहासिक नोटबंदी के बाद कोशिश है कि ये सारी संस्थाए एक साथ मजबूत होकर देश की मजबूती बढ़ाएंगी..

गांधी और लोहिया के नाम पर राजनीति देश और प्रदेश के स्तर पर खूब चमकी ... लेकिन साथ-साथ गांधी और लोहिया के सपनों का भारत उनके विचारों से उतना ही दूर होता गया....

मौजूदा सरकार ने ऐसे कई कामों का दावा किया जो गांव के लोगों को तरक्की के रास्ते पर ले जाने वाले हैं... लेकिन शायद इन कामों से असल लक्ष्य तक पहुंचने में कुछ संदेह रह गया और इसीलिए नोटबंदी के फैसले पर अमल किया गया... अब उम्मीद है कि इस बड़े फैसले के बाद भारत देश में सैंकड़ों सालों बाद अब सबसे बड़े बदलाव आ जाएंगे.. 30 दिसंबर के बाद जब नोटबदली की मियाद पूरी हो जाएगी....तो मौजूदा सरकार लोहिया और गांधी के सपनों का भारत बना पाएगी....

गुरुवार, 10 नवंबर 2016

डोनाल्ड ट्रंप कैसे बन गए राष्ट्रपति ..

लगभग एक साल से अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव को लेकर चल रही सरगर्मी डोनाल्ड ट्रंप के 270 के आंकड़े को छूते ही खत्म हो गई …. जनता ने साफ कर दिया कि डेमोक्रैटिक पार्टी को लगातार तीसरी बार सत्ता देने के पक्ष में नहीं हैं । तो क्या हिलेरी क्लिंटन को ओबामा की असफल नीतियों का खामियाज़ा भुगतना पड़ा ।

अमेरिका के चुनावी कैंपेन के दौरान कई बार ट्रंप पर लग रहे आरोपों और उनकी बयानबाज़ी की वजह से ऐसा लगा कि हिलेरी की दावेदारी मजबूत होती जा रही है । हिलेरी अगर राष्ट्रपति बनतीं तो इतिहास रच डालतीं । हिलेरी ना सिर्फ अमेरिका जैसे सुपरपावर की पहली महिला राष्ट्रपति कहलातीं बल्कि लगातार तीसरी बार डेमोक्रैटिक पार्टी के हाथों में अमेरिका की कमान जाने का इतिहास भी बनता .. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो पाया …

बेरोज़गारी और आर्थिक मंदी से जूझ रही अमेरिका की अवाम को डेमोक्रेटिक पार्टी से अपने सपने पूरे होने की उम्मीद नहीं दिखी … 8 साल पहले बेरोज़गारी और आर्थिक मंदी को दूर करने के वायदे की बदौलत ही बराक ओबामा ने अमेरिका के करोड़ों वोटर्स के भरोसे को जीता था लेकिन इन दोनों ही मसलों को सुलझाने में ब्राकक ओबामा फेल रहे । अपने 8 साल के कार्यकाल के दौरान ओबामा ना तो ज़रूरत के हिसाब से रोज़गार पैदा करने में कामयाब हुए बल्कि आर्थिक मंदी भी कम नहीं हुई …इतना ही नहीं एक तरफ ओबामा के राष्ट्रपति रहते हुए अमेरिका में आतंकी गतिविधियां बढ़ने के आरोप लगे तो दूसरी तरफ फंड की कमी से अमेरिका की मिलिट्री पॉवर के कमजोर होने की बातें भी सामने आईं ।

ऐसा नहीं था कि ओबामा की विदेश नीतियां कामयाब हुई हों … इस दिशा में उठाए गए ओबामा के कई बड़े कदमों से अमेरिका कमजोर होता नज़र आया … फिर चाहे वो Russia Reset के जरिए रिश्ते सुधारने की कवायद हो या फिर ईरान और नॉर्थ कोरिया का अमेरिका की चेतावनी को नज़रअंदाज़ करते हुए अपने मिलिट्री पॉवर को बढ़ाना हो … कुल मिलाकर ओबामा के कार्यकाल में अमेरिका अपने सुपरपावर होने के status को खोता नज़र आया … अपनी नीतियों को लेकर ओबामा सरकार 8 साल में अपनी छाप छोड़ने में नाकामयाब रही … इन वजहों से Anti incumbency factor डेमोक्रेटिक पार्टी के खिलाफ चला गया …

वैसे भी आज़ाद अमेरिका के 240 साल के इतिहास में आज तक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बन पाई है … शायद ये देश महिला के हाथों में कमान सौंपने से डरता है । इस बार पूरे कैंम्पेन के दौरान ऐसा लगा कि अमेरिकी अवाम हिलेरी को ही कमान देगी और हिलेरी क्लिंटन इतिहास रचने में कामयाब हो जाएंगी.. वजह साफ थी क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप का कोई political background नहीं था औऱ कई बार कभी महिलाओं तो कभी minorities को लेकर अपने बयानों से डोनाल्ड ट्रंप unpopular होते जा रहे थे .. बावजूद इसके अमेरिका ने हिलेरी को नहीं चुना .. ऐसा लगता है जैसे अमेरिका अभी भी महिला को राष्ट्रपति के पद पर देखने के लिए तैयार नहीं है …
हालांकि कुछ चीजें ऐसी थीं जो हिलेरी क्लिंटन के खिलाफ गईं .. इसमें सबसे बड़ा मसला उनकी Email से जुड़े विवाद का था … मसलन हिलेरी के हज़ारों Email की पूरी controversy पर आनन-फानन में की गई FBI की जांच और हिलेरी को मिले क्लीन चिट का मसला backfire कर गया तो वहीं विकीलीक्स के बार-बार उठाए जा रहे सवालों ने हिलेरी को हमेशा शक के घेरे में बनाए रखा ...

हिलेरी को फॉरेन एजेंसीज़ का भी पूरी तरह सपोर्ट नहीं मिला .. जिस तरह ओबामा और हिलेरी की टीम ने Anti Putin Campaign चलाया था वैसे ही रूस Anti Clinton Campaign चलाता रहा... Clinton Foundation और चंदे का मामला भी हिलेरी क्लिंटन के खिलाफ जाता नज़र आया ...कैम्पेन के दौरान अमेरिका की पहली महिला राष्ट्रपति के तौर पर अपनी सशक्त उम्मीदवारी पेश करती हिलेरी खुद को Women of America बताती रहीं लेकिन लोग उनसे जुड़ी controversies को देखते हुए उन्हें Face of American women के तौर पर स्वीकार ही नहीं कर पाए …