गुरुवार, 20 अक्तूबर 2016

चक्रव्यूह में नेता जी !

अपने अपने अजनबी...वैसे तो ये बड़े साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय की एक किताब का नाम है लेकिन फिलहाल ये टाइटिल यूपी के सबसे बड़े सियासी परिवार पर सटीक बैठ रहा है...
रोटी , दाल ,कच्चा प्याज़ और नींबू खाकर समाजवादी पार्टी बनाने वाले नेता जी मुलायम सिंह यादव अपने लम्बे राजनैतिक जीवन के  सबसे कठिन दौर से गुज़र रहे हैं... राजनैतिक समर में लंबे समय तक अपने विरोधियों को शिकस्त देने वाले नेता जी आज खुद को पारिवारिक कलह रुपी चक्रव्यूह में घिरा महसूस कर  रहे हैं,  ऐसा लगता है कि महाभारत के सूत्रधार अंतिमभेरी की आवाज़ सुनने के लिए घात लगाए  बैठे हैं...
पत्रकारिता में आने के बाद से मेरा और नेताजी मुलायम सिंह यादव का रिश्ता लगभग 30-32 साल पुराना है..पत्रकारीय सरोकारों के साथ साथ इस रिश्ते की बुनियाद  वैचारिक और भावनात्मक आधार पर रखी गई थी... सबसे खास बात ये रही है कि हम दोनों के बीच इस बेहद खास रिश्ते में किसी भी तरह का वाणिज्यिक आधार नहीं था...
बीते 32 सालों के सफर के दौरान हजारों बार ऐसे मौके आए जब मेरे व्यवसायिक दायित्वों के निर्वहन के कारण नेताजी से वैचारिक और व्यवसायिक टकराव भी हुए..नेताजी की पार्टी और उनकी सरकारों के खिलाफ अलग अलग वक्त में हजारों बार लिखना और बोलना पड़ा था..बावजूद इसके नेताजी और हमारे बीच कभी भी किसी स्तर पर कोई खटास नहीं पैदा हुई... 
रिश्तों में दूरियों की कोई वजह नहीं बनी..परस्पर विश्वास और भरोसे में जरा भी कमी नहीं आई..
मैं उन गिने-चुने लोगों में हूं जो  समाजवादी पार्टी के गठन के वक्त से समाजवादी पार्टी की अब तक की यात्रा का भी चश्मदीद है... लेकिन जो दौर आज इस पार्टी और इस परिवार को देखना पड़ा रहा है..ऐसा इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ..
ऐसा पहली बार हुआ है कि कुछ बाहरी लोगों की साजिश और परिवार के कुछ अति महत्वाकांक्षी लोगों के कारण आज नेताजी की निजी जिंदगी से जुड़ी बातों को भी सार्वजनिक किया जा रहा है..
इस सच को स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है कि समाज के करोड़ो पिछड़े वांछित, प्रताड़ित लोगों को उनका हक और हुकूक दिलाने के मकसद से नेताजी ने शायद अपने पारिवारिक दायित्वों का सही ढंग से निर्वहन नहीं किया जितना कि एक सामान्य गृहस्थ जीवन में रहने वाला व्यक्ति करता है... लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं था कि उन्होने अपनी तरफ से अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने में किसी तरह की कसर रखी... अपने परिवार के सभी सदस्य जिनमें अखिलेश यादव भी शामिल हैं, उनकी सुख-सुविधा और भविष्य निर्माण में नेताजी ने ना दिन देखा और ना रात... बल्कि ये कहा जाए तो गलत ना होगा कि उन्होने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया... अपने तमाम राजनीतिक विरोधियों की तीखी आलोचना की परवाह किए बगैर नेताजी ने अपने परिवार के सभी लोगों को उनके कद से भी आगे के पदों पर भी बिठाने में कोई कोताही नहीं की...
कुछ कम जानकार लोगों की ओर से आजकल नेताजी पर ये आरोप लगाए जा रहे हैं कि नेताजी अखिलेश के प्रति सौतेला व्यवहार कर रहे हैं... अखिलेश के लिए नेताजी के लगाव का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है... कि 2012 के विधानसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद बिना किसी की परवाह किए उन्होंने अखिलेश यादव की मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी की थी...
उस दौर में कुछ लोगों ने नेताजी को महाभारत की कथा वाले धृतराष्ट्र कहकर भी संबोधित किया था..और आज वही लोग अखिलेश के लिए नेताजी पर पक्षपात करने के आरोप लगा रहे हैं... साफ है कि जिन लोगों को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने धृतराष्ट्र की पदवी धारण कर ली ... आज उन्हीं लोगों के लिए वो खुद सवालों के घेरे में हैं...
नेताजी का अखिलेश के लिए लगाव का आलम ये था कि वो अपने बिज़ी से बिज़ी शेड्यूल में भी अखिलेश से मिलने के लिए वक्त जरूर निकाल लिया करते थे... नेता जी मुलायम सिंह और अखिलेश के बीच हुईं ऐसी कई अंतरंग मुलाक़ातों का मैं खुद साक्षी रहा  हूं...
मैं, नेता जी के राजनीतिक सफर के दौरान २-२ हफ्ते तक लगातार दौरे किया करता था इसलिए मैंने  नेता जी को करीब से देखा है और समझा है... ये वो दिन था जब पहले अंबेसेडर और फिर कन्टेसा  गाड़ी में पीछे की सीट पर सोते  हुए नेता जी सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा  किया करते थे ..ढाबे में खाना खाना और ज़्यादा से ज़्यादा कार्यकर्ताओं से मिलना और दिन रात मेहनत करके पार्टी को खड़ा करना, उसे आगे बढ़ाना नेता जी के जीवन का मक़सद हुआ करता था...
लेकिन जब पार्टी अपनी स्थापना के 25 साल मनाने जा रही है तो ऐसे वक्त में परिवार के ही कुछ लोग नेता जी की नीयत और उनकी कार्यशैली पर सवाल उठा रहे  हैं...  और इन सवालों को देखकर लगता है कि कि जैसे नेताजी के कठिन परिश्रम, त्याग और समर्पण को नकारा जा रहा है...
ये कहना पूरी तरह से गलत नहीं होगा कि अपनी लंबी राजनीतिक यात्रा में नेताजी ने समय-समय पर कुछ ऐसे लोगों की भी मदद ली थी जो समाज की नज़रों में विवादास्पद और दाग़ी रहे हैं... लेकिन इसके पीछे भी नेताजी की एक सोची-समझी सोच थी... वो सोच जो एक बड़ी राजनीतिक ताकत खड़ी करके उन करोड़ों पिछड़े, कमजोर और दलित वर्गों के लोगों को न्याय दिलाना था और इसी मकसद के लिए उन्होंने अपनी निजी जिंदगी तक कुर्बान कर दी थी..
इस वक्त नेताजी को उनके परिवार के सभी सदस्यों के सहयोग की जरूरत है..और ठीक ऐसे ही वक्त में परिवार के कुछ सदस्यों की ओर से नेताजी को गलत ठहराने की कोशिश ना तो  पारिवारिक मर्यादा के लिहाज से मुनासिब है और ना ही राजनीतिक दृष्टि से...
नेता जी आज भी समाजवादी पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष हैं और एक अध्यक्ष के नाते उनको पार्टी के संचालन और पदाधिकारियों के दायित्व परिवर्तन का पूरा अधिकार है...चुनाव के इस मौके पर समाजवादी परिवार के सभी लोगो का कर्तव्य एकजुट रहकर नेता जी के उन सपनो को साकार करने की कोशिश करनी चाहिए... ऐसा करके ही नेता जी के प्रति सच्चा आदर  और कृतज्ञता ज़ाहिर की जा सकती है... 

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