गुरुवार, 6 अक्तूबर 2016

सेना की उपलब्धियों पर सियासत क्यों …

देश में इन दिनों सर्जिकल स्ट्राइक पर बयानों की बाढ़ सी आई हुई है… नेता इस बात पर चर्चा करने में मशगूल हैं कि भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक किया या नहीं … तो कुछ नेता सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाने वाले नेताओं को देशद्रोही बताने में लगे हैं और आपत्तिजनक टिप्पणियां की जा रही है …चिंता की बात ये है कि इन सबके बीच राजनीति अपने निचले स्तर पर पहुंच गई है और सेना की तरफ से बीच बीच में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सैनिक कार्रवाई की जानकारी दी जा रही है … ऐसा नहीं है कि भारत की तरफ से पहली बार सर्जिकल स्ट्राइक हुआ हो … उरी हमले की प्रतिक्रिया में हुए सर्जिकल स्ट्राइक के बाद कई पूर्व सैन्य अधिकारी ऐसा कह चुके हैं कि पहले भी सर्जिकल स्ट्राइक होते रहे है .. यही सच है ..लेकिन ऐसा पहली बार हो रहा है कि इस पर देश के तमाम बयानवीर नेता अपने बयानों से सुर्खियां बनाने में लगे हैं ... मंत्री जी के जयकारे हो रहे हैं और जगह-जगह उन्हें सम्मानित किया जा रहा है ... यहां तक कि सोशल मीडिया पर भी ऐसे पोस्ट्स की बाढ़ है...

सवाल उठता है कि ऐसा करने की जरूरत ही क्यों है … अगर पहले इस तरह के ऑपरेशन को सार्वजनिक मंच से उजागर नहीं किया गया तो अब ऐसा क्यों किया जा रहा है… क्या देश की रक्षा और सुरक्षा को बीच में लाकर सियासत करना किसी और लक्ष्य को पाने की कवायद है … और अगर ऐसा है तो किस कीमत पर .. क्या सेना को सियासत में घसीटने के बाद हम उन्हीं देशों की कतार में शामिल नहीं हो रहे जहां सेना और सियासत अलग-अलग नहीं है ... ऐसा करने के बाद भारत और पाकिस्तान में क्या फर्क रह जाएगा …

सर्जिकल स्ट्राइक के बाद ऐसा नहीं है कि सिर्फ सत्तारूढ़ पार्टी के नेता ही नाक ऊंची कर घूम रहे हों .. विपक्ष इनके दावों पर सवाल उठाने के साथ-साथ अपने कार्यकाल में भी सर्जिकल स्ट्राइक करने के दावे कर रहा है … अब सवाल ये कि विपक्ष को अपने कार्यकाल के सीक्रेट ऑपरेशन को अचानक पब्लिक करने की बेचैनी क्यों हो रही है … होड़ ऐसी है कि जैसे आने वाले विधानसभा चुनावों में सर्जिकल स्ट्राइक का मुद्दा जनता के बीच distinction दिलाने की गारंटी हो …

पड़ोसी देश से रिश्तों की तल्खी बयानवीरों को परेशान करे ना करे ….बॉर्डर के पास रहने वाले नागरिकों पर बुरा असर डालती है … बीते दिनों में उनकी परेशानी सुर्खियां बनी हैं .. लेकिन किसी का ध्यान इस तरफ जा ही नहीं रहा … सब बस इसी कोशिश में लगे हैं कि किसी तरह इस मसले का राजनैतिक फायदा उठाया जाए … .अपने व्यक्तिगत राजनैतिक स्वार्थ साध लिए जाएं .. ठीक वैसे ही जैसा करगिल युद्ध के दौरान हुआ था … सब जानते हैं कि भारतीय सैनिकों के पूरी तरह से सक्षम होने के बावजूद पाकिस्तानी सैनिकों ने भारत की ज़मीन से अपना कब्जा अमेरिका की दखल के बाद छोड़ा था... भारतीय सैनिकों ने उन्हें खदेड़ा हो ऐसा कुछ नहीं हुआ फिर भी आज तक भारत इसे शौर्य दिवस के रूप में मनाता है ... उस वक्त भी इस मसले पर राजनीति पूरे शबाब पर थी सत्ता पर आसीन लोग खुद अपनी पीठ थपथपाने में लगे हुए थे ... ना तो इसका जिक्र हुआ कि हमने अपने कितने सैनिकों को खो दिया ना ही इसका कि हमें कितना नुकसान उठाना पड़ा ... कुछ समय तक शहीदों के परिवारों को मदद की बातों का दावा किया जाता रहा …. बाद में उनकी बदहाली पर कोई सुध लेने नहीं पहुंचा .. सत्ता पक्ष हो या विपक्ष दोनों ही इस संवेदनशील मुद्दे पर भी राजनीति करते रहे खुद को बेहतर और दूसरे को कमतर बताते रहे ..

सैन्य कार्रवाई का राजनैतिक फायदा उठाने की एक कोशिश Bangladesh liberation war के बाद भी हुई थी …सत्तारूढ़ दल ने युद्ध में मिली कामयाबी का इस्तेमाल अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए किया था …. अगर मिलिट्री कामयाबी के राजनीतिकरण की ये कोशिश तब गलत थी तो अब भी गलत है .. ये बात सियासतदानों को समझनी होगी कि पाकिस्तान अपने अस्तित्व से लेकर अब तक political instability की problem से जूझ रहा है उसकी एक बहुत बड़ी वजह है कि वहां आर्मी के जरिए सियासत करने की परंपरा रही है …. इसीलिए भारत में ऐसी कोई भी कोशिश नहीं होनी चाहिए ..और चुनावों में जाते वक्त अपने अपने सरकारों की उपलब्धियों को लेकर चुनाव में जाना चाहिए ना कि सेना की उपलब्धियों को ..

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