सोमवार, 24 अक्तूबर 2016

सियासत, सबक और परिवार

राजनीति में संयम, धैर्य टाइमिंग और सही वक्त पर फैसले ही सबसे बड़ी काबिलियत होती है और एसपी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव अपने पूरे पॉलिटिकल करियर में देश के टॉप पॉलिटिशियन्स में शुमार होते हैं..अपने सटीक फैसलों से मुलायम सिंह पहले भी कई बार ये साबित कर चुके हैं कि जल्दबाजी में लिए फैसले अक्सर गलत साबित होते हैं और सियासत में आपको पीछे ले जा सकते हैं..

परिवारवाद के चश्मे से मुलायम सिंह की पॉलिटिक्स को देखने वाले तमिलनाडु और पंजाब की सियासत से निकले संदेशों की अनदेखी कर रहे हैं... तमिलनाडु में करुणानिधि और पंजाब का बादल परिवार..आज भी अपने बुजुर्गों के मार्गदर्शन और लीडरशिप में ही चल रहे हैं..

तमिलनाडु में डीएमके प्रमुख करुणानिधि 92 साल की उम्र में दक्षिण भारत  की सियासत की एक अहम धूरी है... बड़ा परिवार है..3 पत्नियां और उनके बच्चे और सब साथ-साथ हैं..बावजूद इसके करुणानिधि ने अभी तक कुर्सी नहीं छोड़ी है..किसी ने भी उनसे अब तक उत्तराधिकारी के बारे में नहीं पूछा..स्टालिन को भी उन्होंने अपना पद नहीं सौंपा और जब भी तमिलनाडु में अम्मा के जवाब में किसी नेता की बात आती है तो सबसे पहला और आखिरी जिक्र करुणानिधि का ही होता है..दिल्ली में राज करने वाले राष्ट्रीय दलों का वहां पर कोई नामलेवा तक नहीं है ... यही वजह है कि करुणानिधि आज भी तमिलनाडु की राजनीति में प्रासंगिक बने हुए हैं...जबकि करुणानिधि के बच्चे भी अखिलेश  यादव की उम्र से काफी बड़े हैं...

परिवार और सियासत का दूसरा बड़ा सबक हमें पंजाब से भी देखने को मिलता है... पिछले विधानसभा चुनाव में पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल पर दबाव था कि अपने जीते जी पार्टी की कमान अपने उत्तराधिरकारी को सौंप दें... लेकिन प्रकाश सिंह बादल ने ऐसा नहीं किया..और इसका नतीजा ये है कि पंजाब की राजनीति में उलटफेर करते हुए प्रकाश सिंह बादल दोबारा पंजाब में सरकार चला रहे हैं औऱ साथ ही परिवार के सदस्यों को आने वाली जिम्मेदारियों के लिए तैयार भी कर रहे हैं..पिछले विधानसभा चुनावों में उनके ही परिवार के कुछ लोगों ने उन पर आरोप लगाया कि वो पुत्रमोह में पार्टी का बंटाधार कर रहे हैं..लेकिन बादल अड़े रहे..किसी को मनमर्जी नहीं करने दी और इसका नतीजा हुआ कि प्रकाश सिंह बादल ने पंजाब में फिर से सरकार बनाई..

साफ है कि सियासत में परिवार का सदस्य होने के साथ-साथ maturity  और discipline भी देखा जाता है...  इसीलिए सियासत के जानकारों का मानना है कि यूपी के सीएम अखिलेश यादव को तमिलनाडु और पंजाब की First Families से सबक लेना चाहिए... तमिलनाडु की सियासत में ए राजा को लेकर हुआ सियासी हड़कंप गायत्री प्रसाद प्रजापति और अमर सिंह एपिसोड से भी बड़ा था... फिर भी वहां परिवार पर कोई आंच नहीं आई... 
ऐसे वक्त में गांधी जी का वो famous quote याद आता है, पाप से घृणा करो..पापी से नहीं 

आचार्य विनोभा भावे ने अपना पूरा जीवन दुर्जनों को सज्जन बनाने में लगा दिया... चंबल में कई डकैतों का आत्मसमर्पण कराया... जाहिर है गांधी, विनोबा भावे, लोहिया जी जैसे लोगों ने सार्वजनिक जीवन में रहते हुए भी एक मिसाल कायम की है...

ये ऐसे लोग हैं जो समय-समय पर असामाजिक दागी लोगों  को अपने राजनीतिक जीवन में जोड़े रखते थे... लेकिन उनके अपने जीवन में ऐसे लोगों का कुछ प्रभाव नहीं पड़ता था... बल्कि ऐसे महान लोगों की संगत में रहकर ये लोग कुछ बेहतर इंसान भी बन जाते हैं... 

अब अगर एसपी प्रमुख मुलायम सिंह यादव इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं  तो इसमे गलत क्या है... जिस समय बहमई नरसंहार की नायिका फूलन देवी को मुलायम सिंह ने समाजवादी पार्टी में शामिल किया था तो कहा गया कि अब समाजवादी पार्टी को ठाकुरों का वोट कभी नहीं मिलेगा ... लेकिन ऐसा नही हुआ, ठाकुर आज भी एसपी और मुलायम के साथ हैं... मुलायम ने एक सियासी रिस्क लिया और सही भी साबित किया... 

साफ है कि अगर आज कुछ लोग कुछ अपरिहार्य कारणों से मुलायम के साथ हैं तो परिवार के बाकी लोगों को मुलायम की स्थिति समझनी चाहिए... और एक बड़े सियासी मकसद को समझते हुए एक साथ लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाने चाहिए...

गुरुवार, 20 अक्तूबर 2016

चक्रव्यूह में नेता जी !

अपने अपने अजनबी...वैसे तो ये बड़े साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय की एक किताब का नाम है लेकिन फिलहाल ये टाइटिल यूपी के सबसे बड़े सियासी परिवार पर सटीक बैठ रहा है...
रोटी , दाल ,कच्चा प्याज़ और नींबू खाकर समाजवादी पार्टी बनाने वाले नेता जी मुलायम सिंह यादव अपने लम्बे राजनैतिक जीवन के  सबसे कठिन दौर से गुज़र रहे हैं... राजनैतिक समर में लंबे समय तक अपने विरोधियों को शिकस्त देने वाले नेता जी आज खुद को पारिवारिक कलह रुपी चक्रव्यूह में घिरा महसूस कर  रहे हैं,  ऐसा लगता है कि महाभारत के सूत्रधार अंतिमभेरी की आवाज़ सुनने के लिए घात लगाए  बैठे हैं...
पत्रकारिता में आने के बाद से मेरा और नेताजी मुलायम सिंह यादव का रिश्ता लगभग 30-32 साल पुराना है..पत्रकारीय सरोकारों के साथ साथ इस रिश्ते की बुनियाद  वैचारिक और भावनात्मक आधार पर रखी गई थी... सबसे खास बात ये रही है कि हम दोनों के बीच इस बेहद खास रिश्ते में किसी भी तरह का वाणिज्यिक आधार नहीं था...
बीते 32 सालों के सफर के दौरान हजारों बार ऐसे मौके आए जब मेरे व्यवसायिक दायित्वों के निर्वहन के कारण नेताजी से वैचारिक और व्यवसायिक टकराव भी हुए..नेताजी की पार्टी और उनकी सरकारों के खिलाफ अलग अलग वक्त में हजारों बार लिखना और बोलना पड़ा था..बावजूद इसके नेताजी और हमारे बीच कभी भी किसी स्तर पर कोई खटास नहीं पैदा हुई... 
रिश्तों में दूरियों की कोई वजह नहीं बनी..परस्पर विश्वास और भरोसे में जरा भी कमी नहीं आई..
मैं उन गिने-चुने लोगों में हूं जो  समाजवादी पार्टी के गठन के वक्त से समाजवादी पार्टी की अब तक की यात्रा का भी चश्मदीद है... लेकिन जो दौर आज इस पार्टी और इस परिवार को देखना पड़ा रहा है..ऐसा इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ..
ऐसा पहली बार हुआ है कि कुछ बाहरी लोगों की साजिश और परिवार के कुछ अति महत्वाकांक्षी लोगों के कारण आज नेताजी की निजी जिंदगी से जुड़ी बातों को भी सार्वजनिक किया जा रहा है..
इस सच को स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है कि समाज के करोड़ो पिछड़े वांछित, प्रताड़ित लोगों को उनका हक और हुकूक दिलाने के मकसद से नेताजी ने शायद अपने पारिवारिक दायित्वों का सही ढंग से निर्वहन नहीं किया जितना कि एक सामान्य गृहस्थ जीवन में रहने वाला व्यक्ति करता है... लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं था कि उन्होने अपनी तरफ से अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने में किसी तरह की कसर रखी... अपने परिवार के सभी सदस्य जिनमें अखिलेश यादव भी शामिल हैं, उनकी सुख-सुविधा और भविष्य निर्माण में नेताजी ने ना दिन देखा और ना रात... बल्कि ये कहा जाए तो गलत ना होगा कि उन्होने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया... अपने तमाम राजनीतिक विरोधियों की तीखी आलोचना की परवाह किए बगैर नेताजी ने अपने परिवार के सभी लोगों को उनके कद से भी आगे के पदों पर भी बिठाने में कोई कोताही नहीं की...
कुछ कम जानकार लोगों की ओर से आजकल नेताजी पर ये आरोप लगाए जा रहे हैं कि नेताजी अखिलेश के प्रति सौतेला व्यवहार कर रहे हैं... अखिलेश के लिए नेताजी के लगाव का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है... कि 2012 के विधानसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद बिना किसी की परवाह किए उन्होंने अखिलेश यादव की मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी की थी...
उस दौर में कुछ लोगों ने नेताजी को महाभारत की कथा वाले धृतराष्ट्र कहकर भी संबोधित किया था..और आज वही लोग अखिलेश के लिए नेताजी पर पक्षपात करने के आरोप लगा रहे हैं... साफ है कि जिन लोगों को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने धृतराष्ट्र की पदवी धारण कर ली ... आज उन्हीं लोगों के लिए वो खुद सवालों के घेरे में हैं...
नेताजी का अखिलेश के लिए लगाव का आलम ये था कि वो अपने बिज़ी से बिज़ी शेड्यूल में भी अखिलेश से मिलने के लिए वक्त जरूर निकाल लिया करते थे... नेता जी मुलायम सिंह और अखिलेश के बीच हुईं ऐसी कई अंतरंग मुलाक़ातों का मैं खुद साक्षी रहा  हूं...
मैं, नेता जी के राजनीतिक सफर के दौरान २-२ हफ्ते तक लगातार दौरे किया करता था इसलिए मैंने  नेता जी को करीब से देखा है और समझा है... ये वो दिन था जब पहले अंबेसेडर और फिर कन्टेसा  गाड़ी में पीछे की सीट पर सोते  हुए नेता जी सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा  किया करते थे ..ढाबे में खाना खाना और ज़्यादा से ज़्यादा कार्यकर्ताओं से मिलना और दिन रात मेहनत करके पार्टी को खड़ा करना, उसे आगे बढ़ाना नेता जी के जीवन का मक़सद हुआ करता था...
लेकिन जब पार्टी अपनी स्थापना के 25 साल मनाने जा रही है तो ऐसे वक्त में परिवार के ही कुछ लोग नेता जी की नीयत और उनकी कार्यशैली पर सवाल उठा रहे  हैं...  और इन सवालों को देखकर लगता है कि कि जैसे नेताजी के कठिन परिश्रम, त्याग और समर्पण को नकारा जा रहा है...
ये कहना पूरी तरह से गलत नहीं होगा कि अपनी लंबी राजनीतिक यात्रा में नेताजी ने समय-समय पर कुछ ऐसे लोगों की भी मदद ली थी जो समाज की नज़रों में विवादास्पद और दाग़ी रहे हैं... लेकिन इसके पीछे भी नेताजी की एक सोची-समझी सोच थी... वो सोच जो एक बड़ी राजनीतिक ताकत खड़ी करके उन करोड़ों पिछड़े, कमजोर और दलित वर्गों के लोगों को न्याय दिलाना था और इसी मकसद के लिए उन्होंने अपनी निजी जिंदगी तक कुर्बान कर दी थी..
इस वक्त नेताजी को उनके परिवार के सभी सदस्यों के सहयोग की जरूरत है..और ठीक ऐसे ही वक्त में परिवार के कुछ सदस्यों की ओर से नेताजी को गलत ठहराने की कोशिश ना तो  पारिवारिक मर्यादा के लिहाज से मुनासिब है और ना ही राजनीतिक दृष्टि से...
नेता जी आज भी समाजवादी पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष हैं और एक अध्यक्ष के नाते उनको पार्टी के संचालन और पदाधिकारियों के दायित्व परिवर्तन का पूरा अधिकार है...चुनाव के इस मौके पर समाजवादी परिवार के सभी लोगो का कर्तव्य एकजुट रहकर नेता जी के उन सपनो को साकार करने की कोशिश करनी चाहिए... ऐसा करके ही नेता जी के प्रति सच्चा आदर  और कृतज्ञता ज़ाहिर की जा सकती है... 

शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2016

इंदिरा जी के नक्शेकदम पर अखिलेश ?

समाजवादी पार्टी के भीतर का घमासान कई बार थमता नजर आया,.....फिर कलह सतह पर आई,...लेकिन अब ऐसी निजी बातें सामने आ रही हैं, जिनसे साफ लगता है कि इस टकराव में भी कुछ न कुछ समीकरण ज़रुर साधा जा रहा है,...अखिलेश ने जिस तरह खुद को ,...अपने बचपन को,...अपने इमोशन को सामने रखा,...परिवार की लड़ाई सिमटने की बजाय और उलझती नजर आ रही है..क्या अखिलेश किसी सीक्रेट मिशन पर निकल पड़े है..क्या कई सालों बाद देश का सियासी इतिहास खुद को दोहरा रहा है...अब इसमे कोई सीक्रेट नहीं है कि उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े सियासी परिवार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.. ऐसा लगता है कि अब अखिलेश ने तय कर लिया है कि वो अपने बनाए हुए रास्ते पर चलेंगे...
ठीक वैसे ही जैसे इंदिरा गांधी ने अपनी ही पार्टी के नेताओं के खिलाफ एक Parallel Structure खड़ा कर लिया था..और एक बार पार्टी के अधिकृत राष्ट्रपति उम्मीदवार के खिलाफ अलग उम्मीदवार उतार कर पार्टी के सभी veteran leaders  को वैचारिक शिकस्त दे दी थी.. अखिलेश यादव भी अब पार्टी से इतर एकला चलो की राह पर जाते नज़र आ रहे हैं... अब अखिलेश खुद को नई तरह से स्ट्रगलर के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं..
परिवार में जारी कलह की खबरों के बीच एक अखबार को दिए इंटरव्यू में अखिलेश कहते हैं कि बचपन में उनके साथ ठीक से बर्ताव नहीं हुआ... उनकी बुआ ने उनका पालन-पोषण किया...यानि बचपन से ही स्ट्रगलर के तौर पर रहे हैं अखिलेश.. इस बात को पब्लिक लाइफ में कभी भी निजी ज़िंदगी पर बयान नहीं देने वाले मुलायम सिंह यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में मान लिया है ... मुलायम सिंह यादव ने कहा है कि मां बीमार रहती थीं और वो व्यस्त रहते थे इसीलिए उनकी बहन ने अखिलेश की देखभाल की ...
मां बीमार थी और पिता पर ध्यान ना देने का आरोप और जब मेहनत कर आगे बढ़े तो चाचा और पिता पर कमजोर किए जाने का आरोप..कुल मिलाकर देखा जाए तो अखिलेश एक प्रखर राजनेता की तरह हमदर्दी और भावनाओं को एक साथ लोगों के सामने रख रहे हैं..अखबार से अखिलेश ने कहा है कि उन्हें किनारे तो किया जा सकता, हराया नहीं जा सकता...

क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है..इंदिरा गांधी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था..जब उनको पीएम बनाया गया तो पार्टी के Veteran Leaders चाहते थे कि उनको रिमोट की तरह चलाया जाए और जब इंदिरा जी ने इसका विरोध किया तो उनका विरोध होने लगा..इंदिरा गांधी के विरोध के बाद Open War हुआ और Young Generation इंदिरा के साथ खड़ी हो गई..पार्टी के बुजुर्ग अपनी विश्सनीयता खोते गए और इंदिरा जी  ने कामराज प्लान के तहत एक-एक करके सभी बुजुर्गों को हाशिए पर खड़ा कर दिया ...
ये सच है कि आज से 25 साल पहले एसपी को मुलायम सिंह ने बनाया और 24 घंटे मेहनत करके पार्टी को आज के मुकाम तक पहुंचाय़ा..लेकिन इधर कुछ सालों में मुलायम ने पार्टी मे ऐसे तत्वों को संरक्षण देना शुरु किया जो आज के जमाने के युवाओं को रास नहीं आया है...
डीपी यादव से शुरू हुआ ये सिलसिला गायत्री प्रसाद प्रजापति से लेकर मुख्तार अंसारी तक जाता हुआ नजर आता है..इन सब लोगों के खिलाफ अखिलेश के स्टैंड ने भी उन्हे पार्टी की भीड़ से अलग खड़ा कर दिया.. अखिलेश ये मैसेज देने में कामयाब रहे है कि वो साफ-सुथरी राजनीति के साथ हैं और उसी को लेकर चलेंगे..
खैर समाजवादी परिवार के उत्तरकांड का सभी को इंतजार है लेकिन एक बात तो तय है कि अब अखिलेश की राहें परिवार में अलग हैं और अगर ये झगड़ा और बढ़ा तो अगले चुनावों मे इसका फायदा बीएसपी को ही मिलेगा... 

गुरुवार, 6 अक्तूबर 2016

आरक्षण का लॉलीपॉप कब तक ?

महाराष्ट्र में एक बार फिर मराठा बिरादरी को आरक्षण का लॉलीपॉप पकड़ाने की कोशिश की जा रही है … 10 जिलों में फैल चुके आरक्षण के आंदोलन की आग से घिरी बीजेपी मराठा आरक्षण के समर्थन में दलीलें दे रही है... बिना नेता के लाखों लोगों की रैलियों ने देवेंद्र फडणवीस की सरकार की नींद उड़ा दी है … और अब सरकार 13 अक्टूबर को हाईकोर्ट में वकीलों के जरिए 70 दलीलें पेश करने जा रही है … मसला ये है कि ये 70 दलीलें क्या हाईकोर्ट की संविधान के आधार पर दिए गए फैसले पर भारी पड़ेंगीं …

सवाल यही है कि अगर संविधान के मुताबिक 50 फीसदी से ऊपर आरक्षण नहीं दिया जा सकता तो सरकारें किस आधार पर इससे ज्यादा आरक्षण देने के वादे कर सकती हैं …. देवेंद्र फडणवीस सरकार भी मराठा आंदोलनकारियों की 16 फीसदी आरक्षण की मांग को पूरे करने के वादे कर रही है …. हालांकि इससे पहले भी मराठा आरक्षण की मांग होती रही है … लेकिन महाराष्ट्र ऐसा राज्य है जहां पहले से ही एससी, एसटी और ओबीसी मिलाकर 52 फीसदी आरक्षण लागू है …इसी आधार पर 2014 में एनसीपी और कांग्रेस गठबंधन सरकार की तरफ से चुनाव के ठीक पहले मराठाओं को दिए गए आरक्षण पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी … ऐसे में एक बार फिर देवेंद्र फडणवीस सरकार की तरफ से की जा रही ये कोशिशें क्या सिर्फ मराठा आंदोलन को शांत करने की तरकीब है ?

ऐसा लगता है कि जब कभी भी राज्य सरकारें या केंद्र सरकार राजनैतिक मुश्किलों में घिरती हैं, उन्हें लगता है कि उनकी नीतियां आम जनता को पसंद नहीं आ रही हैं तो इस तरह के डैमेज कंट्रोल एक्सरसाइज़ किए जाते हैं .. महाराष्ट्र की सरकार पिछले कई महीनों से अपने काम काज को लेकर विवादों में है .. महाराष्ट्र में जो बीजेपी और शिवसेना का परंपरागत वोटबैंक है वही नाराज होता दिखाई दे रहा है …खासतौर से देवेंद्र फडणवीस की कार्यशैली को लेकर पूरे महाराष्ट्र में नाराजगी देखने को मिल रही है ... इसी का नतीजा है कि एक छोटी सी घटना इतने बड़े मराठवाड़ा आंदोलन का रूप ले चुकी है ... अब जब फडणवीस सरकार को लग रहा है कि उनकी कार्यशैली को लेकर पूरे महाराष्ट्र में नाराजगी बढ़ रही है तो उस नाराजगी को कम करने के लिए इस तरह के फैसले लिए जा रहे है, इस तरह के वायदे किए जा रहे हैं …

इससे पहले भी जब-जब राज्य सरकारों की तरफ से राजनैतिक संकट से उबरने के लिए 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण के वायदे किए गए हैं … अदालतों ने उसे खारिज कर दिया है .. अब अगर महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार कह रही है कि वो आरक्षण देंगे तो ये शिगूफा ही कहा जा सकता है ...ये सभी राजनीतिक दलों को पता है कि संविधान में 50 फीसदी से जयादा आरक्षण देने की इजाज़त किसी को नहीं है .. इससे पहले राजस्थान की सरकार ने गुर्जर आंदोलन को दबाने के लिए ऐसा ही वायदा किया था .. आंध्र प्रदेश या कर्नाटक सरकार ने भी इसी तरह के वायदे किए .. हरियाणा सरकार ने भी जाट आंदोलन को दबाने के लिए आरक्षण देने की बात कही थी लेकिन किसी भी सरकार ने अपने वायदे को पूरा नहीं किया .. और अगर किसी भी सरकार ने ऑर्डिनेंस के जरिए या राज्य विधानसभा में प्रस्ताव पारित करके अपने उस वायदे को पूरा करने की कोशिश की भी अदालतों के जरिए ये कोशिश खारिज कर दी गई … अदालतों ने ऐसे मौकों पर राज्य सरकार को फटकार भी लगाई … इसीलिए फडणवीस की सरकार चाहे जो वायदे करे .. सच्चाई ये है कि 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देने का अधिकार किसी भी राज्य सरकार या केंद्र सरकार को नहीं है …

सेना की उपलब्धियों पर सियासत क्यों …

देश में इन दिनों सर्जिकल स्ट्राइक पर बयानों की बाढ़ सी आई हुई है… नेता इस बात पर चर्चा करने में मशगूल हैं कि भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक किया या नहीं … तो कुछ नेता सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाने वाले नेताओं को देशद्रोही बताने में लगे हैं और आपत्तिजनक टिप्पणियां की जा रही है …चिंता की बात ये है कि इन सबके बीच राजनीति अपने निचले स्तर पर पहुंच गई है और सेना की तरफ से बीच बीच में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सैनिक कार्रवाई की जानकारी दी जा रही है … ऐसा नहीं है कि भारत की तरफ से पहली बार सर्जिकल स्ट्राइक हुआ हो … उरी हमले की प्रतिक्रिया में हुए सर्जिकल स्ट्राइक के बाद कई पूर्व सैन्य अधिकारी ऐसा कह चुके हैं कि पहले भी सर्जिकल स्ट्राइक होते रहे है .. यही सच है ..लेकिन ऐसा पहली बार हो रहा है कि इस पर देश के तमाम बयानवीर नेता अपने बयानों से सुर्खियां बनाने में लगे हैं ... मंत्री जी के जयकारे हो रहे हैं और जगह-जगह उन्हें सम्मानित किया जा रहा है ... यहां तक कि सोशल मीडिया पर भी ऐसे पोस्ट्स की बाढ़ है...

सवाल उठता है कि ऐसा करने की जरूरत ही क्यों है … अगर पहले इस तरह के ऑपरेशन को सार्वजनिक मंच से उजागर नहीं किया गया तो अब ऐसा क्यों किया जा रहा है… क्या देश की रक्षा और सुरक्षा को बीच में लाकर सियासत करना किसी और लक्ष्य को पाने की कवायद है … और अगर ऐसा है तो किस कीमत पर .. क्या सेना को सियासत में घसीटने के बाद हम उन्हीं देशों की कतार में शामिल नहीं हो रहे जहां सेना और सियासत अलग-अलग नहीं है ... ऐसा करने के बाद भारत और पाकिस्तान में क्या फर्क रह जाएगा …

सर्जिकल स्ट्राइक के बाद ऐसा नहीं है कि सिर्फ सत्तारूढ़ पार्टी के नेता ही नाक ऊंची कर घूम रहे हों .. विपक्ष इनके दावों पर सवाल उठाने के साथ-साथ अपने कार्यकाल में भी सर्जिकल स्ट्राइक करने के दावे कर रहा है … अब सवाल ये कि विपक्ष को अपने कार्यकाल के सीक्रेट ऑपरेशन को अचानक पब्लिक करने की बेचैनी क्यों हो रही है … होड़ ऐसी है कि जैसे आने वाले विधानसभा चुनावों में सर्जिकल स्ट्राइक का मुद्दा जनता के बीच distinction दिलाने की गारंटी हो …

पड़ोसी देश से रिश्तों की तल्खी बयानवीरों को परेशान करे ना करे ….बॉर्डर के पास रहने वाले नागरिकों पर बुरा असर डालती है … बीते दिनों में उनकी परेशानी सुर्खियां बनी हैं .. लेकिन किसी का ध्यान इस तरफ जा ही नहीं रहा … सब बस इसी कोशिश में लगे हैं कि किसी तरह इस मसले का राजनैतिक फायदा उठाया जाए … .अपने व्यक्तिगत राजनैतिक स्वार्थ साध लिए जाएं .. ठीक वैसे ही जैसा करगिल युद्ध के दौरान हुआ था … सब जानते हैं कि भारतीय सैनिकों के पूरी तरह से सक्षम होने के बावजूद पाकिस्तानी सैनिकों ने भारत की ज़मीन से अपना कब्जा अमेरिका की दखल के बाद छोड़ा था... भारतीय सैनिकों ने उन्हें खदेड़ा हो ऐसा कुछ नहीं हुआ फिर भी आज तक भारत इसे शौर्य दिवस के रूप में मनाता है ... उस वक्त भी इस मसले पर राजनीति पूरे शबाब पर थी सत्ता पर आसीन लोग खुद अपनी पीठ थपथपाने में लगे हुए थे ... ना तो इसका जिक्र हुआ कि हमने अपने कितने सैनिकों को खो दिया ना ही इसका कि हमें कितना नुकसान उठाना पड़ा ... कुछ समय तक शहीदों के परिवारों को मदद की बातों का दावा किया जाता रहा …. बाद में उनकी बदहाली पर कोई सुध लेने नहीं पहुंचा .. सत्ता पक्ष हो या विपक्ष दोनों ही इस संवेदनशील मुद्दे पर भी राजनीति करते रहे खुद को बेहतर और दूसरे को कमतर बताते रहे ..

सैन्य कार्रवाई का राजनैतिक फायदा उठाने की एक कोशिश Bangladesh liberation war के बाद भी हुई थी …सत्तारूढ़ दल ने युद्ध में मिली कामयाबी का इस्तेमाल अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए किया था …. अगर मिलिट्री कामयाबी के राजनीतिकरण की ये कोशिश तब गलत थी तो अब भी गलत है .. ये बात सियासतदानों को समझनी होगी कि पाकिस्तान अपने अस्तित्व से लेकर अब तक political instability की problem से जूझ रहा है उसकी एक बहुत बड़ी वजह है कि वहां आर्मी के जरिए सियासत करने की परंपरा रही है …. इसीलिए भारत में ऐसी कोई भी कोशिश नहीं होनी चाहिए ..और चुनावों में जाते वक्त अपने अपने सरकारों की उपलब्धियों को लेकर चुनाव में जाना चाहिए ना कि सेना की उपलब्धियों को ..