शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

नीति नहीं नियत बदलें सरकारें !

देश एक बार फिर प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहा है ... कई जगहें ऐसी हैं जहां सालाना एक जैसी ही मुसीबत आती है लेकिन इन मुसीबतों का कोई हल नहीं निकल पाता.. ऐसा नहीं है कि इस पर चर्चा नहीं होती ... चर्चा होती हैनीतियां बनाई जाती हैं .. बजट रिलीज़ होता है .. काम भी शुरू कर दिया जाता है लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहता है ...जमीन से जुड़ी हुई जितनी समस्याएं आज से सत्तर साल पहले थीं....वो आजादी के बाद भी ज्यों कि त्यों बनी हुईं है... सरकारें आईं और गईं ... योजनाएं बनीं और खत्म की गईं ... आयोग बने और भंग कर दिए गए ... लेकिन मुश्किलें वही हैं ...

हमें समझना होगा कि हमारी पॉलिसी में ही खामी है ... आज़ादी के बाद से अब तक हमारे सिस्टम में लालफीताशाही हावी है ... काम तब शुरू किया जाता है जब मुसीबत आ चुकी होती है ... पहले से ही उसे रोकने या उसका प्रभाव कम से कम रखने की कोई प्रभावी प्लानिंग नहीं होती ... सच तो ये है कि समस्याएं और उसका समाधान जानना एक बात है और उसे दूर करने के लिए योजना बनाकर काम करना बिल्कुल जुदा बात है...क्योंकि नीति बनाना और प्रचार करना आसान होता है...सवाल ये कि आजादी के सत्तर साल बाद भी अगर आवाम को न्यूनतम सुविधाएं तक नहीं हासिल हो पाई हैं तो इसका जिम्मेदार कौन है...वो भी तब जब हम मंगलयान तक का निर्माण कर चुके हैं ...

उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले में बने एल्गिन चरसड़ी बांध का उदाहरण ले लीजिए ... गोंडा ऐसा इलाका है जो बीते कई साल से मॉनसून के दौरान बाढ़ का शिकार हो जाता है... इस बाढ़ से बचाने के लिए घाघरा नदी के किनारे 14 करोड़ की लागत से एल्गिन चरसड़ी बांध बनाया गया ... लेकिन हर साल इस बांध का कोई ना कोई हिस्सा टूटता है ... और अब तक इसकी मरम्मत पर लागत से पांच गुना से ज्यादा रकम खर्च की जा चुकी है ... लेकिन बाढ़ अब भी आती है... नेताओं के दौरे होते हैं ... बांध निर्माण में खामियों की चर्चा की जाती है .... बाढ़ पीड़ितों से मिलने की रस्म अदायगी की जाती है ... साल दर साल यही चीजें दोहराई जा रही हैं ... नीतियों की खामी की वजह से नुकसान सिर्फ बांध निर्माण को लेकर ही नहीं उठाना पड़ रहा बल्कि हज़ारों हेक्टेयर की फसल खराब होती है ... हजा़रों लोग बेघर हो जाते हैं ... बाढ़ प्रभावितों के लिए राहत शिविर लगाए जाते हैं और यथासंभव मुआवज़ा दिया जाता है ... अंदाज़ा लगाइए कि इन सारी चीजों पर होने वाला खर्च मिलाकर भी क्या समय रहते कोई ठोस उपाय नहीं किया जा सकता ... ताकि दैवीय आपदा से होने वाला नुकसान कम से कम हो ...

ये हाल सिर्फ उत्तर प्रदेश में नहीं है ... ऐसे उदाहरण पूरे देश से मिल जाएंगे ... बिहार की राजधानी पटना को उत्तरी बिहार से जोड़ने वाला गांधी सेतू अपने जाम के लिए मशहूर हो चुका है ... महज 87 करोड़ रुपए में बने इस सेतु की मरम्मत में बीते 18 साल में 102 करोड़ से ज्यादा लग चुके हैं... अब इसकी मरम्मत सुपर स्ट्रक्चर बदलने में अब 1372 करोड़ रुपए खर्च होने जा रहे हैं...

मध्य प्रदेश के शहडोल में बना बाणसागर बांध भी सफेद हाथी साबित हो रहा है ... 1978 में लगभग 91 करोड़ के बजट से ये परियोजना शुरू हुई थी... 1998 तक इस परियोजना पर हज़ार करोड़ से ज्यादा खर्च कर दिया गया... इस परियोजना का मकसद था कि मध्य प्रदेशउत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ इलाकों में पानी की कमी को पूरा किया जा सके और बाढ़ पर नियंत्रण रखा जा सके.. लेकिन दोनों ही मकसद पूरे नहीं हुए ...

सवाल उठता है कि आखिर आजादी के सत्तर सालों बाद भी हम ऐसा तन्त्र विकसित क्यों नहीं कर पाए जिसके जरिए ना केवल फॉरवर्ड प्लानिंग हो बल्कि आपदा से पहले ही निपटने का पूरा मैप तैयार हो सके... क्या योजना आयोग का नाम नीति आयोग कर देने से इसका हल निकाला जा सकता है ?  सवाल उठता है कि रवैया क्यों नहीं बदला जाता ? क्यों हर बार आपदा आने के बाद ही उसकी वजहों पर चर्चा की जाती है ? क्यों ऐसा सिस्टम डेवलप नहीं किया जाता जो हर साल आने वाली एक जैसी आपदाओं से निपटने के लिए कारगर साबित हो ... दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की चुनी हुई सरकारें ना तो समय पर योजना बना पाती हैं और ना हीं अपनी ही बनाई योजनाओं को समय पर पूरा कर पाती हैं... सच ये है कि एक योजना बनने-बनाने में कई बार कई सरकारें फिर से चुनाव के मुहाने पर पहुंच गईं...लेकिन योजना को जमीन पर उतारना तो दूर...कागज पर भी पूरा नहीं कर पाईं...

ज़रूरत इस बात की है हर साल आने वाली समस्याओं और विकास के ढांचे को लेकर फॉरवर्ड प्लानिंग की जाए .. एक holistic integrated approach रखा जाए ... प्लान माइक्रो और मैक्रो लेवल पर बनाए जाएं ... हर स्तर पर एक ट्रांसपेरेंट सिस्टम रखा जाए ... करप्ट सिस्टम को ढोने के बजाए उसकी जड़ में मट्ठा डाला जाए ... नीति ही नहीं नियत भी बदले ... गांधीदीनदयाल जैसे महापुरुषों के आदर्शों की बात करने वाले दलों की सरकारें उनके आदर्शों पर काम भी करें... 

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