बुधवार, 21 सितंबर 2016

शहर की भीड़ में मुर्दा सी खामोशी क्यों ?

पिछले कुछ दिनों से कई सवाल मन में उमड़-घुमड़ रहे हैं ... मसलन क्या ये प्रेम है .. क्या हमारी भावनाएं सुसुप्त अवस्था में हैं .. क्या हमारी आत्मा मर गई है .. क्या अहसास खत्म हो गए हैं ... क्या चेतना अब नहीं बची ... दरअसल पिछले कुछ दिनों में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जो मन को झकझोर रही हैं ... हम भी इसी समाज का हिस्सा हैं जहां देश की राजधानी में दिन दहाड़े कई लोगों की मौजूदगी में एक लड़की की इतनी बेरहमी से हत्या कर दी जाती है ... क्या उसे बचाया नहीं जा सकता था अगर कोई एक भी हिम्मत करके उसके बेरहम कातिल को रोक लेता ... शायद इसके लिए हिम्मत से ज्यादा
भावनाओं की ज़रूरत थी जो अब समाज में शायद बची ही नहीं है …

इस घटना के बाद बहस कानून व्यवस्था और सियासी दावों पर हो रही है लेकिन क्या ये हर नागरिक की ज़िम्मेदारी नहीं है कि वो भी सोचे कि आखिर समाज में ऐसा क्यों हो रहा है .. हमारे समाज, हमारे आस-पास ऐसी मानसिकता क्यों पल रही है ... क्यों ऐसे विचार फल फूल रहे हैं जिसमें 'मैं' के अलावा कुछ है ही नहीं ... समाज पिछले दो दशकों में बहुत तेजी से भागने लगा है ... समाज का स्वरूप बदल गया है.. जहां लोग एक दूसरे का सहारा होते थे... एक दूसरे के लिए जिया करते थे वो अब एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में बिखर गए हैं... लोग 'हम' से 'मैं' पर आ गए हैं .. संयुक्त परिवार से न्यूक्लियर फैमिली पर आ गए हैं ... और इस तेज़ भाग दौड़ की जिंदगी में सबकुछ तुरंत चाहते हैं ... और ना मिले तो इस फेल्योर को पचा ही नहीं पाते और लोगों में उग्रता बढ़ती जा रही है ...

सोचिए एक प्यार राधा और कृष्ण का भी तो था जिसमें कोई अपेक्षा नहीं थी इसीलिए तो ये प्यार अमर गाथा बन गया ... एक प्रेम मलिक मोहम्मद जायसी की रचनाओं में भी तो है ... जब जायसी विरह के बारे में लिखते हैं तो फिर कोई कवि विरह का वैसा वर्णन नहीं कर पाता … प्यार का अहसास सदियों से मौजूद है और इन सदियों में ऐसे एक दो नहीं बल्कि सैकड़ों उदाहरण सामने आए हैं जहां प्यार पीढ़ी दर पीढ़ी चर्चा करने वाली गाथाओं के रूप में सामने आया है … लेकिन अब वैसे अहसास नहीं बचे … समाज में जीवनशैली के साथ-साथ सोच में भी बदलाव आ गया है … लोग प्यार को भी एक टारगेट की तरह लेने लगे हैं जो अचीव नहीं कर पाए तो इसे अपने फेल्योर से जोड़ लेते हैं … फिर शर्मिंदगी का अहसास घेर लेता है और कभी कभी फ्रस्टेशन इतना बढ़ जाता है कि क्रूरता की हद के तौर पर सामने आता है … यहां क्या ये ज़रूरी नहीं है कि हर मां -बाप अपने बच्चों की परवरिश में ही इस बात का ख्याल रखें कि उपभोक्तावादी सोच से परे उन्हें मानववतावादी सोच रखने की शिक्षा दी जाए …

लेकिन इससे दोष ना तो सरकार का कम होता है ना ही प्रशासन का … वो सरकार जो कानून और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर वादे करती है … पॉलिसीज़ बनाती है … विपक्ष में रहने पर धरना प्रदर्शन करती रहती है लेकिन सरकार बना लेने के बाद उदासीन हो जाती है … 

पुलिस और प्रशासन का भी दोष है जो समय रहते कभी कार्रवाई नहीं करता.. समाज में जब भी ऐसे हालात बनते हैं तो पहले जज बनकर गलतियां ढूंढने लग जाता है … सलाह मशविरे करने लगता है … सुझाव देने लगता है और इसकी कीमत किसी को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है … 


दोष उनका भी है जो खुद को किसी दल का कार्यकर्ता बता कर बिना बात की बात को तूल देकर आए दिन सड़क पर प्रदर्शन करने लगते हैं … बकवास मुद्दों पर हंगामा खड़ा करते हैं और अपना मतलब साधने के बाद चूहे की तरह अपने बिल में गायब हो जाते .. क्यों बुराड़ी जैसे दिल दहलाने वाली घटनाओं पर उनका खून नहीं खौलता … क्यों उनकी चेतना नहीं जागती …. क्यों उनकी मरी हुई आत्मा को ऐसी वारदातें झकझोर नही पातीं … 

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें