सोमवार, 26 सितंबर 2016

विकल्प की तलाश में जनता !

देश के तीन सूबों ने बीते दो साल में बड़े आंदोलन देखे हैं ....सबका मकसद एक ही है आरक्षण...इन आंदोलनों ने देश के नेताओं की नींद हराम करके रख दी है...बिना किसी बड़े चेहरे के जनता सड़कों पर उतर रही है....ऑर्गनाइज्ड तरीके से विरोध जता रही है...नेता हैरान-परेशान हैं कि आखिर ऐसा माहौल क्यों बना है....सवाल उठ रहे हैं कि क्या ये सियासत के खिलाफ आक्रोश है....क्या वादाखिलाफी के खिलाफ बगावत है...क्या ये माहौल ये बता रहा है कि आवाम को अब सिर्फ वादों और जुमलों से बहला पाना मुश्किल होने लगा है.... ये तीन सूबे हैं गुजरात,  हरियाणा और अब महाराष्ट्र... गुजरात में हुआ पटेलों का आंदोलन हो...हरियाणा में जाटों का आंदोलन या अब महाराष्ट्र में मराठों का गुस्सा, इन तीनों में एक बात कॉमन है और वो है इन तीनों जातियों का बैकग्राउंड...इन तीनों ही जगहों पर बीजेपी सत्ता में हैं...तीनों जगहों पर मुख्यमंत्री ऐसे हैं जिन्हें जनता ने नहीं बल्कि बीजेपी आलाकमान और संघपरिवार ने तय किया है...तीनों ने अपने अपने घोषणापत्रों में इन जातियों को सहूलियत देने के वादे किए थे...मगर उन वादों का पूरा करने की राह पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाए...

जाहिर है सत्तातन्त्र के लिए ये मुश्किल वक्त है...महाराष्ट्र सरकार पर इसका दबाव है कि शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा मूक मार्च हंगामे की चीखों की शक्ल ना अख्तियार करे ....मगर ये होगा कैसे ये कोई नहीं जानता....ये सच है कि ये समस्या देवेन्द्र फड़नवीस ने पैदा नहीं की...ठीक वैसे ही जैसे पटेलो की समस्या आनन्दीबेन ने और जाटो की समस्या मनोहरलाल खट्टर ने पैदा नहीं की...मगर इन्हें सत्ता उम्मीद के साथ सौंपी गई थी....जो टूटी तो गुबार बाहर आ गया... उम्मीदें जगाकर सियासत करने का शगल नया नहीं है...मगर बीजेपी ने बीते पांच सालों में जिस तरह उम्मीदों की खेती शुरु की है उसने बड़े बड़े सियासी पंडितों को चौंका दिया है...सियासत के मैनेजमेंट की मास्टरी हासिल कर चुकी बीजेपी ने चुनाव तो जीत लिए हैं मगर अब सियासी वादे पूरे करने की बारी है तो सरकारों पर सवाल उठ रहे हैं....बीजेपी की सरकारों के खिलाफ उबले इस माहौल में अगर विपक्ष की भूमिका नदारद है तो ये भी कम चिन्ता की बात नहीं...खासकर उस राजनीतिक व्यवस्था के लिए जिसमें चेहरे के बिना आगे बढ़ने की कल्पना नहीं की जा सकती....मराठों की ये भीड़ बता रही है कि अगर राजनीति के महारथियों ने अपना चाल चरित्र नहीं बदला तो जनता चेहरा बदलने में ज्यादा वक्त नहीं लगाती

देश में जब-जब पॉलिटिकल क्रेडिबिलिटी पर सवाल खड़े होते हैं, जब- जब स्थापित राजनैतिक दलों और नेताओं की साख गिरी है तब-तब देश में एक नया राजनैतिक विकल्प खड़ा हुआ है ... चाहे वो आपातकाल के बाद जनता पार्टी के रूप में रहा हो या फिर कुछ वर्ष पहले अन्ना हजा़रे के नेतृत्व में खड़ा हुआ आंदोलन रहा हो, जिसने पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव में और फिर लोकसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन कर दिया ...

इतिहास गवाह है कि जब भी क्रेडिबिलिटी की क्राइसिस आती है और नेता या सत्ता में बैठे हुए लोगों की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगते हैं तो जनता खुद विकल्प खोज लेती है ... शायद यही कारण है कि गुजरात में लगभग डेढ़ दशक से सत्ता पर काबिज बीजेपी में बड़े चेहरे होने के बावजूद मुश्किलें खड़ी हुईं .. वो बीजेपी जिसने गुजरात मॉडल को पेश कर देश में चुनाव लड़ा और अब देश की सत्ता की बागडोर बीजेपी के हाथ में है ...  बावजूद इसके गुजरात से राजनैतिक व्यवस्था और गवर्नेंस के खिलाफ अगर कोई मजबूत  आवाज उठ रही है तो अपने आप ये एक संकेत है कि गुजरात की जनता और देश की जनता बदलाव चाहती है ...

कमोबेश यही स्थिति महाराष्ट्र की है .. महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार से जनता बेहद नाराज थी ... इसीलिए जब वहां चुनाव हुए तो जनता ने सत्ता की बागडोर बीजेपी शिवसेना गठबंधन को सौप दी ... बावजूद इसके जितना आक्रामक आंदोलन वहां  दिखाई दे रहा है ... उससे एक बात साफ है कि जनता ने व्यवस्था का जो विकल्प देखा था उसे लेकर अब जनता में कुंठा व्याप्त हो रही है... जनता का मोहभंग हो रहा है ... ऐसे में जनता एक बार फिर नए विकल्प की तलाश में है .. और इसी का नतीजा हैं ये आंदोलन ... इससे राजनीति में जो लोग स्थापित हैं, जो लोग वर्षों से सत्ता में हैं, जिनकी सरकार है,  उन्हें  जरूर सबक लेना चाहिए ... उन्हें अपनी कार्यशैली और नीतियों  में बदलाव करना चाहिए 

बुधवार, 21 सितंबर 2016

शहर की भीड़ में मुर्दा सी खामोशी क्यों ?

पिछले कुछ दिनों से कई सवाल मन में उमड़-घुमड़ रहे हैं ... मसलन क्या ये प्रेम है .. क्या हमारी भावनाएं सुसुप्त अवस्था में हैं .. क्या हमारी आत्मा मर गई है .. क्या अहसास खत्म हो गए हैं ... क्या चेतना अब नहीं बची ... दरअसल पिछले कुछ दिनों में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जो मन को झकझोर रही हैं ... हम भी इसी समाज का हिस्सा हैं जहां देश की राजधानी में दिन दहाड़े कई लोगों की मौजूदगी में एक लड़की की इतनी बेरहमी से हत्या कर दी जाती है ... क्या उसे बचाया नहीं जा सकता था अगर कोई एक भी हिम्मत करके उसके बेरहम कातिल को रोक लेता ... शायद इसके लिए हिम्मत से ज्यादा
भावनाओं की ज़रूरत थी जो अब समाज में शायद बची ही नहीं है …

इस घटना के बाद बहस कानून व्यवस्था और सियासी दावों पर हो रही है लेकिन क्या ये हर नागरिक की ज़िम्मेदारी नहीं है कि वो भी सोचे कि आखिर समाज में ऐसा क्यों हो रहा है .. हमारे समाज, हमारे आस-पास ऐसी मानसिकता क्यों पल रही है ... क्यों ऐसे विचार फल फूल रहे हैं जिसमें 'मैं' के अलावा कुछ है ही नहीं ... समाज पिछले दो दशकों में बहुत तेजी से भागने लगा है ... समाज का स्वरूप बदल गया है.. जहां लोग एक दूसरे का सहारा होते थे... एक दूसरे के लिए जिया करते थे वो अब एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में बिखर गए हैं... लोग 'हम' से 'मैं' पर आ गए हैं .. संयुक्त परिवार से न्यूक्लियर फैमिली पर आ गए हैं ... और इस तेज़ भाग दौड़ की जिंदगी में सबकुछ तुरंत चाहते हैं ... और ना मिले तो इस फेल्योर को पचा ही नहीं पाते और लोगों में उग्रता बढ़ती जा रही है ...

सोचिए एक प्यार राधा और कृष्ण का भी तो था जिसमें कोई अपेक्षा नहीं थी इसीलिए तो ये प्यार अमर गाथा बन गया ... एक प्रेम मलिक मोहम्मद जायसी की रचनाओं में भी तो है ... जब जायसी विरह के बारे में लिखते हैं तो फिर कोई कवि विरह का वैसा वर्णन नहीं कर पाता … प्यार का अहसास सदियों से मौजूद है और इन सदियों में ऐसे एक दो नहीं बल्कि सैकड़ों उदाहरण सामने आए हैं जहां प्यार पीढ़ी दर पीढ़ी चर्चा करने वाली गाथाओं के रूप में सामने आया है … लेकिन अब वैसे अहसास नहीं बचे … समाज में जीवनशैली के साथ-साथ सोच में भी बदलाव आ गया है … लोग प्यार को भी एक टारगेट की तरह लेने लगे हैं जो अचीव नहीं कर पाए तो इसे अपने फेल्योर से जोड़ लेते हैं … फिर शर्मिंदगी का अहसास घेर लेता है और कभी कभी फ्रस्टेशन इतना बढ़ जाता है कि क्रूरता की हद के तौर पर सामने आता है … यहां क्या ये ज़रूरी नहीं है कि हर मां -बाप अपने बच्चों की परवरिश में ही इस बात का ख्याल रखें कि उपभोक्तावादी सोच से परे उन्हें मानववतावादी सोच रखने की शिक्षा दी जाए …

लेकिन इससे दोष ना तो सरकार का कम होता है ना ही प्रशासन का … वो सरकार जो कानून और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर वादे करती है … पॉलिसीज़ बनाती है … विपक्ष में रहने पर धरना प्रदर्शन करती रहती है लेकिन सरकार बना लेने के बाद उदासीन हो जाती है … 

पुलिस और प्रशासन का भी दोष है जो समय रहते कभी कार्रवाई नहीं करता.. समाज में जब भी ऐसे हालात बनते हैं तो पहले जज बनकर गलतियां ढूंढने लग जाता है … सलाह मशविरे करने लगता है … सुझाव देने लगता है और इसकी कीमत किसी को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है … 


दोष उनका भी है जो खुद को किसी दल का कार्यकर्ता बता कर बिना बात की बात को तूल देकर आए दिन सड़क पर प्रदर्शन करने लगते हैं … बकवास मुद्दों पर हंगामा खड़ा करते हैं और अपना मतलब साधने के बाद चूहे की तरह अपने बिल में गायब हो जाते .. क्यों बुराड़ी जैसे दिल दहलाने वाली घटनाओं पर उनका खून नहीं खौलता … क्यों उनकी चेतना नहीं जागती …. क्यों उनकी मरी हुई आत्मा को ऐसी वारदातें झकझोर नही पातीं … 

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

नीति नहीं नियत बदलें सरकारें !

देश एक बार फिर प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहा है ... कई जगहें ऐसी हैं जहां सालाना एक जैसी ही मुसीबत आती है लेकिन इन मुसीबतों का कोई हल नहीं निकल पाता.. ऐसा नहीं है कि इस पर चर्चा नहीं होती ... चर्चा होती हैनीतियां बनाई जाती हैं .. बजट रिलीज़ होता है .. काम भी शुरू कर दिया जाता है लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहता है ...जमीन से जुड़ी हुई जितनी समस्याएं आज से सत्तर साल पहले थीं....वो आजादी के बाद भी ज्यों कि त्यों बनी हुईं है... सरकारें आईं और गईं ... योजनाएं बनीं और खत्म की गईं ... आयोग बने और भंग कर दिए गए ... लेकिन मुश्किलें वही हैं ...

हमें समझना होगा कि हमारी पॉलिसी में ही खामी है ... आज़ादी के बाद से अब तक हमारे सिस्टम में लालफीताशाही हावी है ... काम तब शुरू किया जाता है जब मुसीबत आ चुकी होती है ... पहले से ही उसे रोकने या उसका प्रभाव कम से कम रखने की कोई प्रभावी प्लानिंग नहीं होती ... सच तो ये है कि समस्याएं और उसका समाधान जानना एक बात है और उसे दूर करने के लिए योजना बनाकर काम करना बिल्कुल जुदा बात है...क्योंकि नीति बनाना और प्रचार करना आसान होता है...सवाल ये कि आजादी के सत्तर साल बाद भी अगर आवाम को न्यूनतम सुविधाएं तक नहीं हासिल हो पाई हैं तो इसका जिम्मेदार कौन है...वो भी तब जब हम मंगलयान तक का निर्माण कर चुके हैं ...

उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले में बने एल्गिन चरसड़ी बांध का उदाहरण ले लीजिए ... गोंडा ऐसा इलाका है जो बीते कई साल से मॉनसून के दौरान बाढ़ का शिकार हो जाता है... इस बाढ़ से बचाने के लिए घाघरा नदी के किनारे 14 करोड़ की लागत से एल्गिन चरसड़ी बांध बनाया गया ... लेकिन हर साल इस बांध का कोई ना कोई हिस्सा टूटता है ... और अब तक इसकी मरम्मत पर लागत से पांच गुना से ज्यादा रकम खर्च की जा चुकी है ... लेकिन बाढ़ अब भी आती है... नेताओं के दौरे होते हैं ... बांध निर्माण में खामियों की चर्चा की जाती है .... बाढ़ पीड़ितों से मिलने की रस्म अदायगी की जाती है ... साल दर साल यही चीजें दोहराई जा रही हैं ... नीतियों की खामी की वजह से नुकसान सिर्फ बांध निर्माण को लेकर ही नहीं उठाना पड़ रहा बल्कि हज़ारों हेक्टेयर की फसल खराब होती है ... हजा़रों लोग बेघर हो जाते हैं ... बाढ़ प्रभावितों के लिए राहत शिविर लगाए जाते हैं और यथासंभव मुआवज़ा दिया जाता है ... अंदाज़ा लगाइए कि इन सारी चीजों पर होने वाला खर्च मिलाकर भी क्या समय रहते कोई ठोस उपाय नहीं किया जा सकता ... ताकि दैवीय आपदा से होने वाला नुकसान कम से कम हो ...

ये हाल सिर्फ उत्तर प्रदेश में नहीं है ... ऐसे उदाहरण पूरे देश से मिल जाएंगे ... बिहार की राजधानी पटना को उत्तरी बिहार से जोड़ने वाला गांधी सेतू अपने जाम के लिए मशहूर हो चुका है ... महज 87 करोड़ रुपए में बने इस सेतु की मरम्मत में बीते 18 साल में 102 करोड़ से ज्यादा लग चुके हैं... अब इसकी मरम्मत सुपर स्ट्रक्चर बदलने में अब 1372 करोड़ रुपए खर्च होने जा रहे हैं...

मध्य प्रदेश के शहडोल में बना बाणसागर बांध भी सफेद हाथी साबित हो रहा है ... 1978 में लगभग 91 करोड़ के बजट से ये परियोजना शुरू हुई थी... 1998 तक इस परियोजना पर हज़ार करोड़ से ज्यादा खर्च कर दिया गया... इस परियोजना का मकसद था कि मध्य प्रदेशउत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ इलाकों में पानी की कमी को पूरा किया जा सके और बाढ़ पर नियंत्रण रखा जा सके.. लेकिन दोनों ही मकसद पूरे नहीं हुए ...

सवाल उठता है कि आखिर आजादी के सत्तर सालों बाद भी हम ऐसा तन्त्र विकसित क्यों नहीं कर पाए जिसके जरिए ना केवल फॉरवर्ड प्लानिंग हो बल्कि आपदा से पहले ही निपटने का पूरा मैप तैयार हो सके... क्या योजना आयोग का नाम नीति आयोग कर देने से इसका हल निकाला जा सकता है ?  सवाल उठता है कि रवैया क्यों नहीं बदला जाता ? क्यों हर बार आपदा आने के बाद ही उसकी वजहों पर चर्चा की जाती है ? क्यों ऐसा सिस्टम डेवलप नहीं किया जाता जो हर साल आने वाली एक जैसी आपदाओं से निपटने के लिए कारगर साबित हो ... दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की चुनी हुई सरकारें ना तो समय पर योजना बना पाती हैं और ना हीं अपनी ही बनाई योजनाओं को समय पर पूरा कर पाती हैं... सच ये है कि एक योजना बनने-बनाने में कई बार कई सरकारें फिर से चुनाव के मुहाने पर पहुंच गईं...लेकिन योजना को जमीन पर उतारना तो दूर...कागज पर भी पूरा नहीं कर पाईं...

ज़रूरत इस बात की है हर साल आने वाली समस्याओं और विकास के ढांचे को लेकर फॉरवर्ड प्लानिंग की जाए .. एक holistic integrated approach रखा जाए ... प्लान माइक्रो और मैक्रो लेवल पर बनाए जाएं ... हर स्तर पर एक ट्रांसपेरेंट सिस्टम रखा जाए ... करप्ट सिस्टम को ढोने के बजाए उसकी जड़ में मट्ठा डाला जाए ... नीति ही नहीं नियत भी बदले ... गांधीदीनदयाल जैसे महापुरुषों के आदर्शों की बात करने वाले दलों की सरकारें उनके आदर्शों पर काम भी करें... 

बुधवार, 7 सितंबर 2016

गांधी खानदान के निशाने पर मोदी !

केंद्र सरकार इन दिनों पार्टी के अंदर और बाहर आलोचना झेल रही है ... एक तरफ राहुल गांधी हैं जो पदयात्रा के दौरान मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना कर रहे हैं ... तो वहीं वरुण गांधी भी हैं जो मोदी सरकार पर उद्योगपतियों का साथ देने और गरीबों से मूंह फेरने का आरोप लगा रहे हैं ... दिलचस्प बात ये है कि आलोचना चाहे पार्टी के अंदर से हो रही है या फिर पार्टी के बाहर से, आलोचना करने वाला गांधी परिवार ही है ... इत्तेफाक है कि सियासी विरोधी माने जाने वाले राहुल गांधी और वरुण गांधी के सुर एक जैसे ही हैं ... एक केन्द्र सरकार की नीतियों के खिलाफ एक खुलकर सवाल उठा रहा है दूसरा इशारो-इशारों में...सवाल उठता है कि क्या पॉलिसी को लेकर उठाए गए ये कॉमन सवाल किसी भविष्य की सियासत का इशारा दे रहे हैं...सवाल ये भी उठ रहे हैं कि क्या वाकई मोदी सरकार की नीतियों में ऐसा कुछ है जो बीजेपी के भीतर ही नेताओं की बेचैनी को बढ़ा रहा है...

असल में राजनीति के केन्द्र में गांधी परिवार अक्सर आ ही जाता है...देश की सत्ता गांधी परिवार के इर्द -गिर्द ही घूमती रही है...वरुण गांधी अगर बीजेपी संगठन का हिस्सा रहते हुए भी अक्सर सरकार के खिलाफ बयानबाजी कर देते हैं तो उनकी मां मेनका गांधी भी पार्टी लाइन से अलग हटकर कई बार बोल चुकी हैं...वो भी ऐसे वक्त में जबकि बीजेपी अटल जी वाली बीजेपी नहीं बल्कि मोदी-शाह युग की बीजेपी है जहां पॉलिसी से लेकर पॉलिटिक्स तक को तय करने का एकाधिकार सिर्फ एक जगह केन्द्रित हो चुका है... मगर ये गांधी परिवार का ही प्रभाव है जिसके चलते वरुण गांधी और मेनका गांधी के बार-बार पार्टी लाइन क्रॉस कर जाने के बाद भी उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं होती …

देश की राजनीति भी दिलचस्प रही है ... कहा जाता है कि जवाहर लाल नेहरु ने अटल जी के शुरुआती राजनैतिक दौर में ही अटल जी के अंदर अद्भुत नेतृत्व क्षमता की झलक देख ली थी और भविष्य में आगे चलकर ये सही भी साबित हुई ... बाद में जब कांग्रेस के कमजोर होने पर बीजेपी केंद्र की सत्ता में आई और अटल जी प्रधानमंत्री बने तब उन्होंने प्रधानमंत्री रहते हुए सोनिया गांधी को हर वो राजनैतिक अवसर दिया जिसकी बदौलत सोनिया खुद को एक परिपक्व नेता के रूप में स्थापित कर सकीं और अपने विरोधियों का मूंह बंद करा दिया ... जब-जब सोनिया गांधी की तरफ से कोई भी सुझाव अटल जी के पास जाया करता था .. अटलजी ना सिर्फ उसे गंभीरता से लेते बल्कि उस पर काम भी करते थे ... इस तरीके अटल जी अपने सियासी विरोधी का कद बढ़ाते रहे ...

इस बार मामला कुछ अलग है... इस बार समूचे गांधी परिवार के निशाने पर नरेंद्र मोदी है ... राहुल और वरुण दोनों अपने-अपने तरीकों से मोदी सरकार का विरोध कर रहे हैं ... इसमें खोखलापन बिल्कुल नहीं है...अब मानने वाले इसे गांधी परिवार की नूराकुश्ती भले ही मान लें मगर सच ये है कि पार्टी लाइन से अलग हटकर बोलना वरुण के लिए नया नहीं है...सवाल उठता है कि क्या पॉलिसी मैटर के बहाने भविष्य की किसी नई सियासत की नींव रखी जा रही है...जिसके केन्द्र में एक बार फिर गांधी परिवार ही रहने वाला है....