बुधवार, 20 जुलाई 2016

'हाशिम भाई' नहीं रहे !

हाशिम भाई नहीं रहे ... हाशिम भाई थे तो बाबरी मस्जिद के पैरोकार लेकिन उनको जानने वाले उन्हें इस रूप में याद नहीं रखेंगे कि उन्होंने अदालत में राम मंदिर बनने देने के खिलाफ पैरोकारी की है ...दरअसल बाबरी मस्जिद के इस सबसे बड़े पैरोकार का ऐसा चेहरा था ही नहीं ... वो तो ऐसा इंसान था जिसकी दुनिया से रुखसती ने अयोध्या के साधू संतों की आंखों में भी नमी ला दी ...जिसके जनाज़े में अयोध्या के तमाम साधू-संत शामिल हुए .... और ये यूं हीं नहीं हुआ ... इसके पीछे दशकों की वो लड़ाई है जिसमें विरोधी होते हुए भी हाशिम अंसारी ने राजनैतिक और वैचारिक मतभेद को इंसानी रिश्ते के बीच कभी नहीं आने दिया ...
 
अयोध्या में बाबरी मस्जिद को लेकर विवाद दशकों तक चला है ... 1949 से लेकर अब तक बाबरी मुकदमे की पैरवी से लेकर उस मुहिम को आगे बढ़ाने में हाशिम अंसारी का बहुत बड़ा रोल था ... बावजूद इसके हाशिम अंसारी की ओर से ना तो ऐसी कोई बात कही गई ना ही की गई जिससे सामाजिक सद्भाव बिगड़े, धर्मनिरपेक्षता की विचारधारा को कहीं से कोई ठेस लगे, हिंदू-मुस्लिम के बीच किसी तरह की कोई खाई पैदा हो ... सबसे खास बात ये थी कि जब हाशिम अंसारी मुकदमे की पैरवी के लिए अयोध्या से फैज़ाबाद जाते थे तो उनके साथ होते थे रामचंद्र परमहंस ... रामचंद्र परमहंस राम जन्म भूमि न्यास के पहले अध्यक्ष थे ... अयोध्या के जाने-माने संत थे जिन्हें विश्व हिंदू परिषद ने राम जन्मभूमि न्यास का अध्यक्ष नियुक्त किया था .. अदालत में एक दूसरे के खिलाफ पैरवी करने वाले ये दोनों महान लोग अदालत के बाहर भाईचारे की मिसाल थे ... एक रिक्शे से फैज़ाबाद जाना और मुकदमे की अगली तारीख पड़ जाने पार एक ही रिक्शे से वापस आना .... अयोध्या में रामचंद्र परमहंस के आश्रम में साथ बैठकर खाना खाना .. ताश खेलना... शाम की चाय भी साथ पीना .. ऐसी थी इनके बीच की understanding ... कई बार हाशिम अंसारी खेलने के दौरान रामचंद्र परमहंस पर बेईमानी के आरोप भी लगाते थे लेकिन कभी भी इनके बीच कोई दरार पैदा नहीं हुई ...
 
हाशिम अंसारी ने कभी भी खुद को, अपनी सोच को किसी के लिए नीलाम नहीं होने दिया फिर चाहे वो हिंदू पक्ष हो या फिर मुसलमान पक्ष, चाहे किसी भी राजनैतिक पार्टी के नेता हों या कार्यकर्ता ... उन्होंने कभी भी खुद की मार्केटिंग नहीं होने दी ... शायद यही वजह थी हाशिम अंसारी हमेशा फकीर ही रहे ... इतने लंबे समय तक बाबरी मस्जिद मुकदमे की पैरवी के दौरान कई बार ऐसा वक्त आया जब हाशिम अंसारी ने अपनी ही बिरादरी के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर बयान दिया .... उन लोगों के खिलाफ बयान दिया जो लोग उनका नाम बेचकर ... बाबरी मस्जिद आंदोलन को बेचकर अपनी जेबें भरते रहे ... अपने लिए महल खड़ा करते रहे ... अपने लिए विधानसभा और राज्यसभा की सीटें सुनिश्चित करते रहे .. कौम और बाबरी मस्जिद का नाम लेकर जिन लोगों ने अपनी दुकानें चलाईं ... अपना राजनैतिक उल्लू सीधा किया हाशिम अंसारी ने हमेशा इन लोगों की .. इनके मकसद की मुखालफत की ...
 
मैं लगभग 30 वर्षों से हाशिम अंसारी को जानता था ... हम लोग जब कभी भी रामजन्मभूमि-
बाबरी मस्जिद मामले, आंदोलन या फिर अयोध्या में हो रहे किसी कार्यक्रम की रिपोर्टिंग करने के लिए अयोध्या जाते थे तब बहुत करीब से हाशिम अंसारी और रामचंद्र परमहंस को देखने का मौका मिला ... आंदोलन और कार्यक्रम के बाद इन दोनों का जो आचरण था वो अपने आप में मिसाल है ... भले ही हाशिम अंसारी बहुत कम पढ़े लिखे व्यक्ति थे.. उन्होंने कभी भी किसी मस्जिद में नमाज़ नहीं पढ़ाई लेकिन रामचंद्र परमहंस और हाशिम अंसारी दोनों ने ही अपने कामकाज के जरिए, विचारों के जरिए अपनी सादगी के जरिए अयोध्या- फैज़ाबाद समेत पूरे देश में मिसाल पेश की ... इन्होंने ये साबित किया राजनैतिक, वैचारिक मतभेदों के बावजूद इंसानी रिश्ते कितने बेहतर तरीके से चलाए जा सकते हैं ... सामाजिक सद्भाव कितने बेहतर तरीके से बनाया जा सकता है ... और किस तरह से शांतिपूर्ण और तार्किक तरीके से अपनी बात कही जा सकती है .. अदालत के अंदर भी और अदालत के बाहर भी ...
 
बाद के दिनों में कई बार ऐसा वक्त आया जब हाशिम इंसारी ने खुले तौर पर बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और उन तमाम शख्सियतों, जमातों की संगठनों की खुली आलोचना की ...हाशिम अंसारी हमेशा उन लोगों के विरोध में रहे जो लोग बाबरी मस्जिद का राजनीतिकरण कर रहे थे ... जो लोग बाबरी मस्जिद की आड़ में हिंदू-मुस्लिम के बीच खाई पैदा करने की कोशिश कर रहे थे ... जो लोग बाबरी मस्जिद की आड़ में इंसानी रिश्तों के बीच दरार पैदा कर रहे थे ... जो लोग मुस्लिमों के तथाकथित रहनुमा बनकर अपनी राजनीति चमका रहे थे ...
 
बाबरी मस्जिद आंदोलन के दौरान ऐसे तमाम लोग थे जो अब तक सुरक्षा लेकर बाहर निकलते थे ... लेकिन इस मुकदमे की पैरवी करने वाले इस पैरोकार ने कभी भी सुरक्षा नहीं ली ... जब अयोध्या में तनाव अपने चरम पर था तब भी हाशिम अंसारी और रामचंद्र परमहंस अपनी शख्सियत की बदौलत अयोध्या में बिना सुरक्षा के घूमते रहे ... रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद मामले को इन्होंने कभी सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश नहीं की इसकी लड़ाई इन्होंने एक दीवानी मामले की तरह लड़ी ... इन्होंने कभी नहीं कहा कि मंदिर ना बने या मस्जिद ना बने ... रामचंद्र परमहंस कुछ साल पहले ही दुनिया से चले गए थे... और आज हाशिम अंसारी के इस दुनिया से जाने के बाद भले ही ये दोनों इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन जिस तरह से इन्होंने इस आंदोलन में अपनी भूमिका निभाई वो निश्चित रूप से काबिले तारीफ थी ...

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

मोदी सरकार- एक कदम आगे, दो कदम पीछे

सत्ता में आने के बाद बीजेपी की सरकार ने जो विकास के वादे को पूरा करने की दिशा में पहले कुछ कदम उठाए थे उनमें से एक था land acqusition Bill को पास कराना .. इसके पीछे ये दलील दी गई थी सरकार विकास के काम तेज़ी से तभी कर सकती है जब उसके काम में क्लीयरेंस के नाम पर रुकावट ना आए ..... लेकिन मोदी सरकार ने UPA के Land acquisition bill में जो बदलाव किए वही बदलाव सरकार की गले की हड्डी बन गई ... बिल लोकसभा में शोर शराबे के बीच पास तो हो गया क्योंकि बीजेपी के पास संख्या बल की कमी नहीं थी लेकिन राज्यसभा में सरकार ये बिल पेश भी नहीं कर पाई ... इस दौरान विपक्ष सरकार पर किसान विरोधी होने तो सरकार विपक्ष पर विकास में रोड़ा अटकाने का आरोप लगाती रही ...
दरअसल बीजेपी सरकार ने यूपीए के ज़मीन अधिग्रहण कानून में अधिग्रहण के एवज़ में प्रभावित होने वाले 80 फीसदी लोगों की मंजूरी और Social impact assesment जैसे प्रावधानों को खत्म कर दिया था ... इससे ज़मीन अधिग्रहण में तेज़ी आती लेकिन जिनकी ज़मीन का अधिग्रहण होता वो प्रभावित होते और कई लोगों को बिना मर्ज़ी के अपनी ज़मीनें तय मुआवज़े पर देनी होतीं ... सरकार के इस कानून से यूपीए में वक्त में रहा पॉलिसी पैरालिसिस तो खत्म हो जाता और काम काज में भी तेजी आती ... मोदी सरकार ने कानून में ये बदलाव भी इसी मंशा से किया था ... प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप बनाया, सिंगल विंडो क्लीयरेंस की व्यवस्था कर दी ताकि कानूनों का जाल विकास की रफ्तार को सुस्त ना कर सके ... लेकिन ये सब इतना आसान नहीं था ...
लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हार का सामना कर चुकी कांग्रेस ने मोदी सरकार के ज़मीन अधिग्रहण कानून को किसान विरोधी साबित कर दिया और इस पर इतना शोर शराबा हुआ कि सरकार को इस मसले पर कई बार अपने कदम पीछे करने पड़े ... शायद इसके बाद भी मोदी सरकार विकास के नाम पर इसे आगे बनाए रखती लेकिन बिहार के चुनाव में अपनी हालत देखकर लगता है बीजेपी उत्तर प्रदेश और पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव में यही कहानी नहीं दोहराना चाहती ... इन दोनों ही राज्यों में किसानों की बड़ी आबादी है और शायद इसीलिए बीजेपी के लिए विकास के वादों पर वोटबैंक हावी हो रहा है ... अब बीजेपी को इस बिल को वापस लेने का फायदा होगा या नहीं ये अभी से कहना जल्दबाज़ी होगी लेकिन ये तय है कि विकास की जिस रफ्तार के सपने दिखाकर बीजेपी ने सरकार बनाई थी वो रफ्तार सुस्त ज़रूर पड़ने वाली है ... ये सवाल भी ज़रूर उठ रहे हैं कि क्या अब बीजेपी के लिए विकास महत्वपूर्ण नहीं रहा ... ये भी सवाल है कि क्या बीजेपी पहले गलत कानून थोपने की कोशिश कर रही थी या अब वोट के लिए विकास से तौबा कर रही है ...