सोमवार, 6 जून 2016

भिंडरावाले से रामवृक्ष तक !

ऑपरेशन ब्लू स्टार की बरसी पर लोग भिंडरावाले को भी याद कर रहे हैं ... जो लोग भिंडरावाले का इतिहास और उसकी कार्यशैली जानते हैं उन्हें वर्तमान में भी उसके जैसा किरदार दिख रहा होगा ... जो अभी तक उतना सशक्त नहीं हो पाया था और ना ही वो अपने हाथ पैर भिंडरावाले की तरह फैला पाया था लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि अगर उस शख्स को अपने खड़े किए empire के साथ एक दो साल छोड़ दिया जाता तो वो भिंडरावाले के इतिहास को दोहराता नज़र आता ...
उत्तर प्रदेश के मथुरा में जवाहर बाग में हुई पुलिसिया कार्रवाई में मारा गया रामवृक्ष कई मायनों में भिंडरावाला इन मेकिंग था ... जवाहरबाग में जिस तरह से असलहे मिले .. मेकशिफ्ट मार्केट से लेकर कम्युनिटी किचन तक मिला वो किसी सत्याग्रह की तरफ तो इशारा नहीं करता ... और ये बात भी साफ है कि बिना राजनैतिक संरक्षण के शहर के अंदर अपनी समानांतार हुकूमत चलाना मुमकिन नहीं था .. जिस तरह से रामवृक्ष को एक अलग दुनिया बनाने के लिए पूरे दो साल का वक्त दिया गया वो भी इस बात को साबित करता है कि उसे कोई तैयार कर रहा था ... दो साल से जवाहरबाग पर काबिज रामवृक्ष को हटाने की पांच बार कोशिशें हुईं ... हर बार कोशिश करने वाले अधिकारी का तबादला हो गया ... ये महज़ इत्तेफाक तो नहीं हो सकता .. यहां ये जानना भी ज़रूरी है कि आखिर रामवृक्ष था कौन और उसके इस तरह पावरफुल होने से किसे फायदा हो सकता था ...
रामवृक्ष बाबा जयगुरुदेव की लगभग 12 हज़ार करोड़ की संपत्ति का दावेदार था ... जिसपर नेताओं से लेकर भूमाफियाओं तक की नज़र थी ... लेकिन जयगुरुदेव की इस हज़ारों करोड़ की संपत्ति का उत्तराधिकार पंकज यादव को मिल गया ... तो क्या इसी संपत्ति पर वापस अधिकार पाने की साज़िश के तहत रामवृक्ष यादव मथुरा के जवाहरबाग में जाकर टिका था ... स्वाधीन भारत विधिक सत्याग्रह के बैनर तले अजीबोगरीब सत्याग्रह कर रहा था ... आरोप उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज समाजवादी पार्टी की सरकार के एक मंत्री पर भी लग रहे हैं कि उन्हीं की शह की बदौलत रामवृक्ष यादव पर हाथ डालने की हिम्मत कोई अधिकारी नहीं कर पा रहा था .... अब सवाल ये है कि क्यों शह देकर ऐसे किरदार पैदा किए जाते हैं ...
साठ के दशक के मध्य में ताकतवर होती अकाली पॉलिटिक्स ने सिख अस्मिता के नाम पर सिख वोटरों में
अपनी मजबूत पकड़ बना ली थी...उस दौर में अकालियों के आंदोलन के चलते सिख बाहुल्य अलग पंजाब की मांग केन्द्र सरकार ने मान ली थी... जिसके बाद राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए 1966 में हरियाणा, हिमाचल और पंजाब का गठन भी कर दिया गया लेकिन चंडीगढ़ को पंजाब में मिलाने...नदियों के पानी पर दूसरे राज्यों का एकाधिकार खत्म करने जैसे कई मुद्दे थे जो तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के लिए मुश्किल बने हुए थे... जानकार मानते हैं कि अकालियों की इसी पॉलिटिक्स को जवाब देने के लिए इंदिरा गांधी ने भिंडरावाले को शह दी...जो दमदमी टकसाल का प्रमुख बन चुका था...पहली बार 1978 में निरंकारियों और भिंडरावाले समर्थकों के बीच हिंसक झड़प हुई...जिसके बाद भिंडरावाले अकालियों के मुकाबले कट्टर सिख पॉलिटिक्स का हीरो बन गया.....फिर क्या था... राजनीतिक हत्याओं का दौर शुरु हो गया....भिंडरावाले का प्रभाव बढ़ने लगा था और वो कांग्रेस के लिए अकालियों से बड़ा खतरा साबित होने लगा था... सिख अस्मिता की सियासत उग्र हो चुकी थी...नतीजा खालिस्तान की मांग और फिर आखिरकार ऑपरेशन ब्लू स्टार से होते हुए इंदिरा गांधी की हत्या पर जाकर खत्म हुआ...
रामवृक्ष की ताकत और उसकी तैयारी का मंजर दुनिया देख चुकी है...खुलासों का सिलसिला अभी भी जारी है...सवाल उठ रहा है कि क्या रामवृक्ष भी दूसरा भिंडरावाले बनने की राह पर था...जिस तरह निरंकारियों के खिलाफ भिंडरावाले की मुहिम को दो साल तक इंदिरा गांधी की सरकार बैठकर देखती रही ठीक उसी तरह जवाहरबाग में युद्ध जैसी तैयारी में जुटे रामवृक्ष का तमाशा यूपी सरकार देखती रही... इन सवालों को ज्यादा गहरा कर रही है जवाहरबाग में मिली एक डायरी...जिसमें करीब 156 लोगों के नाम दर्ज हैं... माना जा रहा है कि ये वही लोग हैं जो रामवृक्ष की मदद किया करते थे...इसमें दर्ज नामों में से 29 लोग दिल्ली के रहने वाले हैं जिनमें कई वकील भी हैं...अब सवाल ये उठ रहा है कि क्या रामवृक्ष को फंडिंग करने वाले लोगों को उससे किसी बड़ी क्रांति की उम्मीद थी...क्या विचारधारा के स्तर पर रामवृक्ष से ये लोग इतने ज्यादा प्रभावित थे कि उसे आर्मी बनाने और समानान्तर सरकार बनाने तक के लिए आर्थिक मदद कर रहे थे...और उसकी बगावत का समर्थन कर रहे थे...असल में रामवृक्ष ने भी भिंडरावाले की ही तरह पहले एक धार्मिक पंथ यानी बाबा जयगुरुदेव के अनुयायी के तौर पर पहचान बनाई...फिर अपना संगठन बनाया और फिर नया संगठन बनाकर नई मुहिम शुरु कर दी... आखिरकार जिस तरह बेलगाम हो चुके भिंडरावाले के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार की नौबत आ गई ठीक वैसे ही स्वंयभू सम्राट रामवृक्ष के लिए ऑपरेशन जवाहरबाग की नौबत आई...
रामवृक्ष का किला ढह चुका है मगर जो खुलासे हो रहे हैं वो ये बता रहे हैं कि असल में रामवृक्ष का मकसद सिर्फ आजाद हिन्द की सरकार बनाना या फिर कोई बड़ी क्रांति करना नहीं था बल्कि रामवृक्ष सिर्फ मोहरा था जिसे खेल रहे थे कुछ बड़े चेहरे...जिनकी पहचान साबित होनी अभी बाकी है...अब सवाल ये कि क्या रामवृक्ष अपने मकसद से पहले ही राजनीतिक हाथ छूटने का शिकार हो गया...क्या भिंडरावाले बनने की प्रक्रिया बीच में ही रुक गई... क्या सियासत इतनी ज्यादा मतलबपरस्त होती है कि अपना फायदा साधने के लिए किसी को किसी भी हद तक जाने से गुरेज नहीं होता...

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