शनिवार, 11 जून 2016

अंतर्कलह के दलदल में कैसे खिलेगा कमल !

 2017 के चुनाव बीजेपी के लिए 2014 में हुए political battle से कम नहीं है ... मिशन उत्तरप्रदेश की अपनी रणनीति में भारतीय जनता पार्टी हर वो component डालना चाहती है जिससे पार्टी की जीत सुनिश्चित हो सके... लेकिन उससे पहले पार्टी को अपने ही नेताओं को साधने में पसीने छूट रहे हैं... ऐसे में अंतर्कलह और गुटबाजी के इस दलदल में कमल के खिलने पर सवाल खड़े हो रहे हैं .... बीजेपी में अंदरखाने इस बात का अंदाजा है कि उत्तरप्रदेश जैसे सूबे में ये मुश्किल कितनी बड़ी है वो भी तब कि सेनापति के नाम पर माथापच्ची का दौर थमने का नाम ही न ले....फिर सवाल ये भी कि party with difference में नेतृत्व को लेकर इतने differences क्यों... जहां माया, मुलायम जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों से टकराना भी अपने आप में बड़ी चुनौती है .... वहां कई दावेदारों का होना क्या बीजेपी की मुश्किलें और नहीं बढ़ा रहा ...

लंबे वक्त तक प्रदेश अध्यक्ष के नाम पर मंथन करने के बाद बीजेपी ने केशव प्रसाद मौर्या को कमान सौंपी थी अब एक बार फिर CM Face को लेकर मंथन शुरू हो गया है ... ऐसा लग रहा है जैसे पार्टी में अपने कद को बढ़ाने में लगे नेता और उनके समर्थक कार्यकर्ता इस मौके का भरपूर फायदा उठाने में लग गए हैं ... इसीलिए कभी वरुण गांधी के समर्थक हंगामा करते नज़र आते हैं ... तो कभी महंत आदित्यनाथ को भगवान राम के रूप में दिखाते हुए बड़े बड़े पोस्टर लगा दिए जाते हैं .... ऐसा लग रहा है जैसे बीजेपी के लोगों को सत्ता नजदीक आती दिख रही है ...शायद इसीलिए हर व्यक्ति मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रहा है ..

लेकिन पार्टी के सामने कई चुनौतियां हैं... पहला ये लोकसभा चुनाव नहीं है ... विधानसभा चुनावों में same formula से जीत नहीं हासिल की जा सकती ... यहां मुद्दे और समीकरण अलग होते हैं ... उत्तर प्रदेश में मायावती और मुलायम जैसे चेहरे हैं ... इसीलिए पार्टी को मुख्यमंत्री के लिए चेहरा इनकी बराबरी का ही उतारना होगा ... दूसरा यहां multi corner contest है ... ऐसे में जीत के लिए छोटी से छोटीstrategy पर काम करना ज़रूरी हो जाता है ... पार्टी को Full proof प्लानिंग करनी होगी ... रणनीति बनानी होगी ... मुख्यमंत्री पद के लिए 403 विधानसभा सीटों के लिए सर्वमान्य चेहरे की तलाश करनी होगी ... केंद्र में 2 साल तक के अपने शासन को लेकर उपजी anti incumbency wave को भांपकर उसकी काट तैयार करनी होगी ... फिर उसी स्तर की तैयारी करनी होगी तभी यहां की सियासत में अपनी खोई हुई जमीन दोबारा पा सकेंगे ... शायद यही सोचकर पार्टी राजनाथ सिंह को आगे करने का मन बना रही है ... राजनाथ सिंह राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर यूपी के मुख्यमंत्री तक रह चुके हैं ....

राजनाथ उत्तरप्रदेश में पार्टी के सबसे कद्दावर नेता हैं... माया, मुलायम से टक्कर लेने में राजनाथ का लंबा सियासी अनुभव काम आ सकता है ... राजनाथ के सहारे ठाकुर और ओबीसी वोट साधने की कवायद है .. शायद इसीलिए केंद्र में मंत्री रहते हुए उन्हें कैंपेन कमेटी का चेयरमैन बनाने की तैयारी चल रही है ..
हालांकि यहां ये भी नहीं भूलना चाहिए कि उत्तर प्रदेश की सियासत में पार्टी के अंदर गुटबाजी की शुरुआत राजनाथ सिंह के कार्यकाल में ही हुई थी ... बल्कि जब कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे तभी से पार्टी के अंदर गुट बनने शुरू हो गए थे .... इसी गुटबाजी के परिणामस्वरूप राजनाथ सिंह ने पहले रामप्रकाश गुप्त को मुख्यमंत्री बनाया फिर खुद बन गए ... ये भी सच है कि राजनाथ सिंह की वजह से ही कल्याण सिंह के मंत्रिमंडल में सबसे ज्यादा अपराधियों को मंत्री बनाया गया और ये भी सच है कि इसके बाद जब राजनाथ सिंह के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया तो पार्टी की सिर्फ हार ही नहीं हुई बल्कि आज तक पार्टी प्रदेश में वापसी नहीं कर पाई ... सवाल यूपी की जातिगत सियासत का भी है क्योंकि अगर राजनाथ पार्टी का चेहरा बनते हैं तो उनके सहारे ठाकुर और ओबीसी वोटबैंक को भले ही साधा जा सकता है लेकिन ब्राह्मण मतदाता किस तरफ रुख करेंगे ये भी बीजेपी की बड़ी चिंता है ...

हालांकि अब हालात अलग हैं .... पार्टी कट्टर हिंदुत्व के एजेंडे से हटकर विज़न डॉक्यूमेंट पेश करने लगी है .... जनता के मन में ये बात आने लगी है कि बीजेपी जाति की राजनीति करने वाली पार्टियों से बेहतर साबित हो सकती है... SP के शासनकाल में कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े होते रहते हैं तो बीएसपी के शासनकाल में सबसे ज्यादा विकास पार्क और मूर्तियों के रूप में सामने आता है ... कांग्रेस अभी सुधार के मूड में नहीं है ऐसे में बीजेपी खुद को सबसे मजबूत विकल्प के रूप में पेश कर सकती है .. लेकिन जीत के लिए कुछ बातें सुनिश्चित करनी होंगी मसलन बीजेपी का Rank और Fileएकजुट होकर क्षेत्रीय क्षत्रपों से मुकाबला करने जाए ...  पार्टी मोदी फैक्टर के भरोसे काम ना करे ...  ground level पर जाकर काम करे और लोगों में ये विश्वास जगाने का काम करे कि पार्टी अंदरखाने दूसरी पार्टियों से मिलीभगत करके नहीं बैठी ...  खुद राजनाथ सिंह पर ये आरोप लगते रहे हैं कि वो  चुनाव जीतने के लिए मुलायम सिंह यादव और अजीत सिंह से सांठगांठ करते हैं ... पिछले लोकसभा चुनाव में राजनाथ सिंह के खिलाफ मुलायम ने कई महीने तक Campaign कर चुके अशोक वाजपेयी को हटाकर dummy candidate उतार दिया था ... तो क्या बीजेपी उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह के इस राजनैतिक इतिहास को भुला देगी ... और अगर राजनाथ सिंह को बीजेपी अपना चेहरा नहीं बना रही तो वो कौन है जो बीजेपी के कमल को इस अंतर्कलह के दलदल में भी खिला सके  इस तरह के कई सवाल हैं हो सकता है इनका जवाब इलाहाबाद में बीजेपी की दो दिनों तक होने वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मिल जाए ...


कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें