गुरुवार, 2 जून 2016

शिक्षा पर सियासत भारी !

रूपयौवनसंपन्ना विशाल कुलसम्भवा:
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इन किंशुका ..

ये सच है कि कोई इंसान चाहे कितने हीं ऊंचे कुल में पैदा हुआ हो ... कितना ही धनसंपन्न हो, कितना ही खूबसूरत हो .. अगर उसके पास विद्या ना हो तो वो बिना सुगंध के फूल जैसा होता है... शायद यही वजह है कि हमारे पूर्वज शिक्षा पर सबसे ज्यादा जोर दिया करते थे .... लेकिन अब शायद शिक्षा का उतना जोर नहीं रहा ....या ऐसा कह लें कि जिनके हाथों में इसकी कमान थी उन सबके लिए शिक्षा या तो वोट बढाने या नहीं तो पैसा कमाने का साधन हो गया है .... अगर ऐसा नहीं होता तो बिहार बोर्ड के बारहवीं के नतीजों के बाद सबसे ज्यादा मार्क्स पाकर टॉपर बने स्टूडेंट हर गली चौराहे पर चर्चा का विषय नहीं बने होते ...

इन टॉपर्स ने बिहार के शिक्षा मंत्री समेत देशभर को हैरान कर दिया है ... इन्होंने समूची शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं ... जिनकी काबिलियत उन्हें परीक्षा में पास करने योग्य नहीं बताती उन्होंने मार्क्स स्कोर करने में अपने प्रदेश के सभी बच्चों को पीछे छोड़ दिया है ... परीक्षा देते समय शायद इन बच्चों को भी इसका इल्म नहीं रहा होगा कि ये इतिहास रचने जा रहे हैं ... लेकिन दोषी क्या ये बच्चे हैं ... या फिर ये बच्चे खुद उस व्यवस्था का शिकार हैं जिसने अपने फायदे के लिए इन्हें अंधकार से भरे भविष्य की ओर धकेल दिया है ... वो कौन हैं जिन्होंने देश के भविष्य को ऐसा नुकसान पहुंचाया है जिसकी भरपाई करने में सालों निकल जाएंगे ...

देश के सरकारी स्कूलों की बदहाली की कहानी कोई नई नहीं है...लेकिन किसी बोर्ड के एग्ज़ाम के टॉपर ही ऐसे निकल जाएं जो अपने विषय तक का नाम तक न बोल पाएं तो समझ लीजिए हालात बेहद गंभीर हैं... बिहार स्कूल शिक्षा बोर्ड के एग्ज़ाम पर उठ रहे सवाल ने कुछ बुनियादी सवाल खड़े किए हैं...सवाल ये कि क्या हमने सामाजिक न्याय का सही कॉन्सेप्ट सामने रखा? कहीं ऐसा तो नहीं कि अपनी सियासत चमकाने के चक्कर में नेताओं ने उस बड़े तबके को सही शिक्षा से वंचित कर दिया...आपने बच्चे को बता दिया कि बगैर मेहनत के भी कामयाबी की सीढ़ी चढ़ी जा सकती है...नाम कमाया जा सकता है... आज अगर शिक्षा बदहाल है तो इसका ये हाल एक दो दिन में नहीं हुआ...ये दशकों की कारगुज़ारियों का नतीजा है... और शिक्षा का ये हाल किया है उन नेताओं की पॉलिटिकल चालों ने जो अपनी जीत के लिए कोई भी दांव चल सकते हैं फिर चाहे इससे नुकसान देश का ही क्यों ना हो रहा हो ...

बिहार जो एक के बाद बड़े आंदोलनों का गवाह रहा...जहां से एक के बाद एक बड़े विद्वान निकले और आज भी देश की प्रशासनिक सेवाओं के लिए अहम योगदान दे रहा है... आखिर क्या हो गया है उस बिहार को, कि वहां की परीक्षाओं में सामूहिक नकल की तस्वीरें हेडलाइंस बनती हैं .... वहां के टॉपर्स का इंटरव्यू हैरान कर देता है ... दरअसल इन सब का जवाब तब मिलता है जब आप पिछले कुछ दशकों की बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर नज़र डालते हैं ...लालू यादव बिहार पर कई दशक तक राज करते रहे लेकिन शिक्षा को लेकर उनका ख्याल ये है कि बच्चों को परीक्षा में किताब ही उपलब्ध करा दी जानी चाहिए आखिर जो पढ पाएंगे वही तो लिख पाएंगे ... दरअसल लालू राज में बिहार की हालत यही थी .... खुलेआम परीक्षा केंद्रों पर पर्चियों से नकल की जाती थी ... शासन से लेकर शिक्षक तक भरपूर मदद किया करते थे ... ऐसा कई साल तक चलता रहा ... आप कल्पना करिए कि इस दौरान बिहार बोर्ड से पास होने वाले लाखों छात्र कितनी शिक्षा ग्रहण कर पाए होंगे .... और आज उनकी जिंदगी क्या होगी .. ये वो दौर था जब बिहार से बच्चे अगर दिल्ली आकर दाखिला लेने की कोशिश करते थे तो उनकी मार्कशीट को सवालों के साथ देखा जाता था ... जो छात्र नकल नहीं भी करते थे उनका पूरा सेशन अपनी मेरिट को साबित करने में लग जाता था ... बहुत मुश्किल से पिछले कुछ साल में बिहार की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव होने लगा था कि एक बार फिर इस पर सवाल खडे़ होने लगे हैं ... सवाल ये उठता है कि आखिर क्यों ऐसा होता रहा है ....

यूपी-बिहार में शिक्षा को इस तरह मज़ाक बना देने के पीछे पूरी तरह से सियासी मकसद है ... असल में मंडल आंदोलन के बाद बिहार की सत्ता में बड़ा परिवर्तन आया...सत्ता में पिछड़ों की भागीदारी बढ़ गई...खासतौर पर यूपी और बिहार में पिछड़ी जातियों की सियासत करने वाले नेता सत्ता के शीर्ष पर पहुंच गए...सामाजिक न्याय के नाम पर फिर ऐसा खेल चला कि समाज के हर तबके में जातियों के आधार पर भर्तियां होने लगीं...शिक्षा का भी यही हाल हो गया...टीचर्स की भर्ती के लिए नियमों को या तो कमज़ोर किया गया या फिर उन्हें ताक पर रखा गया...बुनियादी ढांचे पर कोई ध्यान नहीं दिया गया...और समाज के दूसरे क्षेत्रों की तरह शिक्षा में भी माफिया की एंट्री हो गई...भर्ती से लेकर, ट्रांसफर तक और एग्ज़ाम में नकल से लेकर रिज़ल्ट तक के रेट फिक्स होने लगे...
यूपी भी उन राज्यों में से हैं जहां सामाजिक न्याय सियासत का अहम हिस्सा रहा....लेकिन हुआ क्या ... तस्वीर वही रही ... यहां भी शिक्षा सामाजिक न्याय की गलत अवधारणा का शिकार बन गई...मुलायम सिंह यादव और मायावती पिछले ढाइ दशकों में सत्ता के शीर्ष पर रहे हैं...ऐसे में सूबे की शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने की ज़िम्मेदारी इनके पास थी...लेकिन हुआ क्या इसकी तस्वीरें अब सामने आ रही हैं... सरकारों ने अपनी जातियों के लोगों को प्रमोट करना शुरू कर दिया... टीचरों की भर्तियों में धांधली की खबरें आने लगीं...नकल को लेकर कल्याण सिंह सरकार ने कानून बनाया था कि नकल करने वाले बच्चे जेल जाएंगे...लेकिन मुलायम ने आते ही इस कानून को बदल दिया..ये कहते हुए कि ये पिछड़ों को रोकने की साजिश है ... हाल में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि सरकारी स्कूलों की हालत ठीक करने के लिए नेताओं और सरकारी अफसरों के बच्चों का सरकारी स्कूल में एडमिशन ज़रूरी है....इस फैसले का भी अखिलेश सरकार ने विरोध किया... ऐसे में ना तो स्कूलों की हालत सुधरी ना हीं शिक्षा व्यवस्था की ... देश की सबसे बड़ी परीक्षा करवाने वाले यूपी शिक्षा बोर्ड के एग्ज़ाम में जिस बड़े पैमाने पर नकल हुई वो देश विदेश की मीडिया में सुर्खियां बन गईं.. ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है कि सरेआम नकल करने वाले बच्चों को जब आगे की परीक्षाओं में नकल की इजाज़त नहीं मिलती होगी तो इनका क्या होता होगा ...

ऐसे में क्या शिक्षा व्यवस्था का मज़ाक बनाकर, इसके जरिए वोट और नोट कमाने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होनी चाहिए ... जब शिक्षा ही बच्चों का भविष्य है और बच्चे देश का ... तो क्या शिक्षा व्यवस्था में ठोस बदलाव की ज़रूरत नहीं है ... क्या इसकी उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकारें नकल की तस्वीरें और टॉपर्स की असलियत सामने आने पर दोबारा परीक्षा या जांच की ज़रूरत बताने के अलावा भी सक्रिय होंगी ... पहल करेंगी कि ना सिर्फ literacy rate बढ़े बल्कि बच्चों को ऐसी शिक्षा मिले कि वो दुनिया भर में ज़हीन कहे जाएं ...

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