शुक्रवार, 6 मई 2016

कंफ्यूज क्यों है बीजेपी ?


2014 में बीजेपी प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई और सालों बाद देश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। इसके बाद कुछ राज्यों के चुनाव में भी बीजेपी ने अच्छा प्रदर्शन किया,, लेकिन इसके बाद कई राज्यों में पार्टी के औंधे मुंह गिरने से पार्टी की थिंकिंग पर सवाल उठने लगे हैं केन्द्र में सरकार के गठन से लेकर अब तक बीजेपी Issues  को लेकर devided नज़र आ रही है..  लोकसभा चुनावों में विकास को मुद्दा बनाकर बीजेपी ने चुनाव जीता था,, और इसके बाद से बीजेपी को लगने लगा था,, कि इसी मुद्दे से वो बाकी चुनावों में भी जीत हासिल कर सकते हैं.. लेकिन कुछ ही महीने बाद दिल्ली में बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा,, नतीजा ये हुआ कि बिहार चुनावों के दौरान से ही वो मुद्दों पर experiment करने लगे। बिहार में वोटिंग से ठीक पहले संघ की तरफ से रिजर्वेशन खत्म करने जैसी बातें सामने आने लगीं ... लिहाजा बिहार के चुनावों में भी उन्हें करारी शिकस्त मिली ... इसके बाद अपना आत्मविश्वास खो चुकी बीजेपी की हालत उस शख्स की तरह हो गई है जो अंधेरे में अपनी मंजिल तलाशने के लिए इधर उधर हाथ पांव मार रहा है।

कभी बीजेपी को लगता है कि वो जातीय समीकरण बिठाकर अपनी मंजिल पा सकते हैं तो कभी उन्हें लगने लगता है कि अंबेडकर को आगे कर दलित एजेंडे पर काम करते हुए वो वोट बैंक तैयार कर सकते हैं,, यही नहीं कभी उन्हें लगने लगता है कि रिज़र्वेशन में आर्थिक आधार की बात कर उनका काम बढ़ सकता है तो कभी लगता है कि दलित डुबकी लगाने से वो वोट पा सकते हैं।
बीजेपी राम मंदिर के सहारे दो सांसदों से सत्ता तक पहुंची थी ... एक दौर में अटल बिहारी वाजपेयी ने Gandhian Socialism का नारा दिया था ...जिसकी वजह से उन्हें हार का सामना करना पड़ा.. उनके अपने ही cadre ने Gandhian Socialism की Philosophy को accept नहीं किया... इसके बाद एक बार फिर बीजेपी प्रखर राष्ट्रवाद और दीनदयाल के integrated humanism की बात करने लगी ... राम मंदिर को मुद्दा बनाया गया ... देशभर में आंदोलन चलाया गया ... बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया ... चार राज्यों में बीजेपी की सरकारें भी बर्खास्त कर दी गईं,,, फिर ऐसा वक्त आया कि राम मंदिर के ही मुद्दे ने बीजेपी को केंद्र में सरकार बनाने का भी मौका दे दिया ... लेकिन पार्टी के अंदर इस मुद्दे पर confusion बरकरार रहा। NDA में रहकर बीजेपी को लगने लगा कि अगर राम मंदिर के मसले पर अड़े रहे तो नुकसान उठाना पड़ सकता है ... NDA में दरार पड़ सकती है। हाल के सालों में भी बीजेपी खुद को विकास का पैरोकार साबित करने की कोशिश में रही है शायद इसीलिए अब मंदिर का मुद्दा Forefront पर नहीं रहा ... मोदी development और Global Image बचाने के चक्कर में मंदिर मुद्दे को forefront पर ले जाने से डर रहे हैं। बीजेपी के अंदर जो नीति निर्धारक लोग हैं वो caste politics, Communal Politics, regionalism तो कभी दलित एजेंडा को लेकर आगे पीछे हो रहे हैं ... उन्हें खुद ही समझ में नहीं आ रहा कि UP के complex political scenario में कौन सा एजेंडा काम आएगा। 

केशव प्रसाद मौर्या जब उत्तर प्रदेश में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बनने जा रहे थे,, तब जोर-शोर से इस बात का प्रचार किया गया कि वो संघ background के हैं ... राम मंदिर आंदोलन में सक्रिय रहे हैं लेकिन जब वो पार्टी के अध्यक्ष बन गए तो उन्होंने ऐलान कर दिया कि राम मंदिर का निर्माण उनका एजेंडा नहीं है ... और अब अपने अध्यक्ष बनने के महीने भर के अंदर ही उन्होंने अपने अयोध्या जाने का ऐलान कर दिया है। बीजेपी के अंदर मुद्दों को लेकर जो उठापठक चल रही है इसके पीछे लगता है वो डर है जो दिल्ली और बिहार में करारी हार मिलने के बाद उनके मन में घर कर गया है

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