गुरुवार, 12 मई 2016

बोम्मई से रावत तक !

उत्तराखंड में पिछले लगभग डेढ़ महीने के सियासी घमासान के बाद आखिरकार बीजेपी को मुंह की खानी पड़ी है ... कोर्ट की दखल से जनता द्वारा चुनी गई बहुमत वाली सरकार को जीवनदान मिला है ... इस घटना से केंद्र सरकार की ना सिर्फ फज़ीहत हुई है बल्कि एक बार फिर ये बात साबित हो गई है कि अति महात्वाकांक्षा रखने वाले जोड़-तोड़ की राजनीति की बदौलत संविधान और लोकतंत्र का मज़ाक नहीं बना सकते ... उत्तराखंड में गलत तरीके से लगाए गए राष्ट्रपति शासन के मामले में कोर्ट का जो फैसला आया है उसने दो दशक बाद एक बार फिर एक कीर्तिमान स्थापित कर दिया है ... एसआर बोम्मई केस के बाद पहली बार ऐसा हुआ है जब किसी सरकार की बर्खास्तगी का मुद्दा इस तरह केन्द्र सरकार के लिए शर्मिन्दगी का सबब बन गया हो...मगर सवाल बड़ा ये कि ये स्थिति आई ही क्यों...क्या इससे बचा जा सकता था...क्या केन्द्र के सलाहकारों ने गलत सलाह दी या फिर केन्द्र सरकार में बैठे लोग सत्ता के गुरूर में सही-गलत का आंकलन करने में चूक गए... अदालती फैसले ने साथ ही साथ सत्ता के नशे में संवैधानिक दायरे लांघने वालों को एक कड़ा मैसेज भी दिया है... मगर सवाल ये कि क्या वाकई हमारी राजनीतिक जमात इसे समझेगी...

जुगाड़ के नंबरों के सहारे एक छोटे से राज्य के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने उस बीजेपी सरकार को घुटनों के बल बैठा दिया है जिसके पास अपने 30 साल के इतिहास में सबसे बड़ा नंबर है... संवैधानिक मर्यादा और बदले की सियासत के बीच जीत संविधान की हुई है...शायद यही वजह है कि मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के संकेतों की अनदेखी करने वाली केन्द्र सरकार ने फैसले का सीलबंद लिफाफा खोले जाने के पहले ही हार मान ली और राष्ट्रपति शासन हटाने की बात कहने लगे ... सवाल बड़ा ये कि क्या डेढ़ महीने से चल रही सियासी नौटंकी के दौरान एक बार भी केन्द्र के रणनीतिकारों के जेहन में ये ख्याल नहीं आया कि असल में उनसे चूक हो गई...या फिर सत्ता की हनक ने ऐसा सोचने नहीं दिया...

केन्द्र सरकार से चूक यहीं भर नहीं हुई...राष्ट्रपति शासन लगाने के पहले भी सरकार ने होमवर्क नहीं किया... बागी नेताओं और बीजेपी के कुछ नेताओं के दबाव में आनन-फानन में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया... राज्य में संवैधानिक संकट था या नहीं इसे ठीक से चेक भी नहीं किया गया... राज्यपाल ने हरीश रावत को 28 मार्च तक बहुमत साबित करने का मौका दिया था बावजूद इसके राष्ट्रपति शासन लगाया गया जो सीधे-सीधे एसआर बोम्मई केस में आए कोर्ट के आदेशों के खिलाफ था...

1989 में कर्नाटक में एसआर बोम्मई के नेतृत्व वाली जनता दल की सरकार को राज्यपाल ने अल्पमत में
बताकर राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी थी हालांकि बहुमत वाली बोम्मई सरकार राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के विरोध में कोर्ट चली गई थी और मामला कर्नाटक हाईकोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया था .. 1994 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया और धारा 356 के दुरुपयोग करते हुए राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाने पर रोक लगा दी.. कोर्ट ने साफ साफ कहा कि ऐसी स्थिति बनने पर जब लगे कि सरकार अल्पमत में है बहुमत सिर्फ सदन के पटल पर परखा जाएगा.. .केन्द्र, राज्य को चेतावनी दे और एक हफ्ते जवाब देने का वक्त दे.. लेकिन उत्तराखंड में ऐसा कुछ नहीं हुआ .. हरीश रावत सरकार को बहुमत साबित करने का मौका दिए बगैर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया ...

दरअसल राष्ट्रपति शासन लगाने के केन्द्र के फैसले के बाद से ही केन्द्र सरकार की नीयत पर सवाल उठने शुरु हो गए थे...क्योंकि उत्तराखंड में विधानसभा को भंग नहीं किया गया बल्कि सस्पेंडेड एनिमेशन में रखा गया...मकसद साफ था जोड़-तोड़ से सरकार बनाने की गुंजाइश छोड़ी गई... अब सवाल ये था कि सरकार बनाएगा कौन...तो इसके लिए कांग्रेस के 9 बागी विधायकों को राहत दिलाने के लिए कोर्ट के हर प्लेटफॉर्म का सहारा लिया गया...इस कवायद ने उत्तराखंड की सियासत में खरीद-फरोख्त और पैसे की सियासत के लिए रास्ते खोले... अब बीजेपी हरीश रावत के स्टिंग ऑपरेशन को लेकर चाहे जो आरोप लगाए मगर सच ये है कि खरीद-फरोख्त की सियासत के लिए बीजेपी भी उतनी ही जिम्मेदार रही...

दरअसल सत्ता की हनक कई बार सही गलत के बीच भटका कर रख देती है...कुछ ऐसा ही केन्द्र सरकार के साथ भी हुआ है...जहां रणनीतिकारों की गलत सलाहों ने एक छोटे से राज्य की कीमत पर केन्द्र की सरकार की किरकिरी करा दी है ...

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