गुरुवार, 5 मई 2016

150 विधायक, 32 सांसद , फिर भी पिछड़ा क्यों पूर्वांचल ?

उत्तर प्रदेश का नोएडा हो या सैफई ... दोनों ही जगहें development के पैरामीटर पर अव्वल नज़र आती हैं ... जो इस सूबे की सियासत से वाकिफ हैं वो जानते हैं कि जब बीएसपी की सरकार होती है तो नोएडा की सड़कें भी चमचमाने लगती हैं और जब एसपी की सरकार होती है तो सैफई-इटावा वीवीआईपी इलाका हो जाता है ...लेकिन ऐसी किस्मत पूर्वांचल की नहीं है ... पूर्वांचल यानि eastern UP .... लगभग 28 ज़िले ... 150 विधानसभा क्षेत्र और 32 संसदीय क्षेत्र ... यानि विधानसभा में 150 प्रतिनिधि और संसद में 32 ...  राजनैतिक हैसियत इतनी है कि नरेन्द्र मोदी को भी पूर्वांचल से लोकसभा चुनाव लड़ना पड़ा...क्योंकि पूर्वांचल का असर सिर्फ इन्ही सीटों पर नहीं है बल्कि पूर्वांचल, बिहार, महाराष्ट्र, दिल्ली तक की सियासत को प्रभावित करता है.. लेकिन पूर्वांचल की बदहाली ऐसी है करीब साढ़े सात करोड़ की आबादी वाले इस इलाके में चार करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने के लिए मजबूर हैं....

देश के प्रधानमंत्री पूर्वांचल का प्रतिनिधित्व करते हैं ... केंद्रीय कैबिनेट में शामिल लघु एंव सुक्ष्म उद्योग मंत्री कलराज मिश्रा देवरिया से सांसद हैं....हमेशा सुर्खियों में रहनेवाले महंत आदित्यनाथ गोरखपुर से सांसद हैं...कई संसदीय कमेटियों में शामिल राजेश पांडेय कुशीनगर से सांसद हैं.... कुशीनगर से पिछला चुनाव हार चुके आरपीएन सिंह पिछली UPA सरकार में ताकतवर मंत्री रहे..... वीरबहादुर सिंह, राजमंगल पांडेय, बाबू गेंदा सिंह, सूर्यप्रताप शाही, योगी आदित्यनाथ, आरपीएन सिंह, कल्पनाथ राय और  राजनाथ सिंह जैसे नेता पूर्वांचल में राजनीति करके शीर्ष पर पहुंचे... लेकिन इन सबके बावजूद पूर्वांचल को जो मुकाम मिलना चाहिए था वो नहीं मिला...  वीर बहादुर सिंह , कल्पनाथ राय ने इस हिस्से के पिछड़ेपन को दूर करने की कोशिश की...लेकिन प्रदेश के सीएम रहे वीर वहादुर सिंह के आसमियक निधन और कल्पनाय राय के राजनीति में हाशिये पर चले जाने से पूर्वांचल और पिछड़ गया....

लड़खड़ाती कास्तकारी, दम तोड़ती दस्तगीरी, विकराल रूप धारण करती बेरोजगारी, हर रोज इलाका छोड़ते मजदूर और एक के बाद एक बन्द होते उद्योग धन्धे आज के पूर्वांचल की पहचान हैं....पूर्वांचल का आर्थिक आधार चार पिलर्स पर टिका है.... कृषि व्यवस्था,  बुनकरी, कुटीर उद्योग और मिलें, ये सब कभी यहां के अर्थव्यवस्था की जान हुआ करती थीं....लेकिन आज ये चारों दम तोड़ चुकी है... रोजगार की इतनी कमी है कि तमाम जिल्लत झेल कर भी पूर्वांचल की युवा शक्ति दूसरे प्रदेशों में काम करने के लिए मजबूर है.....वक्त बीतने के साथ पूर्वांचल लगातार पिछड़ेपन की गर्त में गया है ...खासकर ग्रामीण इलाकों की तस्वीर तो ऐसी हो गई कि जैसे यहां शासन प्रशासन की कभी नजर ही नहीं पड़ी..
कभी चीनी का कटोरा कहे जाने वाले पूर्वांचल में चीनी मीलों के खत्म होने की वजह से गन्ना किसान तबाह हो गया... पारंपरिक खेती से यहां के लोग उबर नहीं पाए और यहाँ के बुनकरी को खत्म करने की अन्तर्राष्ट्रीय साजिश हुई... भदोही जहाँ से कभी अकेले कालीन कारोबार से  Foreign Export एक्सपोर्ट हजारों करोड़ का होता था वहाँ के कालीन कारोबार को खत्म करने के लिए यूरोपियन देशों ने यहाँ सामाजिक संगठनों को बड़ी फंडिंग करके भदोही के कालीन उद्योग में child labour का हौव्वा खड़ा किया ...जिसकी वजह से आज भदोही का कालीन उद्योग अपनी आखिरी साँसे गिन रहा है....

कभी पूर्वांचल में 30 से ज्यादा चीनी मिलें हुआ करती थीं लेकिन उन्हें साजिश के तहत बंद कर उन जमीनों को
बड़े-बड़े उद्यमियों को कौड़ियों के मोल बेच दिया गया....गोरखपुर की फर्टिलाइजर कंपनी,  मऊ का हथकरघा, बनारस की साड़ी, मिर्जापुर का पीतल कारोबार और चुनार के चीनी मिट्टी उद्योग आज सियासत के भंवर में फंस कर दम तोड़ गये...कुछ नई योजनाएं भी बनी तो वो भी फाइलों के बाहर नहीं निकल पाईं.....नोएडा के तर्ज पर गोरखपुर इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी यानि गीडा की स्थापना हुई...लेकिन यहां ना कोई बड़ी इंडस्ट्री लगी और ना पुराने इंडस्ट्रीज को ही शुरु करने की कोशिश की गई....1991 में उत्तर प्रदेश की सरकार ने पूर्वांचल विकास निधि की स्थापना की...जिसका मकसद था क्षेत्रीय विकास परियोजनाएं के लिये पैसा जमा करना, अग्रिम संतुलित विकास,  स्थानीय जरूरतों की पूर्ति और  क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करना ... लेकिन ऐसा कुछ हो नहीं पाया क्योकि किसी भी नेता ने पूर्वांचल विकास निधि का उपयोग कैसे हो इसके लिए प्रयास नहीं  किया !

ऐसा नहीं है कि सिर्फ उद्योगों के ही मामले में सरकारों ने पूर्वांचल की अनदेखी की...राजनेताओं और पश्चिम परस्त सरकारों ने यहां की शिक्षा व्यवस्था को भी चौपट कर दिया....बनारस का बीएचयू किसी पहचान का मोहताज नहीं है...बीएचयू , गोरखपुर का मदन मोहन मालवीय इंजीनियरिंग कॉलेज और दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय जैसी संस्थाएं तो अपनी पहचान के साथ न्याय करने में सफल रहीं लेकिन इसके अलावा किसी और जगह पर शिक्षा को कोई केन्द्र स्थापित नहीं हो पाया......सरकारी नौकरी की कमी ने युवाओं को प्राइवेट जॉब की तरफ रुख करने के लिए मजबूर कर दिया..लेकिन इस क्षेत्र में स्तरीय तकनीकी शिक्षण संस्थानों की कमी की वजह से यहां के छात्र लखनऊ, दिल्ली, पुणे और बेंगलुरु जैसे शहरों की तरफ रुख करने को मजबूर हैं... यानि पहले से ही बदहाल पूर्वांचल का पैसा एक बड़े पैमाने पर बाहर जा रहा है...

पूर्वांचल बदहाल क्यों है...पूर्वांचल में रोजगार क्यों नहीं है...पूर्वांचल से पलायन क्यों हो रहा है...पूर्वांचल में ऐसा कोई जरिया क्यों नहीं पैदा हो पाता जिसके सहारे यहां के लोगों के लिए नई उम्मीद के रास्ते खुल पाएं... बनारस के घाट, कुशीनगर और सारनाथ जैसे Buddhist places... सोनभद्र और मिर्ज़ापुर में इको टूरिज्म की उम्मीदें... ऐसे एक नहीं दर्जनों उदाहरण हैं जिन्हें अगर ठीक से विकसित किया जाए तो पूर्वांचल देश ही नहीं बल्कि दुनिया के नक्शे पर टूरिज्म के सेक्टर में अपना स्थान बना सकता है...मगर राजनीति के कुचक्र में फंसे पूर्वांचल के लिए ये सपना भी सपना ही है....

पर्यटन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि यूपी आने वाले पर्यटकों में से 85 प्रतिशत पर्यटक बनारस जरूर आते हैं...विदेशी पर्यटकों को खींचने के मामले में आगरा के बाद दूसरे नंबर पर है बनारस.. यहां हर साल पांच लाख विदेशी पर्यटक आते हैं जबकि इसके तीन गुना घरेलू पर्यटक आते हैं.... इस लिहाज से सिर्फ बनारस आने वाले पर्यटकों की संख्या 18 से 20 लाख है ... बीते पांच साल में यहां आने वाले विदेशी पर्यटकों में 60 प्रतिशत बौद्ध हैं....जबकि घरेलू पर्यटकों में सबसे ज्यादा लोग दक्षिण भारतीय हैं... बनारस हिन्दू, बौद्ध धर्म के अलावा जैन धर्म के लिए भी एक अहम स्थान है... यहां जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में से 4 तीर्थंकर ताल्लुक रखते हैं...बनारस से दो घंटे की दूरी पर सोनभद्र और मिर्ज़ापुर में रॉक पेंटिंग का खजाना है... इको टूरिज्म की संभावना है... गोरखपुर में गोरखनाथ मंदिर,  गीताप्रेस जैसी जगहें हैं... तो रामगढ़ताल सालों से अपने कायाकल्प की बाट जोह रहा है... कुशीनगर जिले के मुख्यालय पडरौना के उत्तर में स्थित बिहार और नेपाल सीमा से सटा इलाका भी इको-टूरिज्म का बड़ा सेंटर बन सकता है... ऐसी अनगिनत जगहें हैं जो टूरिज्म के मोर्चे पर पूर्वांचल को एक बड़ा हब बना सकती हैं..

स्वर्गीय वीरबहादुर सिंह के जमाने में गोरखपुर के विकास के लिए रामगढ़ताल परियोजना, तारामंडल जैसी परियोजनाएं बनी थी जो आधी अधूरी हैं...कुशीनगर की मैत्रेय परियोजना डेढ़ दशक से धूल फांक रही है...इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनाने की योजना अभी भी सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही है... Buddhist Circuit बनाने की योजना पर काम कछुआ गति से चल रहा है... काशी को क्योटो बनाने का सपना दिखा दिया गया लेकिन बुनियादी सुविधाएं जस की तस हैं...

आखिर ये बड़ा सवाल है कि जब पूर्वांचल में टूरिज्म की इतनी संभावनाएं मौजूद हैं...तो फिर पर्यटक यहां क्यों नहीं आ रहे हैं....दरअसल इसके पीछे भी सरकारी अनदेखी और वोट बैंक की राजनीति जिम्मेदार है.....पूर्वांचल में अव्वल तो टूरिस्ट प्लेसों की उस तरह की marketing  नहीं हुई जैसे बाकी जगहों पर की जाती है....सरकारी लापरवाही ने पूर्वांचल में tourism का ऐसा कोई system ही develop नहीं किया जिससे ज्यादा से ज्यादा टूरिस्ट पूर्वांचल का रुख करें... अगर सरकारें ऐसा कर पातीं तो बनारस में भी क्योटो और वेनिस से ज्यादा भीड़ होती
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 पूर्वांचल की बदहाली की कहानी में एक खण्ड Encephalitis का भी है .. गोरखपुर मेडिकल कॉलेज की तस्वीरें
जब सुर्खियां बनती हैं तो मजबूत कलेजे के लोग भी एक बार सहम जाते हैं .. इंसेफ्लाइटिस वार्ड में लाचार पड़े बच्चे जेहन में सैकड़ों सवाल खड़े करते हैं ...लेकिन साल 1977 से पूर्वांचल में बच्चों का काल बने इंसेफ्लाइटिस ने अब तक तकरीबन 40 हज़ार बच्चों को अपना निशाना बना चुकी है......क्या इससे बड़ी आपदा और कोई होगी....इससे बड़ा मानवीय संकट पूरी दुनिया में कहीं होगा क्या....शायद नहीं...फिर सवाल उठता है कि चालीस साल में आखिर ऐसा क्या किया गया हमारे सत्तातन्त्र की ओर से जो इस मुसीबत से छुटकारा मिल जाए...
साल 2005 में जब इनसेफ्लाइटिस से होने वाली मौतों का आंकड़ा 500 को पार कर गया था तब सामाजिक संगठन आगे आए.. .. गोरखपुर बस्ती मंडल में डॉ. आरएन सिंह ने इंसेफ्लाइटिस उन्मूलन अभियान शुरु किया जिसमें पूर्वांचल के सामाजिक कार्यकर्ता भी जुड़े...रैली निकाली गई, ज्ञापन भेजे गए...इसके बाद पूर्वांचल में नेताओं के आने का सिलसिला शुरु हुआ...2005 में 108 बेड के एपेडमिक वार्ड बनाने और शोध केन्द्र बनाने की घोषणा हुई जो बनकर तैयार है....इस बीच 7 सितंबर 2005 को राहुल गांधी पहुंचे....राहुल aerial fogging के लिए हेलीकॉप्टर लेकर पहुंचे थे...मगर तत्कालीन यूपी सरकार ने हेलीकॉप्टर उड़ने की मंजूरी नहीं दी... नतीजा एक महीने तक रायबरेली में खड़ा रहने के बाद हेलीकॉप्टर वापस चला गया... सितंबर 2005 को तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदौस गोरखपुर पहुंचे...जिनसे टीकाकरण की मांग की... 2006 में टीकाकरण के लिए हरी झंडी दे दी गई...गोरखपुर और उसके आसपास करीब 65 लाख टीके लगाए गए...इस बीच गोरखपुर में इंसेफ्लाइटिस के रिसर्च सेंटर की मांग उठी ये भी बन गया 2007 से ये भी फंक्शनल है... दरअसल 2006 में जापानी इंसेफ्लाइटिस के टीके लगने के बाद मरीजों की संख्या में कुछ कमी आई...मगर ये स्थिति ज्यादा वक्त तक नहीं रही...वजह रही अधूरा टीकाकरण... एक साल के अंदर दो बार लगाया जाने वाला टीका सिर्फ एक बार लगा...बाद में 2010 में दुबारा 75 लाख टीकाकरण हुआ...इसी बीच अमेरिका से सीडीसी की टीम को बुलाकर शोध कराने की मांग उठी...हाईकोर्ट तक मामला गया कोर्ट की दखल के बाद सीडीसी की टीम आई शोध किया तो पता चला कि जेई के टीके लगने के बाद ज्यादातर मरीज अब एंट्रो वायरल के आ रहे है...जो जलजनित बीमारी है... 2007 में इस एंट्रोवायरल का पता चला...जिसका कोई टीका अब तक इजाद नहीं हो पाया है...उम्मीद सिर्फ फॉगिंग, साफ पानी और हैंडपंप लगाए जाने पर टिकी है ... जिस पर सुस्त रफ्तार से काम चल रहा है... रोकथाम के लिए जिस स्तर पर जागरुकता और सरकारी प्रयास होने चाहिए वो भी कभी नहीं होते... ऐसे में ये साफ दिखता है कि पूर्वांचल के लिए एक बहुत बड़ी मुसीबत के तौर पर उभरे इन्सेफ्लाइटिस को खत्म करने के लिए जिस भागीरथ प्रयास की ज़रूरत है उसके लिए सरकारों में इच्छाशक्ति की कमी है ... फंड ज़रूरी जारी किए जाते हैं ... अगर अब तक इंसेफ्लाइटिस के नाम पर मिले पैसों का हिसाब लगाने बैठे तो उतने पैसों में दस नए मेडिकल कॉलेज खुल सकते थे... उतने पैसों में ना जाने कितनी सीएचसी या पीएचसी खुल सकती थी...मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ... लेकिन अब तक एक अकेला बीआरडी मेडिकल कॉलेज डॉक्टरों और स्टाफ के अभाव में दर्जनों जिलों का बोझ ढो रहा है...ऐसे में तो यही कहा जा सकता है कि पूर्वांचल को बीमारी से ज्यादा सिस्टम ने मारा है

पूर्वांचल को मिला इतना ताकतवर प्रतिनिधित्व भी इलाके की तस्वीर क्यों नहीं बदल पाया ..इस सवाल का जवाब भी पूर्वांचल में ही छिपा है ...गोरखपुर से सांसद योगी आदित्यनाथ ने अपनी सांसद निधि में मिला पैसा खर्च ही नहीं किया ..ऐसा ही हाल बलिया से सांसद भरत सिंह का भी है जिन्होने सासंद फंड से मिला पैसे से इलाके में कोई काम ही नहीं कराया....देवरिया से सांसद कलराज मिश्रा ने भी सांसद निधि का पैसा खर्च नहीं किया...जबकि केन्द्र में वो लघु उद्योगों को बढ़ावा देने वाले मंत्रालय को संभाल रहे हैं ...फिर क्यों पूर्वांचल में दम तोड़ते उद्योंगों पर उनका ध्यान नहीं गया...गाजीपुर से सांसद  और केन्द्र में रेल राज्य मंत्री का ओहदा संभाल रहे मनोज सिन्हा से भी इलाके की जनता को निराशा हाथ लगी ...जबकि कुशीनगर से सांसद राजेश पांडेय ने सांसद निधि से सिर्फ आधा पैसा खर्च किया...ये हाल तब है जबकि सियासी रुतबे के आधार पर पूर्वांचल का कोई सानी नहीं ...32 लोकसभा सीटों में से  31 पर केन्द्र में सत्तारुढ़ एनडीए का कब्जा है ... और 32वीं सीट है आज़मगढ़ की जहां से समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह सांसद हैं ... यहां ये बताने की ज़रूरत नहीं है कि सूबे में उन्हीं की पार्टी की सरकार है ... उनकी सरकार यूपी में प्रचंड बहुमत के साथ बनी थी...और उनका सियासी रुतबा भी किसी से छिपा नहीं ...

जानकार मानते हैं कि पूर्वांचल की बदहाली के लिए नीति बनाने वाले जिम्मेदार हैं जिन्होंने यहां की परिस्थितियों को Ignore किया है ... ज़रूरत बुनियादी तौर पर पूर्वांचल को समझने की है...जानकार कहते हैं कि पूर्वांचल का विकास आप गुजरात की तर्ज पर CSR, NGO और सिविल सोसायटी के जरिये नहीं कर सकते... पिछली सरकारों की तरह मोदी सरकार भी डेवलपमेंटल जम्प की गलती कर रही है जबकि जरूरत है पूर्वांचल में बेसिक डेवलपमेंट की ..

पूर्वांचल की बदहाली के बीच वक्त वक्त पर उसको अलग राज्य बनाने की मांग की जोर पकड़ती रही है ...आर्थिक विषेशज्ञ भी इसका समर्थन करते हैं ..उनकी मानें तो पूर्वांचल का विकास तभी संभव है जब इसको एक ख़ास ज़ोन के हिसाब से पैकेज मिले...  इसका दीर्घकालीन विकास तभी हो सकता है कि जब पूर्वांचल को अलग राज्य बना दिया जाए ...

देश में इससे पहले भी विकास के नाम पर छोटे राज्यों का गठन किया गया है लेकिन उन सभी राज्यों में विकास हुआ हो ऐसा ज़रूरी नहीं है ... मसलन झारखंड और उत्तराखंड ऐसे ही राज्य हैं ... इन राज्यों में विकास की कोई मिसाल पेश नहीं की सकी है ... और इसकी वजह रही है उन राज्यों में राजनैतिक अस्थिरता के हालात .. ऐसे पूर्वांचल राज्य के गठन के साथ साथ राजनैतिक स्थिरता की गारंटी ही इस क्षेत्र को पिछड़ेपन से मुक्ति की नई उम्मीद दे सकता है ...

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