मंगलवार, 31 मई 2016

महज़ वोटबौंक क्यों हैं मुसलमान ?


देश में चुनावी मौसम आते हीं ज़ेहन में अक्सर एक सवाल आता है कि आखिर तमाम सवालों, मुद्दों और वादों के बीच कैसे किसी क्षेत्र या किसी कौम की प्रगति नहीं हो पाती … खासकर बात जब मुसलमान की हो … राजनीतिक पार्टियां फिर चाहे वो 'सेक्युलर' हों या फिर 'नॉन सेक्युलर' हमेशा इस कौम विशेष को प्रगति और विशेष हक़ के वादे करती रही हैं … लेकिन इस कौम के क्रीमी लेयर की बात छोड़ दीजिए तो ना हीं इनकी हालत में बदलाव हुए हैं ना हीं हालात बदले हैं … देश आजाद हुए सत्तर साल होने जा रहे हैं मगर सरकारों के आने-जाने का इस तबके पर कोई फर्क नहीं पड़ा...हर राजनीतिक उठापटक में इस तबके का नाम लेकर राजनीतिक आंसू बहाए गए.. ऐसे में सवाल उठते हैं कि क्या सिर्फ वोटबैंक हैं मुसलमान...

मुसलमानों की बेहतरी के तमाम वादों के बीच इस कौम की शिक्षा का स्तर भी सवालों के घेरे में है .. एक ऐसी कौम जिसके कलाम की शुरुआत ही इकरा से होती है...इकरा यानी पढ़ो...एक ऐसी कौम जिसकी इबादत का हर पहलू इल्म की जरूरत बताता है...उसी कौम की तालीम मुकम्मल तरीके से नहीं हो पा रही... मुल्क में मुसलमानों की साक्षरता दर 68.5 प्रतिशत है जबकि साक्षरता का राष्ट्रीय औसत 74 प्रतिशत है, स्कूल जाने वाले भारतीय बच्चों में मुस्लिम बच्चों की संख्या सबसे कम है....25 फीसदी मुस्लिम बच्चों ने 6 से 14 साल की उम्र के बीच स्कूल जाना या तो छोड़ दिया या गए ही नहीं...प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर पंजीकरण कराने वाले मुस्लिम बच्चों की संख्या सिर्फ 14 फीसदी के करीब है...4 फीसदी मुस्लिम ही हैं जिन्होने ग्रेजुएशन या डिप्लोमा किया है...या 20 साल के ऊपर है...

शिक्षा को लेकर इस कौम की ये हालत तस्वीर का एक पहलू भर है … रही सही कसर मदरसा बोर्ड पूरी कर देता है .. जो अपनी बदइंतजामी की वजह से मजाक बनकर रह गए हैं … मौजूदा दौर में हर क्षेत्र में कॉम्पटिशन बढ़ रहा है ऐसे में शिक्षा के जिस स्तर की जरूरत है अगर वो ना मिल पाए तो मौजूदा हालात में मुस्लिम छात्र कौन सा मुकाम हासिल कर पाएंगे .. असल में मदरसों को लेकर समस्या कई तरह की है...अव्वल तो मदरसों के आधुनिकीकरण के नाम पर किए जा रहे उपाय बेहद सतही है बेहद सुस्त हैं...दूसरी ओर खुद मदरसों की पढ़ाई का ट्रेंड बदलने में ना तो सरकारों की दिलचस्पी है ना ही कौम के नुमाइंदों की... सियासी जमात और सरकारें चाहे जो दावा करें...सच ये है कि आजादी के 69 साल बाद भी ना तो मुसलमानों के हक में कोई ईमानदार कोशिश हुई है ना ही हाल फिलहाल तक इसकी सूरत नजर आती है...तालीम के बुनियादी सवाल तक को हर सरकार ने दरकिनार किया है.

...मगर सवाल ये कि जिनके नाम पर राजनीतिक दल वोटों की फसल काटते रहे हैं उनके हक में इस बुनियादी बदलाव तक के लिए कभी पहल क्यों नहीं हुई...क्या ये जानबूझकर किया गया ताकि अपनी दुनिया से बाहर आकर कोई अपने हक को समझ ना पाए...और समझ भी जाए तो सवाल ना उठा पाए...

मुसलमानों के Social, Economical और Educational हालात को जानने के लिए बनाई गई सच्चर कमेटी की रिपोर्ट बताती है कि दे में मुसलमानों की एक बड़ी आबादी ऐसी है जिसे आज तक बुनियादी सुविधाएं तक मयस्सर नहीं हो पाई हैं... आबादी के एक बड़े हिस्से की हालत दलितों से भी बदतर है...शिक्षा के साथ-साथ इन्हें स्वास्थ्य और रोजगार के बेहद मामूली हक से वंचित रहना पड़ता है.... तो क्या कमेटियां बनाना और रिपोर्ट तैयार करवाना महज़ खानापूर्ति है … सियासत में मुसलमानों की क्या अहमियत है...ये समझना हो तो राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों को पढ़िए...कभी आरक्षण, कभी नौकरी, कभी विशेष अधिकार, तो कभी हाइटेक एजुकेशन से लेकर नकद उपहार तक....फेहरिस्त इतनी लम्बी है कि अगर वाकई इन वादों में से आधे भी पूरे हो गए होते तो कौम की तस्वीर अलग होती...

दरअसल हिन्दुस्तान में वोट की सियासत का सबसे बड़ा मोहरा बन गए मुसलमान...खुद के नेतृत्व की कमी ने जहां मुसलमानों के लिए राजनीतिक विकल्प के दरवाजे हमेशा बंद रखे तो वहीं दूसरी ओर मुसलमानों के बीच से जो नेता निकले वो भी महज वोटबैंक की सियासत की राह पर चल पड़े.... जो बदलाव लाने के काबिल थे उन्हें सियासी साजिशों ने हाशिए पर लाकर खड़ा कर दिया... दरअसल सियासी साजिश के तहत मुसलमानों के भीतर खौफ कायम किया जाता रहा ताकि उसे भुनाकर वोटों की फसल सालों तक काटी जा सके

देश में अयोध्या आंदोलन के बाद सांप्रदायिकता की बयार चली थी … ज्यादातर पार्टियां खुद को मुसलमानों का रहनुमा बताने की कोशिश में जुटीं हुई थीं … शाहबानो केस से पहले तक मुसलमानों की पसंदीदा पार्टी रही कांग्रेस से अब उनका मोहभंग होने लगा था … ..क्षेत्रीय सूरमाओं के क्षेत्रीय समीकरणों में मुसलमानों ने जगह तलाशनी शुरु की...इस दौर में यूपी में अगर मुसलमानों ने मुलायम सिंह यादव को अपना नेता मान लिया तो बिहार में आडवाणी का रथ रोकने वाले लालू प्रसाद यादव मुसलमानों के हीरो बन गए...ऐसा ही अन्य राज्यों में भी हुआ जहां मुसलमान ध्रुवीकरण की सियासत की भेंट चढ गए ...

उस दौर से इस दौर तक दो दशक से ज्यादा का वक्त बीत चुका है...मगर राजनीति का गणित वही है...2002 के गुजरात दंगों ने बीजेपी को मुस्लिम वोटों की होड़ से बाहर कर दिया मगर बाकी सबके लिए मुसलमान एक बड़ा वोटबैंक बन गए जिसे साधने के लिए कभी आरक्षण के दावे होते हैं तो कभी सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र कमेटियों की रिपोर्ट्स की सिफारिशों को लागू करने का लॉलीपॉप दिया जाता है 2012 का समाजवादी पार्टी का घोषणापत्र जिसमें मुसलमानों को 18 प्रतिशत आरक्षण देने, निर्दोष मुसलमानों को जेल से रिहा करने, रंगनाथ और सच्चर कमेटी की रिपोर्टों को लागू करने मुस्लिम बहुल इलाकों में सरकारी संस्थान खोलने, ऊर्दू माध्यम के स्कूल स्थापित करने, मदरसों में टेक्निकल एजुकेशन के लिए विशेष बजट देने जैसे वादे किए गए थे...मगर असल में इनमें से कितने वादे पूरे हुए ये कौम खुद तय करेगी...समाजवादी पार्टी ने लोकसभा के चुनावों में भी कुछ इसी तरह के वादे किए थे...देखादेखी कांग्रेस ने भी ओबीसी के कोटे के भीतर मुसलमानों को साढ़े चार फीसदी कोटा देने का वादा कर दिया था.

सवाल उठता है कि आखिर इस कौम के साथ हमेशा छल क्यों होता है … दरअसल मुसलमानों के बीच अपने खुद के प्रभावी नेतृत्व का अभाव है...और जो नेतृत्व पैदा भी होता है वो या तो पीस पार्टी बन जाता है या फिर ओवैसी जैसा अतिवादी... जो कुछ वक्त के लिए चमकता है फिर गायब हो जाता है....ऐसा इसलिए होता है क्योंकि देश का आम मुसलमान तरक्की चाहता है...उसे अपने हालात में बदलाव चाहिए, मजहब के नाम पर चले गए सियासी दांव से उसे कुछ लेना देना नहीं... लेकिन इनके बीच से निकलकर जो लोग कौम की रहनुमाई के दावे करते हैं वो अपने निजी फायदे से ऊपर सोच नहीं पाते … मुसलमानों की हालत बदलने के नाम पर अक्सर आरक्षण की दलील दी जाती है... ये बताया जाता है कि दरअसल आरक्षण ही मुस्लिम समाज की समस्याओं का समाधान कर सकता है मगर सवाल ये कि क्या इसके लिए कभी ईमानदार पहल की गई....

यूपी में 19 फीसदी मुसलमान है जिनमें से 16 फीसदी आबादी ऐसी है जिनकी हालत दलितों के जैसी या उनसे भी खराब है....इस तबके में अंसारी, मंसूरी, धुनिया, राइनी, सैफी, मुस्लिम धोबी, सलमानी, बंजारा, शाह और इदरीसी शामिल हैं...हैरान करने वाली बात ये है कि जिस मंडल कमीशन का हवाला देकर ओबीसी की राजनीति होती रही है...उसी कमीशन ने इन्हें आबादी के हिसाब से 27 में से 8.44 प्रतिशत आरक्षण देने की सिफारिश की थी....लेकिन वो इन तक नहीं पहुँच रहायानी तस्वीर का दूसरा पहलू ये है कि असल में मुसलमान आरक्षण का फायदा उठा ही नहीं पा रहे ...अव्वल तो इन्हें कमेटियों और आयोगों की सिफारिश में से कुछ नहीं मिला उलटे जो मिल सकता था उसे भी नहीं दिया गया... मुसलमानों को छोटी-छोटी सहूलियतें देकर असल मुद्दों से ध्यान भटका दिया जाता है...उदाहरण के लिए यूपी एक मिसाल है जहां समाजवादी पार्टी ने मुसलमानों को 18 प्रतिशत आरक्षण देने का वादा किया था बिना ये सोचे कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण मिलना मुमकिन ही नहीं है... अक्सर राजनीतिक दल केरल की तरह मुसलामानों को आरक्षण देने का वादा भी करते हैं बिना ये सोचे कि केरल का आरक्षण उस वक्त से लागू है जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं आया था...कुल मिलाकर मुसलमानों को आरक्षण देने के नाम पर जो भी हुआ है वो सिवाय धोखे के और कुछ नहीं...क्योंकि मंडल कमीशन की सिफारिशों के आधार पर मुसलमानों को पहले से ही आरक्षण देने का मॉडल बना हुआ है मगर पिछड़ों की सियासत करने वाली पार्टियां मुसलमानों की कीमत पर अपने परम्परागत वोटबैंक को नहीं खोना चाहती....तो वहीं दलितों की नुमाइंदगी करने वाली पार्टियां अपने आरक्षण के कोटे में भी सेंध नहीं लगाना चाहती...

मौजूदा दौर देश में ना तो जाति आधारित पार्टियों की कमी है, ना क्षेत्रीय मुद्दों को उभारने वाली पार्टियों की... दक्षिण में द्रविड़ों की सियासत तो महाराष्ट्र में मराठी पॉलिटिक्स, पंजाब में अकालियों की सियासत, तो यूपी और बिहार में यादव-दलित पॉलिटिक्स...एलजेपी, हम, आरपीआई, अपना दल समेत अनगिनत पार्टिया हैं जो किसी सम्प्रदाय विशेष का प्रमुख नेतृत्व मानी जाती हैं...इनमें से कोई सेक्युलर की खोल में बैठा है तो कोई क्षेत्रीय अस्मिता का राग अलापता है... मगर मुसलमानों के लिए ऐसी हर कोशिश को सीधे सीधे साम्प्रदायिक बता दिया जाता है...उनकी स्वीकार्यता को कटघरे में खड़ा किया जाता है....नतीजा मुस्लिम नेतृत्व सिर्फ मुस्लिम जमात में सिमट जाता है...वो ना तो अपने साथ दलितों को प्लस कर पाता है ना पिछड़ों को...

आजादी से पहले नेहरू से ज्यादा अंग्रेजीदां रहे मोहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम नेतृत्व शुरु किया तो कट्टर मजहबी बन गए...नतीजा धार्मिक अतिवाद के दौर में भी वो पूरे हिन्दुस्तान के मुसलमानों के रहनुमा नहीं बन पाए...देश तोड़ लिया दिल नहीं जोड़ पाए...अब आजादी के बाद यही हालत ओवैसी, बदरूद्दीन अजमल, मोहम्मद अयूब सईद जैसे नेताओं का भी है जिन्होने मुस्लिम पॉलिटिक्स का विकल्प तो खड़ा किया मगर कट्टरता और मजहबी व्यवहार ने इन्हें अखिल भारतीय बनने ही नहीं दिया...नतीजा मुसलमान दूसरों में अपनी गुंजाइश तलाशता है और ठगा जाता है...

बंटवारे के बाद से ही मुसलमानों के लिए नेतृत्व का संकट बड़ा रहा है...ये बेहद दिलचस्प है कि मुसलमानों ने हमेशा ही हिन्दुओं को ही अपना नेता माना है... बंटवारे के वक्त बने हालात में भारतीय मुसलमानों ने महात्मा गांधी को अपना नेता माना...कांग्रेस पर भरोसा किया...आजादी के बाद पंडित नेहरू बन गए अकलियत के नेता....तो बाद के सालों में इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक मुसलमानों के नेता बने...ये और बात है कि अयोध्या आंदोलन के दौर ने मुसलमानों के भीतर वो सियासी डर दोबारा जिन्दा कर दिया जिसके सहारे वोटबैंक की सियासत ने जोर पकड़ा था...मंडल और कमंडल के खेल में मुसलमान क्षेत्रीय ताकतों में बंट गए...जो स्थिति आज तक बनी हुई है...अब मुसलमानों के बड़े नेता मुलायम सिंह यादव हैं...अयोध्या आंदोलन के बाद मुलायम सिंह इस तबके के हीरो बन गए थे...हां ये जरूर है कि मुलायम सिंह यादव को अपनी इस छवि का फायदा सिर्प यूपी तक ही मिल पाया है पड़ोसी राज्य बिहार में भी नहीं मिला...

सवाल उठता है कि फिर मुसलमानों का विकास कैसे हो ? क्या ये अपने विकास के लिए सशक्त मुस्लिम लीडरशिप का सपना देखें या फिर मौजूदा राजनीतिक पार्टियों पर ही भरोसा करें .. क्या अपने कौम के विकास बारे में सोचें या फिर सांप्रदायिकता के सवाल पर लड़ते रहें .. सवाल ये कि आखिर कब तक ऐसा चलेगा ... कब तक सिर्फ वोटबैंक बने रहेंगे मुसलमान … … ... मुसलमानों को इस सवाल पर खुद सोचना होगा