शनिवार, 9 अप्रैल 2016

इश्क के अल्फाज, मौला से मोहब्बत ...

एक तरफ जहां नफरत की आग ने दुनिया के कई हिस्सों को अपनी चपेट में ले रखा है तो दूसरी तरफ सूफीज़्म एक ऐसी विचारधारा है जो मजहब से ऊपर उठकर आपसी प्यार का संदेश देता है ... क्या है सूफीवाद और क्या है इसका संदेश .. इसी पर पेश है सूफी कथक नृत्यांगना मंजरी चतुर्वेदी से बातचीत के खास अंश

वासिंद्र मिश्र: मंजरी जी किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं...उनको पूरी दुनिया में लोग जानते हैं..उनकी अपनी एक शख्सियत है...खास तौर पर सूफी नृत्य और सूफी संगीत पर जो उनका काम रहा है  जो उनकी परफॉर्मेंस रही हैं उसको यू ट्यूब के जरिए और लाइव परफॉर्मेंस के जरिए पूरी दुनिया में लोग देखते रहे हैं और पूरी दुनिया में उनके प्रशंसक रहे हैं ..मंजरी जी के मैंने भी कई शोज देखे हैं लखनऊ से लेकर दिल्ली तक में..
आज हम उन्हीं से जानने की कोशिश करेंगे कि आज के मौजूदा राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक या हम कहें वैश्विक परिस्थितियों के मद्देनज़र... जो सूफी संगीत है, सूफी नृत्य है या सूफीज़्म है वो कितना प्रासंगिक है ..
 
मंजरी चतुर्वेदी : देखिए बहुत अच्छा लगा मुझे कि आपने इस पर बात करनी चाही क्योंकि  आज के दौर में ..जब हम आपस में सिर्फ बंटवारे की बात करते हैं ..चाहे वो हमारा thought process ...या political बंटवारा हो जो भी हो हम इसी पर तवज्जो देते हैं तो बहुत जरुरी है कि कहीं हम उसको, अपने आप को इंसानियत से जोड़ने की भी कोशिश करें...और इसमें सूफीज़्म और सूफीवाद या सूफीस्ट की जो विचारधारा है वो बहुत मायने रखती है.. अगर मैं  एक शब्द में कहूं कि सूफीज़्म क्या कहता है....तो सूफीज़्म  सिर्फ एक बात कहता है इश्क मोहब्बत....इसके अलावा कोई और बात सूफी संतों ने नहीं कही है..वो मोहब्बत, वो इश्क जो है वो उस परमात्मा से है और उसके बनाए हर एक उस बंदे से है..अब ये अगर हम बात आज के दौर में  समझ लें..तो ये जितनी लड़ाई  हो रही है ....जितने सब आपस में बंट रहे हैं हम खुद अपने आप सोचेंगे कि ये सब बिल्कुल निरर्थक है.....और सिर्फ आपस में एक प्रेम और सदभावना की जो भावना थी वो जरुरी है बस
 
वासिंद्र मिश्र : अभी हाल ही में दिल्ली में एक कॉन्फ्रेंस हुई थी.. अंतर्राष्ट्रीय सूफी कॉन्फ्रेंस ..उसमें भी तमाम विचारक आए थे...तमाम तरह के बुद्धिजीवियों ने अपनी अपनी राय रखी थी...आपको नहीं लगता है कि जितनी विचारधारा इस समय दुनिया में और खास तौर से भारत में देखने को मिलती हैं...और उनके तमाम समर्थक हैं  ...उनको अगर कोई सबसे ज्यादा healing touch दे सकता है या उस पर बाम लगा सकता है इस जख्मी इंसानियत और मानवता को तो... वो सूफीवाद दे सकता है
मंजरी चतुर्वेदी: जी ज़रुर... देखिए  हमारे इस subcontinent में जो हम हिंदुस्तान-पाकिस्तान आज कहते हैं ..यहां पर जो सूफीज़्म की बात हुई है  वो  अपने आप में बड़ी unique चीज़ है..क्योंकि यहां पर  जितने भी सूफी संत रहे हैं....मैं पिछले 20 सालों से उस पर रिसर्च कर रही हूं, काम कर रही हूं....उन्होंने इतनी खूबसूरती से हमारे यहां के सारे धर्म की अलग-अलग चीजों को ऐसे पिरो दिया है आपस में ..अगर आप आज किसी दरगाह पर जाएं तो आपको जितने मुसलमान मिलेंगे....उतने उससे बल्कि ज्यादा ही आपको अलग धर्म को मानने वाले लोग मिलेंगे..और यही उन सूफी संतो की खासियत थी
 
वासिंद्र मिश्र : हिंदू ज्यादा जाते हैं दरगाहों पर..मुसलमानों की तुलना में...
मंजरी चतुर्वेदी:   जी बिल्कुल....वो जो एक मिसबत हैं जिसे कहते हैं connection....वो इन सूफी संतों ने इश्क मोहब्बत के ज़रिए कायम किया....इस दौर में जब मैं रिसर्च कर रही थी इस पर ...बड़ी खूबसूरत चीजें पता चलीं....जैसे कि अगर मैं आपको बताऊं तो काकोरी में एक दरगाह है और वहां पर जो सूफी संत हुए हैं और वहां जो Poet हुए हैं,......शाह अली कलंदर साहब.....कितनी खूबसूरत बात है कि उन्होने अपना पूरा का पूरा दीवान जिसे कहते हैं Collection of poetry ..वो कृष्ण पर लिखा ....अब देखिए एक दरगाह है जहां पर पूरा का पूरा  कृष्ण का सिलसिला गाया जाता हैं वहां के सारे लोग जुड़े हुए हैं.....ये जो हम आपसी सद्भावना की बात करते हैं वो ये दरगाहें दर्शाती हैं...और ये बहुत जरुरी है कि आज के दौर में हम लोगों तक इस बात को पहुंचाएं...और इसमें मैं जोड़ना चाहूंगी कि जो Poetry हुई, Music हुआ या dance हुआ ..ये जो तीन चीजें है ..ये अपने आप में एक इबादत का रंग है...ये prayer हैं और ये सबसे आसानी से  लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का जरिया भी है...तो अगर हम music, dance के जरिए लोगों तक एक soft approach से कोई बात पहुंचाते हैं तो वो उनके जहन में ज्यादा दिन तक रहती है बजाये इसके हम उनको खड़े होकर एक lecture दें.....कि सूफीज़्म बहुत अच्छा है..ये एक जो approach है वो आज के दौर में जरुरी है....

वासिंद्र मिश्र : एक और खास बात अभी आपने बताई लखनऊ के बारे में उस दरगाह के बारे में ...हमने आपकी performance भी कुछ साल पहले लखनऊ में देखा था,  मुजफ्फर साहब ने उसको conceive किया था....और आपने perform किया था..बहुत अच्छी performance थी.....और उसकी बड़ी प्रशंसा हुई थी लखनऊ और अवध के क्षेत्र में और इंडिया में भी,....आपको लगता है कि अवध के तमाम नवाब भी काफी हद तक सूफीवाद से प्रभावित थे...क्योंकि उनमें राधा और कृष्ण की भक्ति ......राधा के प्रति लगाव भी देखने को मिला है
 
मंजरी चतुर्वेदी- जी ये अवध की सर जमीं ही ऐसी थी ....जहां पर गंगा जमुनी तहजीब नजर आती है..और यही  जगह की खूबसूरती थी.... अवध के नवाबों ने ये tradition बना कर रखा ये भी खूबसूरती की बात थी .. और सिर्फ महज काकोरी में नहीं ....अगर आप देवा शरीफ जाएं या फिर उत्तर प्रदेश के ऐसे किसी और सिलसिले में जाएं .. यहां आपको गंगा जमुनी तहज़ीब का मिलन दिखेगा ..  दरगाहों के जरिए, वहां के कलामों के जरिए कव्वालों ने अपनी गायकी के जरिए परमात्मा और उसके बनाए हर बंदे से इश्क की आम लोगों तक पहुंचाई है
 
वासिंद्र मिश्र : इस समय जो राजनीतिक हालात हैं हम आपसे कोई political जवाब नहीं चाहते ..हम आपका सुझाव चाहते हैं जो जो मौजूदा establishment..जो छोटी-छोटी बातों पर तिल से ताड़ बनाते रहते हैं ..कभी जातीय आधार पर कभी सांप्रदायिकता के आधार पर  ...आप इस तरह के लोगों को किस तरह का सुझाव देना चाहती हैं .....कि वो इंसानियत के लिए किस तरह का आचरण रखें ...गवर्नेंस में इस तरह की चीजों का समावेश कैसे करें ...इस तरह के लोगों से आपकी क्या अपेक्षाएं हैं  ?

मंजरी चतुर्वेदी:  देखिए हम किसी भी धर्म की बात करें.....तो हर धर्म में बात इश्क, मोहब्बत या वसुधैव कुटुम्बकम की कही गई है.. हर धर्म में हम एक हैं ही कहा गया है ..अब आती है बात कि हम उसको अपनी practical जिंदगी में किस तरह लाते हैं....जितना आपस में एक दूसरे को हम बांटेंगे..अपने बीच में जितनी हम लकीरें बनाएंगे  .. उतना ही हम अपनी जिंदगी के दायरे छोटे करते जा रहे हैं  .....और जब हम दायरे छोटे करते जा रहे हैं .. तो हमारी सोच छोटी होती जा रही है.. ये सोच हमारे हिंदुस्तान की सोच नहीं है....हिंदुस्तान एक ऐसी जगह है जहां पर हर धर्म , हर जाति , हर देश- विदेश के लोग इतनी खूबसूरती से समा के उसी के साथ रहते हैं अपनी individuality भी बनाते हैं और हिंदुस्तानी भी हो जाते हैं ... ये खूबसूरती हमारे देश की है ...और इसको हमें बड़ी जिम्मेदारी से बहुत समझदारी बना के रखना है..फिर मैं कहूंगी कि देखिए संगीत-नृत्य एक ऐसी चीज है जो दिलों को छूती है...जिस वक्त आप एक घंटा, डेढ़ घंटा संगीत सुन रहे होते हैं या आप नृत्य देख रहे होते हैं....उस वक्त आप उस म्यूजिक से उससे एकाकार हुए होते हैं....और आपके जो कहना चाहिए जो आत्मसात करने की शक्ति है वो उस समय सबसे ज्यादा होती है ....तो हमें  इश्क मोहब्बत के, भाईचारे के , सद्भावना के Message  ज्यादा से ज्यादा नृत्य संगीत के जरिए लोगों तक पहुंचाने चाहिए ....क्यों सूफी संतों ने यही किया कि सब दरगाहों पर कव्वाली होने लगी , आम भाषा में होती थी अगर वो कहेंगे .. ए री सखी मोरा पिया घर आए..तो एक जानकार आदमी भी समझेगा और जो पढ़ा लिखा नहीं है वो भी समझेगा तो बात उन्होने बड़ी आसानी से कही ..अगर वही चीज आज हम आत्मसात करें ....और लोगों तक आसान शब्दों में संगीत के जरिए, नृत्य के जरिए लोगों तक ये छोटे-छोटे messages दें तो हम कहीं न कहीं एक तरह से उनमें एक मोहब्बत आपसी भाईचारे का एक रोशनी जला सकते हैं 
 
वासिंद्र मिश्र : आपका बहुत-बहुत धन्यवाद

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