शनिवार, 9 अप्रैल 2016

मोदी का 'पिछड़ा दलित' दांव

2017 में आने वाले विधानसभा चुनावों में क्या बीजेपी ने कांग्रेस की तरह ही अपनी हार पहले ही स्वीकार कर ली है .... कम से कम इन राज्यों में पार्टी की कमान देने के लिए बीजेपी की तरफ से किए गए चेहरों के चयन से तो यही साबित होता है ... बीजेपी ने उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और पंजाब के लिए पार्टी अध्यक्ष का चुनाव कर लिया है ... सबसे चौंकाने वाला नाम उत्तर प्रदेश के पार्टी अध्यक्ष का है .. जिस तरह से कांग्रेस के यूपी अध्यक्ष निर्मल खत्री की कोई खास पहचान नहीं है वैसे ही केशव प्रसाद मौर्या भी उत्तर प्रदेश में बाकी नेताओं के सामने अपनी पहचान नहीं रखते .... सवाल ये कि जिस यूपी में बीजेपी लंबे वक्त से अपना सियासी वनवास खत्म करने की कोशिशों में जुटी है वहां केशव प्रसाद मौर्य जैसे चेहरे के हाथ में कमान सौंपना कितना जायज है ...एक ऐसा चेहरा जिससे  सूबा अनजान है तो वहीं कानून की नजर में भी इस नेता का दामन दागदार है ...कुल मिलाकर आपराधिक छवि के कम राजनीतिक तजुर्बे वाले नेता के हाथों में पार्टी का भविष्य़ सौंपकर बीजेपी क्या जताना चाहती है ...क्या ओबीसी वर्ग से आना ही केशव प्रसाद की हर कमी को छुपाने के लिए काफी है ...  यहां ये सवाल भी कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी को अब तक वैश्य समुदाय और अगड़ी जाति के लोगों का समर्थन मिलता रहा है तो क्या बीजेपी इस बार केशव प्रसाद मौर्य के नाम पर ओबीसी वोट बैंक में अपनी पैठ बनाने की कोशिश में है ... क्या केशव प्रसाद मौर्य इसमें कामयाब हो पाएंगे वो भी तब जब उनके मुकाबले मैदान में मुलायम और मायावती जैसे चेहरे होंगे .. कांग्रेस भी ऐसे ही कदम उठाने की वजह से अभी तक अपनी वापसी की लड़ाई लड़ रही है .. क्या इससे भी बीजेपी ने कोई सबक नहीं लिया ? 
हो सकता है कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में केशव प्रसाद मौर्या जैसा डमी कैंडिडेट उतारने के बीजेपी का मकसद यहां की क्षेत्रीय पार्टी की मजबूती को बनाए रखना हो .... ताकि जरूरत के वक्त केंद्र में उनकी मदद ली जा सके .. ताकि केंद्र में सरकार को आंच ना आए...  ऐसे में बीजेपी को कांग्रेस का हाल जरूर देखना चाहिए .... कांग्रेस भी इसी रणनीति के तहत राज्यों में संगठन की मजबूती को लेकर उदासीन रही थी ... नतीजा ये हुआ कि धीरे -धीरे कांग्रेस cow belt से बाहर हो गई ... ऐसे में अगर बीजेपी भी इसी रणनीति के तहत काम करती है तो कुछ सालों में बीजेपी का भी यही हाल हो सकता है .... बीजेपी को ऐसे में ये नहीं भूलना चाहिए कि उनके लिए cow belt से बाहर होने का मतलब देश की सत्ता से बाहर होना है ..
इतना ही नहीं लंबे वक्त तक खुद को पार्टी विथ डिफरेंस कहने वाली बीजेपी के सुर सत्ता में आने के साथ ही बदल गए हैं ... अपराध पर नकेल कसने का दम भरने वाली बीजेपी खुद अपराध का दामन थामने को तैयार है.. उत्तर प्रदेश में केशव प्रसाद मौर्या और कर्नाटक में बी एस येदीयुरप्पा के चयन ने पार्टी की नीतियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं ... एक वक्त यूपीए के भ्रष्टाचार पर कड़ी चोट करके सत्ता में आई बीजेपी को कर्नाटक की कमान येदियुरप्पा के हाथों में सौंपते वक्त उनके भ्रष्टाचार के वो दाग क्यों नहीं दिखे जिसके चलते पार्टी को सत्ता से हाथ तक धोना पड़ा था ...हालांकि लिंगायत समुदाय को साधने के लिए येदियुरप्पा जरुरी भी हैं ... तो क्या जातिगत गणित को साधने की कवायद ने बीजेपी को अपने उन चुनावी सभाओं को भुला दिया है जिसमें वो भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजाते सुनाई देते थे ... यूपीए के खिलाफ भ्रष्टाचार को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाने वाली बीजेपी अब दागदार दामन वाले नेताओं के दामन थाम कर जीत की तरफ क्यों बढ़ना चाहती है .... क्या जातिगत रणनीति भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ने के दावों पर भारी पड़ रही है .. क्या विकास के वादे भी सत्ता तक पहुंचने के तमाम हथकंडों की भेंट चढ़ चुके हैं .... ?
 

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