शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

न्यायपालिका और भ्रष्टाचार

वासिंद्र मिश्र: पांडेयजी नमस्कार, सबसे पहले हम लोग चर्चा करते हैं कि जो भ्रष्टाचार शब्द है उसको लेकर ख़ुद न्यायपालिका क्यों इतनी आरोपों के घेरे में है...और न्यायपालिका में जो कार्यरत लोग हैं उनके ऊपर जब भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं तो उन आरोपों को वो इतनी गंभीरता से क्यों नहीं लेते हैं....जितनी गंभीरता से दूसरे के विरुद्ध लगे हुए आरोपों को लेते हैं.... आपका क्या अनुभव है इसमें

सीबी पांडेय : वासिंद्र जी आप तो बहुत दिनों से करीब करीब बीस साल से आप न्यायपालिका के भ्रष्टाचार को कवर करते रहे हैं...चाहे आप अखबारों में रहे हो...या फिर चैनलों में रहे हो...और आपको याद होगा कि 1987 में हमने एक किताब लिखी थी....उस समय मैं सिविल जज था लखनऊ में और उसमें यही लिखा था कि 40 साल में जो देश जहां पहुंचा उसमें सारे संस्थान तो गड़बड़ हुए ही..भ्रष्टाचार तो फैला ही...न्यायपालिका में भी नीचे से लेकर ऊपर तक भ्रष्टाचार है....उसमें एक बात समान था...ऐसा नहीं था कि उसमें केवल सबॉर्डिनेट ज्यूडिशियरी के भ्रष्टाचार में था...बल्कि मैंने ये भी लिखा था कि नीचे से अदली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट भ्रष्टाचार के गिरफ्त में गया..उसको...इस पूरे इंस्टीट्यूशन को शुद्ध करने की ज़रुरत है...सफाई करने की ज़रुरत है...आप बताइये 87 और आज...आज 87 के बाद कितने बरस हो गए...और आज भी वो सवाल वहीं का वहीं खड़ा हुआ है..अब आपने एक बहुत बड़ा सवाल पूछा कि क्या न्यायपालिका के भ्रष्टाचार का मतलब का सबॉर्डिनेट ज्यूडिशियरी का भ्रष्टाचार या न्यायपालिका के भ्रष्टाचार का मतलब है कि निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक है भ्रष्टाचार...मैं बहुच स्पष्ट शब्दों में कहना चाहूंगा...कि पूरी संवैधानिक जो व्यवस्था है उसमें पूरी की पूरी न्यायपालिका एक इंटीट्यूशन के रूप में उसे मान्यता मिली हुई है...चाहे वो सुप्रीम कोर्ट हो...हाईकोर्ट हो...सबॉर्डिनेट ज्यूडिशियरी हो....ये सब अलग अलग नहीं हैं...अब आपने सबॉर्डिनेट ज्यूडिशियरी के लिए एक कोड ऑफ कंडक्ट वो जो गवर्मेंट ..... का कोड ऑफ कंडक्ट है...वो ही सबॉर्डिनेट ज्यूडिशियरी का जजों के लिए कोड ऑफ कंडक्ट है...उनके लिए डिपार्टमेंटल इंक्वायरी है और डिपार्टमेंटल इंक्वायरी में कोई मिस कंडक्ट पाया जाता है...भ्रष्टाचार का या कोई भी मिस कंडक्ट तो उन्हें नौकरी से निकाला जाता है...ये आपने लागू कर लिया....क्या संविधान निर्माताओं की ये मंशा नहीं थी कि उच्च न्यायालय में सुप्रीम कोर्ट में भी भ्रष्टाचार होंगे...आज तक हाईकोर्ट के जजों को...सुप्रीम कोर्ट के जजों को Impeachment के अलावा आपने कोई ऐसा प्रावधान नहीं बनाया है...जिससे उनको हटाया जा सकता है...Impeachment की क्या स्थिति है इस देश में..आज तक तो कोई Impeachment हुआ नहीं...भले ही Impeachment के मेटर उठाए गए ..इस हाउस में या उस हाउस में....यहां वो फंस गया....ज्यादा हुआ तो एक-दो जजों ने इस्तीफा दे दिया...रिज़ाइन कर दिया....यानी की हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज अगर भ्रष्टाचार में लिप्त हैं...तो उनको आप हटा नहीं सकते...अब ये आप समझिए कि जब इतना बड़ा प्रोटेक्शन मिला हुआ है...तो क्या आप ये समझते हैं कि जिस तरह देश में माहौल है...नेताओं का भ्रष्टाचार ...बड़े बड़े पदों पर बैठे भ्रष्टाचार मतलब जो भी जिस पद पर..महत्वपूर्ण पद पर बैठा है....करीब करीब 80% लोग भ्रष्टाचार में लिप्त हैं...तो क्या ये अनुमान लगाया जा सकता है...कि हाईकोर्ट के जजेस जिनके पास इतना पावर है...इतने बड़े बड़े मुकदमों के फैसले करते हैं...या फिर सुप्रीम कोर्ट के जजेस जो बड़ी बड़ी कंपनियों के जहां के 40 40 हज़ार 50-50 हज़ार कंपनियों के मामले तय करते हैं...वो क्या एकदम बिलकुल पवित्र गंगा की तरह से उनकी जल धारा...न्याय की जल धारा बहाते होंगे...इस बात को चूंकि फोरम नहीं है इस तरह का...उस फोरम को आपने अभी तक नहीं बनाया तो इसके लिए कौन सा मापदंड बनेगा...अलग मापदंड हुआ की नहीं हुआ....आपने कहा ना...दोनों के लिए अलग अलग पैरामीटर है...इनके लिए तो सब पैरामीटर है...उनके लिए जांच करने के लिए आप impeachment का लॉ वही बनाया...बहुत बार एक कोशिश हुई...पिछले 8-10 सालों से की न्यायधीशों के..हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों के...इनके भ्रष्टाचार के मामलों में accountability law लाइये...और वो accountability कानून वो नहीं बनेगा......बाकी दुनिया के कानून बन जाएंगे...और सारे बन जाएंगे....लेकिन वो अकाउंटबिलिटी का कानून आज तक जजों के अकाउंटबिलिटी और कंडक्ट के बारे में ....जो पार्लियामेंट को पास करना है...आज तक वो पास नहीं होगा... जब चुनाव आएगा...तो बड़ी-बड़ी बातें होंगी...मोदी जी भी बड़ी-बड़ी बातें कहकर आए थे कि अकाउंटबिलिटी का कानून बनाएंगे...पिछली सरकारों में...मनमोहन सिंह के जमानो में भी कहा था कि अकाउंटबिलिटी बिल पास करेंगे...न्यायधीशों के ऊपर,,,सुप्रीम कोर्ट...हाईकोर्ट के न्यायधीशों के ऊपर...अकाउंटबिलिटी बिल पास क्यों नहीं होता...एक और बात बता दें आपको...ज्यूडिशियरी एक ऐसा इंस्टीट्यूशन है...जिसमें ज़ीरो टॉलरेंस होना चाहिए....भ्रष्टाचार पर ज़ीरो टॉलरेंस...ये नहीं कह सकते कि 10 % बेइमान हैं...कम बेइमान हैं....वहां तो बहुत ज्यादा बेइमान हैं...यहां पर जीरो टॉलरेंस होना चाहिए.....एक आदमी अगर बेइमान तो फिर बिलकुल ही भी...ज्यूडिशियरी में एक मिनट रहने का हक़ नहीं है...उसे जाना चाहिए...

वासिंद्र मिश्र: इसका मतलब ये है कि न्यायपालिका में जो लोग काम करने वाले लोग हैं...और खास तौर से जो हायर ज्यूडिशियल बॉडिज़ हैं.....चाहे वो होईकोर्ट हो या सुप्रीम कोर्ट हो उसमें जो काम करने वाले लोग हैं....उनके बीच में और नेताओं के बीच में जो सत्तारूढ़ दल के नेता हैं...या जो मैन ऑपोज़िशन पार्टी के नेता हैं....जोकि पार्लियामेंट में कानून बनाने में जिनकी अहम भूमिका रहती है....कोई गठजोड़ काम करता है...इस वजह से इतने लंबे समय से ये मांग लंबित है...और आज तक कानून नहीं बन पा रहा है....

सीबी पांडेय :- देखिए मजेदार बात तो ये है कि जैसे केंद्र की जो सरकारें बनती हैं...उनकी जो पहली प्राथमिकता होती है कि अपने फेवर के दो चार जज सुप्रीम कोर्ट में बैठा दो...कम से कम 20-25% हाईकोर्ट में जजेस इनके फेवर में बैठा दो...तो पहली बात तो ये है.....तो जब आप अपने फेवर के जजेस बैठाएंगे...तो फिर उनको प्रोटेक्ट भी करेंगे....जाहिर बात है...तभी तो वो बने रहेंगे...और बने रहेंगे तो आपको उन चीज़ों को आपको उसका लाभ मिलेगा....ये जो बड़े बड़े इसकी चूंकि बहुत सारी बातें हैं...इतनी खुल के नहीं की जा सकती हैं...क्योंकि वो लगेगा कि हम लोग biased होकर बहस कर रहे हैं...लेकिन सच्चाई ये है कि बड़े-बड़े कॉरपोरेट हाउस तक भी इंटरेस्टेड रहते हैं कि हमारे आदमी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज बने...बड़े-बड़े पॉलिटिशियन इंटरेस्टिड होते हैं..जोकि प्राइममिनिस्टिर...होम मिनिस्टिर..या बड़े बड़े मिनिस्टिर बनते हैं.....लॉ मिनिस्टर बन जाते हैं...इंफ्लूयंशिलय मंत्री बनते हैं...कि किसी तरह अपने लोगों को इन पदों पर बैठा दें...ताकि जो लोग अपने लोगों को बैठाएंगे..वो लोग प्रोटेक्ट करेंगे...और क्या मंशा हो सकता है...अगर उन्हें प्रोटेक्ट करने का मंशा नहीं होता...तो फिर ये कानून बनाने में....afterall देश की एक तरह से cry of the nation है.......कि भई कानून बनाइये जज के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए ..ताकि हमारे मुकदमे जल्दी हों...निष्पक्ष तरीके से जांच हो सके...अगर grievance हो तो हम आगे बढ़कर अपनी बात कह सकें....तो जो standard of morality है...जिस standard की morality इस देश में व्यापत हो गई है....उस देश में अब ये नहीं है.कि हम मान के चलें कि कोई ईमानदार होंगे...बिलकुल नही.. ये सत्य नहीं है कि आप किसी को presumption in honesty का नहीं है...जो कभी हमारे देश में जब freedom movement चल रहा था तो presumption होता था कि पॉलिटिक्स में..बड़े बड़े पदों में कोई ईमानदार हो...अब presumption किसी के पक्ष में नहीं है....दूसरी बात है ये महिमामंडित करने की....बहुत तरह ज्यूडिशियरी को महिमामंडित करते हुए उसे बहुत ज्ञान देते आएं हैं...कि इंस्टीट्यूशन महान है...बहुत बड़ा इंस्टीट्यूशन है...पवित्रता है...बड़ी-बड़ी बात की जाती हैं...बड़ी बड़ी quotes दिए जाते हैं.....और बड़े बड़े Conference होते हैं जजेस की ...तो ऐसी ऊंची-ऊंची आदर की बातें की जाती हैं...अब महिमांडित के समय गया...रियालिटी को फेस करिए...पब्लिक समझ रही है...आज चीज़ें ठीक नहीं चल रही हैं....डिसहॉनेस्टी है....लोगों को न्याय नहीं मिल रहा है ....तो अब इसके तरीके खोजने की ज़रुरत है....तरीके खोजने में अगर कुछ नहीं हो पा रहा है...तो निश्चित मानिए....कि जैसा आपने कहा..कि कोई ना कोई गठजोड़ ज़रूर है...अगर ये दोनों तरफ से गठजोड़ नहीं होता...दोनों तरफ से ये चाहत होती कि हमें इस चीज़ को क्लीन करना है...न्यायपालिका के एडमिनिस्ट्रेशन को क्लीन करना है तो कानून आने में ऑर्डिनेंस से भी कानून सकता है....ऑर्डिनेंस आने में कौन सी बड़ी बात है.....अपने मतलब के ऑर्डिनेंस आने में तो एक मिनट में जाते हैं...और इस कानून बनाने में ऑर्डिनेंस नहीं आएगा...अगर ऑर्डिंनेंस जाता तो देखते आप कि इसका क्या प्रभाव पड़ पाता

वासिंद्र मिश्र: तो इसका मतलब साफ है कि जो सरकारें हैं...उनके अंदर इच्छाशक्ति की कमी है...और जो सरकारें हैं जिनके कंधे पर कानून बनाने की जिम्मेदारी है..वो खुद नहीं चाहते हैं कि कोई सख्त कानून बनें जिससे न्यायपालिका में व्यापत भ्रष्टाचार को दूर किया जा सके....जो सबसे बड़ा सवाल है... कि जिस तरह से सिविल सर्विसेज़ कंडक्ट रूल है...कि कोई अगर सिविल सरवेंट रिटायर होता है तो रिटायरमेंट के कुछ महीने..कुछ साल तक conflict of interest वाले पदों को दुबारा एक्सेपट नहीं कर सकते...चाहे वो प्राइवेट सेक्टर हो या फिर सेमी गवरमेंट...क्या इस तरह की व्यवस्था ज्यूडिशियरी में काम करने वाले लोगों के लिए नहीं की जानी चाहिए...हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के बाद जो जज होते हैं...तो तुरंत इस तरह के लाभ के पदों को लेते हैं...जोकि नौकरी पर रहते हुए....न्यायपालिका में रहते हुए उन विभागों या उन नेताओं या उन सरकारों के खिलाफ फैसले देते रहते हैं...तो क्या ये कहीं ना कहीं conflict of interest या wasted interest का नतीजा नहीं होता है...वो लोग गवर्नर बन जाते हैं...तमाम सैंवधानिक संस्थाओं के अध्यक्ष बन जाते हैं....या और भी तमाम इस तरह के पद जो राजनेता उनको सरकारों के जरिए oblige करते रहते हैं...ये कहां तक नैतिक रूप से उचित है...

सीबी पांडेय : वासिंद्र जी देखिए....ये हाईकोर्ट जज की सैलरियां कोई कम तो है नहीं...और इनके पेंशन भी कम नहीं हैं...पेंशन के रूल्स भी इन लोगों ने....पहले ये था कि जितने दिन जज काम करेगा...उतनी का ही पेंशन मिलेगा..अब इन्होंने बढ़ाकर ये कर दिया कि नहीं इनको 20 साल अब फुल पेंशन मिलेगा...पेंशन की भी कमी नहीं है इनको....अब ये बताइये कि एक सामान्य: और नौकरी में भी 62 साल या 65 साल बात रिटायर होते हैं...कोई ये भी नहीं है कि पूरी रिटायरमेंट है...जजेस को ये जो आपने कहा कि अगर हमें किसी चीज़ में निष्पक्ष है और हमें भविष्य में वैसी चीज़ में कोई इंटरेस्ट नहीं है....तो सबसे पहला काम तो यही होना चाहिए कि हमें कोई इंप्लॉइमेंट लेना नहीं है....या उस पीरियड तक हमें कोई इंप्लॉइमेंट नहीं लेना है....3 साल या 4 साल या 5 साल ...आज रिटायरमेंट के बाद क्या ...ये थ्योरी भी खत्म हो चुकी है....अब तो नौकरी में हैं....सुप्रीम कोर्ट के जज होते हुए भी पहले 6 महीना पहले ही आपको appointment letter मिल जाते हैं कि आपको फला के चेयरमैन हो गए...आप उस बोर्ड के चेयरमैन हो गए...तो ये जो जजेस क्या है...और ये जो पार्टी हैं ये collegium system से तो जाता नहीं है......या ज्यूडिशियल इंस्टीट्यूशन से appointment तो होता नहीं हैं...ये पार्लियामेंट से तो होता नहीं है...इस तरह के जो जितने appointment हैं वो सीधे प्राइम मिनिस्टर के हाथों से होता है...या मिनिस्ट्री के हाथों में होता है...इन तरह के जो Appointment होते हैं....रिटायरमेंट के बाद वाले वो वन मैन डिपार्टमेंट होते हैं जिनको प्राइम मिनिस्टर होम मिनिस्टर लॉ मिनिस्टर और भी मिनिस्टर जो डिपार्टमेंटल मिनिस्टर हों...जिसको चाहे उसको appoint कर सकते हैं....तो जब इतना आसानी से appointment मिल सकता है....बाकी तो हाईकोर्ट जज होना...उनकी लंबी प्रक्रिया है appoint होने की..इन बड़े बड़े appointment के लिए तो कोई लंबी प्रक्रिया नहीं....बड़े ही सीधे ढंग से appointment हो जाता है ....इन judges को इसमें गवर्मेंट को भी...जजेस खुद ही कोड ऑफ कंडक्ट बना देते हैं...अपने लिए लागू करते हैं कि हम लोग कोई रिटायरमेंट के बाद कोई पद नहीं लेंगे तो आप समझते हैं कि जनता का विश्वास कितना गहरा बनता है कि जज खुद आगे आए और ख़ुद कहा कि हम कोई पद ..... कम से कम इतना तो कह सकते हैं कि हम तीन साल तक कोई पद नहीं लेंगे...

वासिंद्र मिश्र: पांडेयजी हम बात कर रहे थे कि जजों को खुद पहल करनी चाहिए और अपने ऊपर इस तरह का एक कानून बनाना चाहिए...कोई आचार संहिता बनानी चाहिए कि जिससे की रिटायर होने के बाद इस तरह के लाभ के पदों को वो ना लें कुछ बरसों तक कुछ महीनों तक जिसको लेकर की उनके ऊपर आरोप लगते है कि वो जब नौकरी में रहे हैं तो उन्होंने बेइमानी की होगी...किसी सरकार के पक्ष में किसी नेता के पक्ष में या किसी अधिकारी के पक्ष में या किसी कॉर्पोरेट घराने के पक्ष में इसको और आगे बढ़ाते हैं थोड़ा हम इस चर्चा को....अभी पिछले दिनों भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जी ने एक संबोधन में बोला है कि न्यायपालिका को अपने सीमा में रहकर काम करना चाहिए......और तीनों जो अंग हैं संविधान के...वो महत्वपूर्ण हैं और तीनों को अपनी-अपनी मर्यादा और सीमा का पालन करना चाहिए.....दूसरा आपके पुराने मित्र मार्कणडेय काटजू जी जो अकसर बोला करते हैं न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को लेकर उनका फिर बयान आया है कि न्यायपालिका में लगभग 50 फीसदी लोग भ्रष्ट हैं....जब वो नौकरी में थे तब...जब वो वकालत करते थे तब...और अब रिटायर हो गए हैं तब...आप तीनों रूप में उनको देखे हैं....इलाहाबाद हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक....इस तरह की बातें कहने वाले लोग...और एक और नाम छूट गया था चर्चा में जस्टिस बी एम खरे जी का....भारत के वो भी मुख्य न्यायधीश पद से रिटायर हुए और उनका भी मानना है कि न्याय खरीदा जाता है...जो साधन संपन्न लोग हैं...जो पैसे वाले लोग हैं....वो कानून को अपने फायदे के अनुरूप खरीद लेते हैं और कानून हमेशा गरीब लोगों के लिए ही ढंग से लागू हो पाता है....अमीरों के ऊपर उस तरह से लागू नहीं होता....आप की नज़र में ये जो लोग हैं... चाहे वो जस्टिस बीएम खरे हैं....मार्कंण्य काटजू हो...या देश के राष्ट्रपति हो...इस तरह की बातें जब ये लोग कहते हैं या फिर ये लोग जब खुद ही महत्वपूर्ण पदों पर रहते हैं तब इस तरह के कार्रवाई या इस तरह की बातें उनकी तरफ से क्यों नहीं कहीं जाती.....

सीबी पांडेय: वासिंद्र जी ...मैंने पहले भी कहा...ये तो शौकिया है...नहीं कहते जुमला है...बीच-बीच में जुमला बोलते रहना चाहिए जैसे कि जुमला बोल देंगे तो उनको लगेगा कि हम बहुत बड़े थिंकर हैं...विचारक हैं...किसी सोशल के प्रति हम बड़ा सम्मान रखते हैं....अगर इनसे पूछे...खरे साहब से....खरे साहब के बारे में मशहूर है....कि वहां दिल्ली में बैठे रहते हैं तमाम ट्रैवलर कितनों के पास...आपको जानकारी होगी....इतने मामले आर्टबिटेशन के मामले में उनके पास हैं कि उनकी कमाई करोड़ों में चल रही है...तमाम लोगों को हाईकोर्ट जज बनाने में इंटरेस्टेड रहते हैं कि उनको बनाना है उनको बनाना है....क्या है ये काम है उसका जो सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस से रिटायर हुआ है..इस तरह का काम करना चाहिए...आपको क्या लेना देना है...इतना बड़ा हैंडसम मिल रहा है....इससे बेहतर होता आप जाकर किसी लॉ इन्स्टीट्यूशन में पढ़ाते..आने वाली जेनरेशन यूथ की बनती अच्छे लॉयर बनते....अच्छे जजेज बनते....मार्केंडेय काटजू को आप तो जानते ही हैं किस तरह से उनका अपना कंडक्ट है.....कि बस लंबी लंबी बातें करो...आजकल ये फैशन हो गया है....जुमलेबाजी करना खासकर जब बड़े पदों पर पहुंच जाइए तो....ताकि लगे की आप जैसा महान कोई हो नहीं....डबल ही नहीं बल्कि ट्रिपल...फोर स्टैंर्ड अपना जीवन व्यतीत करिए....और बनते रही मीडिया में....इन लोगों के बारे में कुछ कहना नहीं ..लेकिन क्या जुमलेवाजी करने वाले लोग कोई ऐसा काम कर रहे हैं जिससे वास्तविक में समाज का निर्माण हो सके.....कम से कम इस देश में लीगल एड का जो मामला है..कोई गरीब आदमी को न्याय मिल नहीं सकता...एक-एक जिले में लीगल एड प्रोवाइड करने का काम करते...इन्हें खुद नहीं करना बल्कि...ये खुद नहीं करते लोगों को मोटिवेट करते....लीगल एजुकेशन की जरूरत है....गांव गांव के लोगों को ...न्याय पंचायतें गई...इतना कानून गया है प्रधानों के हाथ में...उनको एजुकेट करते...ये सब नहीं करना....जितनी हिपोक्रैसी होती जा रही है न्यायपालिका में खासकर रिटायरमेंट के बाद....बड़ी बड़ी बातें होती है.....हिपोक्रैसी जितनी बढ़ रही है हायर जुडिशियरी में उतनी हिप्रोक्रैसी पहले नहीं थी....

वासींद्र मिश्र: एक अंतिम सवाल जानना चाहते हैं आपसे...आपकी नजर में जो एक प्रस्ताव मौजूदा सरकार लेकर आई है न्यायपालिका में....क्लीनसिंग के लिए या जवाबदेही के लिए...कुछ भी नाम दे दीजिए...कॉलेजियम सिस्टम और एनएसी इन दोनों में किसको बेहतर मानते हैं न्यायपालिका में शुद्धिकरण के लिए.......

सी बी पांडेय: कॉलेजियम सिस्टम तो बिल्कुल फेल हो गया...पहले जो कॉलेजियम सिस्टम आया था तो इतनी खुशी हुई थी की चलिए ये पॉलिटिशियन के प्रभाव से मुक्त हो गया...अब जजेज जो अप्वाइंट होंगे प्योरली जुडिसियरी को अप्वाइंट करना है...ईमानदार और अच्छे जज आएंगे...क्योंकि उस समय जब 1992-94 में जजेज के बारे में हायर जुडिसियरी के बारे में उतना उस समय आप दौर देखे होंगे...जगमोहन लाल सिन्हा का दौर था...उस समय इमरजेंसी के बाद का एक दौर था..जजेज ने बड़ा स्टैंड बोर्ड लिया....रिजाइन किया...उस समय कॉलेजियम सिस्टम आया तो..लगा कि जुडिसियरी को क्लीन करने के लिए एक आंदोलन चल पड़ा....जजेज ने इमरजेंसी के खिलाफ इस्तीफा दिया.....तो ये जो स्थिति बनी थी....लोगों को लगा कि कॉलेजियम सिस्टम ही न्यायपालिका को शुद्ध करेगी.....लेकिन कॉलेजियम सिस्टम की ऐसी विकृति हुई की...सब जजेज के लड़के जज बनने लगे... .उसकी पराकाष्ठा तब देखने को मिली जब जस्टिस सब्रबाल कृष्णन जैसे लोग सुप्रीम कोर्ट के जज बनने लगे....

सी बी पांडेय: बहुत सारे लोग देखने को मिलेंगे...सुप्रीम कोर्ट में जब बहस चल रही थी तो सारे उदाहरण दिए गए कैसे कैसे जज लोग बने हैं...कैसे कैसे कोई भी बिना सुप्रीम कोर्ट..हाई कोर्ट जज के लिंक के बिना आगे जज नहीं बन सकता था...ये बिल्कुल साफ हो गया....पूरे देश में बात उठी...मीडिया ने भी इसको उठाया...सारे देश की यही मंशा थी कि ये सिस्टम जो रहा है इसमें ये कोशिश हो कि इसमें पॉलिटिकल इंटरफेयरेंस कम हो...और एक बार जुडिसियरी के प्रति लोगों का आस्था घट जाएगी कि देश में आप मत समझिए कि कोई
पहले ही बेरोजगारी...भ्रष्टाचार...पहले ही फैला हुआ है....जब जुडिसियरी से अगर भ्रष्टाचार खत्म होगा तो कौन संभालेगा देख लीजिएगा आने वाला समय बताएगा देश कैसे संभलेगा....और कैसे ये लोग चला पाएंगे देश को..कैसे कॉन्स्टीट्यूशन चल पाएगी....कैसे सांविधानिक रूल और लॉ चल पाएगा...ये समय बताएगा...

वासिंद्र मिश्र : बहुत बहुत धन्यवाद

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